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रविवार, 13 जून 2010

यादों की लकीरें



संस्मरण
अपने साहित्यकार को देर से पहचाना डॉ0 रत्नलाल शर्मा ने

रूपसिंह चन्देल


फरवरी की वह सुबह अधिक ठंडी न थी । हांलाकि दिल्ली में फरवरी के अंत तक ठंड अपनी जवानी में रहती है । वह सुबह पूरी तरह शांत और सुखद थी । यह 22 फरवरी, 1997 का दिन था । तय हुआ था कि हम दोनों में जो भी पहले जग जाएगा फोन करेगा । और यह बाजी मैंने जीती थी ।


''हलो'' कुछ देर तक फोन की घंटी बजने के बाद खनखनाती आवाज सुनाई दी, ''मैं तो साढ़े तीन बजे ही जग गया था। आपको फोन करने ही वाला था।''


''कितने बजे निकल रहे हैं ?''


''आप साढ़े पांच तैयार मिले। डॉक्टर कालरा को लेकर मैं निश्चित समय पर पहुंच जाउंगा।''


''आज्ञा का पालन करूंगा।''


तेज ठहाका, फिर सकुचाहट, ''मुझे इतनी जोर से नहीं हंसना चाहिए। पोता जग गया तो सौ प्रश्न करेगा।'' फुसफुसाहट, ''ठीक है डॉक्टर.... तो हम मिलते हैं।''


और डॉक्टर रत्नलाल शर्मा सवा पांच बजे मेरे यहां पहुंच गए। मुझे डॉ0 कालरा के पति ने पांच बजे फोन कर दिया था कि वे लोग पीतमपुरा छोड़ चुके हैं। उतनी सुबह दिल्ली की सड़कें प्राय: खाली रहती हैं। वाहन की गति स्वत: दोगुनी हो जाती है। डॉ0 कालरा के पति का फोन मिलते ही मैंने विष्णु प्रभाकर जी को फोन कर दिया था कि हम लोग पौने छ: बजे तक उनके यहां पहुंच जाएगें। यह एक सुखद संयोग था कि उस दिन हम चारों ... विष्णु प्रभाकर, डॉ0 रत्नलाल शर्मा, डॉ0 शकुतंला कालरा और मैं .... लखनऊ-नई दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस से कानपुर जा रहे थे। अवसर था ''बाल कल्याण संस्थान'' द्वारा आयोजित वार्षिक समारोह जिसके लिए हमें डॉ0 राष्ट्रबंधु ने बहुत ही आदरपूर्वक आमंत्रित किया था ।


डॉ0 कालरा को संस्थान उस वर्ष अन्य बाल-साहित्यकारों के साथ सम्मानित कर रहा था, जबकि हम तीनों को अलग-अलग सत्रों के अध्यक्ष-विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। मेरे लिए यह सम्माननीय बात थी, क्योंकि जिस आयोजन के एक सत्र की अध्यक्षता विष्णुप्रभाकर जैसे वरिष्ठतम साहित्यकार कर रहे थे और दूसरे की मेरे अग्रजतुल्य मित्र डॉ0 रत्नलाल शर्मा, वहां 'विचार सत्र' के विशिष्ट अतिथि के रूप में मुझे बुलाकर डॉ0 राष्ट्रबंधु ने अपने बड़प्पन का परिचय देते हए मुझे जो सम्मान दिया मैं शायद उसके सर्वथा योग्य नहीं था, क्योंकि हिन्दी में अनेक ऐसे विद्वान साहित्यकार हैं जिनके सामने मेरी बाल-साहित्य की रचनात्मकता पासंग है। खैर, डॉ0 राष्ट्रबंधु ने विष्णु जी को ले आने के लिए मुझे तो कहा ही था डॉ0 शर्मा को भी कह दिया था। डॉ0 शर्मा अति-उत्साही व्यक्ति थे और नौकरी से अवकाश ग्रहण करने के पश्चात वह बाल-साहित्य को लेकर कुछ अतिरिक्त ही उत्साह में रहने लगे थे। उनका यह उत्साह श्रीमती रतन शर्मा,उनकी पत्नी, की मृत्यु के पश्चात कई गुना बढ़ गया था और उसी का परिणाम था कि उन्होंने बाल-साहित्य के लिए कुछ करने के ध्येय से पत्नी के नाम एक ट्रस्ट बनाया और प्रति वर्ष एक पुरस्कार देने लगे। उनके मस्तिष्क में बाल-साहित्य के महत्व और विकास को लेकर अनेक योजनाएं रहतीं और वह कुछ न कुछ करते भी रहते। हालांकि उन्होंने जो ट्रस्ट बनाया था उसमें ऐसे लोगों को रखा जो बाल-साहित्य का 'क' 'ख' 'ग' भी नहीं जानते थे और इस विषय में मेरी अनेक बार उनसे चर्चा भी हुई, लेकिन उन गैर बाल-साहित्यकारों को लेकर उनके पास तर्क थे और उन तर्कों में दम भी था। एक दमदार तर्क तो यही था कि यदि एक भी बाल-साहित्यकार उन्होंने ट्रस्ट में रखा तो 'न्यास' साहित्यिक राजनीति से अछूता न रहेगा। किसी हद तक उनकी बात सही थी।


'श्रीमती रतन शर्मा स्मृति न्यास' की स्थापना के पश्चात वह बाल-साहित्य के देशव्यापी आयोजनों में शिरकत करने लगे थे और जब भी मिलते उन आयोजनों के संस्मरण मुग्धभाव से सुनाते। आयोजानों में सम्मिलित होते रहने से डॉ0 शर्मा और डॉ0 राष्ट्रबंधु प्राय: एक दूसरे से मिलते रहते और उसी आधार पर डॉ0 शर्मा ने उन्हें आश्वस्त कर दिया कि वह सभी को लेकर कानपुर पहुंचेगें। आनन-फानन में उन्होंने विष्णु जी और डॉ0 कालरा के आरक्षण करवा डाले। मेरा जाना किन्हीं कारणों से टल रहा था, लेकिन एक दिन दिल्ली विश्वविद्यालय पुस्तकालय की छत पर चाय की चुस्कियों के साथ आदेशात्मक स्वर में वह बोले, ''डॉक्टर, कोई बहाना नहीं मानूंगा। शनिवार - रविवार को कार्यक्रम है .... आपको चलना है।''


और मुझे आरक्षण करवाना पड़ा था। इसी कारण हम अलग-अलग कोचों में थे। फिर भी बीच-बीच में मैं तीनों के पास आ खड़ा होता। डॉ0 कालरा विष्णु जी के साथ की सीट में थीं और उस अवसर का लाभ उठाने के विचार से वह लगातार विष्णु जी से साक्षात्कारात्मक बातचीत में संलग्न थीं। ऐसे समय मैं और डॉ0 शर्मा बाथरूम के पास खड़े होकर बाल-साहित्य पर चर्चा करते रहे थे।


सिगरेट फूंकते बात करना डॉ0 शर्मा की आदत थी। जब भी कभी गंभीर चर्चा छिड़ती वह सिगरेट सुलगा लेते। लेकिन अनुशासन-प्रियता इतनी अधिक थी उनमें कि किसी भी सार्वजनिक स्थान में सिगरेट नहीं पीते थे। उनसे जब मेरा परिचय हुआ तब वह जीवन-विहार में 'समाज कल्याण विभाग' में कार्यरत थे और वहीं से उप-निदेशक के रूप में अवकाश ग्रहण किया था। अक्टूबर 1980 में मैं गाजियाबाद से शक्तिनगर में आ बसा था। उन दिनों केन्द्रीय सचिवालय के लिए शक्तिनगर से 240 नं0 रूट की बसें प्रत्येक दस मिनट में चलती थीं। मेरा कार्यालय उन दिनों रामकृष्णपुरम में था। मैं 240 से केन्द्रीय सचिवालय पहुंचकर वहां से रामकृष्णपुरम की बस लेता। डॉ0 शर्मा शक्तिनगर के पश्चिमी छोर में और मैं पूर्वी छोर में रहता था। वह भी उसी बस से जाते और पटेल चौक उतरते। कई वर्षों हमारा यह सिलसिला चला था। बाद में वह दूसरी बस से जाने लगे थे।


उन दिनों शनिवार को कॉफी हाउस (कनॉट प्लेस) में साहित्यकारों का जमघट होता था। नियम से जाने वालों में विष्णु प्रभाकर, रमाकांत, डॉ0 रत्नलाल शर्मा, डॉ0 हरदयाल, डॉ0 राजकुमार सैनी आदि थे। मैं भी कभी-कभार पहुंच जाता। तब कॉफी हाउस का माहौल खराब नहीं था। परनिन्दा तब भी होती, लेकिन साहित्य पर चर्चा भी होती और उसी माध्यम से एक दूसरे की खिंचाई भी होती। विष्णु जी निन्दा-प्रशंसा से विमुख मंद-मंद मुस्कराते हर स्थिति का आनंद लेते रहते। यदि वे बहस में शामिल भी होते तो बोलते धीमे ही थे, लेकिन शर्मा बहस को प्राय: उत्तेजक बना देते और जब उनके मित्र उन पर हावी होने लगते, वह अनियंन्त्रित हो जाते। लेकिन इसका आभिप्राय यह नहीं कि नौबत हाथापाई तक पहुंचती थी । डॉ0 शर्मा की यह खूबी थी कि उत्तेजित वह कितना ही क्यों न होते हों लेकिन किसी के विरुध्द अपशब्द का प्रयोग करते मैंने उन्हें कभी नहीं सुना। जब कि उनके अति अंतरंग मित्रों को कई बार उनके खिलाफ अपशब्द प्रयोग करते (पीठ पीछे) मैंने सुना था । डॉ0 शर्मा आपा तो खोते, क्योंकि वह अपनी बात पर अडिग रहते और प्राय: सही वही होते । लेकिन वह यह समझ नहीं पाते कि उनके मित्र उन्हें उत्तेजित करने के लिए ही ऐसा विनोद कर रहे थे। बाद में माहौल शांत होता और सभी फिर मीठी बातों में खो जात।


बहुत बाद में (वर्ष याद नहीं...संभवत: 1990 के आसपास) किसी शनिवार को शायद किसी मित्र ने उनके विरुध्द कोई ऐसी टिप्पणी कर दी, जिससे उन्हें गहरा आघात लगा था। उन्होंने कभी-भी कॉफी हाउस न जाने का संकल्प किया और मृत्यु पर्यन्त उसका निर्वाह किया।


अवकाश ग्रहण कने के बाद वह प्रतिदिन दिल्ली विश्वविद्यालय के केन्द्रीय पुस्तकालय के 'रिसर्च फ्लोर' के एक कमरे में बैठने लगे थे। निश्चित कमरा और निश्चित सीट थी उनकी। वहां वह पहले भी (जब नौकरी में थे ) शनिवार - रविवार को जाते थे, लेकिन अवकाश ग्रहण के बाद वह वहां तभी अनुपस्थित रहे जब या तो अस्वस्थ रहे या शहर से बाहर या किसी अन्य आवश्यक कार्य में व्यस्त।


'रिसर्च फ्लोर' उनके कारण आबाद रहने लगा था। वहां के प्रत्येक शोधार्थी के वह आदरणीय -प्रिय थे और उम्र की सीमाओं को ताक पर रखकर कॉलेज से निकले युवा से लेकर हम उम्र लोगों से वह स्वयं 'हैलो' करके 'विश' करते और चाय के लिए आमंत्रित करते। मुझ जैसे व्यक्ति, जो स्वयं व्यवहार में उदारता का समर्थक है, को भी वह सब अटपटा लगता कि उम्रदराज डॉ0 शर्मा अपने से चालीस-बयालीस वर्ष छोटे बालक-बालिका से न केवल स्वयं विश कर रहे हैं बल्कि साग्रह चाय के लिए बुला रहे हैं। हालांकि मैं स्वयं इसी आदत का शिकार हूं और गवंई -गांव का होने के कारण आयु की सीमारेखा खींचकर चलना आता नहीं। एक - दो बार मैंने डॉ0 शर्मा को इस विषय में उनकी उम्र का वास्ता देते हुए टोका भी। उनका छोटा-सा उत्तर होता, ''आप नहीं समझेंगे डॉक्टर।''


वास्तव में मैं नहीं समझ सका। वह भी अपने स्वभाव को बदल नहीं सके। एक विशेषता और भी देखी उनमें। वह हर जरूरतमंद की मदद के लिए तत्पर रहते थे। बेहतर सलाह देने का प्रयत्न करते। अनेक उदाहरण हैं जब वह किसी न किसी शोधार्थी के काम से दौड़ रहे होते थे। कई शोधार्थियों को उनसे अपने शोध से संबन्धित चर्चा करते या अपना शोध कार्य दिखाते मैंने देखा। वास्तविकता यह होती कि छात्र-छात्रा उनके किसी मित्र प्राध्यापक के अधीन शोधरत होता और डॉ0 शर्मा मित्रता का निर्वाह करते उसका कार्य देखते/गाइड करते।


प्राय: विश्वविद्यालय पुस्तकालय में बाहरी व्यक्ति को एक निश्चित अवधि तक ही बैठने की अनुमति होती है, लेकिन हिन्दी विभाग से लेकर पुस्तकालय तक डॉ0 शर्मा के अनेक मित्र (कुछ उनके सहपाठी थे) थे। डॉ0 शर्मा ने भी कभी स्वप्न देखा था कि वह प्राध्यापक बनेंगे। पी-एच.डी. भी इसी कारण उन्होंने की थी, लेकिन जैसा कि होता है प्राध्यापक बनने के लिए जो गुण व्यक्ति में होने चाहिए वे डॉ0 शर्मा में नहीं थे। डॉ0 शर्मा प्राध्यापक नहीं बन पाए, लेकिन वह उस टीस को शायद कभी भूल भी नहीं पाए। अंदर छुपा वह स्वप्न ही रहा होगा कि कभी उनके अधीन भी शोधार्थी हुआ करेंगे। शायद शोधार्थियों की सहायता कर वह उस स्वप्न को ही पूरा कर रहे थे।


एक अच्छे इंसान होते हुए भी डॉ0 शर्मा में दो कमजारियां भी थीं। जब तब उनका लेखकीय स्वाभिमान जागृत हो जाता और वह सभा-गोष्ठियों का बहिष्कार कर दिया करते। डॉ0 विनय, डॉ0 महीप सिंह, डॉ0 रामदरस मिश्र, डॉ0 नरेन्द्र मोहन और डॉ0 हरदयाल उनके गहरे मित्रों में से थे। डॉ0 शर्मा प्राय: डॉ0 विनय के घर जाते। एक बार डॉ0 विनय ने अपने घर स्व0 डॉ0 सुखबीर के कविता संग्रह पर अपनी संस्था 'दीर्घा' (दीर्घा नाम की पत्रिका भी वह निकालते थे) की ओर से विचार गोष्ठी का आयोजन किया। अध्यक्ष थे डॉ0 रामदरस मिश्र। डॉ0 शर्मा ने आलेख लिखा था। आलेख पढ़ते समय डॉ0 शर्मा को टोका-टाकी बर्दाश्त न थी । उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ। उन्होंने सभी को घूरकर देखा और अपना शाश्वत तकियाकलाम, '' इट्स एनफ'' कह वह उठ गए। सभी भौंचक। आलेख तो शुरू ही हुआ था। डॉ0 विनय ने टोका, ''क्या हुआ पंडित ?''


''मैं जा रहा हूं ।''


गर्मी के दिन थे। गोष्ठी छत पर हो रही थी। डॉ0 विनय ने रोका ... मिन्नते कीं। डॉ0 रामदरस मिश्र ने समझाने का प्रयास किया, लेकिन पंडित जी का मूड उखड़ा तो फिर जमा नहीं। वह जूते पहन सीढ़ियां उतर गए थे।


डनके व्यक्तित्व का दूसरा कमजोर पक्ष था उनकी कार्य-शैली। एक अच्छे समीक्षक -आलोचक की प्रतिभा थी उनमें, लेकिन वह उसका सही उपयोग नहीं कर सके। स्नेहिल होते हुए भी स्वभाव की अक्खड़ता ने उन्हें रचनाकारों से दूर रखा तो कर्यशैली भी बाधक बनी। कुछ भी व्यवस्थित नहीं कर पाते थे। समय का खयाल नहीं रखते थे। आवश्यक और महत्वपूर्ण को छोड़ अनावश्यक कामों-बातों और लोगों में उलझे रहे। एक बार उन्होंने बताया था कि उन्होंने लगभग एक हजार पुस्तकों की समीक्षाएं लिखी थीं।


उनकी कार्यशैली से संबन्धित स्वानुभूत एक उदाहरण देना चाहता हूं। किताबघर, नई दिल्ली से मेरे द्वारा सम्पादित लघुकथा संकलन प्रकाश्य था। यह कार्य मैंने 1985 में पूरा कर लिया था, लेकिन उस वर्ष उसका प्रकाशन नहीं हो पाया। उन्हीं दिनों डॉ0 शर्मा से इस विषय में चर्चा हुई । उन्होंने पूछा, '' उसकी भूमिका आपने लिखी है ?'' ''जी ।'' ''अरे डॉक्टर, आपने पहले क्यों नहीं बताया.... आजकल मैं लघुकथाओं पर विशेष कार्य कर रहा हूं। उसकी बहुत अच्छी भूमिका लिखता।''


'' अभी क्या बिगड़ गया है । आप लिख दें । आपकी भी प्रकाशित हो जाएगी ।''


''आप सत्यव्रत शर्मा (प्रकाशक) को कह दीजिए .... मेरी भूमिका मिलने के बाद ही वह पुस्तक को प्रेस में देंगे।''


मैंने श्री सत्यव्रत शर्मा को यह कह दिया । फिर प्रारंभ हुआ उनकी भूमिका का इंतजार। पाण्डुलिपि की एक प्रति प्रकाशक के पास और दूसरी डॉ0 रत्नलाल शर्मा के पास और शर्मा जी के वायदे दर वायदे होने लगे। ....बस इसी सप्ताह .....पन्द्रह दिन बाद....। इसी बीच उन्होंने शक्तिनगर से प्रशांत विहार शिफ्ट कर लिया। प्रकाशक को भी शर्मा जी की भूमिका न मिलने का बहाना मिल गया। 'प्रकारांतर' (लघुकथा संकलन) का प्रकाशन स्थगित होता रहा। अंतत: बहुत जोर देने पर डॉ0 शर्मा बोले, ''शिफ्ट करते समय पांडुलिपि बांधकर कहीं रख दी गई। मिल नहीं रही । रविवार को घर आ जाओ.....मिलकर खोजते हैं। मैं गया। बराम्दे में बने दोछत्ती में बोरियों में बंद पुस्तकों के साथ पांडुलिपि को हमलोगों ने खोज लिया। उसके पन्द्रह दिनों के अंदर उन्होंने छोटी-सी भूमिका लिख दी थी। उसे लिखने में उन्होंने तीन वर्षों का समय लिया था। पुस्तक 1990 में प्रकाशित हुई थी।


रत्नलाल शर्मा के साथ एक और कमजारी थी ... वह एक विधा से दूसरी की ओर दौड़ते रहे थे। कहानी, ललित निबंध, व्यंग्य, रेखाचित्र, समीक्षा, बाल-साहित्य..... आभिप्राय यह कि यदि वह अपने को एक-दो विधाओं में साध लेते तो शायद स्थिति खराब न होती। लेखक को स्वयं अपने को पहचानना होता है .... वह क्या लिख सकता है। जीवन भर इधर-उधर भागने के बाद अवकाश ग्रहण करने के पश्चात शायद उन्हें वास्तविकता का ज्ञान हुआ और उन्होंने अपने को 'बाल साहित्य' में केन्द्रित करना प्रारंभ किया। यदि वह कुछ वर्ष और जीवित रह जाते तो तन-मन-धन से बाल साहितय के लिए समर्पित हो जाने वाले व्यक्ति के रूप में अपनी अलग पहचान बना लेते।


24 फरवरी, 1997 को जब हम लोग कानपुर से शताब्दी एक्सप्रेस से लौट रहे थे तब मुझे डॉ0 शर्मा के बालमन का परिचय भी मिला । और लगा कि उन्होंने व्यर्थ ही विभिन्न विधाओं में अपना श्रम जाया किया, उन्हें बाल साहित्यकार ही होना चाहिए था। मन को संतोष हुआ कि विलंब से ही सही उन्होंने आखिर अपने साहित्यकार को पहचान लिया है ..... बाल-साहित्य के लिए यह शुभ होगा । लेकिन प्रकृति को यह स्वीकार न था। उनकी असमय मृत्यु ने एक स्नेहिल व्यक्ति हमसे छीन लिया।


मैं प्राय: हफ्ते-दो हफ्ते में डॉ0 शर्मा से मिलने विश्वविद्यालय पुस्तकालय जाता था, लेकिन उनकी मृत्यु के पश्चात लंबे समय तक नहीं गया । बहुत बाद में अपने मित्र प्रखर दलित आलोचक और 'अपेक्षा' त्रैमासिक पत्रिका के सम्पादक डॉ0 तेज सिंह से मिलने वहां जाने लगा , जो विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग में रीडर हैं। डॉ0 तेज सिंह से डॉ0 शर्मा ने ही परिचय करवाया था। वहां की सीढ़ियां चढ़ते हुए डॉ0 शर्मा की याद आती। मन करता कि उस कमरे में झांकर देखूं जहां वह बैठते थे। शायद वह बैठे काम कर रहे हों और मुझे देखते ही बोलें, '' हैलो डॉक्टर'' ,लेकिन यह सच नहीं था । सच डॉ0 शर्मा के साथ जा चुका था ।


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रविवार, 6 जून 2010

यादों की लकीरें



संस्मरण

सपनों में पिता

रूपसिंह चन्देल

पिछले दिनों पिता एक बार फिर आए । इस बार वह वर्षों बाद ......शायद छ:-सात वर्ष बाद । हर बार की भांति वह मेरे साथ बैठे , बातें की, कुछ समझाया , साथ लेकर कहीं गए .... एक अपरिचित स्थान , जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था । एक समय था जब वह महीना-दो महीना में आते , कुछ देर ही ठहरते , कुछ कहते.... जो मुझे कभी याद नहीं रहता था । वह जब भी आते उनकी वेश-भूषा निपट गंवई होती....अर्थात् मोटे सूत की कानपुर के किसी मिल की बनी लुंगी और बण्डी । कलकत्ता से रेलवे की नौकरी से सेवानिवृत्त होने के पश्चात् उन्होंने बेहद साधारण कपड़े अपना लिए थे.......किसानों वाले । लुंगी, पुरुषों की धोती का आधा, सफेद-बदरंग होती । लेकिन इस बार वह गांव की अपनी प्रिय वेशभूषा में नहीं , कलकत्ता की प्रिय वेशभूषा....मंहगी सफेद बुर्राक धोती और सफेद लक-दक कुर्ता में थे । हाथ में भद्र बंगालियों की पहचान वाला छाता , पैरों में अच्छी चप्पलें और चेहरे पर खिली मुस्कान ।


पहले वह जब आते जाने से पहले भोजन की मांग करते ... अपनी पसंद लौकी या तोराई की सब्जी और चपाती । मैं जब भोजन की व्यवस्था में व्यस्त होता , वह कब खिसक जाते पता नहीं चलता । उनकी यही बात मुझे बाद में याद रहती .... शेष सब भूल जाता । घर वाले दुखी होते कि पिता उनके सपनों में क्यों नहीं आते !


पिता जी की मृत्यु (20 सितम्बर,1970) के इक्कीस वर्ष पांच दिन (25 सितम्बर,1991) बाद मां की मृत्यु हुई और उन्हें अफसोस था कि इस पूरी अवधि में वह दो बार ही उनके सपनों में आए थे । और किसी के सपने में वह शायद ही कभी आए । मेरे सपनों में आने के लिए सभी के पास अपने तर्क थे । कुछ के अनुसार उनकी बीमारी में सबसे अधिक सेवा मैंने की थी , और उनकी मृत्यु के समय मैं उनके निकट नहीं था । शायद अंतिम क्षण उनकी आंखें मुझे खोजती रही होगीं ....इसलिए और भोजन मांगने के लिए उन लोगों के तर्क रहे कि जब मैं उनकी मृत्यु से एक दिन पहले इण्टरमीडिएट का प्राइवेट फार्म भरने कानपुर जा रहा था तब उन्होंने अपने लिए लौकी मंगा देने की मांग की थी, जिसे अनुसुना कर मैं चला गया था ..... ।


पिता जी के उन स्वप्नों से मुक्ति के लिए लोग सुझाव देते कि मैं सुबह किसी भिखारी को भोजन करवाऊं या किसी ब्राम्हण को अन्न दान दूं या मंदिर में कुछ दे आऊं । भिखारी को कुछ देना समझ आता, लेकिन मुझ जैसा नास्तिक शेष सलाहों पर मुस्करा देता । अपने हितैषियों के विश्लेषण से अलग मेरा विश्लेषण था और वह चार-छ: बार के अनुभव के बाद तय हुआ था ।


पिता जी जब भी सपने में आते..... कुछ दिनों के अंदर मैं किसी न किसी परेशानी का सामना कर रहा होता । वह परेशानी शारीरिक होती , आर्थिक या किसी भी प्रकार की..... और कुछ अवसरों के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहले ही पहुंच लेता कि जिस किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए मैं प्रयत्नशील था उसमें असफलता मिलने वाली थी या स्वयं अथवा परिवार का कोई व्यक्ति बीमार होने वाला था । अंतत: होता भी यही । मेरा निष्कर्ष था कि सपने में पिता का आना इस बात का पूर्वाभास देना था कि कोई न कोई संकट आसन्न है ।


जिन्दगीभर संघर्षरत रहने वाले पिता शायद मृत्योपरांत भी संघर्षों में मेरे साथ थे । सपनों में आकर शायद वह मुझे आगाह करते थे । लेकिन यह भी सही है कि समस्या या संकट कितना ही गहन क्यों न रहा हो मैं हर बार उससे उबरता रहा हूं । तो क्या वह आगाह कर मेरी रक्षा करते रहे । स्वप्न विश्लेषक होता तो यह जानने का प्रयत्न करता । एक समय आया कि उनके स्वप्न में आने के बाद सुबह ही मैं यह घोषणा कर देता कि कोई संकट संभावित है ।


लेकिन इस बार.... इतने वर्षों बाद, बिल्कुल अलग वेश-भूषा ... लकदक कपड़ों में पिता का आना मुझे अच्छा लगा । सपना मैं भूल गया ... याद रहा केवल उनका वह परिधान जिसमें कलकत्ता में या छुट्टियों में गांव आने में उन्हें देखता था । सुबह मन आशंकित हुआ कि क्या घटित होने वाला है .... उनका आना किस बात की ओर संकेत है ! सोचता रहा और सोचता रहा पिता के बीहड़ जीवन के बारे में जो उनसे , चाचा (काका) और मां से जाना था ।


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पिता का प्रारंभिक और अंतिम जीवन अत्यंत संघर्षमय रहा ।


मेरे पितामह कानपुर के रावतपुर (मसवानपुर) के रहनेवाले थे, जो जी0टी0 रोड पर अवस्थित है और अब शहर के मध्य में है । पितामह नवाबगंज थाने में सिपाही थे । वे लंबे और हृष्ट-पुष्ट शरीर के धनी..... शायद छ: फुट से अधिक लंबे और उनके पैर इतने बड़े कि मोची विशेष आदेश पर उनके लिए जूते तैयार करता था । इतने लंबे डील-डौल वाले पिता की संतान मेरे पिता कुल पांच फुट तीन इंच लंबे थे, लेकिन बलिष्ठ थे । शायद मेरी दादी छोटे कद की थीं । दादी की मृत्यु पिता जी के जन्म के ढाई वर्ष बाद हो गयी थी । दादा जी ने दूसरी शादी की । सौतेली दादी कद-काठी में ठीक-ठाक थीं । उनसे जन्में मेरे चाचा की लंबाई भी दादा जैसी थी ।


दादा ने नवाबगंज थाने के पास अपना बड़ा-सा मकान बनवा लिया था । यह उन दिनों की बात रही होगी जब कानपुर का विस्तार हो रहा था । एक समय कानपुर की बसावट नवाबगंज के आस-पास थी , जिसे आज भी पुराना कानपुर कहा जाता हैं । 1857 की क्रांति के बाद जो नया कानपुर बसा वह परेड के इर्द-गिर्द था। आज जहां आर्डनैंस इक्विपमेण्ट फैक्ट्री है , वहां 1857 में अंग्रेजों का किला था ....कच्ची-पक्की ईटों से निर्मित । इससे कुछ दूर ही है परेड..... जो उन दिनों सैनिकों का परेड ग्राउण्ड हुआ करता था । 1857 की कानपुर का निर्णायक युध्द इसी परेड ग्राउण्ड और किले मध्य हुआ था।


नवाबगंज कब बसा ज्ञात नहीं , लेकिन कानपुर का इतिहास 1338 के आसपास से मिलता है । इसे इलाहाबाद के तत्कालीन चन्देल वंशीय राजा कान्हदेव ने बसवाया था । अपने लाव-लश्कर के साथ कन्नोज जाते हुए वह गंगा के किनारे जिस स्थान पर ठहरे थे वह आज के नवाबगंज के पास था । तब वहां निपट जंगल था , लेकिन कान्हदेव को वहां की रमणीकता भा गयी थी । उन्होंने संचेडी (आज कानपुर के पास एक कस्बा) के तत्कालीन राजा को उस स्थान पर एक गांव बसाने के लिए कहा था । जो गांव बसा वह कान्हदेव के नाम पर कान्हपुर कहलाया , जिसका स्वामित्व एक ब्राम्हण को प्राप्त था । उस गांव के स्वामित्व के लिए उसी ब्राम्हण परिवार का मुकदमा मोतीलाल नेहरू और कैलाशनाथ काटजू द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट में लड़ा गया था ('कानपुर का इतिहास' - ले0. नारायण प्रसाद अरोड़ा )। कालान्तर में वही कान्हपुर आज का कानपुर बना ।


नवाबगंज में मकान बनाने के बाद दादा का कितना रिश्ता अपने गांव रावतपुर से रहा था यह जानकारी नहीं । नवाबगंज से रावतपुर की दूरी कुछ ही किलोमीटर है ।


पिता जब तेरह वर्ष के थे दादा की मृत्यु हो गयी थी । सौतेली दादी मेरे चाचा को लेकर अपने मायके चली गयीं और पिता अपनी एक मात्र बहन के यहां चले गये , जो उनसे कई वर्ष बड़ी और पनकी के पास एक छोटे-से गांव देसामऊ में ब्याही थीं । पिता पढ़-लिख नहीं पाए लेकिन उनकी अपनी स्वतंत्र सोच थी । कुछ दिन बहनोई के साथ उनके खेतों में काम कया, लेकिन बात नहीं बनी । उन दिनों इंच-इंच जमीन की मारा-मारी नहीं थी । गांव के इर्द-गिर्द जंगल फैला हुआ था । बहन से पैसे लेकर पिता जी ने एक जोड़ी भेैसे खरीदे और लगभग दस बीघा जमीन खेती योग्य तैयार की । दो वर्ष खेती की, लेकिन काम-काज में बहनोई का दखल बर्दाश्त नहीं हुआ । हल , भैसे बहन के दरवाजे छोड़ आगरा भाग गए । उन दिनों प्रथम विश्वयुध्द चल रहा था । सेना में भर्ती हो रही थी । तब पिता जी की आयु मात्र सोलह वर्ष थी ।


पिता भर्ती के लिए गए और उनका चयन नहीं हुआ । कारण थी उनकी आयु । अठारह वर्ष से कम के युवक को भर्ती नहीं किया जा रहा था । चयन बोर्ड में अंग्र्रेज अफसरों के अलावा एक कुशवाहा साहब भी थे । पिता जी निराश भर्ती कार्यालय के बाहर घूम रहे थे । बाहर निकलने पर कुशवाहा जी ने उन्हें देखा और उन्हें पास बुलाया । पूरी जानकारी के बाद बोले , ''मेरे साथ आओ ।''


पिता उनके पीछे हो लिए । कुछ देर चलने के बाद वह एक लंबे-चौड़े मकान में पहुंचे । वह कुशवाहा साहब का अपना घर था । पिता जी को भोजन करवाने के बाद कुशवाहा साहब बोले , ''घर के पड़ोस में मेरा एक हाता हेै । अभी दिखा दूंगा । छ: भैंसे हैं । छ: महीने तक तुम उस हाते में रहोगे ..... केवल दिसा -मैदान के लिए बाहर जाओगे । एक भैंस तुम्हारे नाम ..... उसका दूध केवल तुम इस्तेमाल करोगे .... दण्ड-बैठक....व्यायाम ...कुश्ती .....केवल अपने शरीर पर ध्यान दोगे....दूसरा कोई काम नहीं । भेैेंसों की देखभाल के लिए आदमी है । तुम्हारे खान-पान की चिन्ता मेरी । छ: महीने बाद फिर भर्ती का प्रयास करना.....तब तुम्हें निराश नहीं होना पड़ेगा ।''


कुशवाहा साहब ने घी, काजू , पिश्ता , बादाम....अर्थात् सभी प्रकार की पौष्टिक चीजें पिता जी के लिए उपलब्ध करवाई थीं।


मुझे सुनकर आश्चर्य हुआ था कि क्या ऐसे लोग भी थे जो एक अपरिचित युवक के लिए इतना करते थे । सौ वर्षों में हम कहां से कहां पहुंच गए !


पिता जी ने कुशवाहा साहब की आज्ञा का पालन किया । छ: महीने में ही उनका शरीर खिल उठा था । दूसरी बार भी चयन बोर्ड में कुशवाहा साहब थे । उन्होंने पहले ही बता दिया था कि पिता जी अपनी उम्र उन्नीस वर्ष बताएगें । कुछ अन्य बातें भी उन्होंने बतायी थीं। इस बार पिता जी सेलेक्ट हुए और कुछ दिनों के प्रशिक्षण के बाद इटली भेज दिए गए ।


वहां से विश्वयुध्द समाप्ति के बाद वह लौटे थे ।


भारत लौटते ही सेना की नौकरी छोड़ पुन: खेती की ओर रुख किया था । फिर भैसे खरीदे और (उन्हें इस बात की आशंका थी कि बैलों की खेती उनके लिए फलीभूत नहीं होगी) खेती में लग गए । लेकिन कुछ दिनों बाद ही बहनोई की दखलंदाजी से परेशान होकर मुम्बई भाग गए । वहां किसी मारवाड़ी के यहां काम किया । स्पष्ट है कि कोई छोटा काम ही रहा होगा..... घरेलू नौकर जैसा । एक दिन उस मारवाड़ी के घर के आंगन में नाली के पास उन्होंने लगभग एक सेर सोना पड़ा देखा । उन्होंने उसे उठाकर मारवाड़ी को दे दिया । उनकी ईमानदारी से मारवाड़ी ने उन्हें बख्शीश देना चाहा, लेकिन उन्होंने उसे लेने से इंकार कर दिया और नौकरी छोड़ दी। उन्हें मारवाड़ी के पेशे पर संदेह हो गया था ।


पुन: एक बार कानपुर वापसी । फिर गांव.....फिर चख-चख और पुन: प्रस्थान ।

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इस बार पिता जी जा पहुंचे कलकत्ता । आज जिस प्रकार बिहार-उत्तर प्रदेश के लोग दिल्ली दौड़ रहे हैं ... उन दिनों कलकत्ता उनका शरणस्थल था । कई दिनों तक इधर-उधर भटकने के बाद जीने का जुगाड़ सोचा । भद्र बंगाली समाज सुबह नीम की दातून आज भी पसंद करता है .... उन दिनों पसंद करने वालों की संख्या बहुत अधिक थी । उन दिनों जीविका का यह एक अच्छा साधन था और आज की भांति नीम के पेड़ों का संरक्षण भी न था । पिता ने लंबे समय तक सड़क किनारे सुबह-सुबह दातून बेचकर जीविका चलायी । कुछ समय बाद किसी परिचित के माध्यम से पश्चिम बंगाल पुलिस में भर्ती हो गए । दो वर्ष नौकरी की । एक बार वह और उनका साथी सिपाही एक चोर को ट्रेन से आसनसोल ले जा रहे थे । चोर को हथकड़ी लगी हुई थी और एक ने उसकी जंजीर पकड़ रखी थी । रात गहराई तो दोनों साथी खिड़की के रास्ते आ रही शीतल बयार में झपकी लेने लगे । एक जगह ट्रेन धीमी हुई और चोर ने आहिस्ते से जंजीर छुड़ाई और अंधेरे में कूद गया । साथ के यात्री ने इन्हें जगाया । जंजीर खींचकर ट्रेन रोकी । दोनों टार्च की रोशनी में जंगल छानते रहे , अपनी झपकी को कोसते रहे और स्वयं जेल के सीखचों के पीछे जाने की कल्पना करते रहे ।


सुबह दोनों एक गांव के बीच से निकले । भाग्य ने साथ दिया । एक लोहार की दुकान पर नजर पड़ी और दोनों चौंके । चोर लोहार से अपनी हथकड़ी कटवा रहा था । बाज की तेजी से झपठकर दोनों ने चोर को जा पकड़ा था ।


आसनसोल से कलकत्ता लौट पिता ने पुलिस की नौकरी भी छोड़ दी थी ।


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एक बार फिर गांव । फिर वही स्थितियां और पुन: कलकत्ता वापसी । पुराने साथियों के सहयोग से वह रेलवे में खलासी नियुक्त हो गए । इस बार मन जमाने का प्रयत्न किया और वर्षों तक देसामऊ नहीं गए । बहनोई की मृत्यु का समाचार मिलने पर कुछ दिनों के लिए गए और अपने खेत जवान भांजे को सौंप वापस लोट गए ।


पिता जी अथक परिश्रमी , बेहद सीधे, सरल, कोमल हृदय और ईमानदार व्यक्ति थे । सुबह चार बजे उठ जाते । कई मील चलकर कालीबाड़ी जाते .... काली दर्शन के लिए, लौटते, चाय पीते और साढ़े छ: बजे लोको वर्कशॉप (हावड़ा) के लिए निकल जाते । शाम छ: बजे के लगभग लौटते । मेरे बचपन के कितने दिन हावड़ा में बीते, यह याद नहीं लेकिन बावनगाछी की याद है मुझे । बहुत खूबसूरत फ्लैट्स थे वे ....तीन मंजिला । मेरा परिवार पहली मंजिल में रहता था । आमने -सामने फ्लैट्स के बीच लगभग सौ फुट चौड़ी जगह थी । रेलवे के वे फ्लैट्स चारदीवारी से घिरे हुए थे । केवल एक ओर... पूर्व का रास्ता खुला हुआ था, जिधर सड़क गुजरती थी और जिसे पारकर मैं पिता जी को प्रतिदिन शाम वर्कशॉप से लौटते देखता था। दक्षिण दिशा की दीवार का कुछ भाग तोड़कर लोगों ने रास्ता बना लिया था जो एक मैदान में निकलता था , जहां से होकर लोग सीधे बाजार जाते थे । कभी -कभी हम बच्चे उस मैदान में खेलने निकल जाते थे ।


अपने श्रम और लगन के बल पर पिता जी खलासी से सीढ़ियां चढ़ते हुए फिटर तक पहुंच चुके थे। मेरे जन्म से पहले ही वह फिटर बन चुके थे । कॉलोनी में उनका अच्छा रुतबा और सम्मान था । उस कॉलोनी के कुछ फ्लैट्स अफसरों को अलॉट थे और मैं देखता कि सहयोगियों के बीच ही नहीं बंगाली अफसरों के बीच भी पिता जी 'बाबू जी' के रूप में जाने जाते थे । मां-पिता दोनों ही निरक्षर थे लेकिन वे अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा देखना चाहते थे । उनकी इस लालसा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब भाई साहब पाचवीं में थे पिता जी ने उन्हें नेहरू जी की जीवनी खरीदकर भेंट की थी ।


बड़े भाई ने जैसे ही गांव से पाचवीं उत्तीर्ण किया पिता जी उन्हें कलकत्ता ले गए और अंग्रेजी ज्ञान न होने के कारण बड़े भाई को पांचवीं में ही प्रवेश दिलाया । पिता जी ने जब 1959 में अवकाश ग्रहण किया , तब भाई साहब ने हाई स्कूल किया था । वह उन्हें रेलवे में बाबू बनवाना चाहते थे । भाई साहब को नियुक्ति मिल रही थी , लेकिन बंगाली चयन अधिकारी ने पिता जी से चार सौ रुपए रिश्वत मांगी, जिसे देने से उन्होंने इंकार कर दिया और बड़े भाई को पिता जी के साथ ही कलकत्ता से प्रस्थान करना पड़ा था ।


पिता जी ने मुझे दो बार पढ़ने के लिए स्कूल भेजा । उन दिनों मैं पांच वर्ष के लगभग था । पहला स्कूल घर से बहुत दूर नहीं था । सामान्य-सा विद्यालय था वह । आया मुझे और मेरे पड़ोसी मनभरन , जिन्हें हम काका कहते थे , के छोटे बेटे प्रेमचन्द को लेने आती । मां सजा-धजाकर बड़े चाव से मुझे स्कूल भेजतीं । लेकिन मुझे वहां घबड़ाहट होती । मैंने न पढ़ने का मन बना लिया । लेकिन मन बना लेने से बात बनने वाली नहीं थी । कुछ बहाना चाहिए था और मेरे बाल मन ने बहाना खोज लिया था । मैंने जिद पकड़ ली कि स्कूल नहीं जाऊंगा ।


''क्यों ?'' पिता , भाई ने पूछा । भाई ने धमकाया भी, लेकिन पिता जी ने प्यार से समझाया था ।


''क्योंकि वहां जमीन पर बैठाते हैं ......फट्टे पर ।''


''सभी बच्चे बेैठते हैं ....तुम्हारे लिए कुर्सी मेज थोड़े लगाई जाएगी .....कोई अनोखे हो!''


बड़े भाई की इस बात पर मैं रोने लगा था । मुझे यह सब आज भी ज्यों का त्यों याद है। पिता जी ने भाई को डांटा , मुझे पुचकारा , मां ने सहलाया और समझाया , लेकिन बाल जिद .... नहीं का मतलब था नहीं ।


स्कूल का प्रिन्सिपल , जो एक बिहारी बाबू थे , मिस्टर सिन्हा , आया से मेरे स्कूल न आने का कारण जान समझाने - रिझाने घर दौड़े आए । तरह-तरह के लालच दिए , पर मैं जिद पर अटल रहा। लेकिन बड़े भाई छोड़ने वाले नहीं थे । वह जिस हायर सेकेण्डरी स्कूल से हाई स्कूल कर रहे थे , उसके पास एक अच्छा-सा स्कूल था ... मेज कुर्सी .... अच्छे स्मार्ट अध्यापकों और अच्छी ड्रेस वाला । बड़े भाई ने कैसे जुगाड़ बनाया, पता नहीं, लेकिन उन्होंने मुझे वहां प्रवेश दिला दिया । अब बचने का कोई रास्ता नहीं था । बड़े भाई के साथ बस से जाने-आने लगा । वहां मेरा मन भी लगने लगा । इसका एक कारण और था । बड़े भाई हर दिन लंच में मेरे पास आते और कभी लड्डू तो कभी कोई अन्य मिठाई मुझे दे जाते । घर में वह मुझे अंग्रेजी पढ़ाते और पढ़ाई से बिदकने वाला मैं पढ़ने लगा था । लेकिन सत्र समाप्ति से पूर्व ही अकस्मात मां को गांव जाना पड़ा और मुझे और मेरी छोटी बहन को भी उनके साथ लौटना पड़ा। उसके बाद की मेरी पढ़ाई गांव में ही हुई ।


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लेकिन दो बातों के उल्लेख के बिना बात अधूरी ही रहेगी । यद्यपि पिता जी का सम्पूर्ण जीवन ही किसी उपन्यास की मांग करता है, लेकिन संक्षेप में दो घटनाओं का उल्लेख करना चाहता हूं ।


पहली घटना मां ने बतायी थी । उन दिनों बड़े भाई छोटे थे और पिता जी के पास रेलवे का छोटा मकान था । उन दिनों उनकी डयूटी शिफ्ट में रहती थी । वह रात शिफ्ट में थे और वेतन का दिन था वह । उस दिन वह रेलवे लाईन के साथ शाम वर्कशॉप जा रहे थे। रास्ते में उन्हें उनका एक सहयोगी मिला, जो दिन की शिफ्ट करके लौट रहा था । दोनों ने पांच मिनट बातचीत की । सहयोगी घर और पिता जी वर्कशॉप की ओर बढ़ गए । कुछ दूर जाने पर पिता जी को नोटों भरा पर्स मिला । खोलकर देखा .... सोचा और अनुमान लगाया कि वह पर्स कुछ देर पहले मिले सहयोगी का था जिसमें उसका वेतन था । उन्होंने पर्स आफिस में जमा कर दिया ।


पर्स उसी सहयोगी का था ।


दूसरी घटना आंखों देखी है । जाड़े के दिन थे । प्रेमचंद के अतिरिक्त कॉलोनी में मेरा कोई साथी नहीं था । बड़े भाई के साथियों की संख्या पर्याप्त थी । शाम बीच के मैदान में वह अपने मित्रों के साथ वॉलीवाल खेलते...नियमत: । मैं सजधज कर -- कोट-पैण्ट पहन फ्लैट के नीचे सीढ़ियों के साथ बने छोटे चबूतरे पर बैठ उन्हें खेलता देखता । उस दिन मेरी दृष्टि सड़क की ओर से आ रहे काफ़िले पर जा टिकी । चार लोगों ने चारपाई थाम रखी थी और साथ कम से कम दस-पन्द्रह लोग थे । काफ़िला निकट आया । भाई और उनके साथियों का खेल थम गया । पता चला चारपाई पर घायल पिता थे । क्रेन से वह किसी डिब्बे को उठा रहे थे कि क्रेन का पहिया टूटकर उनकी छाती पर आ गिरा था । खून से लथपथ पिता सामने ....भाई किंकर्तव्यविमूढ़ । पूरी कॉलोनी इकट्ठा थी ....सिर ही सिर ...शोर और चीत्कार करती मां । उसके बाद क्या हुआ मैं जान नहीं पाया । बाद में कितने ही दिन मैं भाई के साथ रात रेलवे अस्पताल जाता रहा था । पिता जी स्वस्थ हो गये थे, लेकिन भारी-भरकम पहिए ने उन्हें जो आंतरिक चोट पहुंचाई थी , कालांतर में वही उनकी मृत्यु का कारण बनी थी । उस घटना के कुछ दिनों बाद उनका प्रमोशन हुआ ....... ड्राइवर के रूप में । वह मालगाड़ी चलाने लगे और उसी पद से उन्होंने अवकाश ग्रहण किया था ।


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अवकाश ग्रहण के बाद पिता जी ने गांव में बसने का निर्णय किया , जबकि उनके साथियों ने उन्हें कलकत्ता में रुकने का आग्रह किया था । तीन हजार का एक अच्छा-सा मकान भी उन्हें मिल रहा था । पैसा भी था, लेकिन मां गांव रहना चाहती थीं । मां को उनके चाचा (कंचन सिंह गौतम) ने तेरह बीघे खेत दे दिए थे और मकान बनाने की जगह । नाना के पास यह जमीन अतिरिक्त थी । गांव में सर्वाधिक उपजाऊ खेत उन्हीं के पास थे , लेकिन जो जमीन उन्होंने मां को दी थी वह ऊंची -नीची और चरीदा थी, जिसे कभी उपजाऊ नहीं बनाया जा सका । पिता जी ने अपने गांव देसामऊ में जो खेत भांजे को जोतने-बोने और उनके लौटने पर उन्हें लौटा देने के लिए दिए थे उस भांजे ने कोर्ट में उन्हें मृत घोषित कर (शपथ पत्र देकर) वे खेत अपने नाम लिखा लिए थे । लोगों ने पिता जी को जब भांजे पर मुकदमा करने की सलाह दी तब उन्होंने उत्तर दिया ,'' भांजा बेटा समान होता है ...... उससे कैसा मुकदमा !''


कानपुर शहर से सटे उन दस बीघे खेतों की कीमत आज लगभग ढाई-तीन करोड़ रुपए है । उसी प्रकार मेरे पितामह का जो मकान नवाबगंज में था पिताजी की उदासीनता के कारण नगर महापालिका ने उसे अपने अधिकार में ले लिया था ।


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गांव आकर कलकत्ता के बाबू जी पूरे किसान हो गए थे और गांव में 'चंद्याल' के नाम से जाने जाने लगे । नौकरी करने के दौरान जब भी वह गांव आते (मेरा ननिहाल ही मेरा गांव है ) हर दिन किसी न किसी के घर आमंत्रित रहते । एक युवा नाई, जिसका नाम मैं भूल गया हूं , सप्ताह में दो बार उनकी तेल-मालिश करने आता और बाबू जी मुक्त हस्त पैसे खर्च करते । मां के ठाठ सदैव शाही रहे । बनारसी साड़ी से नीचे कुछ नहीं पहना और यह सब 1962 तक चला । पिता जी ने भले ही खेती में झोंक अपने को माटी कर लिया था , लेकिन मां और हम सब तब तक अच्छा जीवन जीते रहे जब तक अवकाश प्राप्त होने के समय एक मुश्त मिला पैसा समाप्ति की कगार पर नहीं पहुंचा । लेकिन पिता जी ने शायद पहले ही यह स्थिति भांप ली थी । उन्होंने दुधारू गाएं , भैसें पाल ली थीं .... खेती करने के भैसों के साथ । उन दिनों तेरह जानवर थे मेरे यहां । कुछ खेत तिहाई में दिए जाते और कुछ वह स्वयं करते । लेकिन नाले के किनारे होने के कारण भयानक जाड़े में खेतों को पाला मार जाता और फसल के नाम पर जो मिलता उससे लागत बमुश्किल निकल पाती ।


कलकत्ता की अपनी आदत के अनुसार पिता सुबह चार बजे जागते । अब गाय-भैसों की सेवा उनके लिए काली दर्शन था । कुट्टी काटते, सानी तेैयार करते और साढ़े पांच बजे तक हसिया फावड़ा ले खेतों की ओर निकल जाते । जानवर घर से कुछ दूर पसियाने के बीच बने बड़े से घेर में रहते थे और पिता भी वहीं सोते थे । उनके खेतों की ओर जाने से पहले ही गाय-भैंसों का दूध निकालने या दूधिया से निकलवाने के लिए मां बालटी लटका घेर पहुंच जाती थीं ।


पिता जी के रिटायरमेण्ट की राशि खत्म होने के बाद और बड़े भाई की नौकरी लगने तक घर का खर्च गाय-भैंसों के कटता दूध से ही चला था । मुक्त भाव से लोगों को चीजें देने वाले ....ठाठ-बाट से रहने वाले पिता जवान बेटे की उतारन पहनने के लिए विवश थे ,लेकिन उन्हें कभी खीझते-झींकते ...दुखी होते या शिकायत करते नहीं देखा । 'दुखे-सुखे समेकृत्वा' वाला भाव रहता उनके चेहरे पर । जानवरों के लिए सानी आदि तैयार करते हुए ऊंची आवाज में भजन गाते रहते तरन्नाम में ।


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1967 में पहली बार उनके फेफड़ों में फोड़ा हुए । खांसी के साथ बलगम नहीं मवाद निकलता । शहर में दिखाया गया । इंजेक्शन ....लगभग एक सौ इंजेक्शन लगे । चार महीने लगे ठीक होने में । ठीक होते ही पुन: काम । डाक्टरों ने शायद उनके मर्ज को टी.बी. समझाा था । जबकि छाती पर वर्षों पहले गिरे क्रेन के पहिए के जख्म से उन्हें फेफड़ों का कैंसर हो गया था । इंजेक्शन ने कुछ समय के लिए कष्ट मुक्त कर दिया था । लेकिन तीन वर्ष बाद पुन: वह उभरा और इस बार जानलेवा साबित हुआ । बलगम के स्थान पर जो पस वह उगलते उसमें इतनी बदबू होती कि घर का कोई भी व्यक्ति उनके निकट ठहरने से कतराता । मां भी घबड़ाती, लेकिन मैं रात-दिन उनकी सेवा में रहा । मिट्टी के बड़े बर्तन में राख डाल दी गई थी । जब भी उन्हें खांसी आती मैं उनके सिर के नीचे हाथ लगा उन्हें आधा उठाता और राख भरा मिट्टी का बर्तन उनके मुंह के पास कर देता । उनके थूकने के बाद साफ कपड़े से उनका मुंह साफ करता । लगभग डेढ़ महीना यह सिलसिला चला था ।


19 सितम्बर, 1970 को सुबह इंटरमीडिएट का फार्म भरकर (20 सितम्बर अंतिम तिथि थी) 21 को वापस लौट आने की बात उनसे कहकर मैं कानपुर गया । लेकिन बीस सितम्बर की रात मेरे छोटे बहनोई ने कानपुर पहुंच मुझे उनके दिवगंत होने की सूचना दी थी ।

मृत्यु के समय मैं उनके अंतिम दर्शन से वंचित रहा था । क्या इसीलिए वे मेरे सपनों आते रहे । लेकिन उनके आने का जो विश्लेषण मैंने किया था इस बार भी वह सही सिध्द हुआ । मध्य मई में मेरा एक अत्यावश्यक कार्य सम्पन्न होना था , जो नहीं हुआ । पिता शायद उसका पूर्वाभास देने आए थे ।
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रविवार, 25 अप्रैल 2010

यादों की लकीरें



संस्मरण

एक किस्सागो से मुलाकात

रूपसिंह चन्देल

संस्मरणों की इस श्रृंखला में मैंने कुछ साहित्यकारों पर लिखा तो उन लोगों पर भी जिनका साहित्य से दूर का भी रिश्ता नहीं था । जिन साहित्यकारों पर लिखा उन्होंने किसी न किसी रूप में मुझे प्रभावित किया और दूसरे लोगों की मेरे जीवन में कुछ स्मरणीय भूमिका रही । सभी पर लिखने के अपने कारण रहे लेकिन मुख्य कारण उन पर लिखकर उन सबकी स्मृतियों को जीने का सुख प्राप्त करना रहा । मैं आज जो हूं उसके निर्माण में जिन लोगों की सकारात्मक भूमिका रही उन्हें याद करना उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के अतिरिक्त कुछ नहीं है । उनमें से एक नाम डॉ0 शिवतोष दास का है ।

डॉ0 दास दुबले , पांच फीट छ: या सात इंच लंबे , चमकदार आंखों और चपटे ---कुछ लंबोतरे चेहरे वाले व्यक्ति थे । उनकी भौंहों पर घने बाल थे । मुंह में बनारसी पान , दाहिने हाथ में छाता (जैसा कि प्राय: बंगाली भद्र लोगों में देखने को मिलता है ) , और बायें में रेड वाइन कलर का चमड़े का बैग .....पैर में चप्पलें और ढीले पैण्ट पर बाहर निकली शर्ट...... वह प्रतिदिन सुबह आठ बजे मुझे शकितनगर बस स्टैण्ड पर दो सौ चालीस नंबर बस की प्रतीक्षा में पंक्ति में खड़े दिखते । यदि मुझे आते हुए नांगिया पार्क के मोड़ पर देख लेते तब चीखते .......''आसून.....आसून.....।'' और मैं दौड़ लेता । लेकिन यदि उस बस में मेरे लिए सीट मिलने की संभावना न होती तब वह भी बस छोड़ देते और हम दूसरी बस में होते जो दस मिनट बाद जाने वाली होती । उन दिनों शक्तिनगर से सेण्ट्रल सेक्रेटरिएट के लिए प्रत्येक दस मिनट में दौ सौ चालीस नंबर बस शक्तिनगर से चलती थी और यात्री अनुशासन में पंक्तिबध्द बस में चढ़ते थे । आज की भांति अनुशासन-हीनता नहीं थी । आज बसों के लिए दिल्ली में कहीं कोई पंक्ति नहीं दिखती और यदि होती भी है तो बस के आते ही वह बिखर जाती है । सभ्यता के मुखौटे में दिल्ली इन तीस वर्षों में इतनी असभ्य .....इतनी संवेदनशून्य और खुदगर्ज हो गयी है कि सभी एक दूसरे के कंधे पर चढ़कर निकल जाना चाहते हैं ।

साहित्य भी अपवाद कैसे रह सकता था । हालंकि जड़ें काटने वाले लोग तब भी थे , लेकिन आज जैसी गलाकाट स्थिति न थी । तब एक -दूसरे की सहायता के लिए अधिक हाथ आगे बढ़ते थे और नि:स्वार्थभाव से .... आज ऐसे हाथ हैं लेकिन संख्या कम हो गयी है ।

शिवतोष दास से मेरा परिचय डॉ0 रत्नलाल शर्मा ने करवाया था । दास साहब कमला नगर में ई-135 में रहते थे , जबकि डॉ0 शर्मा शक्तिनगर में आनाज गोदाम के पास गंदा नाले की ओर रहते थे ....... मेरे घर से दस मिनट के रास्ते पर । परिचय के मामले में मैं सदैव संकोची रहा हूं । स्वयं आगे बढ़कर परिचय करने से आज भी बचता हूं । संभव है इसे लोग मेरा अहंकार मानते हों या कुछ और लेकिन मैं आज भी अपनी इस आदत का शिकार हूं । एक बार परिचय होने के बाद अपनी ओर से उसके निर्वाह की भरपूर कोशिश करता हूं ......। रिश्तों में कांइयापन मुझे स्वीकार नहीं.....इसका अहसास होते ही कोई कितना ही बड़ा लेखक-व्यक्ति क्यों न हो उससे दूर छिटक लेने में मैं समय नष्ट नहीं करता ।

उन दिनों मेरे पास पढ़ने के लिए बहुत कुछ होता था ....खासकर कथा-साहित्य । दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी , मारवाड़ी पुस्तकालय (चांदनी चौक) ,और केन्द्रीय सचिवालय पुस्तकालय का मैं स्थायी सदस्य था और दिल्ली विश्वविद्यालय और साहित्य अकादमी पुस्तकालयों का अस्थायी । शक्तिनगर से आर।के। पुरम तक की मेरी एक ओर की यात्रा में दो बसें बदलकर डेढ़ -पौने दो घण्टे लगते थे । आते -जाते मुझे तीन-साढ़े तीन घण्टे मिलते , जिसमें मैं किसी भी कृति के सत्तर-अस्सी पृष्ठ पढ़ लेता । डॉ0 रत्नलाल शर्मा समाज कल्याण विभाग में डिप्टी डायरेक्टर थे , जो उन दिनों संसद मार्ग में था । वह प्रतिदिन मुझे पढ़ते देखते ..... और महीनों देखते रहे । बस में उनके परिचितों की संख्या बहुत थी और प्राय: वह आगे बैठते , जबकि मैं जानबूझकर बीच में या पीछे बैठता । कई महीनों बाद डॉ0 शर्मा ने मेरे बारे में पूछ लिया । वह आलोचक थे ...... उन्होंने अपना परिचय उसी रूप में दिया था , लेकिन उन्हें उनके मित्र आलोचक मानने को तैयार नहीं थे । उनके मित्रों में डॉ0 विनय , डॉ0 कमलकिशोर गोयनका , डॉ0 रामदरस मिश्र , डॉ0 हरदयाल , डॉ0 नरेन्द्र मोहन , डॉ0 प्रताप सहगल , डॉ0 अश्वनी पाराशर , डॉ0 सुखबीर ..... थे और उनके माध्यम से इन सबसे मेरा परिचय हुआ। डॉ0 विनय दास साहब के ब्लॉक में रहते थे और प्राय: इन सबका उनके यहां बैठना होता । इनमें से कोई प्राय: डॉ0 शर्मा को छेड़ देता और वह उत्तेजित हो बैठक छोड़कर विनय के घर की सीढ़ियां उतर जाते । लेकिन ऐसा वह अपने समकालीनों के साथ ही करते । मुझ जैसे युवा और अपने से बहुत जूनियर के प्रति उनका व्यवहार बहुत ही आत्मीय होता था ।

डॉ0 रत्नलाल शर्मा ने दास साहब से मेरा परिचय करवाया , ''आर. के. पुरम में केन्दीय हिन्दी निदेशालय में हैं दास साहब ....बड़े लेखक हैं । ''

पहली बार केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय नामक संस्था के बारे में जाना और आगे जितना ही जाना यही निष्कर्ष निकाला कि यह संस्था एक सफेद हाथी है ..... हिन्दी के नाम पर जनता के धन का दुरुपयोग करने वाली मृतप्राय: संस्था । डॉ0 दास वहां सहायक शिक्षा अधिकारी थे । उनसे परिचय के बाद सुबह बस में मेरा पढ़ना बंद हो गया । उनके पास संस्मरणों का भंडार था , जिसे वह किसी किस्सागो की भांति सुनाते और सफ़र का पता ही नहीं चलता । मैं सोचता , यह व्यक्ति यदि कथाकार होता तो कितने ही मील के पत्थर गाड़ चुका होता ।

वह बनारस के रहने वाले थे और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र रहे थे । वहां से उन्होंने मिलटरी साइंस में एम0एस0सी किया था । उनके मुताबिक उन्होंने ओटावा विश्वविद्यालय से पी-एच।डी. की थी और दिल्ली से ओटावा की यात्रा का एक बार नहीं अनेक बार उन्होंने आकर्षक वर्णन किया था ..... फिर विश्वविद्यालय जीवन का भी ।

''इतनी योग्यता के बाद भी आप केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय जैसे अर्थहीन संस्था में.....और वह भी ग्रुप-बी गज़टेड अफसर के रूप में क्यों सड़ रहे हैं ?'' एक दिन मैंने पूछ लिया ।

''सब किश्मत का खेल है चंदेल जी ।'' मुंह में पान चभुलाते हुए उन्होंने कहा ।

उनके बैग में कई बीड़े पान रहते , जो वह घर से लगवा लाते थे ।

उनके साथ रिसर्च असिस्टैण्ट बनकर नौकरी प्रारंभ करने वाले लोग इधर-उधर घूमकर वहां निदेशक बने.... डॉ0 रणवीर रांग्रा वहां एक मेसेंजर के पद पर नियुक्त हुए और कहीं न जाकर वहीं निदेशक के पद तक पहुंचे । 'कोई रहस्य है.........दास साहब कुछ छुपा रहे हैं' मैं सोचता लेकिन उस विषय में मैंने कभी कोई चर्चा नहीं की । मैं उनके किस्से सुनकर ही प्रसन्न था । लेकिन जाड़े के एक दिन डॉ0 रत्नलाल शर्मा ने दिल्ली विश्वविद्यालय के रिसर्च फ्लोर की छत पर धूप में बैठकर चाय पीते हुए कहा , ''डॉ0 दास ने पी-एच0डी0 नहीं की ..... होम्योपैथ का सार्टीफिकेट है उनके पास ।''

छठवें -सातवें दशक में लखनऊ से होम्योपैथ और आयुर्वेद के प्रमाणपत्र सहजता से मिल जाया करते थे । संभव है डॉ0 शर्मा सच कह रहे हों लेकिन इस विषय में मेरी रुचि नहीं थी ।

बहरहाल गाहे-बगाहे दास साहब मेरे घर आने लगे थे । उनकी पत्नी मीना दास आर्टिस्ट थीं और दिल्ली दूरदर्शन द्वारा निर्मित घारावाहिकों में उनकी कोई न कोई भूमिका होती थी । प्राय: वह कृषि-दर्शन में किसी से बातचीत करती दिखतीं ।

1982 , फरवरी में कानपुर की बाल-कल्याण संस्था ने बाल साहित्य में दास साहब के योगदान के लिए उन्हें सम्मानित किया । वह मुझे भी अपने साथ ले गये ....''आपका शहर है .... अपका साथ अच्छा लगेगा । ''

पुरस्कार पाकर वह बहुत प्रसन्न थे और शायद वह उनके जीवन का प्रथम और अंतिम पुरस्कार था । उन दिनों उन्होंने अपनी पुस्तकों की जो साइक्लोस्टाइल्ड प्रति मुझे दी थी उसमें तब तक उनकी बाल साहित्य की प्रकाशित पुस्तकों की संख्या चौसठ थी । उनकी पुस्तकें किताबघर , आर्य बुक डिपो, , प्रकाशन विभाग (भारत सरकार ) , पेनमेन पब्लिशर्स आदि से प्रकाशित हुईं थीं , जिनमें आदिवासियों और जन-जातियों पर अनेक बड़ी पुस्तकें भी थीं ।

1982 में एक दिन बस में उन्होंने मुझे एक प्रस्ताव दिया , '' आप हमारी संस्था के लिए कोई पुस्तक क्यों नहीं लिखते ?''

''मैं.......।'' मैं चौका था , क्योंकि तब तक मैं साहित्य में अपने पैर जमाने की कोशिश कर रहा था और 'विशाल साहित्य सदन ' , नवीन शाहदरा से मेरा बालकहानी संग्रह - ''राजा नहीं बनूंगा'' ही प्रकाशित हुआ था । 'यत्किंचित' के कवि के रूप में मैं फ्लाप घोषित किया जा चुका था और कवि होने के मुगालते से बाहर आ चुका था । अब कथा साहित्य ही मेरी दुनिया थी । तब तक कोई प्रकाशक मुझे पहचानता नहीं था .... बल्कि उनकी दृष्टि में मैं लेखक था ही नहीं । 'प्रभात प्रकाशन' के श्यामसुन्दर जी ने उन्हीं दिनों बहुत ही शालीनता से कहा था , '' न ....न .... अभी आप अपने को लेखक न कहें .....अभी तो आपने लिखना शुरू ही किया है .....।''

बात गलत नहीं थी ।

इस वास्तविकता से वाकिफ़ मेरे लिए दास साहब का प्रस्ताव आश्चर्यचकित करने वाला था । बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा ''निदेशालय की एक योजना है प्रकाशकों के सहयोग से पुस्तक प्रकाशन की । पाण्डुलिपि आप निदेशालय में किसी प्रकाशक के माध्यम से प्रस्तुत करेंगे । निदेशालय तीन विद्वानों से उस पर राय लेगा । स्वीकृत होने पर प्रकाशक को तीन हजार प्रतियां प्रकाशित करनी होगीं । निदेशालय उसमें से एक हजार प्रतियां खरीद लेगा । प्रकाशक लेखक को उन एक हजार की तुरंत रायल्टी देने के लिए बाध्य होता है ।''

मुझ जैसे नये लेखक के लिए योजना आकर्षक थी ।

''फिर कहानियों का संग्रह प्रस्तुत कर देता हूं ।''

''नहीं , कथा-साहित्य नहीं....कुछ और विषय सोचिए .....।''उस दिन बात यहीं समाप्त हो गयी । लगभग एक सप्ताह बाद उन्होंने पूछा ,''विषय सोचा ?''

''नहीं ।''

''आप अपराध विज्ञान पर पुस्तक लिखें ।''

'' मैं और अपराध विज्ञान ..........यह तो मज़ाक हो गया ।''

''नहीं.....मेरे पास इस विषय पर पर्याप्त सामग्री है ।'' चेहरे पर गंभीरता ओढ़ वह बोले , ''भाभी जी (मेरी पत्नी) दिल्ली विश्वविद्यालय पुस्तकालय में हैं ..... उनकी सहायता लें । आप स्वयं अनेक पुस्तकालयों के सदस्य हैं ...... बहुत अच्छा रहेगा । एक बार लगकर काम कर जायें .....पुलिस विभाग , क्राइम ब्रांच ....सर्वत्र आपकी पूछ बढ़ जाएगी । ''

''भाड़ में जाये पूछ .....मुझे कहानियां ही लिखने दीजिए ।''

लेकिन वह पीछे पड़ गये और एक दिन ढेर-सी सामग्री मेरे घर छोड़ गये । विषय भी सुझा दिया -- ''अपराध : समस्या और समाधान ।'' मैंने उनकी दी सामग्री का अध्ययन किया । पत्नी की सहायता ली । अन्य पुस्तकालयों से अपराध संबन्धी डॉटा इकट्ठा किया । मनोवैज्ञानिकों के अपराध संबन्धी वियारों का अध्ययन किया और कार्य प्रारंभ किर दिया । छ: महीनों तक मैंने कोई अन्य साहित्यिक कार्य नहीं किया । पाण्डुलिपि टाइप करवाकर दास साहब को सौंप दी ।

''मुझे नहीं ..... मेरे मित्र प्रकाशक हैं सुखपाल जी .... आर्य बुक डिपो , करोल बाग ....उन्हें दे आइये । पेमेण्ट के मामले में वह ईमानदार हैं । आजकल इस प्रोजेक्ट को मैं ही देख रहा हूं । मैं उन्हें कह दूंगा । ''

पण्डुलिपि मैं सुखपाल जी को दे आया । मैं प्रसन्न था कि दिल्ली में एक ढंग के प्रकाशक से परिचय हुआ । यह तो बाद में जाना कि वह साहित्य के नहीं स्कूलों की पुस्तकें प्रकाशित करते थे ।
पण्डुलिपि केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय से स्वीकृत हो गयी । पत्र मुझे और आर्यबुक डिपो के पास आया । दास साहब से पूछा , ''अब ?''

''जाकर अनुबंध करो । '' कुछ देर चुप रहकर बोले , ''सुखपाल जी से कहना कि वह आपको अनुबंध के साथ तीन हजार रुपये अग्रिम दें ।''

दास साहब की सलाह मान मैं सुखपाल जी से मिला । मेरा प्रस्ताव सुनते ही वह उत्तेजित स्वर में बोले , ''अग्रिम मैं किसी को नहीं देता .....आपको तो बिल्कुल ही नहीं , क्योंकि आपसे मेरा अधिक परिचय नहीं है । फिर तीन हजार ......।''

लौटकर मैं सीधे दास साहब के घर गया । पता चला वह घर में नहीं थे । हालांकि कभी-कभी वह होकर भी मना करवा देते थे । एक बार का ऐसा ही प्रसंग उन्होंने सुनाया था । उनके पास ढाई कमरे थे किराये पर । छोटे कमरे को उन्होंने स्टडी बना रखा था । उसका निकास ड्राइंगरूम से था । वह स्टडी में कुछ लिख रहे थे । कोई मित्र मिलने आ गया । मीना जी ने कहा , ''वह बाहर गए हैं ।''

''कोई बात नहीं भाभी जी ....मैं उनके आने का इंतजार करूंगा ।'' और मित्र महोदय बैठ गये । जाड़े के दिन.....दास साहब लिखने के फेर में पेशाब टालते रहे थे ....'' अब .....'' वह सोचने लगे । दो घण्टे तक उन पर क्या बीती होगी , कल्पना की जा सकती है ।

सुबह बस में पूरा विवरण सुनकर वह बोले ,'' आप फोन करके सुखपाल जी को कह दें कि यदि वह अग्रिम राशि देंगे तभी पाण्डुलिपि उनके यहां से प्रकाशित होगी ..... अन्यथा आप किसी अन्य प्रकाशक को दे देंगे । यदि वह नहीं छापते तो लिखकर दे दें ।''

मैंने दास साहब के निर्देश का पालन किया । सुखपाल भले प्रकाशक थे । लिखकर देने के लिए तैयार हो गये । इधर दास साहब ने किताबघर के श्री सत्यव्रत शर्मा से उसे प्रकाशित करने की चर्चा की और वह तैयार हो गये । लेकिन मुझे अग्रिम तीन हजार नहीं डेढ़ हजार ही देने के लिए तैयार हुए । सत्यव्रत जी अनुबंध करने के लिए दास साहब के साथ मेरे घर आये । डेढ़ हजार का चेक पाकर मैं इतना प्रसन्न था कि उस पुस्तक का कॉपी राइट मैंने मीना दास के नाम लिख दिया ... जो आज भी उन्हीं नाम है । हालंकि उसका दूसरा संस्करण आज तक नहीं हुआ और न ही मेरी उस पुस्तक में कोई रुचि रही । लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि दास साहब मुझे छोटे भाई की भांति मानने लगे । 'अपराध :समस्या और समाधान' के बाद उनके कारण सत्यव्रत जी ने एक साथ मेरी तीन पाण्डुलिपियां प्रकाशनार्थ लीं । एक कहानी संग्रह (पेरिस की दो कब्रें) , बाल कहानी संग्रह (अपना घर) और लघुकथा संग्रह (चीख) । लेकिन उन्होंने केवल कहानी संग्रह ही 1984 में प्रकाशित किया । 'अपना घर' बहुत बाद में अभिरुचि प्रकाशन से और 'चीख' संशोधित रूप में 'कुर्सी संवाद' शीर्षक से 1997 में पेनमेन पब्लिशर्स से प्रकाशित हुए ।

दास साहब के माध्यम से ही मेरा परिचय जैनेन्द्रे जी के पुत्र प्रदीप जैन से हुआ और प्रदीप ने पूर्वोदय प्रकाशन के लिए मेरा किशोर उपन्यास 'ऐसे थे शिवाजी' लिया । तीन सौ रुपये अग्रिम राशि भी दी । यह 1985 की बात है । लेकिन उन्होंने उसे प्रकाशित नहीं किया ।

*******

एक दिन दफ्तर में दास साहब का फोन आया , ''चन्देल जी.... तुरंत आइए .....।''

''क्यों ?''

''इलाहाबाद से सहगल साहब आए हैं .....चांद कार्यालय वाले ।''''चांद कार्यालय .....?''

''अरे भाई, चांद पत्रिका .....आप तो इतिहास में रुचि रखने वाले व्यक्ति हैं ।''

मैं दौड़ गया । सड़क के इस पार-उस पार का फासला । दास सहब मेरे बारे में सहगल साहब से पहले ही हवा बांध चुके थे । यह वह दौर था जब मैं पत्र-पत्रिकाओं में धुंआधार लिख रहा था । दैनिक हिन्दुस्तान के प्रत्येक दूसरे रविवासरीय संस्करण में मेरी एक रचना होती थी । सहगल साहब मेरे नाम-काम से परिचित थे ।

''आप चन्देल जी की बाल साहित्य की पुस्तकें प्रकाशित करें ..... ।'' दास साहब बोल रहे थे और ''दीजिए साहब ....मुझे आपको प्रकाशित कर अच्छा लगेगा । '' सहगल साहब ने कहा ।

उनका नाम अशोक कुमार सहगल था । चांद पत्रिका उनके पिता जी निकालते थे , जिसका फांसी अंक सरकार ने जब्त कर लिया था । सहगल साहब ने मेरी चार पुस्तकें प्रकाशित कीं , जिनमें तीन बाल कहानी संग्रह और 'ऐसे थे शिवाजी' किशोर उपन्यास थे । 1985-86 में चारों की अग्रिम भुगतान के रूप में उन्होंने चार हजार रुपये दिये थे । बाल साहित्य की पुस्तकों की दृष्टि से उन दिनों यह अच्छी राशि थी क्योंकि बड़े-बड़े प्रकाशक बाल साहित्य की पाण्डुलिपियां मिट्टी भाव खरीदते थे... ढाई -तीन सौ से लेकर पांच सौ में ----सदा के लिए । कर्तार सिंह सराभा' पर मेरे किशोर उपन्यास 'अमर बलिदान' (1992 ) के साथ राजपाल एण्ड संस ने ऐसा ही किया था और मैं आज तक उसे पुनर्मुद्रित नहीं करवा सका ।

यद्यपि तीन प्रकाशकों से ही डॉ0 शिवतोष दास ने मेरा परिचय करवाया , लेकिन यह उन्होंने तब किया जब इस क्षेत्र में मेरी कोई पहचान नहीं थी । उसके बाद मैं एक के बाद अनेक (अब तक चौदह) प्रकाशकों के संपर्क में आया और दास साहब ने जो जमीन मेरे लिए तैयार की थी .... मैंने मित्रों के लिए करने की कोशिश की । मेरे माध्यम से जब मेरे किसी मित्र की कोई पुस्तक प्रकाशित होती है तब अपनी पुस्तक प्रकाशित होने जैसा सुख मैं अनुभव करता हूं ।

मेरे और दास साहब के बीच कुछ मुद्दों पर मतभेद भी रहे , लेकिन संबन्धों में कोई फ़र्क नहीं आया । 1987-88 के आस-पास हमारा साथ आना-जाना छूट गया था । कभी-कभार हम मिलते , लेकिन उनमें वही उत्साह.......लपककर मिलना....घर परिवार ...माशा-कुणाल....सबके हालचाल पूछना । जबकि मैं उनकी दोनों बेटियों और मीना जी के बारे में पूछना भूल जाता ।

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अवकाश ग्रहण करने के बाद ही उन्हें चालीस वर्ष पुराना किराए का मकान छोड़कर विजयनगर जाना पड़ा था । एक दिन विश्वविद्यालय में टकरा गये । कुछ दुबले हो गये थे । बोले , ''आजकल करेले के जूस पर जी रहा हूं ।''

''शुगर के शिकार हो गये ? दुबले पतले लोगों को भी शुगर हो जाती है ? आप तो पैदल भी खूब चलते हैं ।''

''हो गयी .....कैसे ...... पता नहीं ।''

''वक्त कैसा कट रहा है ?''

''कुछ लिखना-पढ़ना.....विश्वविद्यालय में विजिटिगं प्रोफेसर हूं ......कुछ क्लासेज मिल जाती हैं ......।'' कुछ रुककर बोले ,'' मैंने नोएडा में मकान ले लिया है । एक महीने में शिफ्ट कर जाऊंगा ।''

जिन्दगी भर दास साहब 'एक ऐसी महत्वाकांक्षा पाले रहे जिसकी पूर्ति संभव नहीं थी , लेकिन अपने को उस रूप में प्रस्तुत करने की आदत वह कभी छोड़ नहीं पाए । इस मनोवैज्ञानिक कमजोरी को मैंने यथासमय समझ लिया था और उनके साथ मुझे कभी कोई परेशानी नहीं हुई । इसके बावजूद वह एक सहज ,सरल और भले व्यक्ति थे ।

एक बार मैं सपरिवार उनसे मिलने नोएडा गया ..... यह शायद 1997 की बात है । वह कुछ और दुबले हो गये थे , लेकिन प्रसन्न थे । उसके बाद उनसे मेरी मुलाकात नहीं हुई ।
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शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

यादों की लकीरें




संस्मरण

अस्थिर स्वभाव थे डॉ0 लक्ष्मीनारायण लाल

रूपसिंह चन्देल
मार्च 1979 के दूसरे शनिवार ( 9।03.1979 ) का खुशनुमा दिन । यानी मुरादनगर की 'विविधा' संस्था के सदस्यों को संस्था के वरिष्ठ सदस्य स्व0 प्रेमचन्द गर्ग के सरकारी मकान में अपरान्ह चार बजे काव्य गोष्ठी के लिए एकत्रित होना था । सुभाष नीरव को छोड़ हम सभी वहां पहुंचे। नीरव सुबह दिल्ली गए थे और गर्ग जी को कह गए थे कि गोष्ठी प्रारंभ होने तक वह लौट आएगें ।

आध घण्टा बीत जाने के बाद भी जब नीरव नहीं लौटे, गोष्ठी प्रारंभ कर दी गई । संतराज सिंह उसकी अध्यक्षता कर रहे थे । आर्डनैंस फैक्ट्री में संतराज सिंह वैज्ञानिक और प्रशासनिक अधिकारी थे और गर्ग जी के बॉस थे । गर्ग जी बहुत विनम्र और मृदुल स्वभाव व्यक्ति थे। संतराज सिंह संस्था के संस्थापक सदस्यों में से थे और हमारी हर गोष्ठी में होते थे। गर्ग जी उनका विशेष खयाल रखते थे.......उनके लिए वह कवि कम अफसर ही अधिक होते थे । उनका खयाल रखते हुए ही साढ़े चार बजे काव्य पाठ प्रारंभ कर दिया गया था । सुधीर अज्ञात ( जो इन दिनों इंदौर में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की एक शाखा में मैनेजर हैं और अब 'अज्ञात' उपनाम का प्रयोग नहीं करते ) के कविता पाठ पर चर्चा शुरू ही हुई थी कि एक बड़ा-सा थैला कंधे से लटकाए हांफते हुए सुभाष नीरव पहली मंजिल के उस मकान में पहुंचे । चेहरे पर थकान स्पष्ट थी। प्रस्थान के लिए उद्यत मार्च की उस ठंड की ठुनक के बावजूद बस और रिक्शा की लटक-पटक और धूल-धक्कड़ उनकी बरौनियों पर चस्पां थी ।
कुछ देर के लिए कार्यक्रम स्थगित हुआ । सभी की नजरें नीरव के बैग पर टिकी थीं । उस बैग में क्या था केवल मैं ही जानता था ।
पानी पीकर नीरव ने बैग खोला और उसमें से 'यत्किंचित' की कुछ प्रतियां निकालीं । सबकी नजरें अब उस अड़तालीस पृष्ठों के कविता संग्रह पर टिक गयी थीं । मैं उसे हाथ में लेने के लिए विकल था। संतराज सिंह विचलित थे । उनका विचलन उनके चेहरे पर लटक आया था ।
''अरे वाह.....आप और चन्देल जी....आप दोनों को बधाई । '' भारी बैठे हुए गले से गर्ग जी ने हमें बधाई दी । उनकी आवाज ऐसी ही थी ।
नीरव ने एक-एक कर प्रतियां मित्रों की ओर बढ़ाईं - ''यह मेरा और चन्देल का संयुक्त कविता संग्रह है ।''
प्रति हाथ में पकड़ उसे खोले बिना ही संतराज सिंह उद्वेलित स्वर में बोले , ''यह क्या ढंग है पुस्तक भेंट करने का । हस्ताक्षर तक नहीं .... '' कुछ देर तक वह उलट-पलटकर उसकी साज-सज्जा देखते रहे फिर बोले , '' आप लोगों ने गुपचुप संग्रह छपवा लिया ...... यह ठीक नहीं......। ''
हम दोनों हत्प्रभ संतराज सिंह के चेहरे की ओर देखते रहे थे ।
''संस्था में और भी लोग हैं .... आप लोगों ने जिक्र तक करना उचित नहीं समझा ....।'' संतराज ने और भी बहुत कुछ कहा , जो आज याद नहीं । वह तेजी से उठे और किसी को कुछ कहने का अवसर दिए बिना ही सीढ़ियां उतरने लगे। गर्ग जी की परेशानी का अनुमान लगाया जा सकता है , जो उनके पीछे लपकते हुए सीढ़ियां उतर रहे थे ।
कुछ देर बाद गर्ग जी मायूस-से लौटे और मुंह के दोनों कोनों में झांक आए झाग में बुदबुदाते हुए बोले - ''यह उचित नहीं हुआ ।''
स्थिति अप्रिय हो चुकी थी । गोष्ठी समाप्त कर दी गयी और वह विविधा की अंतिम गोष्ठी सिध्द हुई थी । बाद में नीरव और मैंने इसका विश्लेषण किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि उस क्षण संतराज सिंह का कुंठित कवि बोल रहा था .... ।
'यत्किंचित्' हम दोनों की पहली पुस्तक थी जिसे हमने अपने पैसों से छपवाया था । हम दोनों उससे बहुत उत्साहित थे । मैं अपने को बड़े कवियों की पंक्ति में आरूढ़ अनुभव करने लगा था ,लेकिन डॉ0 हरिवंशराय बच्चन ने मुझे वास्तविकता से परिचित करवाते हुए दो टूक शब्दों में लिखा -- ''तुममें काव्य प्रतिभा नहीं है। तुम कुछ और कुछ भी क्यों न बनो लेकिन कवि नहीं बन सकते।''
बच्चन जी का वह पत्र आज भी मेरे पास सुरक्षित है । लेकिन इस पत्र के मिलने से पूर्व हम दोनों कुंलाचें भरते हुए लोगों को पुस्तक की प्रतियां बांटते रहे थे । एक दिन मैंने नीरव से डॉ0 लक्ष्मीनारायण लाल के यहां जाने का प्रस्ताव किया । उन्हीं दिनों 'सारिका' में उनका आत्मकथ्य प्रकाशित हुआ था, जिसमें उनके जीवन संघर्ष से मैं प्रभावित हुआ था। उनसे मिलने के लिए लखनऊ के मेरे एक परिचित ने 1978 में मुझे प्रेरित किया था । डॉ0 लाल उनके बचपन के मित्र थे ।
उसके बाद ही मैंने डॉ0 लाल का साहित्य खोजकर पढ़ना प्रारंभ कर दिया था । हिन्दी कहानी पर उनका शोधग्रंथ चर्चित था । उन दिनों वह पत्र-पत्रिकाओं में धुंआधार लिख रहे थे ....सारिका, कादम्बिनी, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग, दैनिक हिन्दुस्तान...। लेकिन चाहकर भी मैं उनसे मिलने नहीं जा सका । अब 'यत्किंचित्' के रूप में उनसे मिलने जाने का हमारे पास एक आधार था ।
एक दिन हम दोनों ईस्ट पटेलनगर उनके घर जा पहुंचे । जिस व्यक्ति ने हमारा स्वागत किया उनका कद लगभग छ: फुट लंबा, शरीर हृष्ट-पुष्ट, बंटे जैसी बड़ी आकर्षक आंखे, चौड़ा गोल चेहरा और चेहरे पर पसरी मुस्कान… वही डॉ0 लक्ष्मीनारायण लाल थे ।
मिलने पर नहीं लगा कि डॉ0 लाल हमें पहचानते नहीं थे । संग्रह देख बधाई दी, प्रशंसा की और नीरव से उनकी दो-तीन कविताएं सुनीं । 'सारिका' के उनके आत्मकथ्य की चर्चा चलने पर विस्तार से अपने जीवन संघर्षों की उन्होंने चर्चा की । यह पूछने पर कि उन्होंने खालसा कॉलेज के प्राध्यापक पद से त्याग-पत्र क्यों दिया था, विस्तार से उन्होंने प्रमोशन में हुई धांधली और अपने साथ हुए अन्याय के विषय में बताया। उन्हें सुपरसीड कर उनसे जूनियर प्राध्यापक को रीडर बना दिए जाने पर उन्होंने त्याग-पत्र दे दिया था । उसके बाद नेशनल बुक ट्रस्ट में सम्पादक से लेकर घनश्यामदास बिरला की जीवनी लिखने तक की यात्रा...... कई चाहे-अनचाहे समझौते… आपात्काल के तुरंत बाद जयप्रकाश नारायण पर लिखी उनकी बहुचर्चित पुस्तक - 'एक प्रकाश : जयप्रकाश' आदि पर लगभग डेढ़ घण्टे तक हम चर्चा करते रहे थे। उस मुलाकात के दौरान जो स्मरणीय बात उन्होंने कही वह यह कि किसी भी साहित्यकार को स्वयं को पहचानना चाहिए कि वह वास्तव में क्या कर सकता है । उसे उसी दिशा में सक्रिय होना चाहिए। ''क्या कर सकने से उनका आभिप्राय था कि वह किस विधा विशेष विधा में अपनी लेखनी को सार्थकता प्रदान कर सकता है । उसे उसी में कार्य करना चाहिए । एक बात उन्होंने और कही थी, ''हर साहित्यकार के अंदर एक सम्पादक होता है । उसे निर्ममतापूर्वक अपनी रचनाओं का सम्पादन करना चाहिए ।''
उनकी ये दोनों बातें हम आज तक नहीं भूले । डॉ0 बच्चन और डॉ0 लाल ने मुझे अंतर्मंथन के लिए विवश किया और मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मैं कवि नहीं कथाकार ही बन सकता हूं । लेकिन इन दोनों ने ही नीरव की पीठ ठोकी थी। खासकर बच्चन जी ने उनकी कविताओं की प्रशंसा करते हुए उन्हें अपना आशीर्वाद दिया था ।
डॉ0 लाल के साथ नीरव की वह प्रथम और अंतिम मुलाकात थी, लेकिन मैं गाहे-बगाहे उनके यहां जाता रहा । हर बार उनके नए स्वरूप के दर्शन होते मुझे । कभी वह बहुत प्रसन्न दिखते तो कभी उखड़े हुए । एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया था कि वह नियम से लेखन करते हैं… सुबह नौ बजे से दोपहर एक बजे तक…फिर लंच के बाद कुछ विश्राम और चार बजे के बाद पुन: साहित्य… ।
उन दिनों कन्हैयालाल नंदन 'सारिका' के सम्पादक थे । एक दिन उनकी चर्चा चलने पर मैंने गर्वपूर्वक कहा , '' नंदन जी ने उसी इंटर कॉलेज से हाई स्कूल किया , जिससे मैंने और उनका गांव मेरे गांव से तीन मील के फासले पर है ।''
यह बात 1982 या 1983 की है ।
''फिर तुम्हारे उनसे अच्छे संबन्ध होगें ।''
''नहीं । नंदन जी से मैं अब तक केवल दो बार मिला हूं । वे शायद ही मुझे पहचानते हों ।''
''उनसे जब भी मिलना .....गांव की चर्चा मत करना ।''
''क्यों ?''
''गांव की चर्चा से वह बचते हैं ।'' डॉ0 लाल देर तक चुप रहे, फिर बोले, ''कल नंदन जी सपत्नीक मेरे यहां आए थे ....लंच पर ।'' वह फिर कुछ देर चुप रहकर बोले ,'' मैं प्राय: एक बात सोचता हूं ।'' मुस्कराते हुए उन्होंने कहा , ''हिन्दी पत्रकारिता में तीन आश्चर्य हैं।'' मुस्कान उनके चेहरे पर पूरी तरह फैल चुकी थी , ''कन्हैयालाल नंदन , राजेन्द्र अवस्थी और जयप्रकाश भारती ।''
''वह कैसे ?''
मेरे इस प्रश्न पर उन्होंने चुप्पी साध ली थी ।
इन्हीं दिनों एक दिन दफ्तर में उनका फोन आया , ''रविवार को क्या कर रहे हो ?''
''आज्ञा दें डाक्टर साहब ।''
''करोलबाग में पीतांबर पब्लिशिंग हाउस के यहां एक मीटिगं है .... तुम्हे आना है । ''
मैं गया । वहां शीला झुनझुनवाला (उन दिनों वह साप्ताहिक हिन्दुस्तान की सम्पादक थीं ) के पति , जो कहीं इनकमटेक्स कमिनश्नर थे , सुरेन्द्र शर्मा के अतिरिक्त अन्य कई लोग उपस्थित थे । प्रकाशक की ओर से डॉ0 लाल पर एक स्मारिका प्रकाशित की जानी थी और उनका अभिनन्दन होना था । स्मारिका के सम्पादन का कार्य मुझे सौंपा गया । अभिनंदन समारोह में मैं नहीं गया, लेकिन स्मारिका का संपादन करते हुए मुझे यह स्पष्ट हुआ कि साहित्यकार उनसे एक दूरी बनाकर रखना चाहते हैं । ये बातें बाद में समझ आयीं । उनके स्वभाव की अस्थिरता उसका सबसे बड़ा कारण था और दूसरा बड़ा कारण था । उनकी प्रसन्नता और नाराजगी अप्रत्याशित होते थे। स्वाभिमान अहंकार की सीमा चूमने लगता । श्रेष्ठता का भाव लोगों को उनसे दूर करता । संघर्ष के बाद उपलब्धियां प्राप्त करने वाले लोगों के साथ ऐसा ही होता है ।
एक बार ग्वालियर में उनके नाटकों का मंचन था । लौटने पर मुलाकात हुई तो बोले , ''रंग बरस रहा था .... रंग । लोगों की दृष्टि में मोहन राकेश बौने हो गए मेरे सामने । ''
शायद राकेश का भी कोई नाटक वहां मंचित हुआ था ।
डसके बाद अपनी व्यस्तताओं के कारण लगभग चार वर्षों तक मैं उनसे नहीं मिला। एक दिन एक पत्रिका में प्रकाशित उनके पते से ज्ञात हुआ- वह ईस्ट पटेल नगर से पश्चिम विहार डी0डी0ए0 फ्लैट में शिफ्ट हो गए थे । यह उनका अपना मकान था । 1988 में एक दिन मैं किसी कार्यवश पश्चिम विहार गया । लौटते समय उनके घर भी गया । चार वर्षों बाद मिलने की शिकायत… कहां रहे के उत्तर में कुछ मनगढंत कहानी… फिर लेखन आदि की चर्चा। बातचीत में उन्होंने पुन: अपनी वह सलाह दोहरायी जो उन्होंने 1983 के अंत में मुझे दी थी। उनकी वह सलाह भी मेरे लिए स्मरणीय रही । 1983 में मेरी पहली बड़ी पुस्तक किताबघर से प्रकाशित हुई थी - 'अपराध : समस्या और समाधान' । मैंने उन्हें पुस्तक दी थी । कुछ दिनों बाद मिलने पर उन्होंने कहा , '' विषय तो तुम्हारा नहीं है लेकिन तुमने परिश्रमपूर्वक शोधपूर्ण कार्य किया है । अपराध को अपने कथा साहित्य का विषय बनाओ। हिन्दी में ऐसे कथा-साहित्य का अभाव है । ''
संभव है उनकी यह सलाह अवचेतन में काम कर रही थी या वे पात्र ही इतनी प्रबलता से मुझे उद्वेलित करते रहे थे कि अनेक कहानियां और 'पाथर टीला' , 'नटसार' और 'शहर गवाह है' उपन्यास अपराधी प्रवृत्ति के चरित्रों को केन्द्र में रखकर लिखे गए । 'पाथर टीला' और 'नटसार' पूर्णरूप से खलनायक प्रधान उपन्यास हैं । कई आलोचकों ने कहा कि अंग्रेजी में खलनायक प्रधान उपन्यास का प्रारंभ 'गॉड फादर' से माना जाता है जबकि हिन्दी में पहली बार 'पाथर टीला' में ऐसा प्रयोग किया गया है ।
उन दिनों डॉ0 लाल को एक हिन्दी टाइपिस्ट की आवश्यकता थी । मेरे कार्यालय में एक जैन साहब थे.... एल.डी.सी. । उनसे चर्चा की। वह शनिवार -रविवार दस बजे से शाम पांच बजे तक उनके यहां काम करने के लिए तैयार थे । मैंने डॉ0 लाल से बात की । उन्होंने जैन साहब को बुला लिया । महीने में आठ दिनों का भुगतान तय होने के बाद जैन ने विनम्रतापूर्वक उनसे किसी एक शनिवार को आधे दिन की मोहलत देने का अनुरोध किया जिससे वह गृहस्थी के लिए आवश्यक वस्तुएं खरीद सकें । यह सुनते ही डाक्टर लाल हत्थे से उखड़ गए । जैन को उन्होंने इतना डांटा कि वह बेचारे रुआंसे होकर उनके घर से निकले । अगले दिन मुझे बताया । मैं भी आहत हुआ । उनके घर कभी न जाने का निर्णय किया लेकिन दफ्तर में लगातार उनके फोन आने लगे । एक दिन जाना पड़ा ।
डॉ0 लाल ऐसे मिले जैसे कुछ हुआ ही न था । बिल्कुल प्रसन्न । उन दिनों वह 1857 पर अवध के किसी ताल्लुकेदार पर केन्द्रित उपन्यास की तैयारी कर रहे थे । देर तक उसकी चर्चा होती रही । मैंने उन्हें प्रतापनारायण श्रीवास्तव का बहुचर्चित उपन्यास 'बेकसी का मज़ार' पढ़ने की सलाह दी ।
''तुम्हारे पास है ?''
''अपनी प्रति मैंने किताबघर के श्री सत्यव्रत शर्मा को दे दी थी उसके पुनर्मुद्रण के लिए। श्रीवास्तव जी की बेटी मेरे माध्यम से सत्यव्रत जी से मिल चुकी हैं । अनुबंध होते ही छप जाएगा ।''
''मैं सत्यव्रत से ले लूंगा ।''
उन दिनों किताबघर से उनकी पुस्तकें प्रकाशित हो रही थीं । उन्होंने शर्मा जी से वह उपन्यास ले लिया और मृत्युपर्यंत उसे वापस नहीं किया। वह उपन्यास पुन: मुद्रित नहीं हो सका ।
उपन्यास पर चर्चा चल ही रही थी कि फोन की घण्टी बजी । डॉ0 लाल लपककर दूसरे कमरे में गए । लौटे तब बहुत उत्तेजित थे ।
''तुम्हारी पीढ़ी के लेखकों को क्या हो गया है ?''
''क्या बात हुई डाक्टर साहब !''
''शकरपुर से फोन था---साप्ताहिक अखबार से (उन्होंने लेखक का नाम बताया) । मैं एक दस हजार रुपए के पुरस्कार का निर्णायक हूं... अकेला निर्णायक । इस युवा लेखक का आज यह चौथा फोन था ... वह चाहता है कि पुरस्कार मैं उसे दूं ।'' वह कुछ देर चुप रहे, ''मैंने उसे डांट दिया और दोबारा फोन न करने के लिए कह दिया।''
और सच ही उस वर्ष उस लेखक को वह पुरस्कार नहीं मिला , लेकिन उसके अगले वर्ष वह लेखक उस पुरस्कार को हासिल करने में सफल रहा था । उसके कुछ वर्षों बाद जब उसे मुम्बई (तब तक वह एक अखबार से संबध्द होकर मुम्बई पहुंच चुका था) के एक लेखक द्वारा अपनी पत्नी के नाम पर दिए जाने वाला दस हजार रुपयों का स्मृति पुरस्कार उसे मिला तब किसी को कतई आश्चर्य नहीं हुआ। बाद में वह पुरस्कार मुम्बई से बाहर स्थानांतरित हो गया था। पुरस्कार हासिल करने में उस लेखक को महारत हासिल है । उस लेखक की एक और क्षुद्रता का उल्लेख आवश्यक प्रतीत हो रहा है । हाल में एक दिन रात बारह बजे मुम्बई से एक युवा कवि का फोन आया । उनका पहला फोन था और पहली ही बार उन्होंने मुझसे लगभग एक घण्टा बात की और अपनी तीन कविताएं सुनाई । बातचीत प्रारंभ करते समय उस लेखक के विषय में उस युवा कवि ने बताया कि एक दिन उन्होंने उस लेखक से मेरी चर्चा की तो उसने मोटी भर्रायी आवाज में कहा , ''राजेन्द्र यादव की सीढ़ियों पर सुबह से शाम तक बैठे रहने वाले लेखक का नाम है रूपसिंह चन्देल ।''
उस युवा कवि से अपने बारे में उस लेखक के उद्गार सुनकर मैं बिल्कुल हत्प्रभ नहीं था । मैंने युवा कवि से कहा, '' आपने उससे गलत समय में मेरे बारे में पूछा होगा। निश्चित ही उस क्षण वह कई बोतल शराब के नशे में रहा होगा ।''
युवा कवि ने हंसते हुए कहा , '' शायद… शराब, चाटुकारिता और अवसरवादिता उस लेखक की कमजोरी हैं ।'' क्षणिक चुप्पी के बाद उन्होंने कहा, '' और पीत पत्रकारिता भी…।''

........तो उस लेखक और हमारी पीढ़ी पर देर तक बोलने के बाद डॉ0 लाल जैन साहब के बारे में बोलने लगे थे । फिर लंबी चुप्पी .... सन्नाटा .... सन्नाटे को तोड़ता पंखे की हवा से फड़फड़ाता तिपाई पर रखा अखबार…। कुछ देर बाद उन्होंने पत्नी को आवाज दे चाय बनवाई और चाय पीते हुए वे बिल्कुल दूसरे ही डॉक्टर लक्ष्मीनारायण लाल हो गए थे । उन्होंने फिर अपने लिए फुल टाइम किसी टापपिस्ट की व्यवस्था कर देने के लिए कहा ।
उन दिनों मैं शक्तिनगर में रहता था और आर.के.पुरम में नौकरी करता था । मेरे पड़ोस की एक महिला भी आर.के.पुरम में नौकरी करती थीं, और प्राय: शाम को वह उसी बस में होतीं जिसमें मैं होता। कई वर्षों तक संवादहीनता के बाद एक दिन उन्होंने वार्तालाप प्रारंभ की और उसके बाद सामने पड़ने पर हमारी 'हलो' 'नमस्ते' होने लगी । एक दिन उन्होंने मोहल्ले की एक लड़की का जिक्र करते हुए कहा कि उसके लिए किसी प्रकाशक के यहां टाइपिगं का काम दिलवाऊं। लड़की ने हिन्दी -अंग्रेजी स्टेनोग्राफी सीख रखी थी । मुझे डॉ0 लाल की याद हो आयी । उनसे चर्चा की तो उसी शाम वह उस लड़की को मुझसे मिलवाने ले आयीं । मां और बड़ी बहन के साथ वह कुछ मकान छोड़कर किराए पर रहती थी । उसके पिता की मृत्यु हो चुकी थी । भाई नहीं था । वह डॉ0 लाल के यहां जाने के लिए तैयार हो गयी ।
आगामी रविवार को पड़ोस की वह महिला (श्रीमती अरुणा आवेल) उस युवती को लेकर डॉ0 लाल के घर गयीं । पगार , छुट्टी , समय ....काम... आदि तय हो गया और वह युवती दो बसें बदलकर उनके घर जाने लगी । एक महीना बीता । उसे पगार मिली और वह मेरे घर लड्डू देने आयी । दूसरा महीना बीता भी नहीं था कि श्रीमती आवेल ने बताया कि उस लड़की ने डॉ0 लाल के यहां जाना छोड़ दिया ।
''कहीं दूसरी जगह नौकरी मिल गयी ?''
''नहीं।''
''फिर ?''
कुछ देर वह चुप रहीं फिर बोलीं ,''डाक्टर साहब उसे बहुत डांटते थे। टॉयलेट जाने तक के लिए टोकते थे .... कामचोरी का आरोप लगाते थे ।''
मैं शर्मसार था । उस लड़की के दिए लड्डुओं की मिठास मुंह से मिटी भी नहीं थी और डॉ0 लाल..... उन्होंने मेरे माध्यम से काम करने गए दूसरे व्यक्ति का अपमान किया था .... और इस बार एक लड़की का । मुझे ऐसा लगा कि श्रीमती आवेल ने कुछ बातें छुपायी थीं । शायद इसलिए कि वह लड़की थी । मैं लंबे समय तक श्रीमती आवेल के सामने पड़ने से बचता रहा । हालांकि वह सामान्य थीं । उसके बाद मैं डॉ0 लाल के घर कभी नहीं गया और न ही मेरे पास उनका कभी फोन आया ।
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शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

यादों की लकीरें


संस्मरण

एक और कस्तूरबा

रूपसिंह चन्देल

1962 दिसंबर का एक दिन । आसमान में घटाटोप बादल । अरहर के पौधों पर झूमती-इठलाती ,खेतों -सड़कों पर मंडराती ,शरीर पर नश्तर चुभाती ठंडी हवा ।

स्कूल से हम चार बजे छूटे । वैसे हमारी छुट्टी साढ़े तीन बजे होती थी, लेकिन जिस दिन हेड मास्टर छिद्दा सिंह (मेरे उपन्यास ‘रमला बहू’ में चित्रित छिद्दा सिंह नहीं ) का गणित का पीरियड होता , उस दिन हम देर से ही निकल पाते । छिद्दा सिंह हमें गणित और इतिहास -भूगोल पढ़ाते और जब वह क्लास में प्रवेश करते दो-चार छात्रों को छोड़ हम सभी के शरीर में बिना ठण्ड के भी कंपकंपी छूट जाती । दुबला, गहरे सावले रंग के पचपन के आस-पास की आयु के छिद्दा मास्टर , जिन्हें हम छिद्दा मुंशी जी भी कहते , के हाथ में सदैव एक पतली छड़ी होती थी और वह छड़ी कभी-किसी भी छात्र पर कहर बरपा देती । छिद्दा मास्टर के दोनों कान और नाक छिदे हुए थे .....शायद इसीलिए उनके मां-पिता ने उनका नाम छिद्दा सिंह रखा था । सुना था कि उनके पिता की औलादें जीवित नहीं बचती थीं इसलिए एक वर्ष का होते ही उन्होंने उनके नाक-कान छिदवाने का टोटका किया था और अपने छात्रों को पीटने के लिए छिद्दा सिंह जीवित रह गए थे ।

उस दिन भी छिद्दा मास्टर का गणित का पीरियड था । हमारे स्कूल में तब तक बिजली की व्यवस्था नहीं हुई थी और शायद तब तक उस गांव (महोली) में बिजली पहुंची भी न थी । बादलों के कारण क्लास में रोशनी कम थी और छिद्दा मास्टर को बीजगणित का टेस्ट लेना था । उन्होंने हम सभी को स्कूल के बाहर मैदान में पंक्तिबद्ध बैठा दिया ..... तीन-चार फीट के अंतर से । तीन कतारें बन गई । हमें पांच सवाल देकर छिद्दा मास्टर पीठ पर हाथ बांध टहलने लगे । हम इस बात से प्रसन्न थे कि मुंशी जी के हाथ में उस दिन छड़ी नहीं थी । कुछ देर टहलने के बाद वह एक ओर खड़े हो गए और चपटे मुंह पर छोटी आंखों से किसी भी विद्यार्थी की ओर न देखने का भ्रम देने लगे । लेकिन ऐसा था नहीं । कनखियों से वह देखते जा रहे थे । कुछ देर बाद तीसरी कतार में पीछे बिल्ले की भांति दबे पांव वह गए और एक छात्र का कान पकड़कर उसे कतार से बाहर खड़ा कर दिया । उसने गिड़गिड़ाकर कितनी ही बार कहा कि वह नकल नहीं कर रहा था , लेकिन छिद्दा मास्टर ने उसकी कापी छीन ली और उसे मुर्गा बना दिया । सामने खड़े पीपल के पेड़ पर सनसनाती उसके पत्तों को खड़काती बदन छीलती ठंडी हवा के बावजूद मुझे गर्मी लगने लगी थी , जबकि मैंने केवल बनियायन और टेरालीन की नीली धारीदार कमीज पर आधी बांह का स्वेटर ही पहना हुआ था ।

सवाल हल करने का निर्धारित समय समाप्त होने के बाद क्लास के मानीटर सुरजन लाल से छिद्दा मास्टर ने सभी की कापियां जमा करवा लीं । कुर्सी मंगायी और बैठकर कापियां देखने लगे । भंयंकर ठंड के बावजूद वह खादी के धोती-कुर्ता पर काली जैकट पहने थे । कभी-कभी ही वह बंद गले का कोट पहनते थे । हम बच्चे अपास में बातें करते कि बुढ़ऊ को ठंड नहीं लगती क्योंक वह प्रतिदिन एक पाव घी खाते हैं । उनके कापियां देखने के दौरान सभी छात्र उसी प्रकार उकड़ूं बैठे रहे पंक्तिबद्ध और मुर्गा बना छात्र जब शिथिल हो बैठने लगा तब उनकी चीख सुनाई दी और वह लड़का पुनः पूर्वस्थिति में आ गया था । उसे डांटने के बाद उन्होंने मेरी ओर इशारा किया , ‘‘रूपसिंह , इधर आओ ।’’

मेरा चेहरा सूख गया । मैं वैसे ही उनकी ओर चलकर गया जैसे वधस्थल की ओर जा रहा था ।
‘‘जाकर चकौड़ी के चार पौधे उखाड़ लाओं ।’’
चकौड़ी गोल पत्तों वाला एक ऐसा पौधा होता है जो बरसात में स्वतः उग आता है । यह दो-से तीन फीट तक लंबा होता है और जनवरी-फरवरी तक यह जीवित रहता है । इसकी डंडियां बहुत लचीली और मजबूत होती हैं । इसका फूल पीला होता है ।
चकौड़ी उखाड़ने जाते हुए मैंने सोचा कि ‘‘ रूपसिंह तुम तो बच गए । तुम्हारे सवाल सही हैं वर्ना मुंशी जी तुम्हें यह काम नहीं सौंपते ।’’ लेकिन कुछ समय बाद ही मेरे विचारों को झटका लगा । चकौड़ी के पौधे छिद्दा मास्टर को थमाकर मैं अपने स्थान की ओर मुड़ा ही था कि उनकी आवाज सुनाई दी, ‘‘किधर चल दिए ?’’
मैं पलटकर खड़ा हो गया ।
‘‘इधर आओ ।’
कांपती टांगों मैं उनकी कुर्सी की ओर बढ़ा । उनके हाथ में मेरी कापी थी । मेरे दो सवाल गलत थे । उन्होंने प्यार से मेरा हाथ पकड़ा और पुचकारते से बोले , ‘‘ ये ऐसे होगें .....कहां गलती की .....?’’
मैं सिर झुकाए सवाल देख-समझ रहा था कि वह तपाक से कुर्सी से उठे और मेरी पीठ पर चकौड़ी के पौधों की छपाक की आवाज हुई । स्वेटर पर पत्तियों के निशान बने , कुछ पीड़ा हुई और पौधे की आधी पत्तियां झड़ीं । फिर एक-दो-तीन- - - सटाक-सटाक..... ‘‘जाओ ---घर से सही करके लाना ।’’ फिर उन्होंने दूसरे छात्र को बुलाया ।
तिलमिलाता , आंखों में आंसू छलकाता मैं अपनी जगह जा बैठा और दाहिने हाथ से बार-बार पीठ सहलाता रहा ।
उस दिन क्लास के आधे से अधिक छात्रों पर छिद्दा मास्टर ने चारों चकौड़ी के पौधे तोड़ दिए थे । पत्तियां झड़ जाने के बाद उनकी मारक क्षमता बढ़ जाती थी और पीठ पर लंबे समय के लिए निशान छोड़ जाती थी ।
पिट-पिटाकर गांव के हम पांचों , बाला प्रसाद, रामसनेही, यमुना प्रसाद, मोहनलाल और मैं , जो छठवीं क्लास में थे , सड़क पर उतर ठण्डी-सीली धूल पर पैर धंसाते छिद्दा सिंह को कोसते गांव की ओर चल पडे थे अपने कंधों से कपड़े के थैला लटकाए ।
हमने गांव के लिए एक सीधा रास्ता तजवीज लिया था , जो जी।टी. रोड क्रास करने के बाद काछिन खेड़ा के बगल से पगडंडी के रास्ते सिकठिया गांव में निकलता था और सिकठिया से गुजरता हुआ बगीचों के रास्ते हमारे गांव से जुड़ता था । हमारे गांव नौगवां (गौतम) से महोली , जहां के जूनियर हाईस्कूल में हम पढ़ते थे, पांच किलोमीटर था ।

काछिन खेड़ा के किसानों के खेतों में बारहों माह हमें सब्जियां उगी दिखाई देतीं । उन दिनों दूर-दूर तक गोभी, बंध गोभी और बैंगन दिख रहे थे ।
स्कूल से निकलने के कुछ देर बाद हम छिद्दा मास्टर और उनकी मार भूल गए । उन दिनों बाला मेरे साथ छीपन के बगीचे से बेर और अमरूद चोरी करने की योजना पर प्रायः चर्चा किया करता और आज यह याद तो नहीं लेकिन उसने उस दिन भी इस पर चर्चा की होगी । गांव में वह मेरा पड़ोसी था और बेहद शरारती, जबकि गांव में लोग मुझे बहुत ही शरीफ ....बिल्कुल भोला समझते थे । हालांकि बाला के साथ मैं भी कुछ शरारतें करता लेकिन रहता मैं पृष्ठभूमि में । इसलिए कभी पकड़ा नहीं जाता । गांव में मेरी शराफत का डंका बजता और लोग कहते कि इतने शैतान लड़के के साथ मेरी मित्रता कैसे थी । मैं चुप रहता , जबकि कुछ बदमाशियां बाला मेरे उकसावे में करता था ।
उस दिन जब हम सिकठिया गांव में प्रविष्ट हुए मैंने साथयों से कहा , ‘‘यार , सामनेवाले घर से कुछ सामान लेना है ।’’ कापी किताबों के थैले के अंदर से कपड़ों का एक बड़ा थैला निकालता हुआ मैं बोला ।
मित्र समझ नहीं पाए , लेकिन किसी ने कुछ पूछा भी नहीं । सभी मेरे पीछे हो लिए । जी।टी.रोड से जाने वाली पगडंडी जहां खत्म होती थी उसके ठीक सामने वह घर था । मैंने रदवाजा खटखटाया । गोरी , दोहरे शरीर की मध्यम कद-काठी की गोल चेहरे वाली वृद्ध महिला ने दरवाजा खोला ।

‘‘तीन सेर मूंगफली , दो सेर गुड़ और दो सेर चीनी के सेब चाहिए ।’’ मैं बोला ।
वृद्धा सामान तौलने लगीं । उनकी दुकान चैपाल में बायीं ओर बने कमरे में थी । वह सामान तौल रही थीं और मैं उन्हें अपलक देख रहा था । मेरी हिन्दी पाठ्य पुस्तक में कस्तूरबा गांधी पर एक पाठ था , जिसमें उनका चित्र बना हुआ था । मैं उनकी तुलना कस्तूरबा से करता रहा । उनमें और उस चित्र में मुझे बहुत साम्य दिखा था ।
सामान कंधे पर रख मैं मित्रों के साथ गांव की ओर चल पड़ा । वह सामान घर की उस दुकान के लिए था जिसे मेरे बड़े भाई ने 1961 में खोली थी । 1959 में कलकत्ता से हाई स्कूल करके आने के बाद उन्होंने भास्करानंद इण्टर कालेज नरवल से इण्टर की परीक्षा दी थी और मां-पिता की इच्छा के विरुद्ध आगे न पढ़ने का निर्णय कर दुकान खोल ली थी । पिता जी 1959 में रेलवे से अवकाश प्राप्त कर गांव आकर खेती करवाने लगे थे । मां-पिता ने भाई को बहुत समझाया आगे पढ़ने के लिए , परंतु वह न पढ़ने की जिद पर अड़े हुए थे । लेकिन जब इंटर का परिणाम आशा से कहीं अधिक अच्छा आया , ग्रेजुएशन करने के लिए भाई कानपुर चले गए और उनकी खोली दुकान मां को संभालनी पड़ी। अब वह दुकान केवल नाम के लिए थी , क्योंकि उसके लिए आने वाला आधा सामान घर में इस्तेमाल होने लगा था ।
उस दिन भी मूंगफली , सेब से भरा थैला कंधे पर लादे मैं कुछ दूर ही गया था कि बाला बोला , ‘‘रूप , तुम थक गए होगे ....थैला मुझे दे दो ।’’
मैंने उसका भाव समझ लिया और सिकठिया से बाहर निकल महुओं के बाग में एक जगह रुक मैंने थैले से सभी को सेब और मूंगफली खाने को दी थीं ।
यह सिलसिला जाड़े भर चला और लगभग पन्द्रह दिनों में स्कूल से लौटते हुए मैं उस दुकान से ये वस्तुएं लेता रहा । मार्च शुरू होते ही उस दुकान से सामान खरीदना बंद करने के बाद उन वृद्धा के दर्शन भी बंद हो गए । यद्यपि हमारा रास्ता वही रहा । अप्रैल में जब तेज गर्मी प्रारंभ हुई , स्कूल से लौटते हुए एक दिन हम पांचों एक चबूतरे पर छप्पर की छाया में सुस्ताने के लिए रुके । हमारी चख-चख की आवाज से घर का दरवाजा खुला और मैंने जिन्हें बाहर निकलते देखा वह वही वृद्धा थीं जिनकी तुलना मैं कस्तूरबा गांधी से करता रहा था । वह हमारे पास आयीं और बहुत ही मधुर-महीन स्वर में बोलीं , ‘‘बहुत तेज धूप है ..... लू चलैं लागि है ....।’’
हमने उनकी हां में हां मिलाया ।
‘‘तुम सबके चेहरा कइस कुंभला रहे हैं ! ’’ कुछ देर तक हमारे चेहरों पर नजरें गड़ाए रहने के बाद वह बोलीं , ‘‘पानी पीकर ही जाना । लू से बचत होई ।’’
‘‘हां , हम पानी पीएगें ।’’ हमने एक स्वर में कहा ।
वह अंदर गयीं और दस मिनट बाद पीतल की बाल्टी और गिलास लिए लौटीं ।
‘‘लेव , शर्बत पिओ । लू नजदीकै न फटकी ।’’
हमने कृतज्ञ भाव से उनकी ओर देखा ।
शर्बत पीने के बाद हम कुछ देर उनसे बातें करते रहे । उन्होंने हमारी इस जिज्ञासा का समाधान किया कि वह उनके मकान का दूसरा दरवाजा है । एक उत्तर दिशा की ओर खुलता है , जहां उनकी दुकान है और दूसरा दक्षिण की ओर जहां उस समय हम बैठे थे और उस ओर आनाज का भण्डार था । बाद में पता चला कि मुरवामीर की बाजार से जिस आनाज की दुकान से मेरे घर आनाज आता था वह उनके बेटे सत्यनारायण की थी । उनके तीन बेटे थे और तीनों ही आनाजा खरीदने-बेचने का काम करते थे । किसानों की फसल के समय वे थोक में आनाज खरीदते और उसे कानपुर में कलट्टर गंज में किसी आढ़ती को बेच आते । कुछ बचा लेते जिसे प्रत्येक बृहस्पतिवार और रविवार को पुरवामीर की बाजार में बेचते थे ।
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उस दिन के बाद अप्रैल-मई के महीनों में छठवीं-सातवीं के दौरान हम उनके यहां चबूतरे पर कुछ देर बैठने और पानी पीने लगे थे। कुछ दिन बाद स्थिति यह हुई कि वह हमारी प्रतीक्षा में पहले ही दरवाजा खोल बैठ जातीं थीं और कभी भी सूखा पानी नहीं पिलाती थीं । कुछ नहीं होने पर गुड़ तो होता ही था और हमारे न-नुकर करने पर बहुत प्रेम से खा लेने का आग्रह करतीं । मुझे अफसोस है कि उनका नाम मुझे नहीं मालूम । उनकी छवि आज भी ज्यों की त्यों मन में अंकित है और आज भी मैं उन्हें उसी रूप में देख पाता हूं । उनके चेहरे पर छलकता ममत्व-मातृत्व स्पृहणीय था । तब मुझे क्या मालूम था कि मैं उन पर कुछ लिखने की योग्यता हासिल कर लूंगा । अप्रैल 1964 में जब मैं कुछ दिन बीमार रहा तब वह प्रतिदिन मेरे साथियों से मेरे हाल पूछती रही थीं और एक दिन दुखी स्वर में यह भी कहा था , ‘‘वह बहुत कमजोर है न ! इसीलिए ....।’’
स्वस्थ होकर जब मैं उनसे मिला देर तक वह मेरे चेहरे और पीठ पर हाथ फेरती रही थीं । आज सोचता हूं तो लगता है कि क्या वह इसी युग में थीं ! क्या ऐसे लोग होते हैं ...निर्छद्म , ममत्व और प्रेम की प्रतिमूर्ति....किसी पौराणिक पात्र की भांति । लेकिन होते हैं .....यह सच है और इन शब्दों की सार्थकता ऐसे लोगों के कारण ही बची हुई है ।
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रविवार, 31 जनवरी 2010

यादों की लकीरें



संस्मरण

गर्दिश के साथी

रूपसिंह चन्देल
मैं उन्हें खान की क्लीनिक में बैठे या बाहर खड़े प्रतिदिन देखता । वह मेरी ही आयु के थे ..... लंबे...... लगभग पांच फीट आठ-नौ इंच , गोरे , स्लिम , स्वस्थ और सुन्दर । गोल , भरे गाल , सुतवां नाक , चमकती गोल आंखें , कुछ घुंघराले काले बाल...... प्रथम दृष्ट्या ही आकर्षक । मैं सुबह दस बजे घर से निकल जाता और शाम छः बजे के आस-पास कालोनी में प्रवेश करता । मैं प्रतिदिन शहर की एक दिशा नापता और खाली हाथ अगले दिन किस दिशा की फैक्ट्रियों-कंपनियों के मैनेजरों-पर्सनल अफसरों से मिलने जाना है यह तय करता घर लौटता । सुबह जाते समय वह मुझे अपने चौथे मंजिल के घर की बाल्कनी में खड़े दिखते और लौटते समय डाक्टर खान की क्लीनिक में या बाहर खड़े । खान की क्लीनिक मेरे पहली मंजिल के घर के ठीक सामने थी ।
यह 1970 के उत्तरार्ध की बात है । मैं बेगमपुरवा की म्यूनिसिपल कालोनी में बड़े भाई के साथ रहता था । उन दिनों मैं एक ऐसी बीमारी का शिकार था जिसके विषय में मैं स्वयं नहीं जान पा रहा था और बड़े भाई का कहना था कि दरअसल मुझे कोई बीमारी नहीं , केवल ‘शक’ की बीमारी है । लेकिन में जानता था कि कुछ ऐसा था अवश्य जिसके कारण मेरा वजन निरंतर घट रहा था और भूख मरती जा रही थी । मैं भाई की विवशता समझता था और उनसे कभी किसी बड़े डाक्टर या अस्पताल की बात नहीं करता था । छोटी नौकरी में , जो छः सात वर्ष पुरानी ही थी , बड़े परिवार का बोझ था उन पर । मैं चाहता था कि नौकरी लगे तो स्वयं ही किसी अच्छे डाक्टर से संपर्क करूं , लेकिन नौकरी मुझे दूर से ही ठेंगा दिखा रही थी । कुछ दिन एक वकील के यहां सेवादारी करके कुछ पैसे बचाए थे जिनसे मैं कुछ दिनों तक आइन्स्टाइन जैसे दिखने वाले एक होम्योपैथ डाक्टर की शरण में रहा जिसने मुझे मीठी गोलियों के साथ दलिया सेवन की सलाह दी थी । उससे लाभ नहीं हुआ । तब मैंने डाक्टर खान की शरण लेने का विचार किया , जिनसे खांसी-ज्वर हाने पर हम दवा लेते थे । ‘बड़े डाक्टर कभी जिस मर्ज को नहीं पकड़ पाते छोटे उसे पकड़ लेते हैं ’ उस समय मैंने यह सोचा और एक दिन डाक्टर खान के पास जा पहुंचा । शाम के सात बजे थे । वही समय होता था खान के आने का । यह तो मुझे बाद में पता चला कि डाक्टर खान नीम -हकीम डाक्टर थे । वह घण्टाघर में एक सरदार जी के धर्मकांटा में बतौर मैनेजर काम करते थे जहां बड़े ट्रकों को तौला जाता था ।
गहरे सांवले रंग के डाक्टर खान सदैव सफेद पैण्ट और हाफ शर्ट पहनते थे । सदैव उनके मुंह में पान रहता और पुराने अखबार में दो-चार बीड़े पान बंधे उनकी मेज पर रखे होते । उनकी क्लीनिक आठ बाई दस के कमरे में थी , जिसमें एक ओर हरे पर्दे के पार्टीशन में कंपाउडर दवाएं कूट-पीसकर....घोल बनाता रहता । उनके यहां बेगमपुरवा बस्ती के कुछ और शेष मरीज कालोनी के होते थे । लेकिन यदि एक मरीज होता तो चार उनसे गप हांकने वाले वहां बैठे होते जो मरीज जैसे ही दिखाई देते थे ।
उस दिन भी वह वहां बैठे अन्य लोगों के साथ ठहाके लगा रहे थे ।
मैंने खान को अपना कष्ट बताया । उन्होंने नब्ज देखी , पेट दबाया फिर आंखें फैलाकर देखीं और बोले , ‘‘ठाकुर साहब आपको कमजोरी है । यह टानिक लिख रहा हूं ..... सुबह-शाम खाने के बाद एक चम्मच लीजिए । बाकी जूस -दूध नियमित ........’’
मैंनें उनसे टानिक का पर्चा लिया और उनकी फीस देने लगा , जिसे उन्होंने , ‘‘तुम ठाकुर साहब के भाई हो ।’’ फीस लेने से इंकार कर दिया । कालोनी में भाई साहब को सभी ठाकुर साहब कहकर पुकारते थे और वहां उनकी अच्छी प्रतिष्ठा थी ।
मैं जब क्लीनिक से बाहर निकला वह भी मेरे पीछे बाहर आ गए ।
‘‘आजकल क्या कर रहे हो ?’’ उन्होंने सीधे पूछ लिया ।
‘‘मैं.....मैं नौकरी तलाश रहा हूं ।’’
‘‘नौकरी....।’’ क्षणभर के लिए उनके चेहरे पर गंभीरता पसर गयी । ‘‘हुंह .....नौकरी.....।’’
‘‘और आप ?’’ उन्हें असमजंस में पाकर मैंने पूछा ।
‘‘यार मैं भी इसी मर्ज से गाफिल हूं ।’’ वह फिर गंभीर हुए । क्षणभर बाद पूछा , ‘‘क्या किया है ?’’
‘‘बारहवीं की परीक्षा देनी है.....प्राइवेट । टाइपिगं जानता हूं । चालीस से ऊपर स्पीड है ।’’
वह मुझे घूरते हुए कुछ सोचते रहे । मैं भी उनके चेहरे पर नजरें गड़ाए उन्हें देखता रहा । हम खान के क्लीनिक से कुछ हटकर रेलवे कालोनी की ओर जाने वाले रास्ते के पास बिजली के खंभे के निकट आ खड़े हुए , जिस पर एक टिमटिमाता पीला बल्ब इस बात का अहसास करा रहा था कि उस कालोनी वालों पर केसा की मेहरबानी थी। अंधेरा घिर आया था और धुंए में डूबी कालोनी के घरों से बीमार रोशनी फूट रही थी । अमूमन हर दूसरे घर में अंगीठी सुलग रही थी । कुछ घरों के बाहर गृहणियां उन्हें सुलगाने का प्रयत्न करती दिख रही थीं । यह कालोनी रेलवे वर्कशाप के निकट थी , इसलिए कच्चा कोयला सहजता से मिल जाता था । कभी वह वर्कशाप ही कानपुर का मुख्य रेलवे स्टेशन हुआ करता था , जिसकी स्मृति को जीर्ण काठ का पुल आज भी सुरक्षित रखे हुए है।
‘‘फिर तो यार , कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जानी चाहिए ।’’
‘‘कैसे ?’’
’’टाइपिगं जो आती है .... मुझे टाइपिगं आती होती तो .....?’’ वह चुप हो गए । लेकिन उन्होंने यह संकेत अवश्य दे दिया था कि वह भी मेरी तरह ही बेकार थे ।
‘‘आप भी सीख लें .....।’’
‘‘आपने कहां सीखी ?’’ उन्होंने पूछा ।
‘‘आई.टी.आई. में....लेकिन प्रैक्टिस के लिए अब सुबह किदवईनगर के शर्मा टाइपिगं इंस्टीट्यूट जाता हूं ।’’
वह देर तक कुछ सोचते रहे , फिर बोले , ‘‘यार , मुझे क्लर्की पसंद नहीं है । मैं अध्यापक बनना चाहता हूं ।’’
‘‘आपने क्या किया है ?’’
‘‘मैंने.........मैंने हमीरपुर से इण्टर पास किया है । वहीं का रहने वाला हूं ।’’
‘‘फिर प्राइमरी टीचर्स ट्रेनिगं कर लो ।’’
‘‘उससे भी नौकरी कहां मिलती है । यू.पी. में बी.टी.सी. किए हुए हजारों बेकार हैं ।’’
‘‘फिर.....?’’ मेरे प्रश्न पर वह सोच में डूब गए ।
‘‘वही.....फिर....।’’ और वह फिर चुप हो गए । हम देर तक खड़े रहे निर्वाक फिर हम अपने घरों को चले गए थे ।
*****
उसके बाद हम दोनों गहरे मित्र बन गए थे ।
उनका नाम था इकरामुर्रहमान हाशमी ।
अब हम दोनों ही सुबह एक साथ अपनी-अपनी साइकिलों पर निकलते । किदवईनगर या रेल बाजार तक साथ जाते , फिर हमारे रास्ते जुदा हो जाते थे । शाम हम पुनः खान की क्लीनिक के सामने मिलते और घण्टा-आध घण्टा दिनभर के अपने अनुभवों को बांटते ।
मार्च 1971 में बारहवीं की परीक्षा थी , इसलिए मैंने नौकरी के लिए दौड़ना छोड़ दिया । सुबह केवल टाइपिगं की प्रैक्टिस के लिए जाता और शेष समय पढ़ाई । हमारी शाम की मुलाकातें बदस्तूर जारी थीं और वह मुझे बताते कि चमनगंज के किसी मुसलमान नेता ने उनसे वायदा किया है कि वह जुलाई में उन्हें अपने स्कूल में बतौर हिन्दी अध्यापक नौकरी दे देगा ।
‘‘यार , वहां काम करते हुए मैं बी.ए. का प्राइवेट फार्म तो भर सकूंगा । बी.ए. करना आवश्यक है ।’’ उन्होंने कहा था ।
‘‘रेगुलर कर लो ।’’
‘‘नहीं ।’’ उनके स्वर में स्वाभिमान की गंध थी । ‘‘मैं भी बड़े भाई के साथ रह रहा हूं ... यही पर्याप्त है । उन पर अधिक बोझ नहीं डालना चाहता । अपने बल पर ही आगे की पढ़ाई करूंगा ।’’
उनके निर्णय की मैंने मन ही मन प्रशंसा की । उससे मुझे भी बल मिला था ।
उन दिनों कानपुर विश्वविद्यालय केवल अध्यापन से जुड़े लोगों को ही प्राइवेट बी.ए. की अनुमति देता था । अगस्त से फार्म भरने का सिलसिला प्रारंभ होता जो विलंब शुल्क के साथ अक्टूबर -नवम्बर तक चलता । मैं भी इण्टरमीडिएट तक सीमित नहीं रहना चाहता था .....लेकिन....वास्तव में हम दोनों की स्थिति एक-सी थी ।
जून 1971 में मेरा स्वास्थ्य अधिक ही खराब हो गया । एक दिन दोपहर इतनी घबड़ाहट हुई कि मैंने सी.ओ.डी. पोस्ट आफिस से भाई साहब को फोन कर दिया । वह घबड़ा गए । उन्होंने कुछ डाक्टरों की जानकारी अपने सहयोगियों से ली और शाम सवा पांच बजे आते ही (वह हिन्दुस्तान एयरोनाटिक्स लि. (HAL) में थे ) बोले , ‘‘कपड़े बदलो....डाक्टर के पास जाना है ।’’
मैं हत्प्रभ था । कल तक वह कहते थे कि मुझे ‘शक’ की बीमारी है.... लेकिन घर में सभी उनसे डरते थे और मैं तो उनसे दस वर्ष छोटा था । चुपचाप बिना कुछ कहे कपड़े बदल उनके साथ चल पड़ा था । किदवई नगर के वाई ब्लाक में डाक्टर भार्गव का क्लीनिक था जो कुछ दिन पहले तक कानपुर मेडिकल कालेज में रीडर पद पर कार्यरत थे , और घर में भी प्रैक्टिस करते थे । घर में उमड़ती भीड़ ने उन्हें नौकरी छोड़ने के लिए प्रेरित किया था । डाक्टर भार्गव ने बातचीत से ही मर्ज समझ लिया , लेकिन उसकी पुष्टि आवश्यक थी , अतः एक्सरे के लिए लिखा । अगले दिन एक्सरे के लिए मैं माल रोड गया । रपट में डाक्टर भार्गव की आशंका सही निकली थी । आंतो का अंतिम छोर आपस में लगभग मिल गया था । (डाक्टरों के मुताबिक इल्यूशिकिल आंत नैरो हो गयी थी ) मात्र सूत भर का अंतर..... यदि पन्द्रह दिन और बीत जाते तब उन आंतों के फट जाने का खतरा था.......अर्थात अवश्यभांवी मृत्यु ।
डाक्टर भार्गव ने सर्जन एस.पी. जैन के पास पत्र देकर भेजा , जो कोतवाली के पास अपनी साली के यहां रहते थे ,क्योंकि उनकी पत्नी की कुछ दिन पहले मृत्यु हो गयी थी और उनके तीन वर्ष की बेटी थी जो साली के यहां रहकर पल रही थी । मैं उनसे घर पर मिला । उन्होंने हैलट अस्पताल में , जहां वह सर्जन थे , मिलने के लिए कहा ।
अंततः 20 जून ‘1971 को उन्होंने मुझे हैलट में भर्ती कर लिया । सभी परीक्षण हुए और पता चला कि उस समय मेरा वजन केवल चालीस किलो था । डाक्टर जैन ने तुरंत आपरेशन न करने का निर्णय किया , क्योंकि उस स्थिति में मुझे बाहर से रक्त देना होता , जो वह नहीं चाहते थे । उचित उपचार प्रारंभ हो गया था , इसलिए पन्द्रह दिनों के लिए आपरेशन टाला जा सकता था । डाक्टर ने अधिक से अधिक मौसमी का जूस लेने की सलाह दी ।
इकराम प्रतिदिन मुझसे मिलने अस्पताल आते थे ।
उन दिनों मौसमी का छोटा गिलास सवा रुपया और बड़ा डेढ़ रुपए का था । मैं भोजन कम जूस अधिक लेने लगा और भाई साहब से पैसे कम लेने के निर्णय के कारण इकराम का एक सौ पचास रुपयों का कर्जदार हो गया । वे पैसे मैंने कब और कैसे वापस किए आज मुझे याद नहीं और न ही यह जान सका कि मेरी ही स्थिति में रह रहे इकराम ने उन पैसों की व्यवस्था कैसी की थी ।
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11 जुलाई 1971 को मेरा आपरेशन हुआ ....पांच घण्टे । इकराम सुबह ही अस्पताल पहुंच गए थे और मेरे होश में आने तक अर्थात शाम पांच बजे तक वहां रहे थे ।
जब अस्पताल से मुझे छुट्टी मिली मेरा वजन मात्र छत्तीस किलो था .... लेकिन तब मैं पूर्ण स्वस्थ था । अगले तीन महीनों में मैं इतना स्वस्थ हो गया कि मैं पुनः उस इनकम टैक्स-सेल्स टैक्स वकील के यहां पचास रुपए मासिक पर प्रतिदिन चार घण्टे के लिए काम पर जाने लगा था ... न चाहते हुए भी । अपने उपन्यास ‘शहर गवाह है’ में मैंने इसी वकील का चित्रण किया है । शाम इकराम के साथ हम बी.ए. करने की चर्चा करते । चमनगंज के नेता ने अपना वायदा पूरा नहीं किया था , जबकि इकराम ने जुलाई से कुछ दिनों तक उसके स्कूल में मुफ्त पढ़ाया था । जब उसने अनुभव प्रमाण पत्र देने से इंकार कर दिया , जिसके बिना इकराम प्राइवेट फार्म नहीं भर सकते थे , उन्होंने स्कूल छोड़ दिया था । वकील साहब के यहां तीन महीने जाने के बाद मैंने भी उन्हें नमस्ते कह दी थी । पुनः टाइपिगं की प्रैक्टिस के लिए मैं ‘शर्मा इंस्टीट्यूट’ जाने लगा था । जिन्दगी पुराने ढर्रे पर लौट आयी थी .....दिन भर शहर की धूल फांकता - घूमता और शाम हताश वापस ।
1972 शुरू हो गया था । एक दिन इकराम समाचार लाए कि फूड कार्पोरेशन आफ इंडिया में लेबर की बहुत-सी वेकेंसी आने वाली हैं ।
‘‘अपुन एक दिन झखरकटी एम्प्लायमेण्ट एक्सचेंज में रजिस्ट्रेशन करवा लेते हैं ।’’ वह बोले ।
‘‘लेकिन हम इण्टरमीडियेट हैं । हम गोटैहा में पहले ही रजिस्टर्ड हैं .... सर्टीफिकेट के पीछे वहां की मोहर लगी हुई है । ’’
‘‘यार हमें हाई स्कूल , इण्टर की सार्टीफिकेट दिखानी ही नहीं.... लेबर को आठवीं पास होना चाहिए.... वह प्रमाणपत्र है न ....?’’
‘‘हां....।’’
‘‘फिर कल ही चलते हैं ।’’
हम दोनों ने गंदे पायजामे पर गंदी कमीजें पहनी थीं जिससे लेबर जैसा दिखें । झखरकटी एम्प्लायमेण्ट एक्सचेंज घर से पांच-छः किलोमीटर की दूरी पर जी.टी. रोड पर था । क्लर्क ने हमें पहनावे से नहीं , बातचीत से भांप लिया कि हम आठवी नहीं...अधिक पढ़े लिखे हैं । उसने यह बात छुपायी भी नहीं । और हम पर एहसान जताते हुए उसने हमारा रजिस्ट्रेशन कर लिया था ।
लेकिन हमें वहां से कोई काल नहीं मिली । इकराम हर दिन फूड कार्पोरेशन की खबर लाते और हम हर दिन झखरकटी से लेबर की काल का इंतजार करते ....... समय बीत गया । अब हम पर पूरी तरह अध्यापक के रूप में बी.ए. करने का भूत सवार हो गया था । अध्यापन के प्रमाणपत्र अथवा किसी विद्यालय से अग्रसारण का जिम्मा इकराम ने संभाल रखा था । वह दिनभर केवल दो बातों के लिए धक्के खा रहे थे .... कहीं नियमित अध्यापकी और फार्म के अग्रसारण के लिए । वह सूचना लाते अमुक प्रधानाचार्य या प्रबन्धक ने तीन सौ रुपये लेकर अग्रसारित करने का वायदा किया है , ‘‘लेकिन यार मेरे पास कुल एक सौ पचास रुपये ही हैं ।’’ कुछ चुप रहकर वह कहते , ‘‘मैं कोशिश कर रहा हूं कि इतने में ही काम हो जाए....।’’
मैं उन्हें सुनता और सोचता ‘मेरे आपरेशन में भाई साहब को खासी रकम खर्च करनी पड़ी है .....कैसे उनसे रुपये मांगूगा । लेकिन मैंने अपना उत्साह भंग नहीं होने दिया । ‘रुपयों के बारे में तब सोचूगं जब किसी स्कूल में अग्रसरारण की बात पक्की हो जाएगी ।’’
लेकिन इकराम को अपने प्रयास में सफलता नहीं मिल रही थी ।
एक दिन शाम हम दोनों खान की क्लीनिक के बाहर खड़े उसी विषय पर गंभीरतापूर्वक चर्चा कर रहे थे कि कहीं से मेरे भाई साहब आ गये ।
‘‘क्या गुफ्तगू हो रहीं है ?’’
‘‘ठाकुर साहब , हमारी एक ही समस्या है .... बी.ए. का फार्म भरना ।’’
भाई साहब गंभीर हो गये । फिर मुझे सुनाते हुए बोले , ‘‘जितनी ऊर्जा इसके लिए नष्टट कर रहे हो ....उतनी यदि नौकरी पाने के लिए करते तो शायद नौकरी मिल जाती , तब करते बी.ए.....एम.ए....।’’
उनकी बात से मेरा ही नहीं इकराम का चेहरा भी राख हो गया था । भाई साहब चले गये और हम देर तक वहां खड़े रहे थे लेकिन शायद ही हमने कोई बात की थी । उस दिन के बाद उस समय मैंने बी.ए. करने का स्वप्न त्याग दिया था और शायद इकराम ने भी । मैंने गंभीरता से अपनी टाइपिगं स्पीड बढ़ाने पर ध्यान केन्द्रित कर लिया और इकराम ने अध्यापकी हासिल करने में ।
*****
एक दिन इकराम सूचना लेकर आये कि किसी ने उनसे वायदा किया है कि वह उन्हें हमीरपुर के एक इण्टर कालेज के प्राइमरी सेक्शन में उर्दू टीचर की नौकरी दिलवा सकता है बशर्तें उन्होंने आठवीं जमात तक उर्दू पढ़ी हो ।
‘‘तुम्हें उर्दू आती है ?’’
‘थोड़ी.... लेकिन जाकर अम्मी से पन्द्रह दिनों में सीख लूंगा ।’’ वह फिर गंभीर हो गये । कुछ देर बाद वह बोले , ‘‘लेकिन...।’’
‘‘लेकिन क्या ?’’
उन्होंने अपनी समस्या बतायी । कई दिनों तक हम उसके समाधान के विषय में सोचते रहे थे । और हमने समाधान खोज ही लिया था ।
अंततः इकराम को हमीरपुर के उस इण्टर कालेज के प्राइमरी सेक्शन में जब जुलाई में उर्दू अध्यापक की नौकरी मिली तब मुझे लगा था कि वह इकराम की ही नहीं मेरी भी सफलता थी ।
उनके कदमों को जमीन मिल गयी थी और उसके नौ महीने बाद मुझे भी । जब 1973 में कानपुर विश्वविद्यालय ने सभी के लिए प्राइवेट छात्र के रूप में बी.ए. करने की घोषणा की तब मैंने भी बी.ए. किया और इकराम ने भी । उसके बाद उन्होंने प्राइमरी टीचर्स ट्रेनिगं की स्कूल से अवकाश लेकर । मैंने जब एम.ए. कर लिया तब उन्होंने मुझे लिखा कि वह मेरी पुस्तकों और मेरे नोट्स से हिन्दी में एम.ए. करना चाहते हैं ।
उन्होंने वह भी किया और बी.एड. भी । लेकिन 1978 के बाद हम एक-दूसरे से नहीं मिल सके । उनके बारे में कुछ वर्षों बाद यह सूचना अवश्य मिली थी कि वह इण्टर कालेज में हिन्दी लेक्चरर हो गये थे ।
संभव है अब वह उस कालेज में अब प्रिसिंपल हों ।
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बुधवार, 6 जनवरी 2010

यादों की लकीरें



संस्मरण

शोभालाल

रूपसिंह चन्देल

मध्यम कद , गहरा सांवला रंग,गठा हुआ शरीर, जो दण्ड-बैठक लगाने वाले व्यक्ति का होता है , और गोल चेहरा । चेहरे पर गंभीरता की चढ़ी पर्त और खोजती आंखें । जब उसने सेक्शन में प्रवेश किया ,उस समय मैं कुछ पढ़ने में तल्लीन था । उन दिनों मैं एम.ए.(हिन्दी) फाइनल का विद्यार्थी था और सीट पर जब काम नहीं होता था विषय की कोई पुस्तक पढ़ने लगता । काम ओैर पढ़ाई.... उन दिनों दफ्तर से लेकर हेस्टल तक मेरी यही दिनचर्या थी ।
वह प्रमोशन पाकर कानपुर से ट्रांसफर होकर आया था । मैं प्रशासन सेक्शन में था और नए आने वाले कर्मचारी को पहले वहीं रिपोर्ट करना होता था । सेक्शन में रिपोर्ट करने के बाद सेक्शन अफसर के निर्देशानुसार वह किसी सेक्शन में जा बैठाा था । दोपहर लंच के बाद वह सकुचाता हुआ मेरे पास आया और अपना परिचय देता हुआ बोला , ''सर, आपके लिए ओ.एन. दीक्षित जी का पत्र है ।''
''ओ0एन0 दीक्षित......'' पत्र लेते हुए मैं बुदबुदाया ।
''सर, आर्डनैंस इक्विपमेण्ट फैक्ट्री में....आपके ....।''
उसे आगे बोलने का अवसर न दे मैं बोला ,''समझ गया....।'' उसे पास बैठने का इशारा करते हुए मैं पत्र पढ़ने लगा । वह बैठा नहीं, पत्र पढ़ता हुआ उत्सुक निगाहों से मुझे देखता रहा । पत्र पढ़कर मैं गंभीर सोच में डूब गया ।
''सर, अगर कुछ नहीं हो सकता तब मैं किसी और से बात करूं....शायद....।''
''दो-चार दिन की कोई बात नहीं....तब तक कुछ व्यवस्था हो ही जाएगी ।''
''जी सर ।'' उसके चेहरे पर राहत झलक आयी थी ।
''सर , दीक्षित जी आपके बारे में अक्सर बातें करते थे....।'' उसके छोड़े स्थान को भरते हुए मैं बोला ,'' वह मेरे गांव के हैं । मेरे बड़े भाई के मित्र ...।''
''जी सर, बता रहे थे । उन्हें पूरा विश्वास था कि आप मेरे लिए कुछ अवश्य करेंगें ।''
''हुंह ।'' मैं पुन: पत्र पढ़ने लगा था ।
ओंकार नाथ दीक्षित को गांव में हम छुन्ना भाई साहब के नाम पुकारते थे। उनके पिता गांव नाते मेरे मामा होते थे , क्योंकि मेरा गांव मेरा ननिहाल भी था । उन्होंने लिख था, ''शोभालाल चपरासी से दफ्तरी प्रमोट होकर तुम्हारे कार्यालय में आ रहा है । विश्वास है कि तुम उसके रहने की समस्या के समाधान में उसकी सहायता करोगे ।'' कुछ ऐसा ही लिखा था छुन्ना भाई ने ।
''कितना सामान है आपके पास ?'' मेरी ओर उत्सुक द्ष्टि गड़ाए शोभालाल से मैंने पूछा।
''सर एक अटैची और एक बैग ।''
''मेरे साथ चलना । मैं फैक्ट्री होस्टल में रहता हूं । मेरे कमरे में दूसरा बेड खाली है । कुछ दिन गेस्ट के रूप में रह सकते हो । तब तक कुछ व्यवस्था हो ही जाएगी ।''
लेकिन गेस्ट के रूप में रहने आया शोभालाल मेरे साथ एक वर्ष से अधिक दिनों तक रहा बावजूद इसके कि होस्टल में वार्डन की अनुमति के बिना किसी अपरिचित को रखना गैर कानूनी था। वार्डन किसी गेस्ट के लिए सप्ताह-दस दिन से अधिक की अनुमति नहीं दे सकता था । लेकिन शोभालाल ने कुछ इस तरह मुझे प्रभावित किया कि सप्ताह भर बाद मैंने स्वयं उससे कहा ,''जब तक वार्डन आपत्ति नहीं करता...तुम यहीं रहो ।'' एक सप्ताह में ही मैं 'आप' से 'तुम' पर आ गया था...हालांकि वह कुछ वर्ष उम्र में मुझसे बड़ा था, लेकिन तब तक कानपुर का प्रभाव मुझ पर शेष था जहां आदर में बड़ों को भी 'तुम' पुकारने की छूट ले ली जाती हैं ।
शोभालाल ने पहले दिन से ही मुझे भोजन बनाने के कार्य से मुक्त कर दिया । एक सप्ताह में वह मुझे 'सर' के बजाय 'गुरू' कहने लगा था । यह शब्द उस दौर में कानपुर के लोगों का तकिया कलाम-सा होता था । आज भी कुछ लोगों की जुबान चढ़ा हुआ है ।
''आप पढ़ाई पर ध्यान दें....।'' शोभालाल बोला ,''मुझे तो कुछ करना नहीं है । आठवीं पास हूं ...दस साल की नौकरी में दफ्तरी हुआ हूं ...अधिक से अधिक क्लर्क बन जाऊंगा। इससे आगे कुछ नहीं गुरू जी...लेकिन आप पढ़कर बहुत आगे जा सकते हैं ...।''
मेरे लिए यह एक बड़ी राहत थी और राहत शोभालाल के लिए भी थी । कहीं बाहर रहने पर उसे किराए के साथ अंगीठी या स्टोव सुलगाने की जहमत उठानी पड़ती, जबकि होस्टल में हीटर था । होस्टल का किराया था सैंतीस रुपए और बिजली का निश्चित था पांच रुपए सत्तर पैसे । कितनी ही खर्च की जाये ।
होस्टल में रहने वाले सभी लोगों (दस या बारह लोग ही थे ) के प्रति शोभालाल का व्यवहार बहुत विनम्रतापूर्ण और मिलनसार था । बहुत दिनों तक लोगों ने यही समझा कि वह अधिकृतरूप से मेरे साथ रह रहा है ,लेकिन जब तक उसकी वास्तविकता लोगों में उद्धाटित होती उसके समुधुर व्यवहार ने उसके प्रति लोगों में सद्भाव उत्पन्न कर दिया था । जबकि सभी जानते थे कि होस्टल चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी को एलाट नहीं हो सकता था ।
दो महीने बाद मैंने होस्टल वार्डन से शोभालाल के विषय में बात की । सामान्य कद-काठी का वार्डन बत्रा फैक्ट्री में फोरमैन था , जिसके सिर के आगे के बाल अपना स्थान छोड़ चुके थे और गाल चूसकर फेके गये आम की भांति थे । चालीस के आस-पास की उम्र थी बत्रा की और कुछ दिन पहले ही उसकी शादी हुई थी । पत्नी की उम्र भी पैंतीस के लगभग थी और वह गेंहुए रंग की भरे-पूरे शरीर की स्वामिनी थी । बत्रा के लंब्रेटा स्कूटर पर बैठकर जब वह सब्जी खरीदने जा रही होती तब हम सोचते ,'' जोड़ा बुरा नहीं है ।''
''कितने दिन रहेगा ?'' बत्रा ने ठंठे स्वर में पूछा ।
''अभी तो आया है । जब तक कहीं एकमोडेशन नहीं मिल जाता....।''
''ठीक है , लेकिन जल्दी ही कोई बंदोबस्त कर लेने के लिए बोलने का....आप जानते हैं यहां बिना एलाटमेण्ट किसी को एलाउ नहीं ।''
''बत्रा साहब , आप बेफिक्र रहें ....जगह मिलते ही वह चला जायेगा ।''
बत्रा कुछ और कहता कि तभी उसकी पत्नी की आवाज सुनाई दी और वह हड़बड़ाता हुआ घर की ओर लपक गया था। मैं निश्चिंत हो गया था । उसे बताना आवश्यक था और मैं यह जानता था कि नई शादी की खुमारी में उसे होस्टल की चिन्ता न थी । एक वर्ष से वह वार्डन था और एक बार भी राउण्ड पर नहीं आया था ।
शोभालाल के साथ रहने से मुझे सुविधा थी । मेरे हिस्से के सभी काम वह कर देता...भोजन बनाने से लेकर दूध आदि लाने का ...। कमरे में हम प्राय: बातें नहीं करते थे । वहां होने पर या तो वह कुछ काम कर रहा होता या मंद स्वर में कोई फिल्मी गाना गुनगुना रहा होता । उसकी खूबी यह थी कि वह बेहद सफाई पसंद था , मितव्ययी भी । मितव्ययिता का कारण संभव है छोटी नौकरी रही हो, लेकिन वह जिस प्रकार टिप-टॉप रह, अनजान व्यक्ति सोच भी नहीं सकता था कि वह चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी था ।
मेरे एम.ए. में प्रथम श्रेणी प्राप्त करने के पीछे शोभालाल के सहयोग की महत भूमिका मैं स्वीकार करता हूं ।
जिस दिन मुझे प्रथम श्रेणी उत्तीर्ण होने की सूचना मिली, शोभालाल शाम मेरे साथ सीधे होस्टल न जाकर बाजार गया था और अपने मित्र सरदार भूपिन्दर सिंह अरोड़ा को साथ लेकर होस्टल आया था । उसके हाथ में एक पैकेट था , जिसमें मिठाई थी ।
''लो गुरू ....।'' मिठाई मेरी ओर बढ़ाते हुए उसने कहा, ''फर्स्ट डिवीजन आने की खुशी में मेरी ओर से.... ''
''यार, यह तो मुझे....।'' शर्मिन्दा होते हुए मैं बोला ।
''गुरू जी....उसके लिए तो मैंने मना नहीं किया ।'' मेरी बात काट शोभालाल बोला ,''वह तो हमें खानी ही है ।''
शोभालाल ने होस्टल के कई लोगों को भी मिठाई बांटी ,'' हमारे गुरू जी एम.ए. में फर्स्ट डिवीजन पास हुए हैं उसी खुशी में...।'' उसने प्रमुदितभाव से सभी को बताया था ।
हम दोनो के साथ सरदार भूपिन्दर सिंह भी जुड़ गया था । वह भी हमारे कार्यालय में क्लर्क था और उसके पिता वहां वरिष्ठ लेखा परीक्षक । वह एक सीधा -सरल छ: फिट लंबा, सांवला और हंसमुख नौजवान था जो अपने पड़ोसी कपूर परिवार से परेशान रहता था । दोनों परिवार पश्चिम पाकिस्तान से आए थे, लेकिन उनमें सद्भाव का अभाव था । इसका कारण यह था कि दफ्तर का इंचार्ज ,डिप्टी कण्ट्रोलर, मंगलसेन कपूर थे और भूपिन्दर का पड़ोसी कपूर इंचार्ज का चमचा था और उसके बल पर वह सब पर रौब गांठता रहता था । वैसे सामने वह सभी से 'बादशाहो' कहकर विनम्रता प्रकट करता, लेकिन पीछे सबकी इंचार्ज से शिकायत करता । उसकी पत्नी का चरित्र गड़बड़ था और उसका घर दिन में दफ्तर के कुछ गड़बड़ चरित्र लोगों का अड्डा बना रहता था ।
उस कार्यालय में मेरे जो तीन-चार मित्र बने उनमें लेखा परीक्षक टी.के. मुखर्जी भी थे । मुखर्जी नाटे कद, साफ चमकता गेहुए रंग ,बड़े गोल चेहरे पर बड़ी-तीक्ष्ण आंखों और तीक्ष्ण बुध्दि वाले लगभग बत्तीस वर्ष के व्यक्ति थे। उनके मुताबिक वह दो बार आई.ए.एस. की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके थे, लेकिन साक्षात्कार में असफल रहे थे । परिचय के बाद वह बदन को जमा देने वाली शीतलहर वाले जाड़े के दिनों में अपने तबला वादन का आनंद लेने के लिए मुझे होस्टल से खींच ले जाते । प्राय: संगीत का कार्यक्रम फैक्ट्री एस्टेट में एक पंत जी के घर होता । मुखर्जी तबला बजाते ,पंत जी हारमानियम और उनकी पुत्री गाती थी।
मुखर्जी की विद्वत्ता से मैं प्रभावित था । जब तब वह मेरे यहां आ जाते । एक-दो बार उन्होंने मुझसे कुछ रुपये उधार लिए । और दो-तीन महीने विलंब से लौटा भी दिए । दफ्तर और होस्टल में सीमित रहने के कारण्ा मुझे उनके विषय में अधिक जानकारी नहीं थी .... और सच यह था कि किसी के विषय में कुछ जानने में मेरे रुचि भी नहीं थी । लोग मुझे अंहकारी या सिरफिरा समझते और कम ही बात करते, जो मेरे हित में था । लेकिन बात कब तक छुपती । शोभालल के आने के बाद मुखर्जी की कहानी ज्ञात हुई । उन्होंने अपने को सेक्शन अफसर बताकर (उन दिनों मेरे विभाग में यह एक सम्मानजनक पद था) रेलवे के डिप्टी डायरेक्टर की बेटी से विवाह किया था और उस झूठ को छुपाने के लिए शादी के बाद प्रदर्शन में इतना खर्च किया कि वह कर्ज के बोझ से दब गए । काबुली पठान से लेकर दफ्तर, फैक्ट्री और स्थानीय सूदखोरों ने उनसे कर्ज के ब्याज के रूप में मूल से कई गुना अधिक वसूल किया और स्थिति यहां तक आयी कि घर का लगभग सब सामान सूदखोर उठा ले गए थे । जब कि उनका मूल ज्यों का त्यों रहा था । मुखर्जी की वस्तुस्थिति जानने के बाद मुझे उनपर क्रोध आया और तरस भी । लेकिन एक शब्द कुछ कहा नहीं मैंने । अपना राजदार समझकर वह बहुत कुछ मूझे बताने लगे थे । वह कलकत्ता स्थानांतरण के लिए प्रयत्नशील थे जहां उनके भाई ,मां और ससुरबाड़ी थी । वहां पहुंचकर उनकी स्थिति सुधर जाएगी ऐसा उन्हें विश्वास था । उनकी पत्नी का सहयोग सराहनीय था जो अभावों में भी प्रसन्न दिखती थी । एक बार मेरे हाथ में घड़ी न देख उन्होंने पूछा, ''आपकी घोड़ी किधर गयी ?''
मैं परेशान सोच में डूब गया कि मैंने घोड़ी पाली ही कब थी । तभी मुखर्जी ने हंसकर कहा ,'' रूपसिंह यह आपकी घड़ी के बारे में पूछ रही हैं ।''
मुखर्जी के एक लड़की और एक लड़का था....छोटे....दो-तीन साल के । एक दिन उनका ट्रांसफर आर्डर आ गया । प्रशासन में रमेन्द्र बनर्जी सेक्शन अफसर थे । एस्टेट का भद्र बंगाली समाज मुखर्जी को पसंद नहीं करता था । बनर्जी के भी वह प्रिय न थे , लेकिन फिर भी उन्होंने वह गोपनीय सूचना उन्हें दी और पूछा वह कब रिलीव होना चाहेंगें ।
रात दस बजे मुखर्जी मेरे पास आए। वह गोपनीय सूचना मुझे देने के बाद पूछा ,''कब रिलीव होना चाहिए ?''
''तीन अप्रैल के लिए पहले आप कलकत्ता जाने का आरक्षण करवा लें और दो को रिलीव हो लें । तब तक आपको मार्च का वेतन भी मिल चुका होगा । ''
''लेकिन सूदखोरों को पता चला तो....?'' मुखर्जी के स्वर में कंपकपाहट थी । सूदखारों को सूचना मिलते ही मुखर्जी का मुरादनगर से निकलना कठिन हो जानेवाला था ।
मैंने उसी समय शोभालाल से परामर्श किया। ऐसे मामलों में वह अधिक व्यावहारिक ढंग से सोचता था । वह साहसी भी था । दो घण्टे तक हम विमर्श करते रहे । तय हुआ कि अंतिम दिन हमें भूपिन्दर सिंह की सेवाएं भी लेनी होगीं , लेकिन तब तक सब कुछ गुप्त रखा जाए ।
मैंने अपना ट्रंक और अटैची उन्हें पकड़ा दी । वे चीजें भी उनकी बिक चुकी थीं । आवश्यक सामान उनमें भरा गया । शेष दो बोरों में भरकर उन्हें सिल दिया गया । मुखर्जी ने बनर्जी से बात कर ली थी । तीन अप्रैल के लिए पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से शाम चार बजे चलने वाले जनता एक्सप्रेस से उन्हें कलकत्ता जाने का आरक्षण मिल गया था । दो को उन्हें वेतन और रिलीविगं आर्डर मिल जाना था । तय हुआ कि वह अपनी पत्नी और बच्चों को अपने मित्र मिस्टर रायर के घर रात में छोड़ देगें जहां से दोपहर बाद भूपिन्दर सिंह उन्हें लेकर बस से दिल्ली पहुंचेगा । मुखर्जी भी बस स्टैण्ड में उनसे जा मिलेगें । मैं और शोभालाल उनके घर से सामान लेकर बारह बजे की ट्रेन से पुरानी दिल्ली स्टेशन पहुंचेगें ।
कार्य बिल्कुल योजनानुसार सम्पन्न हुआ । मुखर्जी के घर से रिक्शों में सामान लाद जब हम स्टेशन जा रहे थे तब उस ब्लॉक की गृहणियां हमें देख रही थीं। उन सबके पति फैक्ट्री में थे । यदि वे होते तब हमारा रहस्य छुपा नहीं रह पाता । उन महिलाओं ने यही अनुमान लगाया होगा कि हम भी कोई सूदखोर हैं ।
स्टेशन पर हमें मेरठ से मछली बेचने आनेवाला मिला जो प्रतिदिन मेरठ से लाकर वहां मछलिया बेचता था । उसकी कुछ उधारी थी । उसे कुछ भनक लग गयी थी । उसे देखकर मुझे अफसोस हुआ । वह जब हमारे निकट आया, शोभालाल उसे सुनाते हुए मुझसे बोला ,'' गुरू आप चण्डीगढ़ पहुंचकर मुझे भूल मत जाना । पत्र जरूर लिखना ।''
''यार ,भूलूंगा कैसे ?'' मैं भी उतनी ही जोर से बोला था ।
''आप बहुत कठोर जो हैं ।''
'कठोर' शब्द शोभालाल का प्रिय शब्द था ।
मछलीवाला हमारा संवाद सुन आगे बढ़ गया था ।
पुरानी दिल्ली स्टेशन पर हमने क्लॉक रूम में सामान रखा । अटैची और ट्रंक रखने की समस्या न थी । बोरों के लिए बाबू तैयार नहीं था , जिसके लिए उसे कुछ देना पड़ा था। चार बजे के लगभग भूपिन्दर, मुखर्जी और उनका परिवार प्लेटफार्म नंबर बारह में हमसे आ मिले । टिकट के आधार पर मुखर्जी को रिटायरिंग रूम मिल गया । रात ग्यारह बजे जब हम होस्टल पहुंचे पता चला दफ्तर का सूदखोर जैन मेरे कमरे के दो चध्ककर काट गया था । सूदखोरों को अनुमान हो गया था कि चिड़िया उड़ गयी थी । अगले दिन पता चला कि दूसरा सूदखोर दिल्ली स्टेशन के चक्कर काट आया था । दफ्तर में जब हम तीनों से लोगों ने मुखर्जी के विषय में पूछा हमने यही कहा कि हमसे वह हरिद्वार जाने की बात कह रहे थे .... सपरिवार वहीं गये होगें .... शेष बनर्जी साहब बताएगें कि वह कब रिलीव होगें ।
''लेकिन तुम तीनों ...आप, भूपिन्दर और शोभालाल .....कल दफ्तर नहीं आए थे ।''
हमने पूर्व निर्धारित बहाने बता दिए थे ।
लेकिन हमारी बातों पर किसी को विश्वास नहीं हुआ था ।
*****
1977 में शोभालाल अपना परिवार ले आया और किराये के मकान में चला गया । जुलाई 1980 में मैंने अपना स्थानांतरण दिल्ली करवा लिया । उसके बाद शोभालाल से मेरी मुलाकात नहीं हुई । कुछ वर्षों वह मुरादनगर कार्यालय में रहा । वहां से प्रमोशन पर अण्डमान निकोबार और फिर प्रमोशन पर कानपुर । यह सूचना मुझे भूपिन्दर से मिलती रही जो यदा-कदा मुझसे मिलने आ जाया करता था । नौकरी से अवकाश प्राप्त कर शोभालाल अब कहां है मुझे जानकारी नहीं ंहै । लेकिन उसे भूल पाना संभव नहीं और भूल मैं भूपिन्दर सिंह को भी नहीं सकता, कुछ दिन पहले सुबह दूध लेने जाते समय किन्हीं अज्ञात लोगों ने जिसकी गोली मारकर हत्या कर दी थी । क्यों...? इसका उत्तर मुझे आज तक नहीं मिला । उस जैसे सीधे-सरल व्यक्ति के भी दुश्मन थे यह सोचकर आश्चर्य होता है ।
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