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सोमवार, 20 जनवरी 2014

यादों की लकीरें-भाग दो

संस्मरण जब तक यह व्यक्ति जीवित है---- रूपसिंह चन्देल अप्रैल ०४,१९८७-- शनिवार का दिन. अपरान्ह तीन बजे का समय. मैंने दरियागंज की उस गली में प्रवेश किया जिसमें बायीं ओर गली के मोहाने पर एक चाय की दुकान थी. वह दुकान आज भी है. वहां मैंने अक्षर प्रकाशन के विषय में पूछा. दुकानदार ने बताया-’आखिरी बिल्डिंग’. बायीं ओर आखिरी बिल्डिंग पर अक्षर प्रकाशन का फीका-सा बोर्ड लटक रहा था. पहले कमरे में धंसते ही सामने जिस युवती से सामना हुआ वह बीना उनियाल थीं. बीना से मैं बोला, “राजेन्द्र जी से मिलना है”. उन्होंने उससे सटे कमरे की ओर इशारा करते हुए कहा, “उधर चले जाइए.” दूसरे कमरे में सामने ही राजेन्द्र जी बैठे कुछ पढ़ते हुए दिखाई दिए. चेहरे पर चमकता तेज, काले बाल, जो स्पष्ट था कि डाई किए गए थे, आंखों पर मोटा चश्मा. प्रणाम कह मैंने परिचय दिया. मुस्कराते हुए बोले, “आओ—आओ…” और वह फिर पढ़ने में व्यस्त हो गए थे. शायद कोई रचना थी. उसे पढ़ने के बाद वह पाइप भरने लगे. पाइप भर उसे सुलगा एक कश लेने के बाद वह बोले, “यह मेरी कमजोरी है. आपको बुरा तो नहीं लगेगा.” उनकी इस सौजन्यता के समक्ष मैं नतमस्तक हुए बिना नहीं रह सका. उन्होंने यह अहसास बिल्कुल नहीं होने दिया कि मैं उनसे पहली बार मिल रहा था. लगा कि वह मुझे वर्षों से जानते थे और मैं पहले भी कितनी ही बार उनसे मिला था. राजेन्द्र यादव और कमलेश्वर की यह बड़ी खूबी थी कि वह सामने वाले को अपरिचय का अहसास नहीं होने देते थे. यही नहीं राजेन्द्र यादव की एक खूबी यह भी थी कि वह अपने यहां बैठे या आने वाले हर व्यक्ति का परिचय दूसरों को देते थे. उनसे यह मेरी पहली मुलाकात थी. मैं खास आभिप्राय से उनसे मिलने गया था. जनवरी के प्रारंभ में कहानी –‘आदमखोर’ उन्हें भेजी थी. कहानी के विषय में जानना चाहता था. मेरे कुछ कहने से पहले पीछे आंगन की ओर से एक नाटे कद के सज्जन आकर वहां बैठ गए. वह हरिनारायण थे. उनके आते ही राजेन्द्र जी उनसे बोले, “यह रूपसिंह चन्देल हैं…” कुछ रुके फिर पूछा, “इन्हें परिचय–फोटो के लिए पत्र भेजा?” “नहीं..” हरिनारायण जी अपने स्वाभाविक मंद स्वर में बोले. “अब भेजना क्या---कह दो.” मैं समझ तो रहा था कि बात ’आदमखोर’ से संबन्धित थी, लेकिन फिर भी पूछ लिया, “किसलिए?” “आपकी कहानी अगले अंक में जा रही है---आप एक हफ्ते में परिचय और चित्र उपलब्ध करवा दें.” अंदर से प्रसन्नता अनुभव करता हुआ मैंने राजेन्द्र जी से मूर्खतापूर्ण प्रश्न किया, “आपको कहानी पसंद आयी?” “पसंद न आती तो छप कैसे रही होती.” उस दिन ही मुझे ज्ञात हुआ कि राजेन्द्र जी १९८१ तक शक्तिनगर में रहते रहे थे. जिस मकान में वह रहे थे वह उस मकान से मात्र तीन मिनट की दूरी पर था जिसमें मैं रहता था. उनके उस किराए के मकान के बाहर तिकोना पार्क था (आज भी है) जहां हम प्रायः रात में जाकर बैठा करते थे. शक्तिनगर का उनका वह मकान साहित्यकारों का केन्द्र था. लेकिन मैं इस जानकारी से अनभिज्ञ था. मुझे शक्तिनगर-कमलानगर के उन साहित्यकार मित्रों ने भी कभी इस विषय में नहीं बताया था जिनसे सप्ताह में मेरी दो-तीन मुलाकातें हो जाया करती थीं. उस दिन राजेन्द्र जी से मेरी वह संक्षिप्त मुलाकात रही थी. -0-0-0-0- सुकून क्या होता है मैंने आज तक नहीं जाना. मेरे लिए वे दिन कुछ अधिक ही मारक थे. नौकरी के तनाव के साथ घर के तनाव--- लेकिन आश्चर्यजनक सच यह है कि उन तनावों के बीच न केवल अधिक लिखा जा रहा था बल्कि महत्वपूर्ण पढ़ भी रहा था. अब तक मेरे अनुभव यह बताते हैं कि कठिन स्थितियों में मैं अधिक ही रचनात्मक रहा. शनिवार-रविवार अवकाश के दिन होते और मै सुबह आठ बजे से ही किराए के मकान के उस हिस्से में दुबक लेता जिसे मैं स्टडी कहता था. वह कमरों से अलग सीढ़ियों के साथ था—बिल्कुल एकांत में. उसकी छत छः फुट से अधिक ऊंची और क्षेत्रफल चालीस वर्गफुट से अधिक न था. उसमें मैंने तख्त के साथ मेज सटा रखी थी. केन की एक कुर्सी भी थी---दोनों दिन नियमतः मैं दो बजे तक वहां बैठता---फिर शाम चार बजे से रात देर तक. हंस में ‘आदमखोर’ के प्रकाशन और पाठकों द्वारा उसके स्वागत ने लिखने का उत्साह कई गुना बढ़ा दिया था. लिखने बैठता तो सोचता कि किस विषय को पहले पकड़ूं. १९८७ के अंत में लंबी कहानी ‘पापी’ लिखी. मैं उन लेखकों की जैसी प्रतिभा का धनी नहीं जो एक बार में ही कहानी को अंतिम रूप दे लेते हैं. गोगोल का कहना था कि रचनाकार को लिखने के बाद रचना को दो-तीन माह के लिए रख देना चाहिए और उसपर निरन्तर चिन्तन करते रहना चाहिए. इस प्रकार उस रचना पर उसे कम से कम आठ बार काम करना चाहिए. मैंने हर रचना को – चाहे कहानी रही हो, उपन्यास,संस्मरण रहे हों या आलेख— कम से काम चार-पांच बार काम करता रहा हूं और आज भी करता हूं. ‘पापी’ को अंतिम रूप देने के बाद मैंने उसे हंस में भेज दिया. तीन महीने की प्रतीक्षा के बाद भी जब कोई उत्तर नहीं आया तब हंस कार्यालय गया. राजेन्द्र जी से मेरी वह दूसरी मुलाकात थी. महीनों बाद मैं उनसे मिला था. कमरे में धंसते ही उनके “आओ” कहने पर स्वभावानुसार जब मैंने “मैं रूपसिंह चन्देल” कहकर परिचय दिया, उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “इस सबकी आवश्यकता नहीं.” राजेन्द्र जी की एक विशेषता यह भी थी कि एक बार मिले व्यक्ति को वह कभी नहीं भूलते थे---उसका नाम भी उन्हें याद रहता था भले ही वह उनसे दोबारा वर्षों बाद क्यों न मिल रहा हो. उनकी स्मरण शक्ति अप्रतिम थी. हंस में अनगिनत बार गया और एक बार भी ऎसा नहीं हुआ कि चाय प्रस्तुत न की गई हो. वहां पहुंचते ही उनका सहायक दुर्गाप्रसाद और दुर्गा नहीं हुआ तो किसन पानी लेकर हाजिर हो जाते थे और उसके कुछ देर बाद ही चाय---यह स्वागत हर आने वाले के लिए था. उस दिन भी चाय आयी. चाय पीते हुए मैंने ‘पापी’ का जिक्र किया. “मेरी नजरों से नहीं गुजरी.” चाय पीते हुए राजेन्द्र जी बोले, “कितने दिन हुए भेजे हुए?” “तीन महीने..” राजेन्द्र जी ने बीना जी को बुलाया. एक आवाज में बीना उनकी मेज से आ टिकीं. “देखो चन्देल की कोई कहानी आयी थी?” फिर मेरी ओर मुड़कर पूछा, “क्या शीर्षक बताया?” मैंने शीर्षक बताया. बीना चली गयीं. कुछ देर बाद लौटीं, “इस शीर्षक की कोई कहानी रजिस्टर में चढ़ी हुई नहीं है.” मेरी ओर देखते हुए बीना जी ने मुझसे प्रश्न किया, “सर, आपने कैसे भेजा था?” “साधारण डाक से.” “फिर तो डाक में कहीं गुम हो गई होगी…आप दोबारा भेज दें.” बीना उनियाल ने मायूस-सा होते हुए कहा. मैं उदास हो उठा. राजेन्द्र जी ने मेरी उदासी भांपी, “क्यों, क्या बात है---दूसरी प्रति नहीं है?” “प्रति है.” “फोटोस्टेट करवाकर दे जाओ.” “हाथ से ही लिखना होगा….लेकिन कोई बात नहीं।” मैं उदासी से उबर चुका था, “मैं अगले शनिवार को दे जाउंगा.” अब राजेन्द्र ने मुझे उधेड़ना शुरू किया. “कहानी के विषय में बताओ!” “मतलब?” मैं उनका आभिप्राय नहीं समझ पाया था. “कहानी का विषय क्या है?” राजेन्द्र जी बोले. सार-संक्षेप में मैंने उन्हें कहानी बताई. आधी सुनने के बाद ही वह बोले, “हाल ही में राजी सेठ का कहानी संग्रह आया है (उन्होंने शीर्षक बताया जो मैं भूल गया हूं) उसकी शीर्षक कहानी भी एक बच्चे पर केन्द्रित है.” “मेरा पात्र बच्चा नहीं है और कहानी ग्राम्य जीवन पर है..” राजेन्द्र जी कुछ देर चुप रहे फिर बोले, “तुम कहानी भेज दो ---देखता हूं.” अगले शनिवार मैं स्वयं बीना को कहानी दे आया. साथ में डाक टिकट लगा लिफाफा भी नत्थी कर दिया. यह बात बीना जी को बता भी दी. एक माह बाद ‘पापी’ मेरे द्वारा दिए गए लिफाफे में वापस लौट आयी. कोई टिप्पणी नहीं थी उसमें. जब कोई कहानी राजेन्द्र जी की नज़रों से गुज़रकर वापस लौटती थी तब उनके हाथ की लिखी चिट अवश्य कहानी के साथ होती थी, जिसमें लौटाने का कारण वह लिखते थे. ‘पापी’ के बाद एक और कहानी हंस को भेजी थी जिसे लौटाते हुए राजेन्द्र जी ने कहानी पर टिप्पणी करते हुए छोटी-सी चिट रख दी थी जो आज भी मेरे पास है. ‘पापी’ के साथ उनकी टिप्पणी न होने से मुझे लगा कि राजेन्द्र जी ने किसी अन्य से कहानी पढ़वाकर उसे लौटा दिया था. लेकिन मेरा विचार सही नहीं था. अगले ही दिन मैंने ‘पापी’ को रविवार को भेज दिया और पन्द्रह दिन में ही जब वहां से स्वीकृति पत्र मिला तो मेरी प्रसन्नता का अनुमान लगाया जा सकता है. उसी शनिवार मैं ‘रविवार’ का स्वीकृति पत्र लेकर सीना ताने राजेन्द्र जी के सामने हाजिर था. संयोग कि वह अकेले थे. मैंने ‘पापी’ के लौटाए जाने का कारण पूछा. राजेन्द्र जी ने कहा, “सभी कारण बताए नहीं जाते.” मैंने उन्हें ‘रविवार’ में उसकी स्वीकृति के विषय में बताया. वह बोले, “वह कहीं भी छप सकती है.” इससे मेरा यह विचार धराशायी हो गया कि राजेन्द्र जी ने कहानी बिना पढ़े ही लौटा दिया था. उन्होंने कहानी पढ़ा था. “फिर वह हंस में क्यों नहीं छप सकती थी?” अपने छोटों के साथ भी बराबर का व्यवहार करने की राजेन्द्र जी के स्वभाव की विशेषता ने मुझे बहुत ही कम समय और कम मुलाकातों में उनसे बातचीत में पूरी तरह बेतकल्लुफ कर दिया था. “वह सब तुम नहीं समझोगे.” “फिर भी, कुछ तो बताइए.” “चन्देल, बहुत से कारण होते हैं, ” मुझे लगा कि यह कहते हुए उन्होंने दीर्घ निश्वास लिया था. मेरा यह भ्रम भी हो सकता है. फिर बोले, “हर बात बताई नहीं जाती.” बात वहीं समाप्त हो गयी थी. ‘पापी’ रविवार में भी प्रकाशित नहीं हुई. जिस दीपावली विशेषांक में वह प्रकाशित हो रही थी उसी अंक से मालिकों ने रविवार को बंद कर दिया था. बाद में मई,१९९० में ‘सारिका’ में वह उपन्यासिका के रूप में प्रकाशित हुई थी. मेरे लिए यह रहस्य ही रहा कि पसंद होते हुए भी राजेन्द्र जी किसके कहने पर या किन कारणों से ‘पापी’ को हंस में नहीं प्रकाशित कर पाए थे. बाद में यह अनुमान अवश्य लगाया था कि कुछ लोग थे जिन्हें मेरा हंस में प्रकाशित होना स्वीकार नहीं था. -0-0-0- राजेन्द्र यादव एक कुशल सम्पादक और गंभीर चिन्तक थे. हंस के सम्पादकीय इसका प्रमाण हैं. पाठक केवल उनके सम्पादकीय पढ़ने के लिए हंस खरीदते थे. लेकिन उनके अंदर एक फितूरी व्यक्ति भी उपस्थित था, जिसके कारण उनकी विशेषताओं से अधिक उनकी कमियां-कमजोरियां अधिक चर्चा में रहती रहीं. यह बात उनके धुर विरोधी भी स्वीकार करते हैं. प्रारंभिक दिनों में हंस में निष्पक्षता थी---उसने अनेक नये लेखक तैयार किए, लेकिन १९९३-९४ के बाद हंस का स्वरूप बदलने लगा था. एक सक्षम सम्पादक चाटुकारों से कैसे बचा रह सकता था. कोई कितने ही दावे करे कि वह ऎसे लोगों को फटकने भी नहीं देगा, लेकिन ऎसे लोग पता भी नहीं लगने देते कि वे कब सेंध लगाकर अंदर प्रविष्ट हो चुके. उसके बाद शुरू होते हैं उनके खेल. खेल इतने अजब-गजब कि सम्पादक धीरे-धीरे कब उनकी कठपुतली बन जाता है वह स्वयं नहीं जान पाता. लेकिन राजेन्द्र जी उन चाटुकारों की हकीकत नहीं जानते रहे होंगे ऎसा हो ही नहीं सकता. किसी को चाटुकारिता तभी करनी पड़ती है जब वह अपनी रचनात्मकता के प्रति आश्वस्त नहीं होता…एक कमजोर रचनाकार होता है. राजेन्द्र जी की अपनी कुछ सर्वविदित कमजोरियां थीं. उन कमजोरियों के चलते वे फिसलते चले गए और जितना चाटुकारों ने उनका इस्तेमाल किया उन्होंने भी अपने ढंग से उनका इस्तेमाल किया ही होगा. लेकिन यह सब हंस की स्तरीयता की शर्तों पर हुआ और यही सही नहीं हो रहा था. उन चाटुकारों को स्थापित करने के लिए राजेन्द्र जी ने सम्पादकीय दायित्व के सभी मानदंड ताक पर रखने शुरू कर दिए थे. परिणामतः कितने ही वरिष्ठ और महत्वपूर्ण लेखकों ने हंस से किनारा करना शुरू कर दिया था. मुझे याद है ’बल्लभ सिद्धार्थ’ के साथ कोई विवाद हुआ था जिसने बल्लभ सिद्धार्थ को इतना आहत किया कि एक समर्थ कथा लेखक मात्र अनुवादक बन रह गया. यद्यप्ति राजेन्द्र जी मार्क्सवादियों और हिन्दूवादियों से एक खास दूरी बनाकर रखते थे लेकिन वह थे मार्क्सवाद के बहुत ही निकट. कितने ही लेखकों को दरकिनार करने के लिए उन्होंने उन्हें हिन्दूवादी कहना शुरू किया. शैलेश मटियानी (जो कि उनके घनिष्ट मित्रों में थे), निर्मल वर्मा, शिवप्रसाद सिंह…और भी नाम हैं. खुले विचारों के होते हुए भी उनके अंदर एक भयानक ईर्ष्यालु व्यक्ति मौजूद था. इन लेखकों के रचनात्मक अवदान को शायद वह अपनी निष्क्रियता के कारण पचा नहीं पा रहे थे और मार्क्सवादियों द्वारा अपने विरोधी को धराशायी करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले हथियार का वह भी इस्तेमाल करने लगे थे. यद्यपि वह विरोधी को बहुत ही गंभीरता से सुनते थे…उसे बोलने का पूरा अवसर देते थे और बाद में अपने तर्कों से उसे खारिज करते थे. उनके व्यक्तित्व के सकारात्मक पक्षों में से यह भी एक पक्ष है, जिसकी सभी प्रशंसा करते हैं, लेकिन यह भी सच है कि उनके अंदर एक असहिष्णु व्यक्ति हर समय उपस्थित रहा. जिसे काटना चाहा उसे स्पष्ट न होने देते हुए ऎसा काटा कि या तो वह पूर्णतया खलास हुआ और यदि रहा तो अपनी दुर्धर्ष क्षमता के कारण. वह हर किसी का पूर्ण समर्पण चाहते थे---चाटुकारों ने वही किया जो उन्होंने चाहा; और फिर चाटुकार उन पर इतना हावी हुए कि जो वे चाहते रहे राजेन्द्र जी उन्हें प्रसन्न रखने के लिए वह सब करते रहे. यदि किसी ने कहा कि इस लेखक को हंस में नहीं प्रकाशित करना है तो राजेन्द्र जी ने शायद वही किया. राजेन्द्र जी की असहिष्णुता का एक उदाहरण देना चाहता हूं. हंस के ३१ जुलाई,२०१३ के कार्यक्रम में किन्हीं विरोधों के कारण आमन्त्रित वरवर राव और अरुन्धती राय ने आने से इंकार कर दिया. इस पर साहित्यकारों ने जमकर चर्चा की. मैंने भी उन लोगों के इस कदम को अनुचित बताया था, लेकिन राजेन्द्र जी भी अतीत में ऎसा ही कर चुके थे. बात १९९२ की है. मेरे मित्र सुभाष नीरव ने पंजाबी लेखकों की एक संस्था की ओर से दिल्ली में एक हिन्दी-पंजाबी लेखक सम्मेलन का आयोजन किया था. एक सत्र की अध्यक्षता करने के लिए राजेन्द यादव से अनुरोध किया और राजेन्द्र जी ने उसे स्वीकार भी कर लिया. फिर भी उन्होंने कहा कि कार्यक्रम की अंतिम रूपरेखा तय होने के बाद वह उन्हें अवश्य सूचित करेंगे. अंतिम रूपरेखा तय होने के बाद नीरव उनसे मिलने गए. जिस सत्र की अध्यक्षता राजेन्द्र जी को करनी थी उसमें हिन्दी लघुकथाओं पर डॉ.कमलकिशोर गोयनका को आलेख पढ़ना था. गोयनका जी का नाम सुनते ही राजेन्द्र जी ने कहा, “कमलकिशोर गोयनका के साथ मैं मंच शेयर नहीं करूंगा. यद्यपि वह मेरे अच्छे मित्र हैं और मैं घण्टों उनसे बातें करता हूं लेकिन मैं उन्हें एक हिन्दूवादी लेखक मानता हूं…इसलिए…” राजेन्द्र जी जिन्हें हिन्दूवादी लेखक मानते थे उनसे खास तरह की दूरी बना लेते थे. नीरव के कार्यक्रम को लेकर उन्होंने जो किया उससे यह स्पष्ट था, लेकिन जब हंस के कार्यक्रम में गोविन्दाचार्य और अशोक बाजपेयी की उपस्थिति में मंच साझा करने से वरवर राव और अरुन्धति राय ने इंकार कर दिया तो उस पर हंगामा हुआ. यहां यह लिखना भी अप्रासंगिक न होगा कि अधिकांश प्रवासी हिन्दी लेखक राजेन्द्र जी की दृष्टि में हिन्दूवादी लेखक थे और नाम लेकर वह उन्हें ऎसा घोषित करते रहे, लेकिन कुछ कमजोरियोंवश जीवन के अंतिम दिनों में जो फिसलन उनमें शुरू हुई थी उस कारण उन्होंने कुछ प्रवासी लेखकों को सिर माथे बैठाना शुरू कर दिया था. हम मानते हैं कि व्यक्तित्व अच्छाइयों और कमजोरियों का समुच्चय होता है. हर व्यक्ति में दोनों पक्ष विद्यमान होते हैं लेकिन प्रायः कमियां अच्छाइयों को अच्छादित कर लेती हैं---राजेन्द्र जी के साथ भी ऎसा ही था. जैसा कि मैंने लिखा—हंस के प्रारंभिक दौर के बाद जिस प्रकार राजेन्द्र जी कुछ लोगों से घिरते गए थे उससे हंस की उत्कृष्टता प्रभावित हुई थी. उन घेरने वालों में महिला कथाकारों की संख्या अधिक थी. कुछ इतना नियमित प्रकाशित होती और केवल हंस में ही दिखाई देतीं कि आश्चर्य होता था---लेकिन एक दिन ऎसा भी होता कि वे सुन्दर लेखिकाएं गायब हो जातीं और गायब वे हंस से ही नहीं होती थीं साहित्यिक परिदृश्य से भी गायब हो जाया करती थीं और उनका स्थान नई लेखिकाएं ले लिया करती थीं. राजेन्द्र जी के अपने गणित थे---उनके अपने कैलकुलेशन थे---और कुछ को छोड़कर वे औरों को छोड़ते जाते थे या वे लोग स्वयं ही उन्हें छोड़ जाया करते थे. कई पुरुष लेखकों के साथ भी यह देखा गया. कुछ लेखिकाएं ऎसी भी थीं जिनका लेखन सामान्य था, लेकिन जिन कारणों से भी वे राजेन्द्र जी की पसंदीदा बनीं यह उन दोनों के अतिरिक्त कोई कैसे बता सकता है! उन्हें साहित्य में स्थापित करने के लिए ही उन्होंने स्त्री-विमर्श का शस्त्र अपने तूणीर से निकाला था. मैं यह कभी समझ नहीं पाया कि साहित्य में स्त्री-विमर्श कब नहीं था! वह तब भी था जब मन्नू भंडारी, उषा प्रियंवदा या कृष्णा सोबती ने लिखना शुरू किया था और तब भी था जब मृदुला गर्ग, नासिरा शर्मा, सुधा अरोड़ा, मंजुल भगत, सूर्यबाला, उषाकिरण खान आदि लिख रही थीं और इनमें से कितनी ही लेखिकाएं आज भी लिख रही हैं और इन्हें कभी स्त्री-विमर्श के बैनर की आवश्यकता नहीं पड़ी. फिर उन्हें ही क्यों पड़ी जिनके साहित्य को राजेन्द्र जी ने स्त्री-विमर्श के अंतर्गत परिभाषित करना प्रारंभ किया था. शायद इसलिए, क्योंकि ऎसा करके ही वह उन्हें स्थापित कर सकते थे. उन महिला रचनाकारों के लिए स्त्री-विमर्श खड़े होने की बैसाखी थी---हंस एक मंच था…और थी राजेन्द्र जी द्वारा गढ़ी गई परिभाषा, जहां नारी को देहमुक्त होने का संदेश दिया जा रहा था. साहित्य और कुछ मामलों में वह देहमुक्त होने भी लगी थी. हंस भदेश, भोंडी, अश्लीलता की सीमाएं तोड़ती कहानियों का एक उबाऊ मंच बन गया और छपास के भूखे रचनाकार केवल हंस में छप लेने मात्र के लिए ऎसी कहानियां लिखने लगे. मुझे याद है कि मेरे एक मित्र, जो अब साहित्य नहीं लिख रहे, केवल हंस में छपने के लिए एक ऎसी अश्लील कहानी लिखी कि मैं हत्प्रभ रह गया था. हालांकि राजेन्द्र जी ने उसे प्रकाशित नहीं किया था. परिणाम --- हंस अपनी वह चमक खोने लगा था जो उसने प्रारंभिक कुछ वर्षों में बनाया था. -0-0-0-0- राजेन्द्र जी स्त्री विमर्श के साथ ही ’दलित विमर्श’ का मुद्दा भी ले उपस्थित हुए थे . १९८८ के बाद जिस प्रकार दलित रचनाकार सक्रिय हुए उस ओर से आंखें बंद नहीं की जा सकती थीं. राजेन्द्र जी एक सजग और विचारशील सम्पादक थे, उन्होंने दूसरों से पहले उसे लपक लिया और एक मसीहाई अंदाज में उसे आन्दोलन का रूप देते हुए हंस का मंच दलित रचनाकारों के लिए उपलब्ध करवा दिया. निश्चित ही जहां स्त्री विमर्श के अंतर्गत खराब कहानियां लिखी जा रही थीं, वहीं दलित साहित्यकारों ने बहुत त्वरितता के साथ विकास किया. यह अविवादित सच है कि हिन्दी में दलित लेखन को आगे लाने का श्रेय राजेन्द्र यादव को ही है. हंस ने उन्हें भरपूर अवसर प्रदान किए. ऎसी स्थिति में दूसरे सम्पादक और पत्रिकाएं पीछे कैसे रह सकती थीं. दलित विमर्श आन्दोलन के आलोचक भले ही इसके खिलाफ कुछ भी कहें, लेकिन यह सचाई तो है ही कि साहित्यिक आन्दोलनों की साहित्य के विकास में एक अहम भूमिका रही है. यह बात राजेन्द्र यादव भी मानते थे कि हंस में उन्हें दलित लेखकों की कुछ कमजोर रचनाएं भी प्रकाशित करनी पड़ती हैं, लेकिन जिस समाज को कभी आगे आने के अवसर ही नहीं दिए गए उस समाज से अकस्मात प्रेमचन्द, तोलस्तोय और गोर्की कैसे पैदा हो सकते हैं. वह इस बात से भी दुखी थे कि अधिकांश दलित रचनाकार कुछ रचनाओं के बाद आत्मकथा लिखने लगते हैं. जबकि आत्मकथा लिखने का समय जीवन का उत्तरार्द्ध होता है जब रचनाकार जीवन का अधिकांश देख-भोग लेता है. उनकी दृष्टि में यही कारण था कि आत्मकथा लेखन के बाद वे लेखक अपने लेखन की इति मान लेते हैं----दूसरे शब्दों में चुक जाते हैं. मैं राजेन्द जी की उपरोक्त बातों से सहमत रहा. मैंने अपने आलेखों में कई बार लिखा भी और अपने दलित रचनाकार मित्रों से कहा भी कि एक आत्मकथा अनेक उपन्यासों को जन्म दे सकती है. उन लोगों को आत्मकथात्मक उपन्यास लिखना चाहिए. मैंने प्रसिद्ध मराठी लेखक आनन्द यादव के ’जूझ’ और ’नटरंग’ उपन्यासों का उदाहरण भी दिया. हंस के लिए मैंने ’जूझ’ की समीक्षा लिखी थी. लेकिन हिन्दी के दलित रचनाकार आत्मकथाओं की ओर क्यों तेजी से अग्रसर हो जाते रहे इसके लिए राजेन्द्र जी को ही मैं दोषी मानता हूं. उन्होंने एक-दो दलित रचनाकारों की आत्मकथाओं की हंस में जिसप्रकार चर्चा की और करवाई और यत्र-तत्र अपने भाषणों में उन्हें हिन्दी की श्रेष्ठतम आत्मकथाओं की कोटि में रखा उससे दूसरे रचनाकारों को प्रेरित होना ही था. राजेन्द्र जी के साथ कई बार इस बात पर लंबी चर्चा हुई कि दलित साहित्य केवल वही नहीं है जो दलित लेखकों द्वारा लिखा जा रहा है बल्कि वह भी है जिसे गैर दलित लेखकों ने लिखा है और जिसके केन्द्र में दलित जीवन ही रहा है. लेकिन राजेन्द्र जी सदा इस बात के पक्षधर रहे कि दलित लेखकों द्वारा लिखा साहित्य ही दलित साहित्य की श्रेणी में आता है. दलित लेखकों की भांति वे गैर दलितों के लेखन को सहानुभूति का लेखन मानते थे. उनके अनुसार दलित अपना भोगा यथार्थ लिख रहे हैं…जबकि गैर दलितों ने उसे भोगा नहीं है. इसलिए वह सहानुभूति का साहित्य है. मेरे इस प्रश्न का उत्तर वह कभी नहीं दे पाए कि यदि भोगा यथार्थ ही साहित्य बनता तो उन्होंने भी शायद उतना सब न लिखा होता जो वे लिख सके. ‘सारा आकाश’ नहीं होता तब. यथार्थ भोगा, महसूसा और देखा--- तीनों रूप में होता है. देखे और महसूसे यथार्थ को व्यक्ति आत्मसात करता है ----उसे अपने अंदर जीता है और जब वह उसे लिखता है तब वह उसका भोगा यथार्थ बन चुका होता है. दुनिया का अधिकांश महान साहित्य दूसरे के भोगे यथार्थ के आधार पर ही लिखा गया. एक उदाहरण पर्याप्त है. लियो तोलस्तोय ने ’अन्ना कारेनिना’ अपने पड़ोसी की रखैल की आत्महत्या के आधार पर लिखा था. जिस लड़की को वह अपने पड़ोसी के बच्चे की देखभाल करते देखते रहे उस व्यक्ति द्वारा बेटे के लिए एक नई गवर्नेस रख लेने से स्वयं को वंचित अनुभव करने वाली उस युवती ने ट्रेन के नीचे कूदकर आत्महत्या की थी. तोलस्तोय ने उस क्षत-विक्षत शव को देखा और उसके पुराने स्वरूप को याद किया….उन्होंने उस युवती के चरित्र को कितनी गहराई से जिया होगा और जो लिखा वह विश्व की महनतम रचनाओं में से एक बना. इस बात का अच्छा विवरण सोफिया अन्द्रेएव्ना ने अपनी डायरी में दिया है. जगदीश चन्द्र की ट्रिलॉजी (धरती धन न अपना, नरक कुंड में बास, और यह जमीन तो अपनी थी), गोपाल उपाध्याय (एक टुकड़ा इतिहास), मदन दीक्षित (मोरी की ईंट), और अमृत लाल नागर( नाच्यो बहुत गोपाल) केवल दलित जीवन पर आधारित उपन्यास हैं. राजेन्द्र जी इनके प्रशंसक तो थे, लेकिन वे इन्हें दलित साहित्य के अंतर्गत मानने को तैयार न थे. मैंने एक बार कहा कि प्रेमचंद का ’रंगभूमि’ हिन्दी का प्रथम दलित उपन्यास है. उसका मुख्य पात्र दलित है और उपन्यास की पूरी कथा उसी के इर्द-गिर्द घूमती है. राजेन्द्र जी ने ऊंचे स्वर में कहा, “यार, तुम भी कहां-कहां की हांकने लगते हो….” और अपने चौड़े मुंह में मुस्करा दिए थे. एक दिन एक दलित लेखक ने मेरे सामने उनसे कहा, “हंस में चालीस प्रतिशत रचनाएं दलित लेखकों की आपको प्रकाशित करना चाहिए.” “तुम्हारा मतलब है कि साहित्य में आरक्षण ----ऎसा कैसे हो सकता है. मैं तो पहले से ही हर अंक में दलित लेखकों को प्रकाशित करता हूं और तुम जानते हो कि कितनों की ही कमजोर रचनाएं देता हूं. यह संभव नहीं….” राजेन्द्र जी के इस दो टूक उत्तर से उन लेखक का खिसियाना चेहरा देखने योग्य था. राजेन्द्र जी ने संकेत में कह दिया था कि उनकी सलाह पर चला गया तो चालीस में तीस और कभी-कभी पूरे चालीस प्रतिशत कमजोर रचनाएं जाएगीं और तब हंस का क्या होगा! इस सबके बावजूद हंस के दलित साहित्य विशेषांक निकले और चर्चित भी रहे. कई ऎसे लेखक रहे जिनको राजेन्द्र यादव ने विशेष महत्व दिया, लेकिन उनमें से कुछ ऎसे भी रहे जो बाद में उनके खिलाफ हुए. यह उनके स्वभाव में था कि जिसे वह झुका पाने में समर्थ नहीं हो पाए उससे दूरी बना ली…और ऎसे लोगों में उन्हें हजार कमियां दिखनी ही थीं; और यह भी सच है कि किसी जिद के तहत जब किसी रचनाकार को वह अधिक उछालने पर लगे होते तब दूसरों को उनके खिलाफ होना ही था. लेकिन वह हंस के सम्पादक थे और हंस के सम्पादक को किसी का क्या भय…वह जो चाहते करते, जिसे चाहते छापते और जो चाहते छापते---! और उन्होंने वही किया था. ‘दलित विमर्श’ को एक आन्दोलन के रूप में हिन्दी साहित्य की मुख्यधारा से जोड़ने का उनका योगदान दलित साहित्य के इतिहास में अक्ष्क्षुण रहेगा. -0-0-0- राजेन्द्र जी से मिलने जाने का सिलसिला जो एक बार शुरू हुआ तो कभी नहीं छूटा. ये वे दिन थे जब साहित्यिक पत्रिकाएं एक-एक कर बंद हो रही थीं. हंस ने अपना वर्चस्व कायम कर लिया था और राजेन्द्र यादव की छवि एक ऎसे सम्पादक की बनती जा रही थी जो जिसे चाहें उसे आसमान पर बैठा दे और जिसे न चाहें उसके प्रति उदासीन रुख अख्तियार कर लें. मैं यह मानने को तैयार नहीं कि राजेन्द्र जी ने यदि किसी को हंस में अवसर नहीं दिया या किसी दूसरे की अपेक्षा कम दिया तो वे सभी रचनाकार डूब गए. अनेक ऎसे रचनाकार हैं जिन्हें हंस का मंच कभी नहीं मिला या नहीं के बराबर मिला लेकिन वे हिन्दी साहित्य में अपना स्थान बनाने में सक्षम रहे. हर सम्पादक के कुछ प्रिय रचनाकार होते हैं. उनकी प्रियता के उसके अपने मामदंड होते हैं. आवश्यक नहीं कि जिसकी रचनाओं को वह बेहद पसंद करता हो वही उसकी प्रिय सूची में हो. ऎसे भी कुछ रचनाकार होते हैं जो इतर कारणों से प्रिय हो जाते हैं. राजेन्द्र जी के साथ ऎसा था. स्त्री-विमर्श के मुद्दे के कारण वह कई लेखिकाओं से घिर गए थे और उन्हें घेरे रहने वाली वे लेखिकाएं सामान्य रचनाकार थीं लेकिन कुछ के प्रति राजेन्द्र जी का आकर्षण इतना अधिक था कि वह उनकी कमजोर रचनाएं निरन्तर प्रकाशित करते रहते थे. यही नहीं उनकी कोई भी पुस्तक प्रकाशित होने पर एक नहीं उस पर एक के बाद एक कई समीक्षाएं प्रकाशित करते…. उनका यह घोर पक्षपात क्यों था, यह समझ से परे था. दरअसल सदैव विवादों में रहना पसंद करने वाले राजेन्द्र जी किसी बात की परवाह नहीं करते थे. -0-0-0- मैं दो-तीन माह और कभी-कभी छः माह में एक बार हंस जाता. कभी बहुत उत्साह में राजेन्द्र जी स्वागत करते तो कभी किसी रचना को पढ़ने में व्यस्त होने या किसी से किसी गर्मागर्म बात में उलझे होने के कारण केवल ‘आओ—आओ’ कहकर व्यस्त हो जाया करते थे. जब भी वहां जाता कोई न कोई पहले से वहां उपस्थित मिलता. कोई उनसे मिलने आया होता तो कोई उन्हें अपने किसी कार्यक्रम की अध्यक्षता के लिए आमंत्रित करने. कितने ही साहित्यिक आयोजन उनकी सलाह से ही सम्पन्न होते थे. यद्यपि राजेन्द्र जी ने हंस में मेरी दो ही कहानियां प्रकाशित की लेकिन कई पुस्तकों की समीक्षाएं या आलेख लिखवाए. जब भी मैं उनके पास अकेला होता वह काम करते हुए मुझसे पूछते, “क्या लिख रहे हो?” और यदि कहा, “उपन्यास लिख रहा हूँ”. तो “क्या विषय है? ” विषय जानकर पूछते, “कितना बड़ा बनेगा…” “अनुमानतः इतना बड़ा” मैं बताता तो वह छूटते ही कहते, “अरे मारा---“ “अरे मारा—“ उनका तकिया कलाम था. १९९८ तक राजेन्द्र जी से मेरी मुलाकातों में बिल्कुल गर्माहट न थी, लेकिन ‘पाथरटीला’ उपन्यास के प्रकाशन के बाद उनसे मिलने जाने के समय का अंतराल कम हो गया था. मैं उनसे पन्द्रह दिन में और अधिक विलंब हुआ तो माह में एक बार मिलने जाने लगा था. इसका एक कारण मेरे मित्र आलोचक डॉ. तेज सिंह भी थे. उसके बाद २००९ तक हम दोनों ही साथ जाते रहे थे. -0-0-0- १९९४ में ’रमला बहू’ किताबघर से प्रकाशित हुआ था. राजेन्द्र जी को एक प्रति भेंट करने गया था और एक प्रति समीक्षा के लिए दी थी. राजेन्द्र जी ने स्वभाव के अनुसार उपन्यास के कथानक पर चर्चा की. उस समय वह उस कमरे में बैठे हुए थे जहां बीना उनियाल बैठती हैं. उस दिन बीना उनियाल नहीं थीं और समय था अपरान्ह तीन बजे का. राजेन्द्र जी भागलपुर के कथाकार शिवकुमार शिव के साथ बातें कर रहे थे. शिवकुमार शिव राजेन्द्र जी के पसंदीदा लोगों में थे. भागलपुर में शिव द्वारा आयोजित कई कार्यक्रमों में वह जाते रहे थे. उस दिन मैं एक अनाहूत व्यक्ति जैसा उन दोनों के सामने बैठा दोनों की बातें सुनता रहा था, लेकिन जब लगा कि मुझे वहां नहीं रहना चाहिए तब उपन्यास की एक प्रति राजेन्द्र जी की ओर बढ़ाते हुए कहा, “यह आपके लिए।” फिर दूसरी प्रति देते हुए कहा, “यह हंस के लिए समीक्षार्थ है…”. राजेन्द्र जी ने उपन्यास को उलट-पलट कर देखा और बोले, “यार इतने मोटे उपन्यास लिखोगे तो औरों का क्या होगा!” “वे अपना काम कर रहे हैं और मैं अपना---होना क्या है.” राजेन्द्र जी हंसे और उपन्यास शिवकुमार शिव की ओर बढ़ाते हुए बोले, “इसकी समीक्षा लिखोगे?” शिवकुमार शिव ने अनमने भाव से उपन्यास थामा लेकिन कहा कुछ नहीं. मैं समझ गया कि हंस में ‘रमला बहू’ की समीक्षा प्रकाशित नहीं होगी और नहीं ही हुई. हंस में मेरे दो उपन्यासों ‘पाथरटीला’ और ‘नटसार’ की समीक्षाएं प्रकाशित हुई. पाथरटीला का प्रकाशन अक्टूबर,१९९८ में सामयिक प्रकाशन ने किया था. उपन्यास पर विचार गोष्ठी आयोजन का प्रस्ताव महेश भारद्वाज ने दिया. मुझमें अधिक उत्साह नहीं था. लेकिन महेश भारद्वाज अडिग थे. मैंने तब तक किसी पुस्तक का लोकार्पण नहीं करवाया था. हम तय नहीं कर पा रहे थे कि लोकार्पण किससे करवाया जाए, विचार गोष्ठी की अध्यक्षता कौन करे और उपन्यास पर बोलने वाले कौन हों! विष्णुप्रभाकर के प्रति मेरे मन में अगाध श्रद्धा थी. चाहकर भी हम उन्हें कार्यक्रम में शामिल नहीं कर सकते थे, क्योंकि उपन्यास उन्हें समर्पित था. दो महीने तक हम इस निर्णय पर नहीं पहुंचे कि कार्यक्रम की रूपरेखा क्या हो! अंततः जनवरी,१९९९ में महेश भारद्वाज ने अध्यक्षता के लिए राजेन्द्र यादव का नाम तय कर लिया. कार्यक्रम महेश को ही आयोजित करना था. मेरी भी कुछ भूमिका थी, लेकिन मुख्य भूमिका महेश भारद्वाज की ही होनी थी. वह उपन्यास के प्रकाशक थे और व्यावसायिक दृष्टि से सोच रहे थे. उन दिनों वह राजेन्द्र जी के अधिक निकट थे. मैंने स्वीकृति दे दी. राजेन्द्र जी को लेकर मैं दुविधा में रहा था. जिसप्रकार उन्होंने रमला बहू के प्रति उदासीनता प्रदर्शित की थी मुझे लग रहा था कि उनकी अध्यक्षता में हुए कार्यक्रम में उपन्यास पर निष्पक्ष चर्चा नहीं हो पाएगी, क्योंकि चर्चाकारों की सूची वे स्वयं तैयार करेंगे और महेश उन नामों को खारिज नहीं कर पाएगें. महेश के सुझाए या मेरे द्वारा प्रस्तावित नाम उन्हें स्वीकार नहीं होंगे. महेश ने ही तय किया कि डॉ. मैनेजर पाण्डेय कार्यक्रम के मुख्य अतिथि होंगे. उपन्यास पर चर्चा करने के लिए राजेन्द्र जी ने दो नाम तय किए --मैत्रेयी पुष्पा और पंकज बिष्ट. कार्यक्रम के संचालन के लिए उन्होंने महेश भारद्वाज द्वारा प्रस्तावित महेश दर्पण के नाम पर मोहर लगा दी. दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान में १२ मार्च,१९९९ को शायं ५.३० बजे विचार गोष्ठी प्रारंभ हुई. यह तिथि मैंने तय की थी, क्योंकि यह मेरा जन्म दिवस है. कार्यक्रम मैत्रेयी पुष्पा के वक्तव्य से शुरू हुआ. मैत्रेयी तब तक मंच पर बोलना सीख चुकी थीं. मंच पर आते ही बोलीं, “राजेन्द्र जी ने कहा कि मुझे ’पाथर टीला’ पर बोलना है. उपन्यास पढ़कर मैंने राजेन्द्र जी से पूछा कि आपने कहा था कि उपन्यास गांव पर आधारित है, लेकिन उपन्यास में गांव है कहां---मुझे तो उसमें कहीं गांव नजर ही नहीं आया.” लगभग बीस मिनट तक मैत्रेयी जी बोलती रहीं, लेकिन उनकी प्रारंभिक बातों के अतिरिक्त कुछ ऎसा नहीं था कि उसे याद रखा जाता. प्रारंभिक बातें इसलिए याद रह गयीं क्योंकि गांव पर लिखने वाली लेखिका को उस उपन्यास में गांव ही नजर नहीं आया जिसकी सम्पूर्ण कथा के केन्द्र में गांव के अतिरिक्त कुछ और है ही नहीं. राजेन्द्र जी की पसंद के दूसरे वक्ता पंकज बिष्ट ने भी उपन्यास को बहुत ही खराब सिद्ध किया लेकिन एक सच बोलने से वह अपने को रोक नहीं पाए कि पाथरटीला हिन्दी का पहला उपन्यास है जिसमें नायक एक खलनायक के रूप में चित्रित हुआ है. उन्होंने अंग्रेजी के ’गॉड फादर’ का उल्लेख करते हुए कहा कि उसके पश्चात वहां ऎसे उपन्यास लिखे जाने लगे थे लेकिन हिन्दी में इस परम्परा की शुरूआत ’पाथरटीला’ से हुई मानना होगा. तीसरे वक्ता डॉ. रामशरण जोशी थे जो उपन्यास पर कुछ स्पष्ट राय व्यक्त नहीं कर पाए. डॉ. कुमुद शर्मा, डॉ. ज्योतिष जोशी, हीरालाल नागर और महेश दर्पण ने तीनों पूर्व वक्ताओं के कथन को खारिज करते हुए उपन्यास को अपने समय की उल्लेखनीय कृति बताया. मैनेजर पाण्डेय भी उपन्यास के पक्ष में नहीं बोले और राजेन्द्र जी ने भी अपने अध्यक्षीय भाषण में जो कहा वह मेरे पक्ष में न था. इस कार्यक्रम में अरुण प्रकाश भी थे। अध्यक्षीय भाषण से पहले उन्होंने कुछ कहने की अनुमति माँगी जो उन्हें प्रदान की गई। मंच पर आकर उन्होंने जो कहा वह निर्विवाद साहित्यिक सत्य है। मैत्रेयी पुष्पा द्वारा ‘पाथरटीला’ में व्यक्त गाँव को काल्पनिक बताने की खबर लेते हुए उन्होंने कहा, “दरअसल, हिन्दी की नई पीढ़ी के लेखकों ने गाँव को जिया अथवा निकट से देखा नहीं है; बल्कि प्रेमचंद की कहानियों में पढ़ा भर है। इसलिए उनके विज़न में प्रेमचंद वाले गाँव ही गाँव हैं; यथार्थ गाँव उन्हें काल्पनिक नजर आते हैं। ” उस दिन का आश्चर्यजनक सत्य यह था कि गांधी शांति प्रतिष्ठान का हॉल खचाखच भरा हुआ था और एक भी व्यक्ति बीच में उठकर नहीं गया था, जैसाकि प्रायः ऎसे कार्यक्रमों में हुआ करता है. लोगों को कहते सुना गया कि लंबे समय के बाद एक सार्थक कार्यक्रम हुआ. साहित्यिक कार्यक्रमों में व्याप्त उदासीनता उस कार्यक्रम से टूटी थी. राजेन्द्र जी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में जो भी कहा था, लेकिन एक अच्छे सम्पादक का दायित्व निर्वाह करते हुए उन्होंने वरिष्ठ आलोचक मधुरेश से उसकी समीक्षा लिखवाकर हंस में प्रकाशित की थी और हीरालाल नागर द्वारा उस कार्यक्रम की रपट भी ’रेतघड़ी’ के अंतर्गत प्रकाशित की थी. उस कार्यक्रम के बाद ही डॉ. तेज सिंह के साथ मेरा हंस में जाने का सिलसिला बढ़ गया था. -0-0-0- हंस में जाने का आकर्षण अपनी कोई रचना प्रकाशित करवाना कभी नहीं रहा. हम दोनों को वहां जाना इसलिए भाता था क्योंकि उतने समय के लिए हम विशुद्ध साहित्य की दुनिया से जुड़ जाते थे. राजेन्द्र यादव प्रायः कुछ ऎसा कहते कि ठहाके लगते और हम उन ठहाकों के भूखे थे. हमारे साथ कई बार ईशकुमार गंगानिया भी होते. गंगानिया तेज सिंह की पत्रिका ’अपेक्षा’ से जुड़े हुए थे. राजेन्द्र जी हर उम्र वालों के साथ बेतकल्लुफ होकर बात करते ---हंसी-मजाक करते. कई बार उनके सामने बीस-बाइस साल की कोई युवती बैठी होती, जिसने कलम चलाना शुरू ही किया होता और हंस का आकर्षण उसे वहां खींच लाता. राजेन्द्र जी उससे इस प्रकार की बातें कहते, जिनमें अश्लीलता निहित होती. सुनने वाले को अटपटा लगता. गंगानिया उनके मजाक सुनकर गंभीर हो जाते. अंततः उन्होंने एक दिन घोषणा कर दी कि वे अब कभी हंस नहीं आएँगे और मेरा अनुमान है कि वे शायद कभी नहीं गए होंगे. किसी युवती के साथ राजेन्द्र जी के वे मज़ाक मुझे और तेज सिंह को भी अच्छे नहीं लगते थे और हम प्रायः इस पर चर्चा भी करते थे. राजेन्द्र जी स्वभाव से विवश थे और वह हंस का लाभ उठा रहे थे बल्कि कहना उचित होगा कि दुरुपयोग कर रहे थे. लेकिन हंसी-ठहाकों के बीच गंभीर विषयों पर चर्चा भी होती और प्रायः उन चर्चाओं के बीच ही हंसी-ठहाके लगते. एक घटना याद आ रही है. यह बात २००४ या २००५ की है. उस दिन राजेन्द्र जी के साथ मैं और तेज सिंह ही थे. तेज सिंह की पत्रिका ’अपेक्षा’ पर चर्चा हो रही थी. कुछ देर बाद एक चालीस पार रचनाकार आए. हंस में उनकी कई वर्ष पहले एक कहानी मैंने पढ़ी थी. उनके आते ही राजेन्द्र जी, जो हंस-बतिया रहे थे अकस्मात गंभीर हो गए. हमें लगा कि उस व्यक्ति का आना राजेन्द्र जी को पसंद नहीं आया. लेकिन उसके बावजूद उन्होंने उसके हाल पूछे और चुप होकर पाइप सुलगाने लगे. कमरे में सन्नाटा छाया रहा. कुछ देर की चुप्पी के बाद मूंछों पर हल्की मुस्कान लाकर उस व्यक्ति ने पूछा, “मेरी कहानी का क्या कर रहे हैं?” पूछने का ढंग इतना अशिष्ट था कि कोई सामान्य व्यक्ति भी आपा खो देता. राजेन्द्र जी ने पाइप सुलगाते हुए बिना किसी उत्तेजना के कहा, “उसे नहीं छाप रहे.” “क्यों नहीं छाप रहे?” “यह भी पूछने की बात है!” राजेन्द्र जी अब अधिक ही गंभीर हो उठे थे. “फिर भी मैं जानना चाहता हूं कि आपको उस कहानी में क्या कमी दिखाई दी?” उस व्यक्ति का चेहरा लाल हो रहा था. उसके चौड़े मुंह पर अस्वाभाविकता उभर आयी थी. “क्योंकि वह हंस के योग्य नहीं है.” “हंस में आप बेहद घटिया कहानियां छाप रहे हैं और मेरी कहानी आपको पत्रिका के योग्य नहीं लगी.” राजेन्द्र जी चुप रहे. कुछ देर चुप रहने के बाद वह व्यक्ति बोला, “आप क्यों छापेगें मेरी कहानी! वह कहानी आपको केन्द्र में रखकर जो लिखी गई है---इसलिए---!” राजेन्द्र जी का चेहरा लाल हो उठा था. स्पष्ट था कि वह अपने क्रोध को किसी प्रकार जज्ब कर रहे थे. वह तत्काल चोट करते भी न थे. उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया. “वापस कर दीजिए मेरी कहानी. कहीं भी छप जाएगी.” ’बीना से ले लो.” राजेन्द्र जी ने केवल इतना ही कहा, लेकिन चेहरा तब भी उनका लाल ही था. “आप मेरी कहानी क्यों छापेगें---छापेगें इन जैसे चमचों की..” उसने मेरी ओर इशारा किया. मैं चुप रहा उसके उस मूर्खतापूर्ण प्रलाप पर. डॉ. तेज सिंह हत्प्रभ थे. आखिर उसकी धृष्टता के कारण तेज सिंह अपने को रोक नहीं पाए और बोले, “यादव जी, छाप दीजिए न इनकी कहानी---आखिर यह भी यादव हैं ---जाति का कुछ तो लिहाज कीजिए---.” लेकिन राजेन्द्र जी ने जो चुप्पी साधी तो उस व्यक्ति के जाने के बहुत देर बाद ही तोड़ी. दो-तीन वर्षों बाद मैंने उस व्यक्ति की एक रचना (वह कहानी थी या आलेख याद नहीं) हंस में देखी थी. शायद उस दिन की उस व्यक्ति की धृष्टता को राजेन्द्र जी ने क्षमा कर दिया था. एक और घटना… एक दिन मैं और राजेन्द्र जी ही थे. तेज सिंह हमारे साथ न थे और जब मैं अकेले उनके कार्यालय पहुंचता तो हंसते हुए वह पूछते, “आज आग अकेले---धुंआ को कहां छोड़ आए..?” उस दिन किसी बात पर चर्चा करते हुए राजेन्द्र जी ने कहा कि ईमानदारी यदि शेष है तो केवल कम्युनिस्टों में. मैंने कहा, “कुछ कम्युनिस्ट भी भ्रष्ट हैं…आप सभी को ईमानदार होने का प्रमाणपत्र नहीं दे सकते.” “मैं ठीक कह रहा हूं।” राजेन्द्र जी अड़ गए थे अपनी बात पर. मैंने कहा, “मेरे पास एक व्यक्ति का उदाहरण है जो अपने को मार्क्सवादी (सीपीएमएल का) कहता है लेकिन महाधूर्त है---उसका मार्क्सवाद एक छद्म है और उस जैसे अनेक हैं.” “कौन है?” राजेन्द्र जी ने पूछा. “उस दिन तेज सिंह और मेरे सामने जो बनारसी यादव अपनी कहानी के लिए आपसे बक-झक कर रहे थे---वह उसे अपना गुरू कहते हैं. वह दिल्ली के एक सांध्य कॉलेज में हिन्दी प्राध्यापक है. उसने कानपुर में अपने ससुर को बरगलाकर उनके करोड़ों रुपयों के मकान की वसीयत करवा ली. गृहकलह हुई और ससुर जी समय से पहले दुनिया छोड़ गए. उनकी असमय मृत्यु का जिम्मेदार वह व्यक्ति अपने को पुराना नक्सलाइट कहता है---क्रान्तिकारी कहता है---उसके बारे में और अधिक जानेगें तो अपने विचार बदलने के लिए आप स्वयं विवश हो जाएगें. राजेन्द्र जी चुप हो गए थे. मैं जानता था कि वे मेरी बात से सहमत भले ही न रहे हों लेकिन उसे काटने की बात भी वह सोच नहीं पा रहे थे. विश्वविद्यालय के लोगों के वह कटु आलोचक थे और मानते थे कि प्राध्यापन में ऎसे लोगों की कमी नहीं जिन्होंने छद्म मार्क्सवाद का लबादा ओढ़ रखा है जबकि वे अंदर से वह नहीं हैं जो दिखाने का प्रयास करते हैं. वे उतने ही बड़े शोषक-लंपट हैं जितने कि सामन्तवादी-पूंजीवादी होते हैं. -0-0-0- अक्टूबर, १९९९ में मैंने राजेन्द्र जी से साहित्य और साहित्येतर विषयों पर लंबी वातचीत की. यकबयक उन्होंने मुझे समय नहीं दिया. कई माह तक टालते रहे. पहले यह जानना चाहा कि मैं क्या पूछना चाहता हूं. उन्हें लोगों से यह शिकायत थी कि लोग घिसे-पिटे प्रश्न करते थे---आपने क्यों लिखना शुरू किया या आपकी पहली रचना क्या थी? ऎसे ही साधारण प्रश्न. मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि मैं ऎसे प्रश्न नहीं करने वाला. कुछ गंभीर साहित्यिक,राजनैतिक, धार्मिक और अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर बात करूंगा. वह तैयार हो गए, “किसी रविवार को आ जाओ…शाम को.” “सुबह क्यों नहीं?” “क्योंकि मैं सुबह चार बजे उठता हूं. लिखने-पढ़ने के लिए मुझे वही समय पसंद है. फिर नाश्ता करके नौ बजे से ग्यारह बजे तक सोता हूं. सुबह का मतलब तुम दस-ग्यारह बजे टपक जाओगे---शाम ही सही रहेगा.” “कल आ जाऊं?” जिस दिन मेरी उनसे यह बात हो रही थी वह शनिवार का दिन था. “कल नहीं---अगले रविवार को. इस रविवार को मुझे किसी के घर लंच पर जाना है.” अगले शनिवार को मैंने उन्हें फोन किया, “भाई साहब, मैं कल शाम तीन बजे आपके यहां पहुंचूंगा.” “यार, तीन के बजाए---चार रख लो, बल्कि पांच सही रहेगा. डिनर करके जाना.” “बातचीत लंबी होनी है—तीन ही सही रहेगा.” “अरे, मारा…” फोन पर हो-हो कर हंसे थे वह. मैंने दो कारणों से तीन बजे का समय तय किया था. पहला कारण यह कि सुना था कि शाम कोई न कोई उनके पास मिलने आ जाता था. दूसरा कारण यह कि मैं डिनर के उनके प्रस्ताव को इसलिए टालना चाहता था, क्योंकि मैं किसन को तकलीफ नहीं देना चाहता था. वैसे भी मैं अकेले नहीं जा रहा था. जैसा कि मेरी आदत है कहीं भी मैं किसी न किसी को साथ लेकर जाया करता हूं. जब कोई नहीं मिलता तब अकेले----उस दिन मेरे साथ महेश भारद्वाज और अशोक आन्द्रे को भी जाना था. अशोक आन्द्रे मेरे द्वारा किए गए कितने ही साहित्यकारों से साक्षात्कार के साक्षी बने. इसे आलस्य कहें या कुछ भी आज भी मेरे पास अच्छा कैमरा नहीं है और उन दिनों भी न था. आज जब डिजिटल का समय है जिससे लिए चित्रों को सीधे कंप्यूटर पर डाला जा सकता है, सोच-सोचकर भी नहीं खरीद पाया. न ही कभी छोटा टेप रिकार्डर रखा. ये दोनों ही चीजें अशोक के पास थीं और उन्होंने कभी भी मेरे साथ जाने से इंकार नहीं किया. उस रविवार हम तीनों राजेन्द्र जी के यहां पहुंचे. लगभग तीन घण्टो तक बातचीत होती रही. मेरे भाग्य से उस दिन तब तक किसी ने भी आकर हमें बाधित नहीं किया था. वे रिकार्डेड टेप आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं. यह साक्षात्कार इक्यावन पृष्ठों का बना. देखने के बाद राजेन्द्र जी संतुष्ट हुए थे. शीर्षक उन्होंने ही दिया था. अब समस्या पैदा हुई कि उसे प्रकाशित कौन करेगा. बहुत सोच-विचार के बाद तय हुआ कि गिरिराज किशोर जी से बात की जाए. गिरिराज जी उनके अभिन्न मित्र रहे. उनकी कटु आलोचना करते भी मैंने गिरिराज जी को ही सुना-पढ़ा. लेकिन उनकी आलोचना को राजेन्द्र जी ने कभी बुरा नहीं माना. राजेन्द्र जी को ही उनसे बात करने की जिम्मेदारी मैंने सौंपी. बहुत ना-नुकर के बाद उन्होंने बात की और एक दिन उनका फोन आया कि गिरिराज जी दिल्ली में थे और शाम चार बजे के लगभग हंस आने वाले थे. मैं दफ्तर में था. संयोग से साक्षात्कार की प्रति मेरे पास थी. मैं साढ़े तीन बजे हंस पहुंचा. बातचीत में मेरे मुंह से निकला, “मैंने सोचा कि चलकर गिरिराज जी से निपट ही लूं.” “जुबान संभालकर बोला करो.” राजेन्द्र जी ने कुछ पढ़ते हुए कहा. मुझे काटो तो खून नहीं. राजेन्द्र जी से अपने कथन के लिए क्षमा मांगी. उनके साथ इसप्रकार की यह पहली और अंतिम घटना थी. कई अवसरों पर मैंने उनसे अपना विरोध जताया, लेकिन कभी भी विनम्रता नहीं छोड़ी. मुझे जो संस्कार मिले उसमें बड़ों के सामने विनम्र रहना प्रमुख था. मेरी पीढ़ी तक ये संस्कार घुट्टी में पिलाए जाते थे. मुझे एक घटना याद आ रही है. वरिष्ठ कवि उपेन्द्र कुमार के सरकारी बंगले में आई.पी.एस. अधिकारी अनिल सिन्हा के पहले कहानी संग्रह, जिसे सामयिक प्रकाशन ने प्रकाशित किया था, उपेन्द्र जी की संस्था ‘बरगद’ की ओर से विचार गोष्ठी का आयोजन था. राजेन्द्र जी अध्यक्ष थे. अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा था, “अनिल जी, साहित्य का दरवाजा बहुत छोटा होता है उसमें से झुककर ही प्रवेश करना होता है.” यह बात उन्होंने लेखक के लिए कही थी और शायद इसलिए क्योंकि वह एक आई.पी.एस. अधिकारी थे. राजेन्द्र जी के साथ मेरी लंबी बातचीत ‘अकार’ के तीसरे अंक में अविकल प्रकाशित हुई. बाद में उसे राजेन्द्र जी ने किताबघर प्रकाशन से प्रकाशित अपने साक्षात्कार पुस्तक में भी शामिल किया. उसके प्रकाशन ने मुझसे एक कथा लेखिका को इस बात के लिए प्रेरित किया कि मैं उनका भी वैसा ही साक्षात्कार करूं. उन्होंने कभी स्वयं मुझे नहीं कहा. दरियागंज के अपने प्रकाशक को कहा और बार-बार कहा. यह २००२ की बात है. उन दिनों मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में अपने बेटे के प्रवेश को लेकर तनाव में था. प्रकाशक से उन्होने यह भी कहलवाया कि मुझे पत्रिका नहीं खोजनी होगी. उन्होंने किसी पत्रिका में साक्षात्कार के प्रकाशन की बात कर ली थी. उन दिनों उनका उपन्यास चर्चा में था. मेरा उपन्यास ‘पाथरटीला’ उनके उपन्यास से कुछ माह पहले प्रकाशित हुआ था. उसकी भी चर्चा थी. उसके विषय में महेश भारद्वाज के पिता स्व. जगदीश भारद्वाज जी का कहना था, “चन्देल जी, जब से प्रकाशन प्रारंभ किया मैं अपनी अधिकांश पुस्तकें समीक्षा के लिए पत्र-पत्रिकाओं को भेजता रहा, लेकिन कभी समीक्षा नहीं प्रकाशित हुई. ‘पाथरटीला’ पहली पुस्तक है जिसकी पत्र-पत्रिकाओं में इतनी अधिक चर्चा हो रही है.” जगदीश जी की बात मेरे लिए महत्वपूर्ण थी. मेरी उनसे गहन आत्मीयता स्थापित हो चुकी थी और जब भी दरियागंज जाना होता–मैं उनसे मिलने अवश्य जाया करता. उस लेखिका के उपन्यास की समीक्षाएं ‘पाथरटीला’ ही नहीं सुरेन्द्र वर्मा के उपन्यास ‘मुझे चांद चाहिए’ को भी पीछे छोड़ गयी. स्वाभाविक था कि वह अपने को राजेन्द्र यादव के समकक्ष मानने की गलतफहमी पाल बैठतीं. वह अपने प्रकाशक को कोंचती रहीं और वह मुझे फोन करते रहे. मैं एक तो कभी दूसरे कारण बताकर टालता रहा. हकीकत यह थी कि उनसे बातचीत करने का मेरे मन में बिल्कुल ही उत्साह नहीं था और अंततः यह बात लेखिका को समझ आ गयी थी. लेकिन इसका परिणाम यह रहा कि उन्होंने मुझे दुश्मन नंबर एक के खाते में डाल दिया. वह यह भूल गयीं कि जब एक कथा पत्रिका में उनके विरुद्ध अभियान छिड़ा हुआ था तब एकमात्र मैं ही उनके साथ खड़ा हुआ था. यह बात वह मेरे मित्र सुभाष नीरव से स्वीकार भी कर चुकी थीं. लेकिन उपन्यास की चर्चा ने उनमें जो अहंकार पैदा किया उसने अतीत की सभी यादों को उनसे शायद धो-पोछ दिया था. वह राजेन्द्र यादव से भी किसी बात से खफा थीं. राजेन्द्र जी ने हंस में उनके उपन्यास की बिल्कुल ही चर्चा नहीं की थी. इसलिए जिस व्यक्ति ने राजेन्द्र जी का इतना बड़ा और अच्छा साक्षात्कार किया उसे उनका भी करना चाहिए और यदि मैं ऎसा कर लेता तो वह अपने को राजेन्द्र यादव के बराबर ही नहीं उनसे बड़ा मान लेतीं. राजेन्द्र जी से दूसरी बातचीत मैंने मित्रवर डॉ. तेजसिंह की पत्रिका ’अपेक्षा’ के लिए की थी. वह साक्षात्कार तीस पृष्ठों का था और पूरा ‘दलित साहित्य और दलित जीवन’ पर केन्द्रित था. -0-0-0-0- अपनी आलोचनाओं का आनन्द लेने वाला उन जैसा व्यक्ति मैंने दूसरा नहीं देखा. प्रायः वह कुछ ऎसा करते कि आलोचना होने लगती. हम सभी जानते हैं कि उन्होंने जितना छुपाया होगा उससे अधिक प्रकट किया और जो प्रकट किया वह विवादों को जन्म देता रहा. केवल विवादों के लिए उन्होंने कई ऎसे आलेख लिखे और जीवन के अंतिम दिनों में ‘स्वस्थ व्यक्ति के बीमार विचार’ जैसी पुस्तक लिखी. ‘होना सोना एक दुश्मन के साथ’ लिखने के बाद आलोचना का जो तूफान उठा उसे ठंडा होने में काफी वक्त लगा, लेकिन राजेन्द्र जी उस सबसे असम्पृक्त रहे. हनुमान को दुनिया का पहला आतंकवादी घोषित कर वह हिन्दूवादियों के निशाने पर आ गए. उन्हें धमकियां मिली या नहीं लेकिन उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस से एक पुलिस वाले की व्यवस्था अवश्य करवा ली. एक दिन जब मैं अक्षर प्रकाशन पहुंचा बाहर एक पुलिस के सिपाही को बैठा देखकर समझ नहीं पाया कि वह दिल्ली पुलिस का सिपाही था या निजी सेक्योरिटी गार्ड. उस समय तक मैं हनुमान प्रकरण से अनजान था. अंदर पहुंचकर जब बीना उनियाल से उस सिपाही के बारे में पूछा तब असलियत पता चली. कुछ लोगों ने इसे राजेन्द्र जी का नाटक करार दिया था. मेरे मित्र बलराम अग्रवाल ने उनकी मृत्यु पश्चात अपने ब्लॉग में ‘रह गया हंस अकेला’ शीर्षक के अन्तर्गत लिखा कि वह ब्यूटी कांशस थे. मैं बलराम के शब्द उधार ले रहा हूं. जब भी मिला उन्हें टिप-टाप देखा. रंग-बिरंगे मंहगे कुरते, आलीशान जैकेट---पूरी तरह सजे-धजे देखा. मेरे पास उनका एक चित्र १९५७ (वरिष्ठ कथाकार सुधा अरोड़ा जी के सौजन्य से) का है उसमें वह साधारण पायजामा-कुरता में साइकिल पर जमशेदपुर की चिल्का झील की ओर जाते दिखाई दे रहे हैं. राजेन्द्र यादव हिन्दी के उन रचनाकारों में से एक थे, जिन्होंने नौकरी करना स्वीकार नहीं किया. स्वतंत्र जीवन के आकांक्षी राजेन्द्र जी को निश्चित ही अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा होगा. पूछने पर उन्होंने बताया था कि वह अपनी स्वच्छन्दता खोना नहीं चाहते थे. उन्होंने अच्छे अनुवाद किए लेकिन लेखन और अनुवाद के बल पर हिन्दी साहित्यकार जीवित नहीं रह सकता. निश्चित ही मन्नू जी ने उनकी स्वच्छन्दता की रक्षा करने में महत्वपूर्ण सहयोग किया होगा. अनेक लोगों का कहना है कि वह कंजूस व्यक्ति थे. इस मामले में आधिकारिकरुप से मेरे लिए कुछ कहना कठिन है, लेकिन आर्थिक मामलों में वह सचेत अवश्य रहते थे. अक्षर प्रकाशन से उनके मित्र इसी कारण उनसे अलग हुए थे. सर्वाधिक नुकसान जवाहर चौधरी को उठाना पड़ा था, जिन्होंने बताया था कि अक्षर के लिए उन्होनें ग्रेटर कैलाश का अपना एक सौ पचास वर्गगज का प्लॉट बेच दिया था और आजीवन किराए के मकान में रहने के लिए विवश रहे थे. राजेन्द्र जी जब प्रसार भारती के सदस्य नामित हुए तब उन्हें बैठकों में सम्मिलित होने के लिए सरकारी गाड़ी और भत्ता मिलता था, लेकिन उस विषय में उन्होंने मुझे बताया था कि उन्होंने कभी वह सब स्वीकार नहीं किया. इस विषय में जब चर्चा हुई तब वह बोले, “चन्देल, मेरी आवश्यकताएं बहुत सीमित हैं. कोई जिम्मेदारी नहीं है. मेरे एक ही बेटी है और वह एक सुरक्षित और समृद्ध जीवन जी रही है. जितना मैं एक माह में खर्च करता हूं उससे दोगुना वह एक दिन में खर्च करती है. मन्नू को खासी पेंशन मिलती है (हालांकि तब वह उनसे अलग मयूर विहार में रह रहे थे), फिर सरकार मुझे दे भी क्या देगी. रोज दफ्तर-कार्यक्रमों में आना-जाना होता ही है---तो प्रसार भारती के कार्यक्रमों में भी शामिल हो लेता हूं.” जबकि उनके बाद के सदस्यों पर धारावाहिकों की स्वीकृति दिलाने के लिए रिश्वत लेने के आरोप लगे थे. किसी को कुछ देने में भी वह कंजूस थे, लेकिन जब देना चाहते तब दिल खोलकर देते. उनके उपकारों से उपकृत लोगों की सूची छोटी न होगी, लेकिन कब किसे उपकृत किया यह जानकारी कम लोगों को होगी क्योंकि वह इन बातों को उद्घाटित करने में भी कंजूस थे. -0-0-0- राजेन्द्र जी को अपना जन्म दिन मनाने का शौक था. यह शौक कब प्रारंभ हुआ मैं कह नहीं सकता. उनके बेहद निकट लोग ही बता सकते हैं, लेकिन सन २००० से लेकर मैं तब तक उनके जन्मदिवस समारोहों में शामिल होता रहा जब तक वे उपेन्द्र कुमार के बंगलें में होते रहे. राजेन्द्र जी के जन्मदिवस पार्टी को मैं समारोह इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उसकी भव्यता और व्यवस्था किसी समारोह से कम न होती थी. दिल्ली ही नहीं बाहर के साहित्यकार उसमें शामिल होते थे. साहित्यकारों-पत्रकारों का समागम अवसर होती थी वह पार्टी. २८ अगस्त को सुबह सात बजे ही मैं उन्हें फोन करके जन्मदिन की बधाई देता और वह हंसकर धन्यवाद देते, फिर कहते, “तो मिलते हैं शाम को।”. “अवश्य।” मैं कहता तब वह तुरन्त जोड़ते, “धुंआ को भी साथ लेते आना।”. मैं हंसकर “हां” -0-0-0-0- एक बार की बात है. हमारे पहुंचने के कुछ देर बाद ही राजेन्द्र जी ने हमारी ओर एक पत्र बढ़ाकर कहा, “इसे पढ़ो.” पत्र थामते हुए मैंने पूछा, “क्या है ?” “हसन जमाल का पत्र.” मैंने पत्र पढ़ा और ठहका लगाकर हंसा. राजेन्द्र जी चुप रहे. यद्यपि ठहाका लगाने का कोई भी अवसर वह गंवाते नहीं थे, लेकिन वह उस क्षण चुप थे. मुझे हंसता देख तेज सिंह की उत्सुकता बढ़ी और उन्होंने पत्र मेरे हाथ से ले लिया, पढ़ा और अपनी दाढ़ी में हंसने लगे. अब राजेन्द्र जी की बारी थी, मुस्कराते हुए बोले, “हसन जमाल की एक कहानी छपती नहीं कि एक के बाद एक ढेरों कहानियां पेल देते हैं. खुद ‘शेष’ पत्रिका निकालते हैं. इतनी समझ तो होगी ही उन्हें, लेकिन नहीं ---कहानी पर कहानी और फिर नाराज होकर ऎसे पत्र लिखते हैं.” राजेन्द्र यादव को कोसता हुआ हसन जमाल का पत्र लंबा था, जिसके अंत में उन्होंने लिखा था, “जिस दिन राजेन्द्र यादव की मृत्यु होगी उस दिन वह एक मन लड्डू बांटेगें.” पता नहीं २९28 अक्टूबर,२०१३ को राजेन्द्र जी की मृत्यु का समाचार सुनने के बाद हसन ने ऎसा किया या नहीं. वह पत्र हसन की कुंठा का प्रतीक था, जब कि राजेन्द्र जी ने ’अकार’ के अपने साक्षात्कार में दो लघुपत्रिकाओं की खुले दिल से प्रशंसा की थी और वे दो थीं ’सम्बोधन’ (सम्पादक – क़मर मेवाड़ी) और शेष (सम्पादक – हसन जमाल). पत्र वापस राजेन्द्र जी को देते हुए मैंने कहा था, “यह कुंठा लेखक को कहीं का नहीं छोड़ती. क्या हंस ही एकमात्र पत्रिका है…. हिन्दी में इन दिनों इतनी अधिक पत्रिकाएं हैं ---हसन जमाल ने ‘कथादेश’ को लेकर भी कुछ ऎसी ही भावना पाल रखी है. मुझे एक बार पत्र लिखकर हरिनारायण से कुछ पूछने के लिए कहा. मैं वह नहीं कर पाया. हसन नाराज हो गए. मेरी कहानी ‘शेष’ में पड़ी थी. लौटाते हुए लिखा था—आपने हरिनारायण के लिए कहा मेरा काम नहीं किया इसलिए बिना पढ़े ही कहानी लौटा रहा हूं. ऎसी कुंठा उनके लिए घातक है.” मैंने राजेन्द्र जी की ओर देखकर मुस्कराते हुए कहा, “ आपने बीस साल में मेरी केवल दो ही कहानियां प्रकाशित की लेकिन मैंने न ही आपसे कोई शिकायत की और न ही कोई कहानी देकर ऎसा आग्रह किया. और ऎसा भी नहीं कि हंस में कहानी न छपने के कारण मैंने कहानियां लिखना छोड़ दिया है.” “यार, ऎसा क्यों सोचते हो….” राजेन्द्र जी का चेहरा कुछ गंभीर हो गया, “अब तुम कहानियां कम उपन्यास अधिक लिख रहे हो….एक के बाद एक बड़े-बड़े उपन्यास पेले जा रहे हो.” ‘अधिक’ के लिए वह इस शब्द का प्रयोग करते थे. एक और अवसर पर उन्होंने एक और पत्र दिखाया था. जब भी कोई ऎसा पत्र आता उसे वह मेज पर ठीक सामने रख दिया करते थे, जिससे आने वालों की दृष्टि उस पर स्वतः पड़ जाए और यदि वह देखने के बावजूद उसे पढ़ने में रुचि न लेता तो राजेन्द्र जी उसे कहकर पढ़वाते. ऎसा ही वह उन कार्यक्रमों के निमत्रंण पत्रों के लिए करते थे जिनमें उन्हें किसी खास भूमिका के लिए आमत्रित किया गया होता. वह चाहते कि उनके यहां आने वाला व्यक्ति उस कार्यक्रम में अवश्य शामिल हो. इससे उन्हें आतंरिक सुख मिलता था. बल्कि मैं कहूंगा कि अपने चाहने वालों और जिन्हें वे चाहते उनकी भीड़ देखकर उन्हें सुख मिलता रहा होगा. उस दिन सीट ग्रहण करते ही उन्होने वह पत्र बढ़ा दिया. वह हिन्दी में टाइप किया गया पत्र था, जो मयूर विहार के हिन्दुस्तान टाइम्स अपार्टमेण्ट्स में रहने वाले एक वरिष्ठ साहित्यकार और दरियागंज के एक प्रकाशक के संबन्धों को लेकर लिखा गया था. राजेन्द्र जी उन दिनों हिन्दुस्तान टाइम्स अपार्टमेण्ट्स में ही रह रहे थे. पत्र पढ़ लेने के बाद मैंने पूछा, “आपको क्यों भेजा गया है यह?” “तुम बताओ।” मुझपर नज़रें गड़ाकर राजेन्द्र जी ने पूछा. “मैं इस बारे में क्या कह सकता हूं.” “जिनके बारे में लिखा गया है वह तो तुम्हारे मित्र हैं.” “हां, मित्र हैं, लेकिन प्रकाशक के लिए वह क्या करते हैं यह जानकारी मुझे बिल्कुल नहीं है, क्योंकि उस प्रकाशक से १९९४ से मेरा संबन्ध नहीं है. “ “ऎसे पत्र आते रहते हैं….लोगों को लगता है कि सभी के दर्द की दवा मेरे पास है.” राजेन्द्र जी ने ठहाका लगाया. मैं भी हंसा. “हो सकता है पत्र लेखक प्रकाशक से आपकी सिफारिश चाहता हो..आप भी उसके लेखक हैं न!” मैंने कहा. “पत्र में किसके हस्ताक्षर हैं---पहचानते हो. कोई नाम तो है नहीं---यह सब बकवास करने वाले लोग हैं.” “फिर आपने इस पत्र को मेज के ऊपर आने वालों को दिखाने के लिए क्यों रखा हुआ है?” राजेन्द्र जी केवल मुस्कराए और मैंने पत्र जहां से उठाया था वहीं रख दिया,जिससे दूसरा कोई उसे पढ़ सके. पत्र जिन वरिष्ठ साहित्यकार के विरुद्ध लिखा गया था राजेन्द्र जी का उनसे छत्तीस का आंकड़ा था. शायद इसीलिए उन्होंने उसे सार्वजनिक रूप से वहां रखा हुआ था. -0-0-0- २००९ के बाद हंस जाना पहले की अपेक्षा कम हुआ, लेकिन डॉ. तेजसिंह के गीता कॉलोनी से वैशाली (गाजियाबाद) शिफ्ट हो जाने के बाद बहुत ही कम हो गया था…दो-तीन महीने में एक बार. फरवरी,२०१२ के अंतिम सप्ताह में ज्ञात हुआ कि राजेन्द्र जी बहुत बीमार हैं. मैं जाने का कार्यक्रम बनाता रहा, लेकिन किसी न किसी कारण जा नहीं पाया. अंततः बलराम अग्रवाल के साथ १२ मार्च को जाने का कार्यक्रम बना. राजेन्द्र जी को देखकर हम हत्प्रभ थे. बेहद दुबले—मानो शरीर में मांस ही नहीं था. यह हमारी कल्पना से बाहर था. लेकिन उनकी आवाज में किंचित भी शिथिलता न थी---वही कड़कपन और वही बेलागपन. उन्होंने शिकायत करते हुए कहा, “इन दुष्टों (उनका आभिप्राय केयरटेकर युवक और किशन से था) ने जीना हराम कर रखा है.” “क्या करते हैं ये लोग?” मैंने पूछा. “अरे,क्या नहीं करते---?” बेड पर सीधे होकर कुछ ऊपर को उठे वह, “इतने परहेज---नाक में दम कर दिया है इन लोगों ने---.” “आपके स्वस्थ होने के लिए डाक्टरों ने इन्हें जो निर्देश दिए होंगे उन्हीं का पालन ये कर रहे हैं….इसमें इनका क्या दोष.” मैं ऎसे उन्हें समझा रहा था मानो किसी बच्चे को समझा रहा होऊं. वैसे एक बीमार व्यक्ति किसी बच्चे की भांति ही हो जाता है. राजेन्द्र जी फीकी मुस्कान के साथ बोले, “सिगरेट को हाथ नहीं लगाने देते---पाइप तो छूट ही गया….” “सिगरेट आपके लिए जब मना है तब ये कैसे दे सकते हैं.” राजेन्द्र जी कुछ देर चुप रहे, फिर धीमे स्वर में, जिससे किशन और केयरटेकर सुन न ले, लगभग फुसफुसाते हुए बोले, “लेकिन मिलने वालों से मैं एक-दो झटक लेता हूं और इन दुष्टों से छुपाकर बाथरूम में जाकर पी आता हूं.” “लेकिन आपको ऎसा नहीं करना चाहिए और आने वाले लोगों को आपको कतई नहीं देना चाहिए.” मैं किसी बुजुर्ग की भांति बोला. बलराम अग्रवाल भी बीच-बीच में अपनी बात कह रहे थे. “कुछ नहीं होता, एक-दो पी लेने से...” राजेन्द्र जी जिद्दी व्यक्ति थे---सारी जिन्दगी उन्होंने सुना सबकी लेकिन किया वही जो उन्हें अच्छा लगा. भले ही जो उन्हें अच्छा लगा वह दुनिया की दृष्टि में कितना ही गलत क्यों न रहा हो. इतनी सारी बातें होने से पहले पहुंचते ही बलराम अग्रवाल ने उनका एक चित्र तब खींच लिया था जब वह किसी से मोबाइल पर बात कर रहे थे. उनका चेहरा खिड़की की ओर था इसलिए पहली क्लिक को वह जान नहीं पाए. लेकिन जैसे ही बलराम अग्रवाल ने उनका दूसरा चित्र लेने का प्रयास किया वह जान चुके थे और मोबाइल को हटाकर बोले थे, “कोई फोटो नहीं.” बलराम ने कैमरा बैग के हवाले किया, लेकिन राजेन्द्र जी का जो चित्र उनके अनजाने ही कैमरे में कैद हो चुका था वह शायद किसी के पास भी न होगा. “मैं एक पुस्तक डिक्टेट कर रहा हूं.” बातों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए वह बोले, “स्वस्थ व्यक्ति के बीमार विचार”. हम उनके चेहरे की ओर देखने लगे. समझ नहीं पाए कि वह क्या लिखवा रहे थे. शायद हमारे असमंजस को उन्होंने समझा और खुलासा करते हुए कहा, “कुछ अपने बारे में कुछ दूसरों के बारे में… एक लड़की है---बहुत अच्छी-समझदार है--वह रोज डिक्टेशन लेने आती है.” वह कुछ देर चुप रहे फिर मेरी ओर उन्मुख होकर पूछा, “आजकल क्या लिख रहे हो?” “एक उपन्यास – ’गलियारे’ पूरा किया है. इससे पहले लेव तोलस्तोय पर तीस संस्मरणों का अनुवाद किया था---आपको एक देना चाहता था---अद्भुत है वह लेकिन है लंबा..” “कितना?” “सत्रह-अठारह पृष्ठों का है.” “उसे छोटा करके दो.” “वह संभव न होगा…वह मर जाएगा… मैं देखता हूं कि कोई छोटा संस्मरण हो, लेकिन कोई भी संस्मरण ढाई हजार शब्दों से छोटा शायद ही हो.” “जल्दी से दे दो..” “आपको देना होगा या---“ “दफ्तर में दे देना…मुझे मिल जाएगा. कुछ काम देखने लगा हूं. इस माह का सम्पादकीय भी लिखना है.” मैं सोचने लगा कि हंस की कितनी चिन्ता है उन्हें. हमें उनके पास बैठे लगभग पैंतालीस मिनट हो चुके थे. हमने एक दूसरे से चलने का इशारा किया, लेकिन तभी मुझे याद आया कि मैं उन्हें यह बताऊं कि १२ मार्च १९९९ को उन्होंने मेरे उपन्यास ‘पाथरटीला’ का लोकार्पण किया था. मैंने यह बताया और यह भी कि उस दिन (१२ मार्च) मेरा जन्म दिन है. राजेन्द्र जी ने आशीर्वाद स्वरूप अपना हाथ आगे बढ़ाया. मैंने उनका हाथ थाम लिया. “फिर आउंगा---अब चलें.” हम उठ खड़े हुए. राजेन्द्र जी ने बैठने के लिए हाथ से इशारा किया. हम बैठ गए. खिड़की पर कागज का एक लिफाफा रखा हुआ था. दाहिना हाथ बढ़ा वह उस लिफाफे को पकड़ने का प्रयास करने लगे. हम उत्सुक नज़रों से उन्हें वैसा करते हुए देखते रहे. आखिर वह उस लिफाफे को पकड़ने में सफल रहे थे. उस समय उनका चेहरा गंभीर था. उन्होंने लिफाफे से दो टॉफी निकाली—जन्म दिन की बधाई कहते हुए पहली टॉफी मेरी ओर बढ़ाई. दूसरी उन्होंने बलराम अग्रवाल को देते हुए बोले, “इसके बाद तुम इनका भेजा खाना---“ हमने ठहाका लगाया. राजेन्द्र जी ठहाका तो नहीं लगा सके, लेकिन मुस्काराए अवश्य. उनके अपार्टमेण्ट से निकलते हुए मुझे लेव तोलस्तोय के बारे में लिखी गोर्की की एक बात याद आयी. तोलस्तोय की अनेकानेक बातों को गोर्की पसंद नहीं करते थे---मैं भी राजेन्द्र जी की कितनी ही बातों को नापसंद करता था. गोर्की ने तोलस्तोय के विषय में लिखा था, “जब तक यह व्यक्ति जीवित है हम अनाथ नहीं हैं.” मैंने बलराम अग्रवाल से राजेन्द्र यादव के संदर्भ में गोर्की की वह बात दोहराई थी और बलराम ने कहा था, “बिल्कुल सही कहा आपने.” -0-0-0-

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

संस्मरण




भगत भूरमलदास

रूपसिंह चन्देल

जून,१९७८ के एक रविवार का गर्म दिन. शाम पांच बजे का समय. लू चल रही थी. कमरे से बाहर निकलने की इच्छा नहीं हो रही थी, लेकिन मैंने साढ़े पांच बजे उनसे उनके घर मिलने का समय लिया हुआ था. घर बहुत दूर नहीं था. हॉस्टेल के दक्षिणी छोर पर पानी की विशाल टंकी थी, जिसके साथ पुस्तकालय था. बात आयुध निर्माणी, मुरादनगर की है. पानी की टंकी और हॉस्टेल के बीच ’आर’ और ”एच’ ब्लॉक से गांधी पार्क और बाजार की ओर जाने वाली सड़क थी. उन दिनो मैं फैक्ट्री हॉस्टेल में रहता था जो फैक्ट्री के प्रशिक्षु अधिकारियों के लिए कभी बनाया बनाया गया था, लेकिन प्रशिक्षण कार्यक्रम स्थगित हो जाने या कहीं अन्यत्र स्थानांतरित हो जाने के कारण खाली था और फैक्ट्री की पूर्वी दीवार के अंतिम छोर पर एस्टेट से अलग निपट एकांत में था.
पैंट पर कुर्ता डाल मैं उनके घर जाने के लिए निकल आया. उनका घर हॉस्टेल से दस मिनट के रास्ते पर फैक्ट्री के ’एस’ टाइप मकानों में था. कहते हैं कि ’आर’ और ’एस’ टाइप के मकानों का निर्माण अंग्रेजों ने अपने घोड़ों को बांधने के लिए किया था. स्पष्ट है कि फैक्ट्री प्रशासन की दृष्टि में उसके नीचे स्तर के कर्मचारियों की औकात जानवरों से अधिक नहीं थी. इन मकानों में रहने वालों के लिए दैनिक क्रियाओं की निवृत्ति के लिए पानी की टंकी के पीछे जंगल में सार्वजनिक शौचालयों की व्यवस्था थी या खुला जंगल था. अब स्थिति क्या है कह नहीं सकता, लेकिन तब उन सबकी स्थिति के विषय में सोचकर मन कसैला को उठता था. 




                   (बाएं भगत भूरमल दास और दांए लेखक - बीच में कोई अपरिचित)

जब उनके घर पहुंचा, वे घर के बाहर सफेद धोती-कुर्ता में चारपाई पर बैठे थे. मैंने अपने सहयोगी मित्र भूपिन्दर सिंह अरोड़ा को भी बुला लिया था. मेरे पहुंचने के कुछ देर बाद ही भूपिन्दर भी पहुंच गया था. जिनसे हम मिल रहे थे उनका नाम भूरमल दास था जिन्हें फैक्ट्री और एस्टेट में लोग भगत जी के नाम से पुकारते थे. मेरे मिलने के दिन तक भगत भूरमल जी हजारों सांप काटे लोगों को जीवन दान दे चुके थे. वह एक करिश्माई व्यक्ति थे, जो सांप काटे स्थान पर मुंह से खून चूस लेते थे और तब तक चूसते रहते थे जब तक जहर पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता था. 

भगत भूरमल जी को मैं फैक्ट्री, जहां के लेखा विभाग में मैंने ३१ अक्टूबर, १९७३ से १८ जुलाई, १९८० तक नौकरी की थी, के गेट के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे पालथी मारकर बैठे प्रतिदिन देखता था. सदैव उनका एक ही परिधान होता…सफेद धोती पर सफेद कुर्ता. मध्यम कद, भारी शरीर, उभरा पेट, गोल मोटे चेहरे पर कंचे जैसी छोटी पीली आंखें और  काला रंग. पूछने पर बताया कि वे सांवले तो थे, लेकिन उतना काले नहीं थे. सांपों के जहर के प्रभाव के कारण उनके शरीर का रंग वैसा हो गया था. भगत जी स्वभाव से अत्यंत सरल थे और उन्होंने कभी किसी से एक फूटी कौड़ी नहीं ली थी. सांप काटे व्यक्ति को स्वस्थ कर देने से उन्हें जो सुख मिलता उसे वह किसी भी धन से बड़ा मानते थे. 

भगत जी का जन्म अलवर (राजस्थान) के राजगढ़ नामक गांव में एक बाल्मीकि परिवार में हुआ था. उन्हें बचपन से ही सांप पकड़ने का शौक था, लेकिन पिता समय सिंह को उनका यह शौक पसंद नहीं था.  पिता ने अपनी चिन्ता अपने गुरू घम्मन गुरू को बतायी. घम्मन गुरू ने भूरमल को समझाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन बालक पर कोई प्रभाव नहीं हुआ. अंततः घम्मन गुरू ने उन्हें कुछ साधना बतायी जिसे नदी तट पर जाकर करना था. लगन के पक्के बालक भूरमल ने निरन्तर तीन वर्ष तक गुरू द्वारा बताए उपाए किए और जब घम्मन गुरू को विश्वास हो गया कि भूरमल ने उनका शिष्यत्व प्राप्त करने की योग्यता प्राप्त कर ली है, उन्होंने उन्हें अपना शिष्य बनाना स्वीकार कर लिया. इसके लिए वह राजगढ़ आए और जिस दिन भूरमल को शिष्य बनाया जाना था, घम्मन गुरू ने वहां एक भंडारा का आयोजन किया. गुरू के अनेक शिष्य उपस्थित थे. भंडारा चल ही रहा था और भूरमल को शिष्य बनाए जाने की प्रक्रिया पूरी भी न हुई थी कि पास के गांव से सांप काटे व्यक्ति को कुछ लोग चारपाई पर डालकर वहां लाए. घम्मन गुरू के शिष्यों ने उसे स्वस्थ करने के प्रयास किए, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. भूरमल ने गुरू से अनुमति मांगी कि वह कुछ करना चाहते हैं. गुरू की अनुमति पाकर भूरमल ने काटे स्थान पर अपने होंठ रख दिए. लोग भौंचक थे. भूरमल ने यह भी नहीं ध्यान दिया कि उस स्थान पर जहर मोहरा रखा हुआ था. 

भूरमल ने जहर चूसना प्रारंभ किया. विषैले रक्त के साथ जहर मोहरा भी उनके पेट में चला गया. वहां उपस्थित लोग भयभीत किशोर भूरमल को आंखें फाड़े देख रहे थे. देर तक रक्त चूसने के बाद बेहोश व्यक्ति में हरकत हुई और कुछ देर बाद वह पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गया था. भूरमल को कुछ भी नहीं हुआ. उस समय उनकी  आयु मात्र १६ वर्ष थी. उस दिन के बाद भूरमल दास ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. 

१९३८ में भूरमल को आहुध निर्माणी कटनी में नौकरी मिली. १९५२ तक वह वहां रहे. वहां से स्थानांतरित होकर १९५९ तक वह जबलपुर में रहे. १९५९ में उनका स्थानांतरण मुरादनगर हो गया. वह जहां भी रहे समाज सेवा का यह कार्य जारी रखा.  बरसात के दिनों में उनके पास आने वाले मरीजों की संख्या प्रतिदिन पांच-छः होती थी. एस्टेट के कुछ लोगों ने उनके झोपड़ीनुमा क्वार्टर के बाहर एक छोटा-सा कमरा बनवा दिया था, जहां रात में आने वाले मरीजों को वह देखा करते थे.
“अब तक कितने मरीजों को उन्होंने स्वस्थ किया है” मेरे पूछने पर भगत जी ने बताया कि १९६५ तक का उनके पास कोई रिकार्ड नहीं था, लेकिन उसके पश्चात उन्होंने लोगों के नाम-पते लिखने प्रारम्भ कर दिए थे. उन्होंने अपने पास रखी एक डायरी दिखाई, जिसमें १९६५ से उस दिन तक आठ हजार पांच  सौ बत्तीस लोगों के नाम-पते दर्ज थे. 

फैक्ट्री प्रशासन की ओर से उन्हें हाजिरी लगाकर गेट के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे बैठने की अनुमति मिली हुई थी, जिससे वह मरीजों को जीवन दान दे सकें. 

जब मैं भगत जी से मिला था उस समय वह ५३ वर्ष के थे. उनके एक बेटा था जिसे फैक्ट्री में नौकरी मिल गयी थी और उनके मुरादनगर में ही बस जाने की संभावना थी. पूछने पर उन्होंने कहा था कि यदि  अवकाश ग्रहण के पश्चात वह वहां से जाना भी चाहेंगे तो पता चलने पर आस-पास के गांव वाले उन्हें जाने न देंगे. 

१८ जुलाई, १९८० के पश्चात मैं मुरादनगर नहीं गया. भगत जी हैं या नहीं और हैं तो कहां, मुझे आज जानकारी नहीं है, लेकिन सोचकर सुखद आश्चर्य होता है कि दुनिया में ऎसे लोग हैं जो निर्लिप्त भाव से समाज सेवा में अपना पूरा जीवन ही अर्पित कर देते हैं और इस बात की कतई चिन्ता नहीं करते कि समाज उनके लिए क्या कर रहा है या क्या किया.
  
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शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

यादों की लकीरें - भाग-दो

संस्मरण
आचार्य मुंशी राम शर्मा


रूपसिंह चन्देल

अप्रैल, १९७८ की बात है. उन दिनों मेरे मन में एक ही धुन सवारथी---विश्वविद्यालय से शोध विषय की स्वीकृति. फरवरी में यशपाल केकथा-साहित्य पर प्रस्तुत विषय अस्वीकृत हो चुका था. लेकिन मैं पीएच.डी. करने का संकल्प करचुका था अतः कुछ उदास तो हुआ लेकिन हताश नहीं. मेरे कानपुर के दौरे बढ़ गएथे. हफ्तों वहां पड़ा रहता. एक सप्ताह का अवकाश लेकर जाता और बीमारी केबहाने दो-तीन सप्ताह रुकता. मेरे शोध निर्देशक ने किसी भी प्रकार कीसहायता से पहले ही हाथ खड़े कर दिए थे. जो भी करना था स्वयं के बल पर. इससिलसिले में कितने ही लोगों से मिला. ‘कंचनप्रभा’ पत्रिका के सम्पादक श्रीयुत शंभूरत्न त्रिपाठी (अब स्वर्गीय) से भी उन्हीं दिनों मुलाकात हुई थी. वह थे तोसमाजशास्त्र के व्यक्ति लेकिन हिन्दी साहित्य में भी उनकी गहरी पैठ थी.उन्होंने अनेक विषय सुझाए, लेकिन वे इतने मुश्किल थे कि या तो मैं उसीसमय असमर्थता व्यक्त कर देता या कुछ दिन पुस्तकालयों की खाक छानकर हताशहो जाता. मतलब का कुछ भी नहीं मिलता. तब तक मैं कथा-साहित्य की ओर उन्मुखहो चुका था. कुछ कहानियां लिखी थीं. यद्यपि उन्हें प्रकाशनार्थभेजने का साहस नहीं जुटा पाया था तथापि मेरी रुचि कथा साहित्य में ही शोधकरने की थी.
अवकाश के दिन की एक सुबह, किदवई नगर में एक दुकान पर पानखाने के लिए रुका. प्रायः सुबह नौ बजे के लगभग मैं अपने निर्देशक सेमिलने साइकिल से जाता था, जो किदवई नगर के ’एल’ ब्लॉक में रहते थे. मिलने जाते हुए मैं उस दुकान से पान अवश्य खाता था. पान बनवातेसमय दैनिक जागरण भी पढ़ लेता. उस दिन कानपुर के वरिष्ठ कथाकारप्रतापनारायण श्रीवास्तव के निधन का समाचार प्रकाशित हुआ था. मेरेमस्तिष्क की घंटी बजी थी. ऎसी ही घंटी यशपाल के कथा-साहित्य पर विषय चयन केसमय भी बजी थी. उसी पनवाड़ी के यहां सुबह के उसी वक्त अखबार में उनकीमृत्यु का समाचार पढ़कर मैं अपने निर्देशक के यहां दौड़ गया था और उनसेचर्चा करके सीधे बिरहना रोड स्थित ’मारवाड़ी पुस्तकालय’ गया था, जहांदिनभर बैठकर यशपाल पर नोट्स तैयार किए थे और दो दिन के अंदर संक्षिप्तरूपरेखा प्रस्तुत कर दी थी.
श्रीवास्तव जी के निधन का समाचार पढ़कर भी समय नष्ट न कर मैं शोध-निर्देशक डा. बैजनाथ त्रिपाठी से मिलने गया. श्रीवास्तव जी के बारे में उनसे चर्चा की और सीधे ’मारवाड़ी पुस्तकालय’ जा पहुंचा. श्रीवास्तव जी का अधिकांश साहित्य वहां उपलब्ध था. यशपाल जी की भांति ही मैंने नोट्स तैयार किए और किसी अन्य छात्र द्वारा विषय प्रस्तुत करने से पहले ही रूपरेखा विश्वविद्यालय में प्रस्तुत कर आया.यह सब मेरे वश में था, लेकिन विषय की स्वीकृति विश्वविद्यालय में विषय निर्धारित करने वाली कमिटी के अधिकार की बात थी जिसकी बैठक साल या छः माह में एक बार होती थी. डा. सुधांशु किशोर मिश्र पर लिखे अपने संस्मरण में इस विषय पर मैं विस्तार से प्रकाश डाल चुका हूं. लेकिन उनकी सहायता कितनी लाभप्रद होने वाली थी, कहना कठिन था. इसके लिए उन तमाम स्रोतों को पकड़ना आवश्यक था विषय स्वीकृति में जिनके सहायक होने की संभावना थी.एक निजी छात्र के रूप में एम.ए. में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने काएक सुखद परिणाम यह हुआ था कि कानपुर के भद्र समाज में मेरी पहुंच और पूछबढ़ गयी थी. शंभूरत्न त्रिपाठी मेरे मुक्तकठ प्रशंसक थे. मेरे ऎसे हीप्रशंसकों में श्री सूर्यभान सिंह गौतम और उनकी पत्नी तरुणलता गौतम भी थे.तरुणलता जी आगरा के वरिष्ठ पत्रकार स्व. राजेन्द्र रघुवंशी की भतीजी थीं,जो इप्टा के संस्थापक सदस्यों में से एक और राजेन्द्र यादव के मित्र थे.बहरहाल, उन दोनों ने भी मेरी सहायता की थी. होता यह कि कानपुर प्रवासकाल में मैं घर में बिल्कुल नहीं टिकता था. दिनभर साइकिल शहर की सड़कों परदौड़ती रहती और किसी न किसी से मिलने जाता रहता. जिन लोगों से मिलने जाताउनमें गौतम दम्पति भी थे. उन्होंने मुझे आचार्य डा. मुंशीराम शर्मा सेमिलवाया, जो उन्हीं के मोहल्ले आर्यनगर में रहते थे. आर्यनगर कानपुर काअभिजात्य मोहल्ला है—खासकर नया आर्यनगर. वे दोनों आचार्य मुंशीरामशर्मा के भक्त थे. यह तो बाद में ज्ञात हुआ कि वे जिस मकान में रहते थेवह आचार्य शर्मा का ही था, जिसे उन्होंने कुछ वर्ष पहले उन्हें बेच दिया था.वह एक बड़ा, लेकिन पुराना मकान था. आचार्य शर्मा ने वहां से दस मिनट पैदलके रास्ते पर आर्यनगर की नयी बस्ती में मकान बनवा लिया था.इस प्रकार मैं एक ऎसे व्यक्ति—आचार्य डा. मुंशीराम शर्मा—से मिला जो संस्कृत और हिन्दी के प्रकांड विद्वान थे. आचार्य शर्मा डी.ए.वी. कॉलेज कानपुर के हिन्दी विभागाध्यक्षपद से अवकाश प्राप्त थे और उन दिनों वह अस्सी पार थे. पहली मुलाकात केसमय मैं उनके विषय में इतना ही जानता था. बाद में जाना कि उनके संबन्धचन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह आदि क्रान्तिकारियों के साथ रहे थे. जिन दिनोंवह डी.ए.वी.इंटर कॉलेज में प्रवक्ता थे, भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद और दूसरेक्रान्तिकारी डी.ए.वी. हॉस्टेल में आकर रहते थे. उन दिनों कानपुरक्रान्तिकारियों की शरणस्थली ही नहीं कर्मस्थली भी था. अपने जन्मकाल से हीयह नगर न केवल अपनी व्यावसायिक विशेषताओं के लिए बल्कि साहित्य और कला केलिए तो प्रसिद्ध था ही, क्रान्तिकारियों का प्रमुख केन्द्र भी था.क्रान्ति शायद इस नगर की मिट्टी में बसी हुई है. १८५७ की क्रान्ति कीयोजना बनाने वाले अजीमुल्ला खां इसी नगर में पले-बढ़े थे. यहीं एक अंग्रेजके घर बावर्ची का काम करते हुए उन्होंने यहां के तत्कालीन एकमात्रप्राइमरी विद्यालय में अंग्रेजी और उस अंग्रेज के बच्चों को फ्रांसीसीपढ़ाने आने वाले शिक्षक से फ्रांसीसी का ज्ञान प्राप्त किया था. नाना साहबके सलाहकार और बाद में मंत्री बनने से पहले वह उसी प्राइमरी विद्यालय मेंअध्यापक रहे थे. १८५७ की क्रांति के कार्यान्वयन का श्रेय भले ही नानासाहब को जाता है, लेकिन उसकी संपूर्ण योजना अजीमुल्ला खां के मस्तिष्क कीही उपज थी.
क्रांति, कला और साहित्य का स्वाभाविक विकास कानपुर की धरती में हो रहाथा. यह नगर प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्णशर्मा नवीन, विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक,भगवतीचरण वर्मा, प्रतापनारायण श्रीवास्तव, गणेशशंकर विद्यार्थी, और कुछसमय के लिए कथाकार प्रेमचंद की भी कर्मभूमि रहा है यह नगर. और भी कितने हीनाम हैं. इस नगर की ऎसी ही एक विभूति थे आचार्य मुंशीराम शर्मा. शर्मा जीक्रांतिकारियों के छुपने-छुपाने में सहायक रहते थे. ब्रितानी शासनकाल में यह एक जोखिमभरा काम था. जिन दिनों मैं उनसे मिला, उन दिनों वह प्रतिदिन संस्कृत के कुछ श्लोकों का सृजन कर रहे थे. मुझे बताया गया कि स्वरचित ऎसे श्लोकों का एक ग्रंथ शीघ्र ही प्रकाशित करवाने की उनकी योजना थी. ग्रंथ प्रकाशित हुआ या नहीं मुझे जानकारी नहीं. आचार्य शर्मा जी से मिलवाने के लिए श्रीमती तरुणलता गौतम मेरे साथ गई थीं. आचार्य जी से उन्होंने मेरे विषय में पहले ही चर्चा की हुई थी. पहली मुलाकातसंक्षिप्त रही थी—मात्र परिचय और शोध विषय तक सीमित. उसके बाद जब भीमैं कानपुर में होता एक-दो बार आचार्य जी से मिलने अवश्य जाता था….भलेही मैं कई महीनों बाद गया, लेकिन उन्होंने कभी भुलाया नहीं था.उनके पड़ोस में रहते थे डॉ. प्रेम नारायण शुक्ल. शुक्ल जी उनके शिष्य रहेथे और उन दिनों डी.ए.वी. कॉलेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष थे. दूसरी मुलाकातमें आचार्य जी ने बताया कि उन्होंने मेरे विषय में शुक्ल जी से चर्चा कीथी. मैं समझ नहीं पाया था कि शुक्ल जी से चर्चा का अर्थ क्या था. यह वहीप्रेमनारायण शुक्ल थे जिनसे मैं सितंबर १९७६ में पीएच.डी. करने केअपने निर्णय के बाद डी.ए.वी. कॉलेज में बहुत उत्साह से इस आशय से मिलाथा कि उनके कॉलेज में उस वर्ष प्रथम श्रेणी पाने वाला एकमात्र छात्र मैंथा और वह मुझे अपने निर्देशन में पीएच.डी. के लिए पंजीकृत करवा लेंगे.भूतल में सीढ़ियों के पास खड़ा मैं उनकी प्रतीक्षा कर रहा था. वह नीचेउतरे. हाथ में पुस्तकें—धोती-कुर्ता में मध्यम कद. मैंने चरण स्पर्श करपरिचय दिया. प्रसन्न हुए, लेकिन जब मेरे मिलने का अभिप्राय जाना, चेहरेपर भावहीनता ओढ़ बोले, “निजी छात्र के रूप में तुमने एम.ए. किया है इसलिएअपने अधीन मैं तुम्हें पंजीकृत नहीं करवा सकता.” मैं बुझ गया था.उन्हीं प्रेमनारायण शुक्ल से आचार्य मुंशीरामशर्मा जी द्वारा चर्चा करने की बात सुनकर मैं चौंका था. मैंने सफाई देते हुए कहा था कि मुझे शोध निर्देशकनहीं चाहिए. मैंने अपने निर्देशक का नाम बताया और कहा कि मैं चाहता हूंकि इस बार प्रतापनारायण श्रीवास्तव पर प्रस्तुत मेरा विषय अस्वीकृत न हो.
“उसी विषय में प्रेम से मैंने चर्चा की थी. वह संयोजक को कह देंगे.”
मैं चुप रहा था. उस वर्ष संयोजक लखनऊ विश्वविद्यालय के कोई डॉ. अग्रवालथे. मीटिंग की तिथि मुझे डॉ. सुधांशु किशोर मिश्र से ज्ञात हो गयी थी.मैं कानपुर पहुंचा और आचार्य शर्मा से मिला. उन्होंने शुक्ल जी को फोनकरके अपने पास बुलाया. शुक्ल जी तुरंत आए. आचार्य जी ने मेरी ओर संकेत करकहा, “यही हैं रूपसिंह चन्देल. प्रतापनारायण श्रीवास्तव के व्यक्तित्व औरकृतित्व पर इनका विषय प्रस्तुत है.”
“मुझे याद है. आप चिन्ता न करें.” शुक्ल जी ने अपने गुरू से कहा और मेरी ओर उन्मुख हुए, “मेरे साथ आओ.”
आचार्य मुंशीराम जी ने भी मुझे उनके साथ जाने के लिए कहा.मैं शुक्ल जी के साथ उनके निवास पर गया. शुक्ल जी बोले, “परसों मीटिंगहै. डॉ. अग्रवाल से मेरी बात हुई थी. वह सुबह दस बजे की ट्रेन से कानपुरसेण्ट्रल स्टेशन पहुंचेंगे….आप टैक्सी लेकर उन्हें वहां रिसीव करें औरमेरे घर पहुंचा दें. वह टैक्सी दिनभर डॉ. अग्रवाल जी के साथ रहेगी.”
“जी डाक्टर साहब.” मैंने कहने के लिए कह तो दिया था, लेकिन उनकी बातसुनकर मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी थी. पहली बात, टैक्सी का दिनभरका खर्च—मेरी सोच से बाहर की बात थी. दूसरी बात, जीवन में इस प्रकार कावह पहला अनुभव था. यह एक प्रकार का खुला भ्रष्टाचार था. इससे पहले शोधकरवाने के नाम पर कुछ प्रोफसरों ने मुझसे पैसों की मांग की थी, जिनकेप्रस्ताव सुनकर मैंने उनसे पुनः संपर्क नहीं किया था. उनके खिलाफ कुछ करसकने की हैसियत नहीं थी सिवा चुप रहने के. यह भी वैसा ही प्रस्ताव था.तब तक इतनी जानकारी तो हो ही चुकी थी कि कितने ही शोधार्थियों को ऎसीशर्तें मानने के लिए विवश होना पड़ता है. इससे भी खराब शर्तें—हिन्दीशोध के नाम पर भयानक शोषण—डॉ. शुक्ल जैसे दो-चार प्रोफेसर प्रत्येकविश्वविद्यालय में होते हैं, यह भी जानता था.
“मेरा फोन नंबर लिख लो—कल सुबह मुझे फोन कर लेना. मैं डॉ. अग्रवाल कानिश्चित कार्यक्रम पूछकर बता दूंगा.”
“बुरे फंसे.” मैंने सोचा, लेकिन तत्क्षण मुझे डॉ. मुंशीराम शर्मा की यादआयी और मैंने डॉ. शुक्ल का फोन नंबर लिखा और उनके घर से बाहर आ गया था.
रातभर बेहद उहा-पोह की स्थिति में रहा. अंततः सुबह डॉ. शुक्ल को फोन करनेका निर्णय किया. फोन पर उन्होंने बताया कि डॉ. अग्रवाल की योजना बदल गयीहै. तुम्हें स्टेशन जाने की आवश्यकता नहीं है. मैंने राहत की सांस ली थी.
उस मीटिंग की अध्यक्ष थीं प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. शशिप्रभा शास्त्री औरजैसाकि डॉ. सुधांशु किशोर मिश्र पर लिखे अपने संस्मरण में लिख चुका हूं—विषय की स्वीकृति में डॉ. मिश्र और विश्वविद्यालय में कार्यरत श्रीडी.पी. शुक्ल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. मुझे नहीं मालूम किप्रेमनारायण शुक्ल ने कुछ किया था या नहीं, लेकिन बाद में यह जानकारीअवश्य मिली थी कि हिन्दी शोध के लिए कानपुर विश्वविद्यालय का जो भीसंयोजक होता था, डॉ. शुक्ल उसे लपक लेते थे. अधिकांश उन्हीं विषयों कोस्वीकृति दी जाती जिन्हें डॉ. शुक्ल चाहते थे. लेकिन उस दिन आचार्य मुंशीरामशर्मा के निवास पर हुई मुलाकात ही डॉ. प्रेमनारायण शुक्ल से मेरी अंतिममुलाकात थी, जबकि उसके बाद भी मैं आचार्य शर्मा से मिलने जाता रहा था. यहसिलसिला तभी थमा जब कानपुर जाने का अंतराल बढ़ा और साथ ही बढ़ी व्यस्तता.
और एक दिन समाचार पत्र में उनकी मृत्यु का समाचार पढ़ा. कानपुर का एक बेहदआत्मीय और मानवीय चेहरा हमारे मध्य नहीं रहा था. समाचार-पत्र में यहसमाचार भी था कि अंतिम समय तक आचार्य शर्मा का संस्कृत श्लोक लिखने कासिलसिला जारी रहा था.
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रविवार, 18 दिसंबर 2011

यादों की लकीरें

संस्मरण
बड़ी दीदी

शुक्रवार 29 अप्रैल,2005 का गर्मीभरा दिन। मुझे कनॉट प्लेस स्थित कॉफी होम में अपने दो मित्रों से पांच बजे मिलना था। सुबह नौ बजे से अपरान्ह दो बजे तक लियो तोलस्तोय के अंतिम उपन्यास हाज़ी मुराद का अनुवाद कार्य करता रहा। स्वैच्छिक सेवावकाश ग्रहण करने के पश्चात् सबसे पहला काम मैंने दो वर्षों से स्थगित होते आ रहे उस कार्य को सम्पन्न करने का किया था।
उस दिन कॉफी होम बंद होने तक हम वहां बैठे रहे। जब लोग चले गए और कर्मचारियों ने मेजें खिसकाना प्रारंभ किया हम बाहर निकल आए। बाहर भी कुछ देर बातें करते रहे... साहित्यिक बातें। रात जब साढ़े नौ बजे के लगभग मैं घर पहुंचा, पता चला शाम पांच बजे से नौ बजे के मध्य कानपुर से तीन फोन आ चुके थे।
''क्यों?''
''दीदी नहीं रहीं।''
''कब?''
''आज शाम चार बजे।''
'दीदी' - यानी मेरी बड़ी बहन भाग्यवती, जो नाम से ही भाग्यवती थीं और जब तक पिता के घर रहीं भाग्यवती ही रहीं, लेकिन पति के घर जाते ही दुर्भाग्य ने जो एक बार उन्हें अपने फंदे में लपेटा तो मृत्युपर्यंत वह उसके फंदे को काट नहीं पायीं।
अशांत मन कुछ देर मैं कानपुर पहुंचने पर विचार करता रहा। समय नष्ट न कर मैंने रेलवे इन्क्वारी फोन मिलाकर कानपुर जाने वाली अंतिम ट्रेन के विषय में जानकारी मांगी। ज्ञात हुआ कि अंतिम ट्रेन साढ़े दस बजे रात की थी। उस ट्रेन को पकड़ना असंभव था। छोटे भाई राजकुमार को कानपुर फोन करके वस्तुस्थिति स्पष्ट कर अंत्येष्टि के विषय में पूछा। ज्ञात हुआ कि सुबह दस बजे तक सम्पन्न हो जाएगी।
'अब?' मैं सोचता रहा और रातभर सो नहीं पाया।
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मैं जब डेढ़ वर्ष का था, बड़ी दीदी का विवाह कर दिया गया था। पिता जी कलकत्ता में थे। मां को किसी ने सुझाया कि उनकी बबनी के लिए उसने एक सुयोग्य वर देखा है कानपुर से तीस मील दूर पियासी नामके गांव में (बाद में इस गांव का नाम भरतपुर पड़ा)। यह गांव कानपुर के घाटमपुर तहसील में है जिसका निकटतम रेलवे स्टेशन पतारा वहां से छ: मील है। उन दिनों वहां पहुंचने के लिए पैदल के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था। मेरे बहनोई की सुयोग्यता यह थी कि तीन भाइयों में वह सबसे छोटे थे, लगभग तीस-पैंतीस बीघा उपजाऊ खेत और भाइयों ने उन्हें पहलवानी की छूट दे रखी थी। हालांकि वह मुझे कभी पहलवान जैसे नहीं दिखे। होश संभालने पर जब भी उन्हें देखा--लंबे, छरहरे,सांवले, लंबोतरे चेहरे पर छोटा-सा मुंह, छोटे बाल, छोटी आंखें, हड्डियां निकलीं, उभरी नाक। भाइयों की छूट ने उन्हें आलसी और निकम्मा बना दिया था। दोनों बड़े भाई खेत संभालते और अपने व्यवसाय भी, लेकिन सदन सिंह सेंगर...यही नाम है मेरे बहनोई का, तहमद बांधे गांव में घूमते...अपने हमउम्रों के साथ किसी चौपाल में ताश फेट रहे होते।
दीदी का जब विवाह हुआ वह तेरह-चौदह साल की थीं। दो-तीन वर्षों तक वह अच्छी बहू...देवरानी के रूप में ससुराल में रहीं। उनके सास-श्वसुर नहीं थे। भाइयों ने सोचा होगा कि शादी के पश्चात् सदन सिंह अपनी जिम्मेदारी अनुभव करेंगे और पहलवानी के साथ, जिसके लिए सुबह-शाम अखाड़े में उतरने की आवश्यकता होती है, के बाद खेतों की ओर ध्यान देंगे, लेकिन पचीस-छब्बीस वर्ष की उम्र तक खेत-खलिहान से मुक्त रहे सदन सिंह को वह सब रास नहीं आया। भाइयों की बात की उपेक्षा कर वह बदस्तूर चौपालों की शोभा बढ़ाते रहे और घर में वातावरण तनावपूर्ण होने लगा। दीदी पति के लिए दिए जाने वाले ताने सुनने को विवश थीं। अंतत: उन्होंने स्वयं कमर कसी और खेत-खलिहान तो नहीं, लेकिन घर के काम के साथ घेर का काम करने का विचार किया और एक दिन सुबह जब सदन सिंह के दोनों भाई जानवरों के सानी-चारा के लिए घेर में पहुंचे देखकर हैरान-परेशान रह गए कि उनकी छोटकी बहू जानवरों के नीचे का गोबर एकत्र कर चुकी थी। भूसे में रातिब मिलाकर भैंसों और बैलों के सामने डाल चुकी थीं और जानवर नांद में भकर-भकर मुंह मार रहे थे।
''छोटकी, मैं यह क्या देख रहा हूं?'' मंझले जेठ बदन सिंह बोले, ''सदन लंबी तानकर सो रहे हैं और तुम.....।''
छोटकी ने घूंघट सिर से नीचे खींच लिया, और जानवरों के नीचे झाड़ू लगाना जारी रखा। बोली नहीं। बदन सिंह का पुरुषत्व कोई उत्तर न पाकर आहत हुआ। घेर घर से सटा हुआ था। वह पलटे जबकि बड़े जेठ खड़े रहे...अपने बड़प्पन के बोझ तले दबे। बदन सिंह ने घर जाकर अपनी पत्नी से छोटकी की शिकायत की, ''यह क्या तमाशा है राकेश की अम्मा...छोटकी नाक कटवाने पर तुली हुई है इस खानदान की।''
''का हुआ...?''
''चलकर घेर में देखो।''
और छोटकी की दोनों जेठानियां मिनटों में घेर में हाज़िर थीं। शोर सुनकर सदन सिंह भी अपनी तहमद संभालते घेर जा पहुंचे। छोटकी किंकर्तव्यविमूढ़ हाथ में झाड़ू थाम घूंघट को और नीचे तक सरकाकर खड़ी हो गयीं।
''बदजात, मैं यह क्या तमाशा देख रहा हूं?'' सदन सिंह फुंकारे। उनका पुरुष अहं जाग्रत हो उठा था। छोटकी सोच ही रही थीं कि पति के स्थान पर स्वयं काम करके उन्होंने क्या अपराध किया था।' लेकिन उनकी सोच पूरी भी नहीं हुई थी कि सदन सिंह का मुगदर उठाने वाला हाथ उनकी पीठ पर पड़ा था और छोटकी 'हा, अम्मा...।' के चीत्कार के साथ छाती थाम ज़मीन पर बैठ गयी थीं। जिस अम्मा को उन्होंने याद किया था उसे गलियाते सदन सिंह के हाथ-पांव छोटकी पर चल रहे थे और उनके भाई-भौजाई मुंह बांधे दृश्य देख रहे थे। वे पुलकित थे या दुखी कहना कठिन है, लेकिन सदन सिंह ने पत्नी को उस दिन इतना पीटा कि पन्द्रह दिनों तक वह बिस्तर पर पड़ी दूध में हल्दी पीकर आंतरिक चोटों के ठीक होने का इंतज़ार करती रही थीं।
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दीदी की प्रताड़ना की अनंत कथाएं हैं। सदन सिंह का हाथ खुल चुका था...अब वह मामूली-सी बातों पद भी दीदी पर बरस पड़ता। दीदी पिटती, मां-पिता को याद करतीं...छटपटातीं और उसी खूंटे से बंधी रहतीं। मां...जिन तक समाचार पहुंचाना उनके लिए सहज न था। पढ़ना-लिखना उन्हें बखूबी आता था...अपढ़ मां-पिता ने अपनी संतानों को पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन उन दिनों गांव के निकट के गांव में मात्र प्राइमरी तक शिक्षा की ही सुविधा थी। आगे पढ़ने के लिए तीन: मील दूर जाना पड़ता। दीदी की पढ़ाई में पहली बाधा दूर जाने की थी और दूसरी बाधा उस परिचित ने ला उपस्थित की थी जिसने सदन सिंह की सुयोग्यता का ऐसा दृश्य उपस्थित किया था कि मां ने उस सुयोग्य वर को छोड़ना उचित नहीं समझा था। दीदी पांचवीं तक ही पढ़ सकी थीं। लेकिन ''सर्वश्री उपमा योग भगवान की किरपा से.....'' से प्रारंभ कर पत्र लिखना उन्हें आता था। लेकिन एक अंतर्देशीय लिखकर उसे दूर गांव स्थित पोस्ट आफिस में छोड़ने की व्यवस्था वह कैसे करतीं और मां भी क्या उनकी सहायता के लिए दौड़ आतीं! भले ही वह अक्खड़, खुद्वार और निर्भीक थीं...किसी से भी न दबने वालीं, लेकिन यहां मामला कुछ और ही था। लड़की की ससुराल से जुड़ा मामला.....अति संवेदनशील। मेरे पिता और बड़े भाई कलकत्ता में थे। दीदी अपनी स्थितियां और सीमाएं जानती थीं और यातना सहने के लिए अभिशप्त थीं। उधर उनकी ससुराल का वातावरण अधिकाधिक तनावपूर्ण होता जा रहा था। जेठानियां देवर के खुल चुके हाथ का आनंद लेने लगी थीं और उनके कान भी भरने लगी थीं। दीदी की मामूली त्रुटि भी उनके लिए प्रताड़ना का कारण बन जाती। प्रताड़ना ऐसी कि आह भरने पर भी प्रतिबंध था। आखिर एक दिन पीड़ा फूट ही पड़ी थी। आंगन में पहले दिन के घेर का दृश्य उपस्थित था। सदन सिंह के लात-घूंसों की बौछार के बीच फुंकार उठी थीं रामदुलारी की बेटी, ''बहुत हो चुका...आप डांव-डांव घूमो और मैं यहां ताने सुनूं। मार डालो वह अच्छा, लेकिन ताने नहीं सुन सकती। खेतों में निराई करने गई थी...चोरी-छिनारा करने नहीं। आप अपने शरीर को नहीं खटा सकते, अपने हिस्से के काम के लिए मजदूर रखने की तौफीक पैदा नहीं कर सकते तो कोई तो काम करेगा ही...या तो खेतों में सब के बराबर काम करें या मुझे करने दें और अगर वह भी स्वीकार नही तो मुझे मेरे मायके छोड़ दें...फिर जो मन आए करें....।''
पहली बार दीदी की आवाज फूटी थी और वह भी सदन सिंह के दोनों भाइयों और भौजाइयों के सामने और सदन सिंह के हाथ रुक गए थे। हालांकि वह रुकावट अस्थाई साबित हुई थी, लेकिन दीदी को लगा था कि उनकी बात का असर हुआ था पति पर। और हुआ था...अगली सुबह सदन सिंह के दोनों भाइयों ने देखा था कि हल कंधे पर रख सदन बैलों के साथ खेतों की ओर जा रहे थे। लेकिन अनभ्यस्त हाथ और खेत में टेढ़े-मेझे चलते पैरों ने कुछ देर सही खेत जोतने के बाद हल की कुशिया जमीन में धंसकर चलने के बजाए मात्र रेखा-सी खींचती चलने लगी थी और ऐसी स्थिति में जो होना था वह हुआ। कुशिया का फाल उछलकर सदन सिंह के पैर में जा धंसा था। हल छूट गया था और सदन सिंह लंगड़ाते, खून बहाते पैर घसीटते सड़क किनारे एक खेत की मेड़ पर खड़े आम के पेड़ की ओर दौड़ पड़े थे। बैल उनके बिना जमीन पर बेड़ा पड़े घिसटते हल को तब भी खींच रहे थे। संयोग था कि दोनों बड़े भाई उसी समय वहां पहुंचे थे। एक ने दौड़कर हल को बैलों से अलग किया था, क्योंकि जो गति कुशिया ने सदन सिंह के पैर की की थी, वह दोनों बैलों के पैरों की होनी निश्चित थी।
सदन सिंह के घायल होने का दोष भी दीदी के सिर पड़ा। 'कुलच्छनी, गृहतोड़नी-बोरनी' जैसी कितनी ही उपमाओं से उन्हें विभूषित होना पड़ा और अपराधबोध से ग्रस्त वह भी अपने को वैसा ही मान रही थीं।
''मैं इसकी शक्ल नहीं देखना चाहता।'' सदन सिंह का फरमान जारी हुआ तो निर्णय किया गया कि उन्हें मायके पहुंचा दिया जाए। गांव के किसी व्यक्ति के साथ दीदी को मायके भेज दिया गया। मायके आने के बाद मां को दीदी की दारुण स्थिति ज्ञात हुई। तीन या चार महीना ही वह मायके में रही थीं कि एक दिन सफेद झक धोती-कुर्ता पहने चमरौधा चटकाते शाम आगरा-इलाहाबाद पैसेंजर से सदन सिंह प्रकट हुए। वह दीदी को लेने आए थे। दामाद बेटी को ले जाने आया था, मां ने दबी जुबान उनसे शिकायत की और दामाद ने मुस्कराकर कहा, ''अरे अम्मा, मैंने तो आपकी बिटिया की खेतों में काम करने से बदन में लगी धूल झाड़ी थी...अब आपको शिकायत का मौका नहीं मिलेगा। मैंने परचून की दुकान खोल ली है। खेतों में काम करने के लिए अपनी जगह एक मजदूर लगा दिया है। किसी को कहने का मौका नहीं दूंगा...आप निश्चिंत रहें अम्मा...।''
और मां निश्चिंत हुई थीं, लेकिन दीदी नहीं। वह सेंगरों के छद्म को भलीभांति पहचान चुकी थीं। और ससुराल पहुंचने के कुछ दिनों बाद ही उनकी आशंका सही सिध्द हुई थी। सदन सिंह ने दुकान तो कर ली थी, लेकिन वह ताश खेलने वालों का अड्डा बन गयी थी। गांव के उनके आवारा साथी वहां एकत्र होते...मुफ्त की बीड़ी-सिगरेट फूंकते...जल्दी ही दुकान घाटे का सौदा सिध्द हुई। सदन सिंह न कभी अपने प्रति जिम्मेदार हुए न घर के प्रति और न पत्नी के प्रति। भाइयों में कसमसाहट हो रही थी।
''ऐसा कब तक चलेगा?'' का प्रश्न दोनों बड़े भाइयों के बीच उछलने लगा था, ''हम खटें-कमाएं और सदन मौज करें। छोटकी हल तो नहीं चला सकती...घूर तक जाकर गोबर नहीं फेक सकती....।''
छोटकी ने सुना। हल वह भले ही नहीं चला सकती थीं, लेकिन गोबर, सानी-पानी, निराई,गोड़ाई, बुआई से लेकर जानवरों के लिए मशीन पर कुट्टी काटने जैसे काम छोटकी ने अपने सिर ओढ़ लिया। अब उनके इन सब कामों का विरोध भी कम हो चुका था। गांव में नाक कट चुकी थी, लेकिन वह नाक तो गांव के और भी कितने ही निखट्टू पतियों की उनकी पत्नियों के कारण पहले ही कट चुकी थी।

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समय बीतता रहा। दीदी दो बेटियों और दो बेटों की मां बन गयीं। पारिवारिक विग्रह बढ़ा और भाइयों में बटवारा हो गया। बटवारा सदन सिंह को सबक सिखाने के लिए था, लेकिन दूसरे के श्रम पर गुलछर्रे उड़ाने वाले कम लोग ही अपने को संभाल पाते हैं। सदन सिंह ने अपने हिस्से के खेत तिहाई पर दे दिए और स्वयं तहमद बांधे गांव में घूमते रहे। दीदी ने घर-खेत की जिम्मेदारी संभालीं, बच्चों की पढ़ाई और बड़ी बेटी के विवाह की चिन्ता ने उन्हें वह सब करने के लिए विवश किया जो किसी पुरुष किसान को करना होता है। इस सबके बावजूद सदन सिंह का कोपभाजन वह जब-तब होती रहीं, लेकिन बटवारे के बाद दीदी के अथक श्रम पर जीने वाले उस इंसान का साहस दीदी पर हाथ उठाने का कम ही होने लगा था। शायद एक कारण बड़े होते बच्चे रहे हों। दीदी ने अठारह की होते हीे बड़ी बेटी का विवाह कर दिया था।
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दीदी ने नानी जैसा स्वभाव पाया था। घोर अपमान और प्रताड़ना सहकर भी परिवार के लिए समर्पित रहना क्या भारतीय ग्राम्य नारी की नियति है! दीदी ने अपने बल पर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर ली थी। 1962 से 1965 के मध्य जब मायके की आर्थिक स्थिति दयनीय हो गयी थी, दीदी ने पति से छुपाकर सहायता की थी। उन्हीं दिनों पिता ने शादी के समय उन्हें एक सेर चांदी के दिए वे कड़े बहुत ही भारी मन से मांगा था, जिन्हें देते समय पिता जी ने कहा था, ''बेटा, ईश्वर न करे मुझे ये मांगना पड़े, लेकिन यदि ऐसी स्थिति आ ही जाएगी तब तुम इन्हें अपने भाइयों के लिए दे देना। और यह बात सदन को भी बता देना।''
मुझे याद है कड़े मांगने से पहले मां-पिता जी के बीच हुई वार्तालाप और दोनों के चेहरों के भाव। पिता के चेहरे के भाव बयां कर रहे थे कि बेटी से कड़े मांगने से पहले वे मर क्यों नहीं जाते। लेकिन वे मरे नहीं थे। उन्हें शेष परिवार के पोषण के लिए बेटी को अपनी कही बात याद दिलानी ही पड़ी थी और दीदी ने सहेजकर रखे वे कड़े पिता जी के हवाले कर दिए थे। शायद उन्होंने कभी उन्हें पैरों में नहीं डाला था। छोटे कद का कर्मठता का गवाह उनका दुबला शरीर शायद आध-आघ सेर के कड़ों का वजन पैरों पर स्वीकार करने से इंकार कर देता।
जिन दिनों हम बहनोई को दीदी के विरुध्द किसी प्रताड़ना के लिए रोकने की स्थिति में आ गए थे उन दिनों उनका कहर थमा हुआ था। कारण था घर-खेतों में दीदी की जूझ और बच्चों की परवरिश। बच्चों के लिए सदन सिंह भी चिन्तित दिखने लगे थे और इसी कारण जब बड़ा बेटा छठवीं क्लास में पहुंचा, वह उसे शहर में पढ़ाने के लिए बड़े भाई साहब के पास छोड़ गए थे। उन दिनों मेरा छोटा भाई भी छठवीं में बड़े भाई साहब के पास रहकर पढ़ रहा था। उसे पढ़ाई की परवाह नहीं थी। हम लोगों की डांट-फटकार ...यहां तक कि मारपीट भी उस पर बेअसर थी। उसके साथ राघवेन्द्र की पढ़ाई चौपट होने का खतरा भांप भाई साहब ने बहनोई को उसे वापस ले जाने के लिए संदेश भेजा। यह बात उन्हें नागवार लगनी थी...और लगी। लेकिन दीदी तो दीदी थीं...उन्होंने कभी नाराज होना जाना ही नहीं था।

बड़े बेटे ने इंटर करने के बाद एयर फोर्स ज्वायन किया तो दीदी को लगा कि उनके दुख के दिन बीतने वाले हैं। लेकिन कुछ ही वर्षों में उनका भ्रमभंग हो गया था। बड़ा बेटा पिता के नक्शे-कदम पर था...खानदान का प्रभाव। मां के प्रति पिता के दर्ुव्यवहार के लिए वह मां को दोष देता....उसके सामने भी बहनोई दीदी को पीटते और वह प्रस्तर मूर्ति बना रहता। लेकिन छोटा बेटा जिसे हम पप्पू पुकारते थे, मन ही मन पिता के प्रति विद्रोही हो रहा था। उसने इंटर किया तो पिता ने उसे खेतों में काम करने की सलाह दी। वह चुप रहा, लेकिन तभी एक दिन किसी बात पर बहनोई ने दीदी पर हाथ उठा दिया। पप्पू घर में था। दीदी पर पिता का हाथ पड़ता इससे पहले ही दौड़कर उसने उनका हाथ पकड़ लिया और ऊंची आवाज में बोला, ''चाचा (बड़े भाई के बच्चों का अनुसरण करते हुए मेरे भांजे-भांजियां भी पिता को चाचा कहने लगे थे) जब से होश संभाला आपको अम्मा को मारता-पीटता देखता रहा...अब नहीं। खैरियत इसी में है कि अब आप यह सब बंद कर दें।''
विवाद बढ़ा। सदन सिंह नाग की भांति फुंकारते उछलते रहे, लेकिन जवान बेटे के सामने कुछ करने में असमर्थ थे, जो उनसे भी लंबा दो इंच कम छ: फुट का था।
''आज और अभी निकल जा घर से....।'' सदन सिंह चीखे थे। पप्पू ने घर छोड़ दिया, लेकिन दीदी उसके पीछे दौड़ीं और गांव के छोर पर उसे रोककर समझाने में सफल रहीं कि उसके जाने के बाद पति का उनके प्रति दर्ुव्यहार बढ़ जाएगा जो कुछ वर्षों से थमा हुआ था। पप्पू लौट आया। वास्तव में पति से भय से अधिक एक मां की पुत्र के प्रति ममता ने उन्हें उसे लौटा लाने के लिए दौड़ाया था।
पप्पू के लौट आने से सदन सिंह की खीझ बढ़ गयी, लेकिन अब उम्र जवान खून का सामना करने की न रही थी। छटपटाकर रह गए थे सदन सिंह।
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नवंबर, 1984 के अंत में दीदी बड़े बेटे के साथ मेरे यहां आयीं। अवकाश समाप्तकर भुज वापस लौटते समय बेटा उन्हें मेरे यहां छोड़ गया। चार माह रहीं वह। उन्ही दिनों पप्पू को पिता ने घर से निकाल बाहर किया। वह भी दिल्ली आ गया। स्टेशन से सीधे मां से मिलने मेरे यहां आया। उसने रात बितायी। दीदी ने उसे गांव लौट जाने के लिए समझाया, लेकिन वह वापस न लौटने के दृढ़ निश्चय के साथ आया था। अगले दिन वह अपने बहनोई के किसी रिश्तेदार के यहां बुध्दविहार चला गया। दीदी के रहते वह दो बार उनसे मिलने कुछ घण्टे के लिए आया। उसने किसी एक्सपोर्ट कंपनी में एकाउण्ट्स का का काम संभाल लिया था। वह लंबा,स्वस्थ-सुदर्शन युवक था।
चार माह बाद पति की बीमारी का समाचार पाकर दीदी गांव चली गयीं। मैं उनके निर्णय पर सोचने लगा था कि जिस पति ने आजीवन उन्हें सताया उसकी मामूली बीमारी के समाचार ने उन्हें विचलित कर दिया...क्या यही भारतीय नारी का वास्तविक स्वरूप है! शायद परंपरा से उसे यह सिखाया जाता रहा कि वही घर की असली संरक्षिका है...वह सर्व-स्वरूपा है। पुरुषों ने नारी को बांध रखने के कितने ही छद्म किए...वह प्रताड़ित भी होती रही और प्रताड़ित करने वालों के लिए मरने को भी तैयार होती रही। सत्यवान कैसा भी हो उसे सावित्री ही बनना होता है। मैं नहीं चाहता था कि वह जाएं , लेकिन उन्होंने मेरे सुझाव को दरकिनार कर दिया था।
''खेत कटने के लिए तैयार हैं रूप...अगर वह सच ही बीमार हैं तब न जांये ते आधी पैदावार ही मिलेगी।''
बहनोई की बीमारी शायद खेतों को लेकर ही थी और इसे दीदी ने भांप लिया था।
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दीदी ने छोटी बेटी की भी शादी कर दी और अब उनके दिन ठीक बीत रहे थे। 1994 में उन्होंने छोटे बेटे का विवाह निश्चित किया। 12 या तेरह मार्च को शादी होनी थी। पप्पू हम लोगों से मिलकर और ''शादी में आप सब अवश्य आना मामा....।'' कहकर कानपुर गया, लेकिन शादी से दो दिन पूर्व रात बारह बजे किदवई नगर से यशोदानगर जाने वाली रोड पर एक ट्रक से स्कूटर टकरा जाने से उसकी मृत्यु हो गयी थी। तब तक दीदी का बड़ा बेटा नौकरी से स्वेच्छया सेवाकाश लेकर कानपुर में बस गया था। पप्पू की मृत्यु ने दीदी को तोड़ दिया। वह बीमार रहने लगीं... मधुमेह और दूसरी तमाम बीमारियां।
राघवेन्द्र ने कार्पोरेशन बैंक ज्वायन किया और नोएडा में उसकी पोस्टिंग हुई। वह गाजियाबाद रह रहा था। एक दिन दीदी का खत मिला जिसमें उन्होंने दुखी भाव से लिखा था कि बहनोई अब फिर बात-बात पर उन पर हाथ छोड़ने लगे हैं। बड़े भाई साहब ने दीदी को अपने साथ कानपुर आकर रहने के लिए समझाया, लेकिन अपना घर छोड़ने को वह तैयार नहीं हुईं। यह उचित भी था। जिस घर को उन्होंने अपने अथक श्रम से सजाया-संवारा था, उसे छोड़कर भाई के घर रहना उन्होंने उचित नहीं समझा था। उस पत्र में दीदी ने लिखा था कि मैं राघवेन्द्र को कहूं कि वह पिता को समझाए ....पिता बड़े बेटा-बहू की बात मानते हैं।
हम पति-पत्नी गाजियाबाद गए। पत्र पढ़कर राघवेन्द्र बोला, ''मामा, सारा दोष अम्मा का ही है।''
हम हत्प्रभ-निराश लौटे। बड़ा बेटा पिता के पक्ष में खड़ा था...वह पहले भी उन्हीं के पक्ष में था और छोटा अब था नहीं। कहानी बाद में मालूम हुई। राघवेन्द्र पिता पर खेत बेचने का दबाव डाल रहा था। पिता तैयार थे, लेकिन दीदी न बेचने के लिए अड़ी हुई थीं। उन्हें बड़े बेटे की मंशा में खोट दिख रहा था और खेत न बिकते देख बेटा मां के विरुध्द था।
खेत नहीं बिके। बहनोई ने भी हथियार डाल दिए थे। लेकिन तभी एक दिन सूचना मिली कि राघवेन्द्र अंतर्ध्यान हो गया। कहां गया किसी को पता नहीं था। दीदी का हाल बेहाल था जिनका दूसरा बेटा, भले ही वह उनके विरुध्द था, सन् 2000 में अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर गायब हो गया था। हम अनुमान ही लगाते रहे और वह नहीं लौटा। दीदी उस बेटे को एक नज़र देख लेने की आस लिए 29 अप्रैल, 2005 को इस संसार को अलविदा कह गयीं। दीदी की मृत्यु के एक वर्ष बाद एक दिन पता चला कि राघवेन्द्र की पत्नी-बच्चे भी कहीं चले गये। स्पष्ट है कि राघवेन्द्र के पास ही वे गये थे। मेरे बहनोई को शायद दीदी की मृत्यु का ही इंतजार था।
मुझे यह अपराध बोध है कि मैं बड़ी दीदी के लिए कुछ नहीं कर सका सिवाय इसके कि उन्हें समर्पित दो कहानियां....'उनकी वापसी' (साप्ताहिक हिन्दुस्तान-1985) और ‘आखिरी खत’ (साहित्य अमृत-1995) लिखीं और दोनों ही कहानियाँ चर्चित रहीं।
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