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शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

यादों की लकीरें


संस्मरण

एक और कस्तूरबा

रूपसिंह चन्देल

1962 दिसंबर का एक दिन । आसमान में घटाटोप बादल । अरहर के पौधों पर झूमती-इठलाती ,खेतों -सड़कों पर मंडराती ,शरीर पर नश्तर चुभाती ठंडी हवा ।

स्कूल से हम चार बजे छूटे । वैसे हमारी छुट्टी साढ़े तीन बजे होती थी, लेकिन जिस दिन हेड मास्टर छिद्दा सिंह (मेरे उपन्यास ‘रमला बहू’ में चित्रित छिद्दा सिंह नहीं ) का गणित का पीरियड होता , उस दिन हम देर से ही निकल पाते । छिद्दा सिंह हमें गणित और इतिहास -भूगोल पढ़ाते और जब वह क्लास में प्रवेश करते दो-चार छात्रों को छोड़ हम सभी के शरीर में बिना ठण्ड के भी कंपकंपी छूट जाती । दुबला, गहरे सावले रंग के पचपन के आस-पास की आयु के छिद्दा मास्टर , जिन्हें हम छिद्दा मुंशी जी भी कहते , के हाथ में सदैव एक पतली छड़ी होती थी और वह छड़ी कभी-किसी भी छात्र पर कहर बरपा देती । छिद्दा मास्टर के दोनों कान और नाक छिदे हुए थे .....शायद इसीलिए उनके मां-पिता ने उनका नाम छिद्दा सिंह रखा था । सुना था कि उनके पिता की औलादें जीवित नहीं बचती थीं इसलिए एक वर्ष का होते ही उन्होंने उनके नाक-कान छिदवाने का टोटका किया था और अपने छात्रों को पीटने के लिए छिद्दा सिंह जीवित रह गए थे ।

उस दिन भी छिद्दा मास्टर का गणित का पीरियड था । हमारे स्कूल में तब तक बिजली की व्यवस्था नहीं हुई थी और शायद तब तक उस गांव (महोली) में बिजली पहुंची भी न थी । बादलों के कारण क्लास में रोशनी कम थी और छिद्दा मास्टर को बीजगणित का टेस्ट लेना था । उन्होंने हम सभी को स्कूल के बाहर मैदान में पंक्तिबद्ध बैठा दिया ..... तीन-चार फीट के अंतर से । तीन कतारें बन गई । हमें पांच सवाल देकर छिद्दा मास्टर पीठ पर हाथ बांध टहलने लगे । हम इस बात से प्रसन्न थे कि मुंशी जी के हाथ में उस दिन छड़ी नहीं थी । कुछ देर टहलने के बाद वह एक ओर खड़े हो गए और चपटे मुंह पर छोटी आंखों से किसी भी विद्यार्थी की ओर न देखने का भ्रम देने लगे । लेकिन ऐसा था नहीं । कनखियों से वह देखते जा रहे थे । कुछ देर बाद तीसरी कतार में पीछे बिल्ले की भांति दबे पांव वह गए और एक छात्र का कान पकड़कर उसे कतार से बाहर खड़ा कर दिया । उसने गिड़गिड़ाकर कितनी ही बार कहा कि वह नकल नहीं कर रहा था , लेकिन छिद्दा मास्टर ने उसकी कापी छीन ली और उसे मुर्गा बना दिया । सामने खड़े पीपल के पेड़ पर सनसनाती उसके पत्तों को खड़काती बदन छीलती ठंडी हवा के बावजूद मुझे गर्मी लगने लगी थी , जबकि मैंने केवल बनियायन और टेरालीन की नीली धारीदार कमीज पर आधी बांह का स्वेटर ही पहना हुआ था ।

सवाल हल करने का निर्धारित समय समाप्त होने के बाद क्लास के मानीटर सुरजन लाल से छिद्दा मास्टर ने सभी की कापियां जमा करवा लीं । कुर्सी मंगायी और बैठकर कापियां देखने लगे । भंयंकर ठंड के बावजूद वह खादी के धोती-कुर्ता पर काली जैकट पहने थे । कभी-कभी ही वह बंद गले का कोट पहनते थे । हम बच्चे अपास में बातें करते कि बुढ़ऊ को ठंड नहीं लगती क्योंक वह प्रतिदिन एक पाव घी खाते हैं । उनके कापियां देखने के दौरान सभी छात्र उसी प्रकार उकड़ूं बैठे रहे पंक्तिबद्ध और मुर्गा बना छात्र जब शिथिल हो बैठने लगा तब उनकी चीख सुनाई दी और वह लड़का पुनः पूर्वस्थिति में आ गया था । उसे डांटने के बाद उन्होंने मेरी ओर इशारा किया , ‘‘रूपसिंह , इधर आओ ।’’

मेरा चेहरा सूख गया । मैं वैसे ही उनकी ओर चलकर गया जैसे वधस्थल की ओर जा रहा था ।
‘‘जाकर चकौड़ी के चार पौधे उखाड़ लाओं ।’’
चकौड़ी गोल पत्तों वाला एक ऐसा पौधा होता है जो बरसात में स्वतः उग आता है । यह दो-से तीन फीट तक लंबा होता है और जनवरी-फरवरी तक यह जीवित रहता है । इसकी डंडियां बहुत लचीली और मजबूत होती हैं । इसका फूल पीला होता है ।
चकौड़ी उखाड़ने जाते हुए मैंने सोचा कि ‘‘ रूपसिंह तुम तो बच गए । तुम्हारे सवाल सही हैं वर्ना मुंशी जी तुम्हें यह काम नहीं सौंपते ।’’ लेकिन कुछ समय बाद ही मेरे विचारों को झटका लगा । चकौड़ी के पौधे छिद्दा मास्टर को थमाकर मैं अपने स्थान की ओर मुड़ा ही था कि उनकी आवाज सुनाई दी, ‘‘किधर चल दिए ?’’
मैं पलटकर खड़ा हो गया ।
‘‘इधर आओ ।’
कांपती टांगों मैं उनकी कुर्सी की ओर बढ़ा । उनके हाथ में मेरी कापी थी । मेरे दो सवाल गलत थे । उन्होंने प्यार से मेरा हाथ पकड़ा और पुचकारते से बोले , ‘‘ ये ऐसे होगें .....कहां गलती की .....?’’
मैं सिर झुकाए सवाल देख-समझ रहा था कि वह तपाक से कुर्सी से उठे और मेरी पीठ पर चकौड़ी के पौधों की छपाक की आवाज हुई । स्वेटर पर पत्तियों के निशान बने , कुछ पीड़ा हुई और पौधे की आधी पत्तियां झड़ीं । फिर एक-दो-तीन- - - सटाक-सटाक..... ‘‘जाओ ---घर से सही करके लाना ।’’ फिर उन्होंने दूसरे छात्र को बुलाया ।
तिलमिलाता , आंखों में आंसू छलकाता मैं अपनी जगह जा बैठा और दाहिने हाथ से बार-बार पीठ सहलाता रहा ।
उस दिन क्लास के आधे से अधिक छात्रों पर छिद्दा मास्टर ने चारों चकौड़ी के पौधे तोड़ दिए थे । पत्तियां झड़ जाने के बाद उनकी मारक क्षमता बढ़ जाती थी और पीठ पर लंबे समय के लिए निशान छोड़ जाती थी ।
पिट-पिटाकर गांव के हम पांचों , बाला प्रसाद, रामसनेही, यमुना प्रसाद, मोहनलाल और मैं , जो छठवीं क्लास में थे , सड़क पर उतर ठण्डी-सीली धूल पर पैर धंसाते छिद्दा सिंह को कोसते गांव की ओर चल पडे थे अपने कंधों से कपड़े के थैला लटकाए ।
हमने गांव के लिए एक सीधा रास्ता तजवीज लिया था , जो जी।टी. रोड क्रास करने के बाद काछिन खेड़ा के बगल से पगडंडी के रास्ते सिकठिया गांव में निकलता था और सिकठिया से गुजरता हुआ बगीचों के रास्ते हमारे गांव से जुड़ता था । हमारे गांव नौगवां (गौतम) से महोली , जहां के जूनियर हाईस्कूल में हम पढ़ते थे, पांच किलोमीटर था ।

काछिन खेड़ा के किसानों के खेतों में बारहों माह हमें सब्जियां उगी दिखाई देतीं । उन दिनों दूर-दूर तक गोभी, बंध गोभी और बैंगन दिख रहे थे ।
स्कूल से निकलने के कुछ देर बाद हम छिद्दा मास्टर और उनकी मार भूल गए । उन दिनों बाला मेरे साथ छीपन के बगीचे से बेर और अमरूद चोरी करने की योजना पर प्रायः चर्चा किया करता और आज यह याद तो नहीं लेकिन उसने उस दिन भी इस पर चर्चा की होगी । गांव में वह मेरा पड़ोसी था और बेहद शरारती, जबकि गांव में लोग मुझे बहुत ही शरीफ ....बिल्कुल भोला समझते थे । हालांकि बाला के साथ मैं भी कुछ शरारतें करता लेकिन रहता मैं पृष्ठभूमि में । इसलिए कभी पकड़ा नहीं जाता । गांव में मेरी शराफत का डंका बजता और लोग कहते कि इतने शैतान लड़के के साथ मेरी मित्रता कैसे थी । मैं चुप रहता , जबकि कुछ बदमाशियां बाला मेरे उकसावे में करता था ।
उस दिन जब हम सिकठिया गांव में प्रविष्ट हुए मैंने साथयों से कहा , ‘‘यार , सामनेवाले घर से कुछ सामान लेना है ।’’ कापी किताबों के थैले के अंदर से कपड़ों का एक बड़ा थैला निकालता हुआ मैं बोला ।
मित्र समझ नहीं पाए , लेकिन किसी ने कुछ पूछा भी नहीं । सभी मेरे पीछे हो लिए । जी।टी.रोड से जाने वाली पगडंडी जहां खत्म होती थी उसके ठीक सामने वह घर था । मैंने रदवाजा खटखटाया । गोरी , दोहरे शरीर की मध्यम कद-काठी की गोल चेहरे वाली वृद्ध महिला ने दरवाजा खोला ।

‘‘तीन सेर मूंगफली , दो सेर गुड़ और दो सेर चीनी के सेब चाहिए ।’’ मैं बोला ।
वृद्धा सामान तौलने लगीं । उनकी दुकान चैपाल में बायीं ओर बने कमरे में थी । वह सामान तौल रही थीं और मैं उन्हें अपलक देख रहा था । मेरी हिन्दी पाठ्य पुस्तक में कस्तूरबा गांधी पर एक पाठ था , जिसमें उनका चित्र बना हुआ था । मैं उनकी तुलना कस्तूरबा से करता रहा । उनमें और उस चित्र में मुझे बहुत साम्य दिखा था ।
सामान कंधे पर रख मैं मित्रों के साथ गांव की ओर चल पड़ा । वह सामान घर की उस दुकान के लिए था जिसे मेरे बड़े भाई ने 1961 में खोली थी । 1959 में कलकत्ता से हाई स्कूल करके आने के बाद उन्होंने भास्करानंद इण्टर कालेज नरवल से इण्टर की परीक्षा दी थी और मां-पिता की इच्छा के विरुद्ध आगे न पढ़ने का निर्णय कर दुकान खोल ली थी । पिता जी 1959 में रेलवे से अवकाश प्राप्त कर गांव आकर खेती करवाने लगे थे । मां-पिता ने भाई को बहुत समझाया आगे पढ़ने के लिए , परंतु वह न पढ़ने की जिद पर अड़े हुए थे । लेकिन जब इंटर का परिणाम आशा से कहीं अधिक अच्छा आया , ग्रेजुएशन करने के लिए भाई कानपुर चले गए और उनकी खोली दुकान मां को संभालनी पड़ी। अब वह दुकान केवल नाम के लिए थी , क्योंकि उसके लिए आने वाला आधा सामान घर में इस्तेमाल होने लगा था ।
उस दिन भी मूंगफली , सेब से भरा थैला कंधे पर लादे मैं कुछ दूर ही गया था कि बाला बोला , ‘‘रूप , तुम थक गए होगे ....थैला मुझे दे दो ।’’
मैंने उसका भाव समझ लिया और सिकठिया से बाहर निकल महुओं के बाग में एक जगह रुक मैंने थैले से सभी को सेब और मूंगफली खाने को दी थीं ।
यह सिलसिला जाड़े भर चला और लगभग पन्द्रह दिनों में स्कूल से लौटते हुए मैं उस दुकान से ये वस्तुएं लेता रहा । मार्च शुरू होते ही उस दुकान से सामान खरीदना बंद करने के बाद उन वृद्धा के दर्शन भी बंद हो गए । यद्यपि हमारा रास्ता वही रहा । अप्रैल में जब तेज गर्मी प्रारंभ हुई , स्कूल से लौटते हुए एक दिन हम पांचों एक चबूतरे पर छप्पर की छाया में सुस्ताने के लिए रुके । हमारी चख-चख की आवाज से घर का दरवाजा खुला और मैंने जिन्हें बाहर निकलते देखा वह वही वृद्धा थीं जिनकी तुलना मैं कस्तूरबा गांधी से करता रहा था । वह हमारे पास आयीं और बहुत ही मधुर-महीन स्वर में बोलीं , ‘‘बहुत तेज धूप है ..... लू चलैं लागि है ....।’’
हमने उनकी हां में हां मिलाया ।
‘‘तुम सबके चेहरा कइस कुंभला रहे हैं ! ’’ कुछ देर तक हमारे चेहरों पर नजरें गड़ाए रहने के बाद वह बोलीं , ‘‘पानी पीकर ही जाना । लू से बचत होई ।’’
‘‘हां , हम पानी पीएगें ।’’ हमने एक स्वर में कहा ।
वह अंदर गयीं और दस मिनट बाद पीतल की बाल्टी और गिलास लिए लौटीं ।
‘‘लेव , शर्बत पिओ । लू नजदीकै न फटकी ।’’
हमने कृतज्ञ भाव से उनकी ओर देखा ।
शर्बत पीने के बाद हम कुछ देर उनसे बातें करते रहे । उन्होंने हमारी इस जिज्ञासा का समाधान किया कि वह उनके मकान का दूसरा दरवाजा है । एक उत्तर दिशा की ओर खुलता है , जहां उनकी दुकान है और दूसरा दक्षिण की ओर जहां उस समय हम बैठे थे और उस ओर आनाज का भण्डार था । बाद में पता चला कि मुरवामीर की बाजार से जिस आनाज की दुकान से मेरे घर आनाज आता था वह उनके बेटे सत्यनारायण की थी । उनके तीन बेटे थे और तीनों ही आनाजा खरीदने-बेचने का काम करते थे । किसानों की फसल के समय वे थोक में आनाज खरीदते और उसे कानपुर में कलट्टर गंज में किसी आढ़ती को बेच आते । कुछ बचा लेते जिसे प्रत्येक बृहस्पतिवार और रविवार को पुरवामीर की बाजार में बेचते थे ।
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उस दिन के बाद अप्रैल-मई के महीनों में छठवीं-सातवीं के दौरान हम उनके यहां चबूतरे पर कुछ देर बैठने और पानी पीने लगे थे। कुछ दिन बाद स्थिति यह हुई कि वह हमारी प्रतीक्षा में पहले ही दरवाजा खोल बैठ जातीं थीं और कभी भी सूखा पानी नहीं पिलाती थीं । कुछ नहीं होने पर गुड़ तो होता ही था और हमारे न-नुकर करने पर बहुत प्रेम से खा लेने का आग्रह करतीं । मुझे अफसोस है कि उनका नाम मुझे नहीं मालूम । उनकी छवि आज भी ज्यों की त्यों मन में अंकित है और आज भी मैं उन्हें उसी रूप में देख पाता हूं । उनके चेहरे पर छलकता ममत्व-मातृत्व स्पृहणीय था । तब मुझे क्या मालूम था कि मैं उन पर कुछ लिखने की योग्यता हासिल कर लूंगा । अप्रैल 1964 में जब मैं कुछ दिन बीमार रहा तब वह प्रतिदिन मेरे साथियों से मेरे हाल पूछती रही थीं और एक दिन दुखी स्वर में यह भी कहा था , ‘‘वह बहुत कमजोर है न ! इसीलिए ....।’’
स्वस्थ होकर जब मैं उनसे मिला देर तक वह मेरे चेहरे और पीठ पर हाथ फेरती रही थीं । आज सोचता हूं तो लगता है कि क्या वह इसी युग में थीं ! क्या ऐसे लोग होते हैं ...निर्छद्म , ममत्व और प्रेम की प्रतिमूर्ति....किसी पौराणिक पात्र की भांति । लेकिन होते हैं .....यह सच है और इन शब्दों की सार्थकता ऐसे लोगों के कारण ही बची हुई है ।
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रविवार, 31 जनवरी 2010

यादों की लकीरें



संस्मरण

गर्दिश के साथी

रूपसिंह चन्देल
मैं उन्हें खान की क्लीनिक में बैठे या बाहर खड़े प्रतिदिन देखता । वह मेरी ही आयु के थे ..... लंबे...... लगभग पांच फीट आठ-नौ इंच , गोरे , स्लिम , स्वस्थ और सुन्दर । गोल , भरे गाल , सुतवां नाक , चमकती गोल आंखें , कुछ घुंघराले काले बाल...... प्रथम दृष्ट्या ही आकर्षक । मैं सुबह दस बजे घर से निकल जाता और शाम छः बजे के आस-पास कालोनी में प्रवेश करता । मैं प्रतिदिन शहर की एक दिशा नापता और खाली हाथ अगले दिन किस दिशा की फैक्ट्रियों-कंपनियों के मैनेजरों-पर्सनल अफसरों से मिलने जाना है यह तय करता घर लौटता । सुबह जाते समय वह मुझे अपने चौथे मंजिल के घर की बाल्कनी में खड़े दिखते और लौटते समय डाक्टर खान की क्लीनिक में या बाहर खड़े । खान की क्लीनिक मेरे पहली मंजिल के घर के ठीक सामने थी ।
यह 1970 के उत्तरार्ध की बात है । मैं बेगमपुरवा की म्यूनिसिपल कालोनी में बड़े भाई के साथ रहता था । उन दिनों मैं एक ऐसी बीमारी का शिकार था जिसके विषय में मैं स्वयं नहीं जान पा रहा था और बड़े भाई का कहना था कि दरअसल मुझे कोई बीमारी नहीं , केवल ‘शक’ की बीमारी है । लेकिन में जानता था कि कुछ ऐसा था अवश्य जिसके कारण मेरा वजन निरंतर घट रहा था और भूख मरती जा रही थी । मैं भाई की विवशता समझता था और उनसे कभी किसी बड़े डाक्टर या अस्पताल की बात नहीं करता था । छोटी नौकरी में , जो छः सात वर्ष पुरानी ही थी , बड़े परिवार का बोझ था उन पर । मैं चाहता था कि नौकरी लगे तो स्वयं ही किसी अच्छे डाक्टर से संपर्क करूं , लेकिन नौकरी मुझे दूर से ही ठेंगा दिखा रही थी । कुछ दिन एक वकील के यहां सेवादारी करके कुछ पैसे बचाए थे जिनसे मैं कुछ दिनों तक आइन्स्टाइन जैसे दिखने वाले एक होम्योपैथ डाक्टर की शरण में रहा जिसने मुझे मीठी गोलियों के साथ दलिया सेवन की सलाह दी थी । उससे लाभ नहीं हुआ । तब मैंने डाक्टर खान की शरण लेने का विचार किया , जिनसे खांसी-ज्वर हाने पर हम दवा लेते थे । ‘बड़े डाक्टर कभी जिस मर्ज को नहीं पकड़ पाते छोटे उसे पकड़ लेते हैं ’ उस समय मैंने यह सोचा और एक दिन डाक्टर खान के पास जा पहुंचा । शाम के सात बजे थे । वही समय होता था खान के आने का । यह तो मुझे बाद में पता चला कि डाक्टर खान नीम -हकीम डाक्टर थे । वह घण्टाघर में एक सरदार जी के धर्मकांटा में बतौर मैनेजर काम करते थे जहां बड़े ट्रकों को तौला जाता था ।
गहरे सांवले रंग के डाक्टर खान सदैव सफेद पैण्ट और हाफ शर्ट पहनते थे । सदैव उनके मुंह में पान रहता और पुराने अखबार में दो-चार बीड़े पान बंधे उनकी मेज पर रखे होते । उनकी क्लीनिक आठ बाई दस के कमरे में थी , जिसमें एक ओर हरे पर्दे के पार्टीशन में कंपाउडर दवाएं कूट-पीसकर....घोल बनाता रहता । उनके यहां बेगमपुरवा बस्ती के कुछ और शेष मरीज कालोनी के होते थे । लेकिन यदि एक मरीज होता तो चार उनसे गप हांकने वाले वहां बैठे होते जो मरीज जैसे ही दिखाई देते थे ।
उस दिन भी वह वहां बैठे अन्य लोगों के साथ ठहाके लगा रहे थे ।
मैंने खान को अपना कष्ट बताया । उन्होंने नब्ज देखी , पेट दबाया फिर आंखें फैलाकर देखीं और बोले , ‘‘ठाकुर साहब आपको कमजोरी है । यह टानिक लिख रहा हूं ..... सुबह-शाम खाने के बाद एक चम्मच लीजिए । बाकी जूस -दूध नियमित ........’’
मैंनें उनसे टानिक का पर्चा लिया और उनकी फीस देने लगा , जिसे उन्होंने , ‘‘तुम ठाकुर साहब के भाई हो ।’’ फीस लेने से इंकार कर दिया । कालोनी में भाई साहब को सभी ठाकुर साहब कहकर पुकारते थे और वहां उनकी अच्छी प्रतिष्ठा थी ।
मैं जब क्लीनिक से बाहर निकला वह भी मेरे पीछे बाहर आ गए ।
‘‘आजकल क्या कर रहे हो ?’’ उन्होंने सीधे पूछ लिया ।
‘‘मैं.....मैं नौकरी तलाश रहा हूं ।’’
‘‘नौकरी....।’’ क्षणभर के लिए उनके चेहरे पर गंभीरता पसर गयी । ‘‘हुंह .....नौकरी.....।’’
‘‘और आप ?’’ उन्हें असमजंस में पाकर मैंने पूछा ।
‘‘यार मैं भी इसी मर्ज से गाफिल हूं ।’’ वह फिर गंभीर हुए । क्षणभर बाद पूछा , ‘‘क्या किया है ?’’
‘‘बारहवीं की परीक्षा देनी है.....प्राइवेट । टाइपिगं जानता हूं । चालीस से ऊपर स्पीड है ।’’
वह मुझे घूरते हुए कुछ सोचते रहे । मैं भी उनके चेहरे पर नजरें गड़ाए उन्हें देखता रहा । हम खान के क्लीनिक से कुछ हटकर रेलवे कालोनी की ओर जाने वाले रास्ते के पास बिजली के खंभे के निकट आ खड़े हुए , जिस पर एक टिमटिमाता पीला बल्ब इस बात का अहसास करा रहा था कि उस कालोनी वालों पर केसा की मेहरबानी थी। अंधेरा घिर आया था और धुंए में डूबी कालोनी के घरों से बीमार रोशनी फूट रही थी । अमूमन हर दूसरे घर में अंगीठी सुलग रही थी । कुछ घरों के बाहर गृहणियां उन्हें सुलगाने का प्रयत्न करती दिख रही थीं । यह कालोनी रेलवे वर्कशाप के निकट थी , इसलिए कच्चा कोयला सहजता से मिल जाता था । कभी वह वर्कशाप ही कानपुर का मुख्य रेलवे स्टेशन हुआ करता था , जिसकी स्मृति को जीर्ण काठ का पुल आज भी सुरक्षित रखे हुए है।
‘‘फिर तो यार , कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जानी चाहिए ।’’
‘‘कैसे ?’’
’’टाइपिगं जो आती है .... मुझे टाइपिगं आती होती तो .....?’’ वह चुप हो गए । लेकिन उन्होंने यह संकेत अवश्य दे दिया था कि वह भी मेरी तरह ही बेकार थे ।
‘‘आप भी सीख लें .....।’’
‘‘आपने कहां सीखी ?’’ उन्होंने पूछा ।
‘‘आई.टी.आई. में....लेकिन प्रैक्टिस के लिए अब सुबह किदवईनगर के शर्मा टाइपिगं इंस्टीट्यूट जाता हूं ।’’
वह देर तक कुछ सोचते रहे , फिर बोले , ‘‘यार , मुझे क्लर्की पसंद नहीं है । मैं अध्यापक बनना चाहता हूं ।’’
‘‘आपने क्या किया है ?’’
‘‘मैंने.........मैंने हमीरपुर से इण्टर पास किया है । वहीं का रहने वाला हूं ।’’
‘‘फिर प्राइमरी टीचर्स ट्रेनिगं कर लो ।’’
‘‘उससे भी नौकरी कहां मिलती है । यू.पी. में बी.टी.सी. किए हुए हजारों बेकार हैं ।’’
‘‘फिर.....?’’ मेरे प्रश्न पर वह सोच में डूब गए ।
‘‘वही.....फिर....।’’ और वह फिर चुप हो गए । हम देर तक खड़े रहे निर्वाक फिर हम अपने घरों को चले गए थे ।
*****
उसके बाद हम दोनों गहरे मित्र बन गए थे ।
उनका नाम था इकरामुर्रहमान हाशमी ।
अब हम दोनों ही सुबह एक साथ अपनी-अपनी साइकिलों पर निकलते । किदवईनगर या रेल बाजार तक साथ जाते , फिर हमारे रास्ते जुदा हो जाते थे । शाम हम पुनः खान की क्लीनिक के सामने मिलते और घण्टा-आध घण्टा दिनभर के अपने अनुभवों को बांटते ।
मार्च 1971 में बारहवीं की परीक्षा थी , इसलिए मैंने नौकरी के लिए दौड़ना छोड़ दिया । सुबह केवल टाइपिगं की प्रैक्टिस के लिए जाता और शेष समय पढ़ाई । हमारी शाम की मुलाकातें बदस्तूर जारी थीं और वह मुझे बताते कि चमनगंज के किसी मुसलमान नेता ने उनसे वायदा किया है कि वह जुलाई में उन्हें अपने स्कूल में बतौर हिन्दी अध्यापक नौकरी दे देगा ।
‘‘यार , वहां काम करते हुए मैं बी.ए. का प्राइवेट फार्म तो भर सकूंगा । बी.ए. करना आवश्यक है ।’’ उन्होंने कहा था ।
‘‘रेगुलर कर लो ।’’
‘‘नहीं ।’’ उनके स्वर में स्वाभिमान की गंध थी । ‘‘मैं भी बड़े भाई के साथ रह रहा हूं ... यही पर्याप्त है । उन पर अधिक बोझ नहीं डालना चाहता । अपने बल पर ही आगे की पढ़ाई करूंगा ।’’
उनके निर्णय की मैंने मन ही मन प्रशंसा की । उससे मुझे भी बल मिला था ।
उन दिनों कानपुर विश्वविद्यालय केवल अध्यापन से जुड़े लोगों को ही प्राइवेट बी.ए. की अनुमति देता था । अगस्त से फार्म भरने का सिलसिला प्रारंभ होता जो विलंब शुल्क के साथ अक्टूबर -नवम्बर तक चलता । मैं भी इण्टरमीडिएट तक सीमित नहीं रहना चाहता था .....लेकिन....वास्तव में हम दोनों की स्थिति एक-सी थी ।
जून 1971 में मेरा स्वास्थ्य अधिक ही खराब हो गया । एक दिन दोपहर इतनी घबड़ाहट हुई कि मैंने सी.ओ.डी. पोस्ट आफिस से भाई साहब को फोन कर दिया । वह घबड़ा गए । उन्होंने कुछ डाक्टरों की जानकारी अपने सहयोगियों से ली और शाम सवा पांच बजे आते ही (वह हिन्दुस्तान एयरोनाटिक्स लि. (HAL) में थे ) बोले , ‘‘कपड़े बदलो....डाक्टर के पास जाना है ।’’
मैं हत्प्रभ था । कल तक वह कहते थे कि मुझे ‘शक’ की बीमारी है.... लेकिन घर में सभी उनसे डरते थे और मैं तो उनसे दस वर्ष छोटा था । चुपचाप बिना कुछ कहे कपड़े बदल उनके साथ चल पड़ा था । किदवई नगर के वाई ब्लाक में डाक्टर भार्गव का क्लीनिक था जो कुछ दिन पहले तक कानपुर मेडिकल कालेज में रीडर पद पर कार्यरत थे , और घर में भी प्रैक्टिस करते थे । घर में उमड़ती भीड़ ने उन्हें नौकरी छोड़ने के लिए प्रेरित किया था । डाक्टर भार्गव ने बातचीत से ही मर्ज समझ लिया , लेकिन उसकी पुष्टि आवश्यक थी , अतः एक्सरे के लिए लिखा । अगले दिन एक्सरे के लिए मैं माल रोड गया । रपट में डाक्टर भार्गव की आशंका सही निकली थी । आंतो का अंतिम छोर आपस में लगभग मिल गया था । (डाक्टरों के मुताबिक इल्यूशिकिल आंत नैरो हो गयी थी ) मात्र सूत भर का अंतर..... यदि पन्द्रह दिन और बीत जाते तब उन आंतों के फट जाने का खतरा था.......अर्थात अवश्यभांवी मृत्यु ।
डाक्टर भार्गव ने सर्जन एस.पी. जैन के पास पत्र देकर भेजा , जो कोतवाली के पास अपनी साली के यहां रहते थे ,क्योंकि उनकी पत्नी की कुछ दिन पहले मृत्यु हो गयी थी और उनके तीन वर्ष की बेटी थी जो साली के यहां रहकर पल रही थी । मैं उनसे घर पर मिला । उन्होंने हैलट अस्पताल में , जहां वह सर्जन थे , मिलने के लिए कहा ।
अंततः 20 जून ‘1971 को उन्होंने मुझे हैलट में भर्ती कर लिया । सभी परीक्षण हुए और पता चला कि उस समय मेरा वजन केवल चालीस किलो था । डाक्टर जैन ने तुरंत आपरेशन न करने का निर्णय किया , क्योंकि उस स्थिति में मुझे बाहर से रक्त देना होता , जो वह नहीं चाहते थे । उचित उपचार प्रारंभ हो गया था , इसलिए पन्द्रह दिनों के लिए आपरेशन टाला जा सकता था । डाक्टर ने अधिक से अधिक मौसमी का जूस लेने की सलाह दी ।
इकराम प्रतिदिन मुझसे मिलने अस्पताल आते थे ।
उन दिनों मौसमी का छोटा गिलास सवा रुपया और बड़ा डेढ़ रुपए का था । मैं भोजन कम जूस अधिक लेने लगा और भाई साहब से पैसे कम लेने के निर्णय के कारण इकराम का एक सौ पचास रुपयों का कर्जदार हो गया । वे पैसे मैंने कब और कैसे वापस किए आज मुझे याद नहीं और न ही यह जान सका कि मेरी ही स्थिति में रह रहे इकराम ने उन पैसों की व्यवस्था कैसी की थी ।
*****
11 जुलाई 1971 को मेरा आपरेशन हुआ ....पांच घण्टे । इकराम सुबह ही अस्पताल पहुंच गए थे और मेरे होश में आने तक अर्थात शाम पांच बजे तक वहां रहे थे ।
जब अस्पताल से मुझे छुट्टी मिली मेरा वजन मात्र छत्तीस किलो था .... लेकिन तब मैं पूर्ण स्वस्थ था । अगले तीन महीनों में मैं इतना स्वस्थ हो गया कि मैं पुनः उस इनकम टैक्स-सेल्स टैक्स वकील के यहां पचास रुपए मासिक पर प्रतिदिन चार घण्टे के लिए काम पर जाने लगा था ... न चाहते हुए भी । अपने उपन्यास ‘शहर गवाह है’ में मैंने इसी वकील का चित्रण किया है । शाम इकराम के साथ हम बी.ए. करने की चर्चा करते । चमनगंज के नेता ने अपना वायदा पूरा नहीं किया था , जबकि इकराम ने जुलाई से कुछ दिनों तक उसके स्कूल में मुफ्त पढ़ाया था । जब उसने अनुभव प्रमाण पत्र देने से इंकार कर दिया , जिसके बिना इकराम प्राइवेट फार्म नहीं भर सकते थे , उन्होंने स्कूल छोड़ दिया था । वकील साहब के यहां तीन महीने जाने के बाद मैंने भी उन्हें नमस्ते कह दी थी । पुनः टाइपिगं की प्रैक्टिस के लिए मैं ‘शर्मा इंस्टीट्यूट’ जाने लगा था । जिन्दगी पुराने ढर्रे पर लौट आयी थी .....दिन भर शहर की धूल फांकता - घूमता और शाम हताश वापस ।
1972 शुरू हो गया था । एक दिन इकराम समाचार लाए कि फूड कार्पोरेशन आफ इंडिया में लेबर की बहुत-सी वेकेंसी आने वाली हैं ।
‘‘अपुन एक दिन झखरकटी एम्प्लायमेण्ट एक्सचेंज में रजिस्ट्रेशन करवा लेते हैं ।’’ वह बोले ।
‘‘लेकिन हम इण्टरमीडियेट हैं । हम गोटैहा में पहले ही रजिस्टर्ड हैं .... सर्टीफिकेट के पीछे वहां की मोहर लगी हुई है । ’’
‘‘यार हमें हाई स्कूल , इण्टर की सार्टीफिकेट दिखानी ही नहीं.... लेबर को आठवीं पास होना चाहिए.... वह प्रमाणपत्र है न ....?’’
‘‘हां....।’’
‘‘फिर कल ही चलते हैं ।’’
हम दोनों ने गंदे पायजामे पर गंदी कमीजें पहनी थीं जिससे लेबर जैसा दिखें । झखरकटी एम्प्लायमेण्ट एक्सचेंज घर से पांच-छः किलोमीटर की दूरी पर जी.टी. रोड पर था । क्लर्क ने हमें पहनावे से नहीं , बातचीत से भांप लिया कि हम आठवी नहीं...अधिक पढ़े लिखे हैं । उसने यह बात छुपायी भी नहीं । और हम पर एहसान जताते हुए उसने हमारा रजिस्ट्रेशन कर लिया था ।
लेकिन हमें वहां से कोई काल नहीं मिली । इकराम हर दिन फूड कार्पोरेशन की खबर लाते और हम हर दिन झखरकटी से लेबर की काल का इंतजार करते ....... समय बीत गया । अब हम पर पूरी तरह अध्यापक के रूप में बी.ए. करने का भूत सवार हो गया था । अध्यापन के प्रमाणपत्र अथवा किसी विद्यालय से अग्रसारण का जिम्मा इकराम ने संभाल रखा था । वह दिनभर केवल दो बातों के लिए धक्के खा रहे थे .... कहीं नियमित अध्यापकी और फार्म के अग्रसारण के लिए । वह सूचना लाते अमुक प्रधानाचार्य या प्रबन्धक ने तीन सौ रुपये लेकर अग्रसारित करने का वायदा किया है , ‘‘लेकिन यार मेरे पास कुल एक सौ पचास रुपये ही हैं ।’’ कुछ चुप रहकर वह कहते , ‘‘मैं कोशिश कर रहा हूं कि इतने में ही काम हो जाए....।’’
मैं उन्हें सुनता और सोचता ‘मेरे आपरेशन में भाई साहब को खासी रकम खर्च करनी पड़ी है .....कैसे उनसे रुपये मांगूगा । लेकिन मैंने अपना उत्साह भंग नहीं होने दिया । ‘रुपयों के बारे में तब सोचूगं जब किसी स्कूल में अग्रसरारण की बात पक्की हो जाएगी ।’’
लेकिन इकराम को अपने प्रयास में सफलता नहीं मिल रही थी ।
एक दिन शाम हम दोनों खान की क्लीनिक के बाहर खड़े उसी विषय पर गंभीरतापूर्वक चर्चा कर रहे थे कि कहीं से मेरे भाई साहब आ गये ।
‘‘क्या गुफ्तगू हो रहीं है ?’’
‘‘ठाकुर साहब , हमारी एक ही समस्या है .... बी.ए. का फार्म भरना ।’’
भाई साहब गंभीर हो गये । फिर मुझे सुनाते हुए बोले , ‘‘जितनी ऊर्जा इसके लिए नष्टट कर रहे हो ....उतनी यदि नौकरी पाने के लिए करते तो शायद नौकरी मिल जाती , तब करते बी.ए.....एम.ए....।’’
उनकी बात से मेरा ही नहीं इकराम का चेहरा भी राख हो गया था । भाई साहब चले गये और हम देर तक वहां खड़े रहे थे लेकिन शायद ही हमने कोई बात की थी । उस दिन के बाद उस समय मैंने बी.ए. करने का स्वप्न त्याग दिया था और शायद इकराम ने भी । मैंने गंभीरता से अपनी टाइपिगं स्पीड बढ़ाने पर ध्यान केन्द्रित कर लिया और इकराम ने अध्यापकी हासिल करने में ।
*****
एक दिन इकराम सूचना लेकर आये कि किसी ने उनसे वायदा किया है कि वह उन्हें हमीरपुर के एक इण्टर कालेज के प्राइमरी सेक्शन में उर्दू टीचर की नौकरी दिलवा सकता है बशर्तें उन्होंने आठवीं जमात तक उर्दू पढ़ी हो ।
‘‘तुम्हें उर्दू आती है ?’’
‘थोड़ी.... लेकिन जाकर अम्मी से पन्द्रह दिनों में सीख लूंगा ।’’ वह फिर गंभीर हो गये । कुछ देर बाद वह बोले , ‘‘लेकिन...।’’
‘‘लेकिन क्या ?’’
उन्होंने अपनी समस्या बतायी । कई दिनों तक हम उसके समाधान के विषय में सोचते रहे थे । और हमने समाधान खोज ही लिया था ।
अंततः इकराम को हमीरपुर के उस इण्टर कालेज के प्राइमरी सेक्शन में जब जुलाई में उर्दू अध्यापक की नौकरी मिली तब मुझे लगा था कि वह इकराम की ही नहीं मेरी भी सफलता थी ।
उनके कदमों को जमीन मिल गयी थी और उसके नौ महीने बाद मुझे भी । जब 1973 में कानपुर विश्वविद्यालय ने सभी के लिए प्राइवेट छात्र के रूप में बी.ए. करने की घोषणा की तब मैंने भी बी.ए. किया और इकराम ने भी । उसके बाद उन्होंने प्राइमरी टीचर्स ट्रेनिगं की स्कूल से अवकाश लेकर । मैंने जब एम.ए. कर लिया तब उन्होंने मुझे लिखा कि वह मेरी पुस्तकों और मेरे नोट्स से हिन्दी में एम.ए. करना चाहते हैं ।
उन्होंने वह भी किया और बी.एड. भी । लेकिन 1978 के बाद हम एक-दूसरे से नहीं मिल सके । उनके बारे में कुछ वर्षों बाद यह सूचना अवश्य मिली थी कि वह इण्टर कालेज में हिन्दी लेक्चरर हो गये थे ।
संभव है अब वह उस कालेज में अब प्रिसिंपल हों ।
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बुधवार, 6 जनवरी 2010

यादों की लकीरें



संस्मरण

शोभालाल

रूपसिंह चन्देल

मध्यम कद , गहरा सांवला रंग,गठा हुआ शरीर, जो दण्ड-बैठक लगाने वाले व्यक्ति का होता है , और गोल चेहरा । चेहरे पर गंभीरता की चढ़ी पर्त और खोजती आंखें । जब उसने सेक्शन में प्रवेश किया ,उस समय मैं कुछ पढ़ने में तल्लीन था । उन दिनों मैं एम.ए.(हिन्दी) फाइनल का विद्यार्थी था और सीट पर जब काम नहीं होता था विषय की कोई पुस्तक पढ़ने लगता । काम ओैर पढ़ाई.... उन दिनों दफ्तर से लेकर हेस्टल तक मेरी यही दिनचर्या थी ।
वह प्रमोशन पाकर कानपुर से ट्रांसफर होकर आया था । मैं प्रशासन सेक्शन में था और नए आने वाले कर्मचारी को पहले वहीं रिपोर्ट करना होता था । सेक्शन में रिपोर्ट करने के बाद सेक्शन अफसर के निर्देशानुसार वह किसी सेक्शन में जा बैठाा था । दोपहर लंच के बाद वह सकुचाता हुआ मेरे पास आया और अपना परिचय देता हुआ बोला , ''सर, आपके लिए ओ.एन. दीक्षित जी का पत्र है ।''
''ओ0एन0 दीक्षित......'' पत्र लेते हुए मैं बुदबुदाया ।
''सर, आर्डनैंस इक्विपमेण्ट फैक्ट्री में....आपके ....।''
उसे आगे बोलने का अवसर न दे मैं बोला ,''समझ गया....।'' उसे पास बैठने का इशारा करते हुए मैं पत्र पढ़ने लगा । वह बैठा नहीं, पत्र पढ़ता हुआ उत्सुक निगाहों से मुझे देखता रहा । पत्र पढ़कर मैं गंभीर सोच में डूब गया ।
''सर, अगर कुछ नहीं हो सकता तब मैं किसी और से बात करूं....शायद....।''
''दो-चार दिन की कोई बात नहीं....तब तक कुछ व्यवस्था हो ही जाएगी ।''
''जी सर ।'' उसके चेहरे पर राहत झलक आयी थी ।
''सर , दीक्षित जी आपके बारे में अक्सर बातें करते थे....।'' उसके छोड़े स्थान को भरते हुए मैं बोला ,'' वह मेरे गांव के हैं । मेरे बड़े भाई के मित्र ...।''
''जी सर, बता रहे थे । उन्हें पूरा विश्वास था कि आप मेरे लिए कुछ अवश्य करेंगें ।''
''हुंह ।'' मैं पुन: पत्र पढ़ने लगा था ।
ओंकार नाथ दीक्षित को गांव में हम छुन्ना भाई साहब के नाम पुकारते थे। उनके पिता गांव नाते मेरे मामा होते थे , क्योंकि मेरा गांव मेरा ननिहाल भी था । उन्होंने लिख था, ''शोभालाल चपरासी से दफ्तरी प्रमोट होकर तुम्हारे कार्यालय में आ रहा है । विश्वास है कि तुम उसके रहने की समस्या के समाधान में उसकी सहायता करोगे ।'' कुछ ऐसा ही लिखा था छुन्ना भाई ने ।
''कितना सामान है आपके पास ?'' मेरी ओर उत्सुक द्ष्टि गड़ाए शोभालाल से मैंने पूछा।
''सर एक अटैची और एक बैग ।''
''मेरे साथ चलना । मैं फैक्ट्री होस्टल में रहता हूं । मेरे कमरे में दूसरा बेड खाली है । कुछ दिन गेस्ट के रूप में रह सकते हो । तब तक कुछ व्यवस्था हो ही जाएगी ।''
लेकिन गेस्ट के रूप में रहने आया शोभालाल मेरे साथ एक वर्ष से अधिक दिनों तक रहा बावजूद इसके कि होस्टल में वार्डन की अनुमति के बिना किसी अपरिचित को रखना गैर कानूनी था। वार्डन किसी गेस्ट के लिए सप्ताह-दस दिन से अधिक की अनुमति नहीं दे सकता था । लेकिन शोभालाल ने कुछ इस तरह मुझे प्रभावित किया कि सप्ताह भर बाद मैंने स्वयं उससे कहा ,''जब तक वार्डन आपत्ति नहीं करता...तुम यहीं रहो ।'' एक सप्ताह में ही मैं 'आप' से 'तुम' पर आ गया था...हालांकि वह कुछ वर्ष उम्र में मुझसे बड़ा था, लेकिन तब तक कानपुर का प्रभाव मुझ पर शेष था जहां आदर में बड़ों को भी 'तुम' पुकारने की छूट ले ली जाती हैं ।
शोभालाल ने पहले दिन से ही मुझे भोजन बनाने के कार्य से मुक्त कर दिया । एक सप्ताह में वह मुझे 'सर' के बजाय 'गुरू' कहने लगा था । यह शब्द उस दौर में कानपुर के लोगों का तकिया कलाम-सा होता था । आज भी कुछ लोगों की जुबान चढ़ा हुआ है ।
''आप पढ़ाई पर ध्यान दें....।'' शोभालाल बोला ,''मुझे तो कुछ करना नहीं है । आठवीं पास हूं ...दस साल की नौकरी में दफ्तरी हुआ हूं ...अधिक से अधिक क्लर्क बन जाऊंगा। इससे आगे कुछ नहीं गुरू जी...लेकिन आप पढ़कर बहुत आगे जा सकते हैं ...।''
मेरे लिए यह एक बड़ी राहत थी और राहत शोभालाल के लिए भी थी । कहीं बाहर रहने पर उसे किराए के साथ अंगीठी या स्टोव सुलगाने की जहमत उठानी पड़ती, जबकि होस्टल में हीटर था । होस्टल का किराया था सैंतीस रुपए और बिजली का निश्चित था पांच रुपए सत्तर पैसे । कितनी ही खर्च की जाये ।
होस्टल में रहने वाले सभी लोगों (दस या बारह लोग ही थे ) के प्रति शोभालाल का व्यवहार बहुत विनम्रतापूर्ण और मिलनसार था । बहुत दिनों तक लोगों ने यही समझा कि वह अधिकृतरूप से मेरे साथ रह रहा है ,लेकिन जब तक उसकी वास्तविकता लोगों में उद्धाटित होती उसके समुधुर व्यवहार ने उसके प्रति लोगों में सद्भाव उत्पन्न कर दिया था । जबकि सभी जानते थे कि होस्टल चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी को एलाट नहीं हो सकता था ।
दो महीने बाद मैंने होस्टल वार्डन से शोभालाल के विषय में बात की । सामान्य कद-काठी का वार्डन बत्रा फैक्ट्री में फोरमैन था , जिसके सिर के आगे के बाल अपना स्थान छोड़ चुके थे और गाल चूसकर फेके गये आम की भांति थे । चालीस के आस-पास की उम्र थी बत्रा की और कुछ दिन पहले ही उसकी शादी हुई थी । पत्नी की उम्र भी पैंतीस के लगभग थी और वह गेंहुए रंग की भरे-पूरे शरीर की स्वामिनी थी । बत्रा के लंब्रेटा स्कूटर पर बैठकर जब वह सब्जी खरीदने जा रही होती तब हम सोचते ,'' जोड़ा बुरा नहीं है ।''
''कितने दिन रहेगा ?'' बत्रा ने ठंठे स्वर में पूछा ।
''अभी तो आया है । जब तक कहीं एकमोडेशन नहीं मिल जाता....।''
''ठीक है , लेकिन जल्दी ही कोई बंदोबस्त कर लेने के लिए बोलने का....आप जानते हैं यहां बिना एलाटमेण्ट किसी को एलाउ नहीं ।''
''बत्रा साहब , आप बेफिक्र रहें ....जगह मिलते ही वह चला जायेगा ।''
बत्रा कुछ और कहता कि तभी उसकी पत्नी की आवाज सुनाई दी और वह हड़बड़ाता हुआ घर की ओर लपक गया था। मैं निश्चिंत हो गया था । उसे बताना आवश्यक था और मैं यह जानता था कि नई शादी की खुमारी में उसे होस्टल की चिन्ता न थी । एक वर्ष से वह वार्डन था और एक बार भी राउण्ड पर नहीं आया था ।
शोभालाल के साथ रहने से मुझे सुविधा थी । मेरे हिस्से के सभी काम वह कर देता...भोजन बनाने से लेकर दूध आदि लाने का ...। कमरे में हम प्राय: बातें नहीं करते थे । वहां होने पर या तो वह कुछ काम कर रहा होता या मंद स्वर में कोई फिल्मी गाना गुनगुना रहा होता । उसकी खूबी यह थी कि वह बेहद सफाई पसंद था , मितव्ययी भी । मितव्ययिता का कारण संभव है छोटी नौकरी रही हो, लेकिन वह जिस प्रकार टिप-टॉप रह, अनजान व्यक्ति सोच भी नहीं सकता था कि वह चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी था ।
मेरे एम.ए. में प्रथम श्रेणी प्राप्त करने के पीछे शोभालाल के सहयोग की महत भूमिका मैं स्वीकार करता हूं ।
जिस दिन मुझे प्रथम श्रेणी उत्तीर्ण होने की सूचना मिली, शोभालाल शाम मेरे साथ सीधे होस्टल न जाकर बाजार गया था और अपने मित्र सरदार भूपिन्दर सिंह अरोड़ा को साथ लेकर होस्टल आया था । उसके हाथ में एक पैकेट था , जिसमें मिठाई थी ।
''लो गुरू ....।'' मिठाई मेरी ओर बढ़ाते हुए उसने कहा, ''फर्स्ट डिवीजन आने की खुशी में मेरी ओर से.... ''
''यार, यह तो मुझे....।'' शर्मिन्दा होते हुए मैं बोला ।
''गुरू जी....उसके लिए तो मैंने मना नहीं किया ।'' मेरी बात काट शोभालाल बोला ,''वह तो हमें खानी ही है ।''
शोभालाल ने होस्टल के कई लोगों को भी मिठाई बांटी ,'' हमारे गुरू जी एम.ए. में फर्स्ट डिवीजन पास हुए हैं उसी खुशी में...।'' उसने प्रमुदितभाव से सभी को बताया था ।
हम दोनो के साथ सरदार भूपिन्दर सिंह भी जुड़ गया था । वह भी हमारे कार्यालय में क्लर्क था और उसके पिता वहां वरिष्ठ लेखा परीक्षक । वह एक सीधा -सरल छ: फिट लंबा, सांवला और हंसमुख नौजवान था जो अपने पड़ोसी कपूर परिवार से परेशान रहता था । दोनों परिवार पश्चिम पाकिस्तान से आए थे, लेकिन उनमें सद्भाव का अभाव था । इसका कारण यह था कि दफ्तर का इंचार्ज ,डिप्टी कण्ट्रोलर, मंगलसेन कपूर थे और भूपिन्दर का पड़ोसी कपूर इंचार्ज का चमचा था और उसके बल पर वह सब पर रौब गांठता रहता था । वैसे सामने वह सभी से 'बादशाहो' कहकर विनम्रता प्रकट करता, लेकिन पीछे सबकी इंचार्ज से शिकायत करता । उसकी पत्नी का चरित्र गड़बड़ था और उसका घर दिन में दफ्तर के कुछ गड़बड़ चरित्र लोगों का अड्डा बना रहता था ।
उस कार्यालय में मेरे जो तीन-चार मित्र बने उनमें लेखा परीक्षक टी.के. मुखर्जी भी थे । मुखर्जी नाटे कद, साफ चमकता गेहुए रंग ,बड़े गोल चेहरे पर बड़ी-तीक्ष्ण आंखों और तीक्ष्ण बुध्दि वाले लगभग बत्तीस वर्ष के व्यक्ति थे। उनके मुताबिक वह दो बार आई.ए.एस. की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके थे, लेकिन साक्षात्कार में असफल रहे थे । परिचय के बाद वह बदन को जमा देने वाली शीतलहर वाले जाड़े के दिनों में अपने तबला वादन का आनंद लेने के लिए मुझे होस्टल से खींच ले जाते । प्राय: संगीत का कार्यक्रम फैक्ट्री एस्टेट में एक पंत जी के घर होता । मुखर्जी तबला बजाते ,पंत जी हारमानियम और उनकी पुत्री गाती थी।
मुखर्जी की विद्वत्ता से मैं प्रभावित था । जब तब वह मेरे यहां आ जाते । एक-दो बार उन्होंने मुझसे कुछ रुपये उधार लिए । और दो-तीन महीने विलंब से लौटा भी दिए । दफ्तर और होस्टल में सीमित रहने के कारण्ा मुझे उनके विषय में अधिक जानकारी नहीं थी .... और सच यह था कि किसी के विषय में कुछ जानने में मेरे रुचि भी नहीं थी । लोग मुझे अंहकारी या सिरफिरा समझते और कम ही बात करते, जो मेरे हित में था । लेकिन बात कब तक छुपती । शोभालल के आने के बाद मुखर्जी की कहानी ज्ञात हुई । उन्होंने अपने को सेक्शन अफसर बताकर (उन दिनों मेरे विभाग में यह एक सम्मानजनक पद था) रेलवे के डिप्टी डायरेक्टर की बेटी से विवाह किया था और उस झूठ को छुपाने के लिए शादी के बाद प्रदर्शन में इतना खर्च किया कि वह कर्ज के बोझ से दब गए । काबुली पठान से लेकर दफ्तर, फैक्ट्री और स्थानीय सूदखोरों ने उनसे कर्ज के ब्याज के रूप में मूल से कई गुना अधिक वसूल किया और स्थिति यहां तक आयी कि घर का लगभग सब सामान सूदखोर उठा ले गए थे । जब कि उनका मूल ज्यों का त्यों रहा था । मुखर्जी की वस्तुस्थिति जानने के बाद मुझे उनपर क्रोध आया और तरस भी । लेकिन एक शब्द कुछ कहा नहीं मैंने । अपना राजदार समझकर वह बहुत कुछ मूझे बताने लगे थे । वह कलकत्ता स्थानांतरण के लिए प्रयत्नशील थे जहां उनके भाई ,मां और ससुरबाड़ी थी । वहां पहुंचकर उनकी स्थिति सुधर जाएगी ऐसा उन्हें विश्वास था । उनकी पत्नी का सहयोग सराहनीय था जो अभावों में भी प्रसन्न दिखती थी । एक बार मेरे हाथ में घड़ी न देख उन्होंने पूछा, ''आपकी घोड़ी किधर गयी ?''
मैं परेशान सोच में डूब गया कि मैंने घोड़ी पाली ही कब थी । तभी मुखर्जी ने हंसकर कहा ,'' रूपसिंह यह आपकी घड़ी के बारे में पूछ रही हैं ।''
मुखर्जी के एक लड़की और एक लड़का था....छोटे....दो-तीन साल के । एक दिन उनका ट्रांसफर आर्डर आ गया । प्रशासन में रमेन्द्र बनर्जी सेक्शन अफसर थे । एस्टेट का भद्र बंगाली समाज मुखर्जी को पसंद नहीं करता था । बनर्जी के भी वह प्रिय न थे , लेकिन फिर भी उन्होंने वह गोपनीय सूचना उन्हें दी और पूछा वह कब रिलीव होना चाहेंगें ।
रात दस बजे मुखर्जी मेरे पास आए। वह गोपनीय सूचना मुझे देने के बाद पूछा ,''कब रिलीव होना चाहिए ?''
''तीन अप्रैल के लिए पहले आप कलकत्ता जाने का आरक्षण करवा लें और दो को रिलीव हो लें । तब तक आपको मार्च का वेतन भी मिल चुका होगा । ''
''लेकिन सूदखोरों को पता चला तो....?'' मुखर्जी के स्वर में कंपकपाहट थी । सूदखारों को सूचना मिलते ही मुखर्जी का मुरादनगर से निकलना कठिन हो जानेवाला था ।
मैंने उसी समय शोभालाल से परामर्श किया। ऐसे मामलों में वह अधिक व्यावहारिक ढंग से सोचता था । वह साहसी भी था । दो घण्टे तक हम विमर्श करते रहे । तय हुआ कि अंतिम दिन हमें भूपिन्दर सिंह की सेवाएं भी लेनी होगीं , लेकिन तब तक सब कुछ गुप्त रखा जाए ।
मैंने अपना ट्रंक और अटैची उन्हें पकड़ा दी । वे चीजें भी उनकी बिक चुकी थीं । आवश्यक सामान उनमें भरा गया । शेष दो बोरों में भरकर उन्हें सिल दिया गया । मुखर्जी ने बनर्जी से बात कर ली थी । तीन अप्रैल के लिए पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से शाम चार बजे चलने वाले जनता एक्सप्रेस से उन्हें कलकत्ता जाने का आरक्षण मिल गया था । दो को उन्हें वेतन और रिलीविगं आर्डर मिल जाना था । तय हुआ कि वह अपनी पत्नी और बच्चों को अपने मित्र मिस्टर रायर के घर रात में छोड़ देगें जहां से दोपहर बाद भूपिन्दर सिंह उन्हें लेकर बस से दिल्ली पहुंचेगा । मुखर्जी भी बस स्टैण्ड में उनसे जा मिलेगें । मैं और शोभालाल उनके घर से सामान लेकर बारह बजे की ट्रेन से पुरानी दिल्ली स्टेशन पहुंचेगें ।
कार्य बिल्कुल योजनानुसार सम्पन्न हुआ । मुखर्जी के घर से रिक्शों में सामान लाद जब हम स्टेशन जा रहे थे तब उस ब्लॉक की गृहणियां हमें देख रही थीं। उन सबके पति फैक्ट्री में थे । यदि वे होते तब हमारा रहस्य छुपा नहीं रह पाता । उन महिलाओं ने यही अनुमान लगाया होगा कि हम भी कोई सूदखोर हैं ।
स्टेशन पर हमें मेरठ से मछली बेचने आनेवाला मिला जो प्रतिदिन मेरठ से लाकर वहां मछलिया बेचता था । उसकी कुछ उधारी थी । उसे कुछ भनक लग गयी थी । उसे देखकर मुझे अफसोस हुआ । वह जब हमारे निकट आया, शोभालाल उसे सुनाते हुए मुझसे बोला ,'' गुरू आप चण्डीगढ़ पहुंचकर मुझे भूल मत जाना । पत्र जरूर लिखना ।''
''यार ,भूलूंगा कैसे ?'' मैं भी उतनी ही जोर से बोला था ।
''आप बहुत कठोर जो हैं ।''
'कठोर' शब्द शोभालाल का प्रिय शब्द था ।
मछलीवाला हमारा संवाद सुन आगे बढ़ गया था ।
पुरानी दिल्ली स्टेशन पर हमने क्लॉक रूम में सामान रखा । अटैची और ट्रंक रखने की समस्या न थी । बोरों के लिए बाबू तैयार नहीं था , जिसके लिए उसे कुछ देना पड़ा था। चार बजे के लगभग भूपिन्दर, मुखर्जी और उनका परिवार प्लेटफार्म नंबर बारह में हमसे आ मिले । टिकट के आधार पर मुखर्जी को रिटायरिंग रूम मिल गया । रात ग्यारह बजे जब हम होस्टल पहुंचे पता चला दफ्तर का सूदखोर जैन मेरे कमरे के दो चध्ककर काट गया था । सूदखोरों को अनुमान हो गया था कि चिड़िया उड़ गयी थी । अगले दिन पता चला कि दूसरा सूदखोर दिल्ली स्टेशन के चक्कर काट आया था । दफ्तर में जब हम तीनों से लोगों ने मुखर्जी के विषय में पूछा हमने यही कहा कि हमसे वह हरिद्वार जाने की बात कह रहे थे .... सपरिवार वहीं गये होगें .... शेष बनर्जी साहब बताएगें कि वह कब रिलीव होगें ।
''लेकिन तुम तीनों ...आप, भूपिन्दर और शोभालाल .....कल दफ्तर नहीं आए थे ।''
हमने पूर्व निर्धारित बहाने बता दिए थे ।
लेकिन हमारी बातों पर किसी को विश्वास नहीं हुआ था ।
*****
1977 में शोभालाल अपना परिवार ले आया और किराये के मकान में चला गया । जुलाई 1980 में मैंने अपना स्थानांतरण दिल्ली करवा लिया । उसके बाद शोभालाल से मेरी मुलाकात नहीं हुई । कुछ वर्षों वह मुरादनगर कार्यालय में रहा । वहां से प्रमोशन पर अण्डमान निकोबार और फिर प्रमोशन पर कानपुर । यह सूचना मुझे भूपिन्दर से मिलती रही जो यदा-कदा मुझसे मिलने आ जाया करता था । नौकरी से अवकाश प्राप्त कर शोभालाल अब कहां है मुझे जानकारी नहीं ंहै । लेकिन उसे भूल पाना संभव नहीं और भूल मैं भूपिन्दर सिंह को भी नहीं सकता, कुछ दिन पहले सुबह दूध लेने जाते समय किन्हीं अज्ञात लोगों ने जिसकी गोली मारकर हत्या कर दी थी । क्यों...? इसका उत्तर मुझे आज तक नहीं मिला । उस जैसे सीधे-सरल व्यक्ति के भी दुश्मन थे यह सोचकर आश्चर्य होता है ।
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मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

यादों की लकीरें



संस्मरण


विनष्ट होना एक प्रतिभा का


रूपसिंह चन्देल

उनकी लापरवाही कहें या सोची-समझी आत्मघाती जिद , लेकिन उससे हिन्दी ने न केवल एक प्रतिभाशाली लेखक बल्कि एक प्रखर पत्रकार खो दिया . बात रमेश बतरा की है . रमेश से मेरी मुलाकात 1984 में हुई थी . वह सारिका में उपसम्पादक थे और 10 , दरियागंज , नई दिल्ली में बैठते थे , जहां सारिका , दिनमान और पराग के कार्यालय भी थे . सारिका कार्यालय जाने का मेरा सिलसिला 1982 के आसपास प्रारंभ हुआ था . तब मेरा परिचय केवल बलराम से था और महीना -दो महीने में कंधे पर जूट का थैला लटकाए ( जिसका उन दिनों फैशन था ) मैं सारिका जा पहुंचता और कुछ देर बलराम के सामने पड़ी कुर्सी पर बैठता और बलराम को काम करते या किसी से बतियाते देखता रहता . यदि मैं एक घण्टा वहां बैठता तो बलराम से नहीं के बराबर ही बात होती. कारण मैं भलीभांति समझता था. तब तक मेरा कोई साहित्यिक वजूद नहीं था और न ही मैं इस स्थिति में था कि किसी को कोई बड़ा क्या छोटा लाभ ही पहुंचा सकता . साहित्य में ऐसी स्थितियां सदैव रहीं लेकिन आठवेंं दशक में उनका विकास हुआ और आज वह सब चरम पर है ।

1984 तक सारिका में मेरी केवल एक -दो लघुकथाएं ही प्रकाशित हुई थीं । कहानियां सखेद लौटती रही थीं । उसमें मेरी केवल एक ही लंबी कहानी 'पापी' उपन्यासिका के रूप में मई 1990 में प्रकाशित हुई . उसके बाद सारिका बंद हो गयी थी .

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रमेश बत्तरा से सुभाष नीरव का गहन परिचय तब तक स्थापित हो चुका था. मेरा पहला कहानी संग्रह ‘पेरिस की दो कब्रें’ 1984 में किताबघर से प्रकाशित हुआ . सारिका में जिन दो लोगों को मैंने संग्रह दिया , वे बलराम और रमेश बतरा थे . रमेश से तभी परिचय हुआ , और उस परिचय के लिए मुझे सुभाष नीरव के परिचय का सहारा लेना पड़ा था .

बतरा से परिचय होने के बाद मैं जब भी सारिका जाता उन्हीं के पास बैठता । उन दिनों वहां के

सम्पादकीय विभाग में लेखकों का आवागमन लगा रहता था । मेरा जाना प्राय: शनिवार को होता और मुझ जैसे कुछ अन्य सरकारी बाबू लेखकों के लिए भी वही दिन सुविधाजनक होता था और उनके पत्र-पत्रिकाओं के कार्यालय जाने के पीछे वहां कार्यरत लोगों से याराना निभाने से अधिक अपनी रचना के लिए उनकी दृष्टि में बने रहने का भाव ही अधिक होता था और निश्चित ही मेरे मन में भी यह नहीं था यह कहना हकीकत से मुंह चुराना होगा . गाहे-बगाहे लेखक अपने परिचित उप-सम्पादक को वहां विचारार्थ पड़ी अपनी कहानी की याद भी दिलाते और मुझे याद है कि परिचय के बाद मैंने भी रमेश बतरा से अपनी एक कहानी की बाबत पूछा था और पान की पीक हलक से नीचे उतारते हुए मुंह ऊपर उठा मुस्कराते हुए बतरा ने कहा था ,''पता करूंगा .''

और सारिका में रहते उन्होंने शायद ही कभी मेरी कहानी के विषय में पता किया और आज मैं समझ सकता हूं कि वह इतना सहज भी न था । कहानी कहानियों के अंबार में किसके पास थी , कैसे पता चल सकता था । सारिका में कहानियों के विलंबित होने का चौदह वर्षों का रिकार्ड दर्ज है ।

लेकिन सभी लेखकों को लंबी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती थी । मेरे कुछ समकालीन ऐसे थे, सारिका में जिनका विशेष खयाल रखा जाता था और जब वे कंधे पर जींस का थैला लटकाए वहां के सम्पादकीय हॉल में प्रवेश करते किसी हीरो की भांति उनका स्वागत किया जाता , लेकिन उस स्वागत में रमेश बतरा का स्वर शामिल नहीं होता था . यहां यह बताना अनुचित नहीं कि सारिका के उन दिनों के वे हीरो लेखक आज कहीं नहीं हैं . वे अपनी रचनाओं की उत्कृष्टता के बल पर नहीं छपते थे (रचनाएं ऐसी थी भी नहीं ) , छपते थे अपने संपर्कों के कारण . खैर यह इतर प्रसंग है जिस पर फिर कभी लिखा जाएगा .

रमेश बतरा का व्यवहार सभी के साथ समान होता । पहचान के लिए भटकते मुझ जैसे युवक के साथ वह जितनी बात करते , दूसरों से भी उससे अधिक नहीं करते थे . रमेश की कम बोलने की आदत थी… कम श्ब्दों में , लेकिन सार्थक , बात कहते .

पान के वह शौकीन थे . लेकिन शराब के भी थे , मुझे जानकारी नहीं थी . मैं केवल इतना ही जानता था कि आधुनिक लुघुकथा विधा को आंदोलन का रूप देने में उस व्यक्ति की अहम भूमिका थी . रमेश की पहल पर ही उनके सम्पादन में जालंधर से मिकलने वाली 'तारिका ' का लघुकथा विशेषांक प्रकाशित हुआ था और पहली बार किसी पत्रिका ने यह कार्य किया था . सारिका में रहते हुए उसमें लघुकथाओं के प्रकाशन की रूपरेखा तय करने में रमेश बतरा की भूमिका को समझा जा सकता है . सारिका के लघुकथा विशेषांकों ने इस विधा के अनेक लेखक तैयार किए और उन सभी के संपर्क रमेश बतरा से थे , जिन्हें वे अपने लिए प्ररणा श्रोत मानते थे . लघुकथाकारों के प्रति रमेश के हृदय में एक विशेष भाव था . अनुमान लगाया जा सकता है कि वह इस विधा के विकास के प्रति कितना समर्पित थे . वह स्वयं एक सशक्त लघुकथाकार थे लेकिन उन्होंने अनेक उल्लेखनीय कहानियां भी लिखीं थीं . सारिका से नवभारत टाइम्स में जाने से पूर्व उन्होंने मुझसे जिक्र किया कि वह एक उपन्यास लिखने की योजना बना रहे हैं , लेकिन वह उसे लिख नहीं सके थे .

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कमलेश्वर के बाद कन्हैयालाल नंदन सारिका के सम्पादक बने थे । बाद में नंदन जी ने सारिका के साथ-साथ दिनमान और पराग का कार्यभार भी संभाला . उन दिनों पत्रकारिता की दुनिया में कन्हैयालाल नंदन एक चमकता हुआ सितारा थे . लेकिन कुछ वर्षों में ही स्थिति ऐसी बदली कि उन्हें केवल नवभारत टाइम्स के रविवासरीय के प्रभारी के रूप में ही कार्य करना पड़ा . अब वह 10 , दरियागंज के बजाय बहादुरशाह ज़फरमार्ग स्थित टाइम्स ऑफ इंडिया बिल्डिगं में बैठने लगे थे . रमेश बतरा भी नंदन जी के साथ नवभारत टाइम्स में शिफ्ट हो गए थे . रमेश से मिलने मैं कभी-कभी वहां जाने लगा था .

मैंने नवभारत टाइम्स के रविवासरीय संस्करण में प्रकाशनार्थ एक कहानी भेजी । लगभग छ: महीने बीत गए . एक दिन रमेश को कहानी की याद दिलाई . बोले , ''नंदन जी के पास है . छप जाएगी .'' कुछ देर बाद उन्होंने उठते हुए कहा , ''चल तुझे पान खिलाऊं '' पनवाड़ी की दुकान तक जाते हुए गंभीर स्वर में उन्होंने कहा , ''चंदेल , एक बात कहूं.....?''

''हां....''
''अखबारों में कहानी प्रकाशित करवाने का मोह त्याग दो ....''
''क्यों ?''
''क्योंकि जिन्दगीभर तुम अखबार में छपते रहोगे तब भी कहानीकार की पहचान नहीं मिलेगी ।बेहतर होगा कि लघुपत्रिकाओं में प्रकाशित हो .''

मैंने रमेश की बात पर गंभीरता-पूर्वक विचार किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि रमेश ने ठीक कहा था ।

रमेश बतरा ने 1989 में स्कूटर खरीदा सौ सी।सी. का . उसे लेकर वह बहुत दुखी थे . दुख था कि किसी को पीछे बैठा लेने पर पुल की चढ़ाई पर स्कूटर हांफता हुए खड़ा हो जाता था . सोचिए जब पत्नी जया रावत को बैठाकर वह चलते होगें और पुल की चढ़ाई पर स्कूटर खड़ा हो जाता होगा तब उनपर क्या बीतती होगी . एस.पी. पिता की बेटी जया को रमेश के हिचक-हिचक कर चलने वाले स्कूटर से कोफ्त अवश्य होती होगी . उन्हीं दिनों उन्होंने एक पत्रिका निकालने की योजना बनाई - हिन्दी-पंजाबी की संयुक्त पत्रिका निकालना चाहते थे वह . मित्रों से सहयोग लेना प्रारंभ किया . नीरव को रसीद बुक भी पकड़ा दी . कम से कम सौ रुयए की राशि देनी थी जो बिना रसीद ही मैं उन्हें दे आया था . एक दिन उन्होंने बताया कि लगभग छ: हजार रुयए एकत्रित हो गए हैं . अब वह रचनाएं मंगाएंगें और पत्रिका छ: महीनों के अंदर पत्रिका हमारे हाथ में होगी . लेकिन वह सब होता उससे पहले ही वह टाइम्स ऑफ इंडिया छोड़ नंदन जी के साथ सण्डेमेल में सहायक सम्पादक होकर चले गए थे . नंदन जी सण्डेमेल के सम्पादक थे .

बाद में मित्रों ने बताया कि पत्रिका के लिए एकत्रित धनराशि उन्होंने खर्च कर दी थी ।

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सण्डेमेल में उनसे मेरी दो मुलाकातें ही हुई । एक तब जब एक साथ प्रकाशित अपने दो कहानी संग्रह - 'हारा हुआ आदमी ' (पारुल प्रकाशन) और 'आदमखोर तथा अन्य कहानियां ' (पराग प्रकाशन ) उन्हें सण्डेमेल में समीक्षार्थ देने गया था और दोबारा कुछ दिनों बाद ही तब जब अपने द्वारा सम्पादित लघुकथा संकलन 'प्रकारांतर' की प्रति नंदन जी को भेंट करने गया , क्योंकि जिन तीन साहित्यकारों को संकलन समर्पित था उनमें नंदन जी एक थे . उसके बाद वर्षों रमेश से मेरी मुलाकात नहीं हुई . सुभाष नीरव से उनके समाचार मिलते रहते , क्योंकि दोनों के पारिवारिक संबन्ध थे और सुभाष उनसे दफ्तर में कम घर ही अधिक मिलते थे . सुभाष को या तो पता नहीं था या उन्होंने जिक्र करना उचित नहीं समझा .... रमेश और उनकी पत्नी के बीच पटरी बैठ नहीं पा रही थी . कारण जो भी रहा हो .... रमेश तनाव में रहने लगे , और पीने की मात्रा बढ़ गयी . कुछ मित्रों के अनुसार वह सण्डेमेल कार्यालय में भी पीने लगे थे और वहां से उनके हटने के कारणों में शायद यह भी एक रहा होगा .

सण्डे मेल से नौकरी छूटने और तनावपूर्ण पारिवारिक स्थितियों के कारण रमेश ने शायद अपने को तबाह (Ruin) कर लेने की ठान ली थी । एक प्रतिभा का इस प्रकार विनष्ट होना दुर्भाग्यपूर्ण था . ऐसी स्थिति में मित्र बिखरने लगते हैं . इस सबका जो दुष्परिणाम होना था.... हुआ ..... रमेश का स्वास्थ्य चौपट हो गया . शरीर में अनेक बीमारियों ने घोसला बना लिया . गुर्दे खराब हो गए और एक दिन उन्हें अस्पताल के हवाले होना पड़ा . नियमित उन्हें अस्पताल देखने जाने वालों में कमलेश्वर थे , जिन्होंने डाक्टरों से कहा था , ''रमेश का ऑपरेशन आवश्यक है तो आप करें डाक्टर ..... पैसों की परवाह न करें . जितना पैसा खर्च होगा मैं दूंगा .'' यह बात कमलेश्वर जैसा मानवीय सरोकारों से युक्त कोई दिलेर व्यक्ति ही कह सकता था . अनुमान लगया जा सकता है कि अपने साथ काम करने वालों को कमलेश्वर कितना प्रेम करते थे . रमेश ने मुम्बई में सारिका में कमलेश्वर जी के साथ काम किया था . लेकिन रमेश बतरा की स्थिति इतनी खराब थी कि ऑपरेशन के बाद भी डाक्टरों को उनके बचने की आशा न थी .

अंतत: 15 मार्च , 1999 को रमेश बतरा इस संसार को अलविदा कह गए थे । हिन्दी कथा-साहित्य का एक स्तंभ गिर गया था . कहानीकार के रूप में आलोचक अब उन्हें भूल चुके हैं , लेकिन लघुकथाकारों ने आधुनिक लघुकथारों के बीच उन्हें शीर्ष स्थान पर अवस्थित कर रखा है और मुझे विश्वास है कि वहां उनका स्थान सदा के लिए सुरक्षित रहेगा . जहां तक कहानी की बात है , आज रमेश की कहानियों की उपेक्षा करने वाले आलोचक उनके सारिका में रहने के दौरान उनके नाम और कहानियों की माला जपते थे . इससे हिन्दी आलोचना के दोगलेपन को समझा जा सकता है .

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रमेश बतरा की मृत्यु के बाद मित्रों ने साहित्य अकादमी में उनकी शोक सभा के आयेजन का कार्यक्रम तय किया और अकादमी प्रशासन से हॉल के लिए अनुरोध किया , लेकिन साहित्य अकादमी ने बहुत ही बेरुखी के साथ हॉल देने से इंकार कर दिया था । प्रशासन ने हॉल देने से इंकार किया लेकिन साहित्यकारों-पत्रकारों को साहित्य अकादमी अपने लॉन में शोक सभा करने से रोक नहीं सकी . 18 मार्च 1999 को शायं चार बजे बड़ी संख्या में वहां एकत्र होकर पत्रकारों और साहित्यकारों ने रमेश बतरा को श्रद्धांजलि दी थी .

उस दिन साहित्यिक सरोकारों और साहित्यकारों के लिए समर्पित रहने की बात करने वाली साहित्य अकादमी का जो चरित्र प्रकट हुआ पतन की ओर उसके बढ़ते कदमों का वह एक प्रमाण था ।

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सोमवार, 16 नवंबर 2009

यादों की लकीरें


संस्मरण
रमाकांत जी ने एक सपना देखा था
रूपसिंह चन्देल
उनसे मेरी पहली मुलाकात 1982 में गर्मियों के किसी महीने हुई थी . उन दिनों प्रत्येक माह दूसरे शनिवार को मेरे कार्यालय में अवकाश होता था . उस अवकाश के दिन दोपहर बाद कंधे पर थैला लटका मैं प्रायः परिचितों से मिलने के लिए निकल पड़ता . तब परिचय का दायरा छोटा था , लेकिन धीरे -धीरे बढ़ रहा था . परिचितों से मिलता हुआ मैं काफी हाउस अवश्य जाता . विष्णु प्रभाकर वहां नियमित जाते थे . नियमित जाने वालों में कुछ अन्य साहित्यकार भी थे .
मोहन सिंह प्लेस की सीढि़यां चढ़कर गर्मी के उस दिन जब मैं वहां पहुंचा छः बज चुके थे . दरवाजे के ठीक सामने खुली छत पर विष्णु जी चार-पांच लोगों से घिरे हुए बैठे थे . दो मेजों को मिला दिया गया था , जिससे अन्य आने वाले लोगों के लिए जगह बन सके . विष्णु जी के साथ जो लोग थे उनमें वे भी थे . मध्यम कद , चैड़ा मुस्कराता चेहरा , खिली आंखें और पीछे की ओर ऊंछे घने पाके-अधपके बाल . विष्णु जी से मेरी मु्लाकात काफी हाउस की ही थी . परिचय इतना ही कि वह मेरा चेहरा पहचानने लगे थे . हालांकि कुछ दिनों बाद अर्थात सितम्बर 1982 में ‘बाल साहित्य समीक्षा’ के अतिथि सम्पादन का कार्य करते हुए मैं उनके पर्याप्त निकट हो गया था . कुछ दिनों बाद इस पत्रिका के उन पर केन्द्रित विशेषांक का भी मैं अतिथि संपादक था . संयोगतः उस दिन मैं वि्ष्णु जी के बगल में बैठा था . विष्णु जी ने उनकी ओर इशारा करते हुए पूछा , ‘‘ आप इन्हें जानते हैं ?’’
मैं चुप उनकी ओर देखता रहा . विष्णु जी ने मेरी द्विविधा समझी और बोले , ‘‘आप कथाकार रमाकांत हैं.........’’
और विष्णु जी मेरे बारे में कुछ कहते , इससे पहले ही मैंने रमाकांत जी को अपना परिचय दे देया . रमाकांत जी ‘अच्छा.... अच्छा.....’वहां उपस्थित लोगों के साथ पुनः वार्तालाप में करने लगे थे . लोगों के आने का सिलसिला जारी था और आध घण्टा में दोनों मेजें कम पड़ने लगी थीं . अन्य लोगों के आने के बाद ‘‘अब मैं कुछ देर उधर बैठूंगा ....’’ कहते हुए रमाकांत जी उठे और काफी हाउस की छत में दक्षिण की ओर की गलियारानुमा जगह की ओर चले गए . यह मुझे बाद में पता चला कि उस गलियारे में जनवादी-मा्र्क्सवादी लोग बैठते थे . उनमें से कुछ इधर-उधर ”शिफ्ट होते रहते थे , जिनमें रमाकांत , राजकुमार सैनी , रमेश उपाध्याय , कांति मोहन , “श्याम कश्यप आदि थे .... लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जो विष्णु जी की मंडली की ओर देखते भी न थे . वे सीढि़यां चढ़ दरवाजे पर कुछ देर खड़े होकर अपने लोगों का जायजा लेते , फिर दाहिनी ओर गलियारे की ओर मुड़ जाते . वे अपने को महान क्रांतिकारी रचनाकार मानते थे . लेकिन इसे विडबंना ही कहेंगे कि कल के क्रांतिकारी आज पूंजीवादी हो गए हैं , हालांकि वे अंदर से तब भी पूंजीवादी - सामंतवादी ही थे और आज पूंजीवादी होकर भी पूंजीवाद का विरोध करते दिख जाते हैं . दरअसल उनका यह विरोध ही उनकी सुविधा-सम्पन्नता का आधार है . लेकिन रमाकांत जी इन सबसे भिन्न थे . उनके जीवन और व्यवहार में कोई अंतर नहीं था . मार्क्सवादी होते हुए भी वह छद्म मार्क्सवादियों के विरोधी थे . सत्ता और सुख के पीछे दौड़ने वाले व्यक्ति वह नहीं थे . यही कारण है कि उन्होंने ‘सोवियत भूमि’ पत्रिका की अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी थी , जबकि एक बड़े परिवार का दायित्व उनपर था . बहरहाल , काफी हाउस में महीने में एक बार रमाकांत जी से मेरी मुलाकात हो जाया करती . तभी मुझे ज्ञात हुआ कि वह सादतपुर में रहते थे . यद्यपि इस जगह का नाम मैंने अपने गाजियाबाद निवास के दौरान 1979-80 में सुना था . उन दिनों तक कई साहित्यकार यहां आकर बस चुके थे . यहां को लेकर तभी मन में उत्सुकता जाग्रत हुई थी . रमाकांत जी के यहां रहने की जानकारी के बाद मुझे लगा कि मुझे एक बार जाकर इस स्थान को देखना चाहिए . लेकिन लंबे समय तक यह संभव नहीं हुआ . यहां जमीन सस्ती होने की बात सुनता तो यहां जमीन का छोटा-सा टुकड़ा खरीद लेने की इच्छा प्रबल हो उठती लेकिन अंततः बात आई गई हो जाती . अगस्त 1985 में एक दिन सारिका में बलराम और वीरेन्द्र जैन को आपस में सादतपुर जाने की चर्चा करते सुना . ज्ञात हुआ कि वे दोनों यहां अपने मकान बनवा रहे थे और दफ्तर से जल्दी निकलकर काम देखने जाना चाहते थे . इन दोनों से प्रेरित होकर 20 सितम्बर 1985 को मैंने यहां जमीन का एक टुकड़ा खरीद लिया और यहां आने जाने की परेशानियां समझ मकान बनाकर आ बसने का विचार त्याग दिया .

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लेकिन मही्ने में एक बार मैं सादतपुर घूम जाता यह देखने के लिए कि प्लाट पर किसी ने कब्जा तो नहीं कर लिया . आता और चला जाता .....कभी-किसी से मिल नहीं पाता . प्लाट सुरक्षित देखता और उल्टे पैर वापस लौट लेता . अंततः बहुत उहा-पोह के बाद 9 अप्रैल 1988 को प्लाट का पीछे का आधा भाग बनवाना प्रारंभ किया और तब लंबी छुट्टियां लेकर मुझे यहां रहना पड़ा . सुबह सात बजे तक मैं सादतपुर पहुंच जाता और रात 8 बजे तक रहता . काम कछुआ की गति से चलता क्योंकि ठेकेदार शराबी था और मजदूर लगाकर वह कई-कई दिनों के लिए गायब हो जाता था . मजदूरों से कह देता बाबू जी से पैसे ले लेना . उन्हीं दिनों रामकुमार कृषक अपना मकान बनवा रहे थे . कुछ दिनों बाद मेरे पड़ोस में महेश दर्पण ने बनवाना प्रारंभ किया था . कृषक जी की स्थिति मेरी तरह थी . काम देखने के लिए वह त्रिनगर से आते और सारा दिन यहां रहते . दिन का कुछ समय हम साथ बिताते ........ लेकिन कितना .... जब वह न होते मैं रमाकांत जी के पास जा बैठता . घण्टों मैं उनके साथ रहता ... साहित्य से लेकर राजनीति तक ... विभिन्न विषय पर चर्चा होती . उन दिनों वह अपना अंतिम उपन्यास ‘जुलूस वाला आदमी ’ लिख रहे थे . उनका पहला उपन्यास ‘छोटे-छोटे महायुद्ध ’ चर्चित रहा था . हंस में प्रकाशित उनकी कहानी ‘कार्लो हब्सी का संदूक ’ उसी प्रकार उनके नाम का पर्याय बन गयी थी जिसप्रकार ‘उसने कहा था ’ चन्द्रधर शर्मा गुलेरी के नाम का पर्याय बनी . रमाकांत जी उन दिनों स्थानीय समस्याओं पर केन्द्रित एक अखबार भी निकाल रहे थे . किसी दिन जब मैं उनके यहां न जा पाता और शाम शक्तिनगर (11 अक्टूबर , 1980 से 2 अगस्त , 2003 तक मैं वहां किराये पर रहा ) लौटने के लिए सईद मियां की सैलून के सामने बस पकड़ने के लिए खड़ा होता , रमाकांत जी सईद के पास बैठे नजर आते . वहीं से पूछते , ‘‘आज कहां रहे ?’’
सिगरेट उनकी कमजोरी थी . प्रायः मैं उनके मुंह में सिगरेट दबी देखता . 1988 के आसपास उनका काफी हाउस जाना कम हुआ था और शाम प्रायः वह सईद की दुकान में बैठे दिखाई देते थे . इससे पहले वह नियमित काफी हाउस जाया करते थे और देर रात तक वहां बैठते थे बावजूद यह जानते हुए कि सादतपुर पहुंचने के साघन अत्यल्प थे .
उन्हीं दिनों बातचीत में एक दिन उन्होंने बताया कि 1972 में जब उन्होंने सादतपुर में बसने का निर्णय किया तब दूर-दूर तक खेत फैले हुए थे .

उनके बाद 1973 में विष्णु चन्द्र शर्मा यहां आए .
विष्णु चंद्र शर्मा जी को सादतपुर आ बसने की प्रेरणा रमाकांत जी ने ही दी थी . दरअसल सादतपुर को लेकर रमाकांत जी ने एक सपना देखा था . वह इसे साहित्यकारों की बस्ती के रूप में बसा हुआ देखना चाहते थे . काफी हद तक उनकी चाहत पूरी भी हुई . विष्णु चन्द्र शर्मा के बाद महेश दर्पण , सुरेश सलिल , स्व. डा0 माहेश्वर , लेखक-चित्रकार हरिपाल त्यागी , बाबा नागार्जुन , वीरेन्द्र जैन , बलराम , रामकुमार कृषक , धीरेन्द्र अस्थाना , अरविन्द सिंह , सुरेन्द्र जोशी, अजेय सिंह , हीरालाल नागर , सय्यद शहरोज , रामनारायण स्वामी , रामजी यादव , राधेश्याम तिवारी आदि लोग आए . लेकिन इनमें कुछ लोग निजी कारणों से यहां से चले गए . दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ प्राध्यापकों ने भी यहां प्लाट खरीदे , जिन्हें उन्होंने बेच दिए थे .
रमाकांत जी ने जो सपना देखा उसे उन्होंने अपने जीवन में पूरा होते भी देखा . देश के दूरस्थ स्थानों से ही नहीं विदेशों में रहने वाले साहित्यकारों के लिए यह जगह आकर्षण का केन्द्र बन गई थी और लोग यहां बसे साहित्यकारों से मिलने आते .....हफ्तों ठहरते और उनके सम्मान में यहां गोष्ठियों का आयोजन होता . एक सौहार्दपूर्ण वातावरण था . हालांकि आज स्थिति वह नहीं है . अब यहां केवल साहित्यकार ही नहीं हर पेशे के लोग आकर बस गये हैं . 1995 के बाद आए लोगों में अधिकांश पैसे के पीछे दौड़ने वाले लोग हैं या उद्दण्ड और संस्कारहीन . अर्द्धशिक्षितों की संख्या अधिक है और उसका लाभ कर्मकांडी पंडितों-पुरोहितों को मिल रहा है . हर दूसरी गली में एक हनुमान मंदिर है और सप्ताह के पांच दिन किसी न किसी के घर अखंड-पाठ या भागवत प्रवचन होता रहता है . सुबह पांच बजे से लाउडस्पीकर में इन पंडितों की आवाजें गूंजने लगती हैं , जो संस्कृत के श्लोंकों के अशुद्ध उच्चारण द्वारा लोगों को प्रभावित कर धन और प्रंशसा बटोर रहे होते हैं . यह सिलसिला रात देर थमता है . एक बार महेश दर्पण ने बताया कि यहां के ए ब्लाक में जो हनुमान मंदिर है वहां पुस्तकालय बनना था , लेकिन प्लाट का मालिक पंडितों से प्रभावित था अतः उसने पुस्तकालय के बजाए धरती का वह टुकड़ा मंदिर के लिए दे दिया .
अब यहां साहित्यकार अल्पसंख्यक हो गए हैं और उनकी स्थिति वही है जो धर्मान्ध-कट्टर लोगों के बीच अल्पसंख्यकों की होती है .
रमाकांत जी ने ऐसे सादतपुर का सपना शायद नहीं देखा था !

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सितम्बर के प्रारंभ में वह अस्वस्थ होकर अस्पताल में थे . मैं मिलने गया . बहुत धीमे बोल रहे थे . बात करते करते उनकी आंखें पनिया आयीं . उसके बाद वह बोले नहीं सके थे .
‘‘आप ठीक हो जाएगें ....... अधिक नहीं सोचते ’’ मैंने ऐसा ही कुछ कहा था . कुछ और साहित्यकार उनसे मिलने - देखने आ गए तो ‘‘फिर आऊंगा ’’ कह उनसे विदा लेकर चला आया था . दूसरे दिन रात ग्यारह बजे कानपुर से फोन मिला कि मेरी मां गंभीर रूप से बीमार हैं . सुबह शताब्दी एक्सप्रेस से मैं कानपुर चला गया . सात सितम्बर को लौटा , लेकिन 6 सितम्बर , 1991 को रमाकांत जी का देहावसान हो हो चुका था .
गत वर्ष ग्यारहवें रमाकांत स्मृति पुरस्कार कार्यक्रम की समाप्ति के बाद कवि-आलोचक राजकुमार सैनी को जब यह ज्ञात हुआ कि मैं सादतपुर में रहता हूं तब वह बोले , ‘‘ भाई चन्देल , आप बहुत भाग्यशाली हैं .’’
‘‘कैसे ?’’
‘‘आप साहित्यकारों के बीच रहते हैं . रमाकांत जी ने कितनी ही बार मुझे सादतपुर में प्लाट खरीदने के लिए कहा , लेकिन मैं ले नहीं पाया ..... अब द्वारका के फ्लैट में लटका रहता हूं , जहां किसी साहित्यकार की छाया भी नहीं दिखती .’’
मैं उनकी पीड़ा समझ सकता था . आज पंडितों-पुरोहितों और संस्कारहीन लोगों के आतंक के नीचे भले ही रमाकांत जी का सपना तड़फड़ा रहा हो और यहां के पत्रकार-साहित्यकार कुछ भी कर पाने में अपने को असमर्थ पा रहे हों , लेकिन यह सुख तो हमें मिला हुआ है ही कि भले ही अब नियमित नहीं लेकिन जब-तब हम एक-दूसरे से मिल लेते हैं . एक-दूसरे की रचनाओं पर विचार-विमर्श भी हो जाया करता है .
रमाकांत जी का शायद यही वास्तविक सपना था .
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शनिवार, 31 अक्टूबर 2009

संस्मरण/ श्रद्धांजलि



(चित्र डॉ० अवधेश मिश्र )

वह मेरे पथ-बंधु

रूपसिंह चन्देल

वह साहित्यकार नहीं थे , लेकिन साहित्यकार परिवार से थे । आचार्य शुक्ल से पूर्व हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने वाले ‘मिश्र बंन्धुओं’ में से वह एक भाई के प्रपौत्र और साहित्य-मर्मज्ञ थे .

उनसे मेरा परिचय 1976 के अंतिम दिनों में हुआ था ।

मैंने 1976 में कानपुर विश्वविद्यालय से निजी छात्र के रूप हिन्दी में फर्स्ट डिवीजन में एम।ए. किया था . यहां यह बताना अनुचित नहीं होगा कि इण्टरमीडिएट के बाद की मेरी पूरी शिक्षा एक निजी छात्र के रूप में ही हुई . पारिवारिक परिस्थितियां ऐसी थीं कि नौकरी करना मेरे लिए आवश्यक हो गया था और अप्रैल 1973 में जब मुझे रक्षा लेखा विभाग में नौकरी मिली तब मेरे खाते में केवल इंण्टरमीडिएट का प्रमाणपत्र था . उन दिनों कानपुर विश्वविद्यालय से चार सौ कॉलेज संबद्ध थे और उनमें केवल बीस छात्रों को उस वर्ष हिन्दी में प्रथम श्रेणी प्राप्त हुई थी . मैं डी.ए. वी. कॉलेज केन्द्र से सम्मिलित हुआ और उस कॉलेज का एक मात्र प्रथम श्रेणी पाने वाला छात्र था .

प्रथम श्रेणी ने मुझे पी-एच।डी करने के लिए प्रेरित किया और इस सिलसिले में मुरादनगर से (उन दिनों मेरी पोस्टिंग वहीं थी ) कानपुर के मेरे दौरे बढ़ गए थे . अवकाश प्राप्त करने के लिए तरह-तरह के बहाने खोजने पड़ते , जिसमें कई बार मैंने अपनी मां को बीमार किया और यही नहीं हट्टी-कट्टी स्वस्थ मां को स्थाई रूप से हृदय रोग से पीडि़त घोषित कर दिया था .मैं जब भी कानपुर में होता , हर दूसरे दिन विश्वविद्यालय अवश्य जाता . विश्वविद्यालय में मेरे एक मात्र परिचित थे दुर्गाप्रसाद शुक्ल , जो भास्करानंद इंटर कॉलेज (नरवल) में मेरे सीनियर थे . यह वही इंटर कॉलेज है , कन्हैयालाल नंदन और प्रसिद्ध कवि रामावतार चेतन ने जहां से हाईस्कूल किया था . ‘झण्डा ऊंचा रहे हमारा .....विजयी विश्व तिरंगा प्यारा ’ झण्डा गान के प्रणेता श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ इसी नरवल के निवासी थे और मेरे समकालीन प्रसिद्ध कवि दिनेश शुक्ल भी यहीं के हैं .

दुर्गाप्रसाद शुक्ल को हम डी।पी. कहते , और जिन दिनों मैं नौकरी के लिए भटक रहा था , डी.पी. विश्वविद्यालय में जम चुके थे और अपने मृदुल स्वभाव और सहयोगी भाव के कारण छात्रों , मित्रों , प्राध्ययापकों और सहयोगियों के प्रिय बन चुके थे .

मैं पी-एच।डी. का स्वप्न तो देखने लगा लेकिन कोई निर्देशक मुझे अपने अधीन रजिस्ट्रेशन करनवाने के लिए तैयार नहीं था . उनके पास एक ही बहाना था कि मैंने एक ‘प्राइवेट छात्र’ के रूप में एम.ए. किया था . मेरे प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने की वे प्रशंसा करते , लेकिन अपना छात्र स्वीकार करने में असमर्थता व्यक्त कर देते . कुछ ने ऐसी शर्तें रखी जो मुझे स्वीकार नहीं थीं . उदाहरण के लिए क्राइस्टचर्च कॉलेज के विभागाध्यक्ष ने अपने अधीन रजिस्ट्रेशन के लिए तीन हजार रुपयों की मांग की . 1976 में मुझ जैसे बाबू के लिए वह एक बड़ी रकम थी . ऐसी ही मांग मोदी कॉलेज , मोदी नगर के विभागाध्यक्ष ने की थी . उसने इसके अतिरिक्त यह भी कहा था कि जब तक मैं शोध प्रबंध प्रस्तुत नहीं कर देता , प्रतिवर्ष एक हजार रुपये उसे अतिरिक्त देता रहूंगा . (पी-एच. डी. की उपाधि मिलने के बाद 1985 के अंतिम दिनों के एक ‘रविवारीय हिन्दुस्तान’ में इस संबन्ध में प्रकाशित मेरा आलेख बहुचर्चित हुआ था ) .

शोध निर्देशक की मेरी समस्या का समाधान डी।पी. कर सकते हैं इस आशा में मैं निरंतर डी.पी. के संपर्क में रहने लगा . डी.पी. उन दिनों डिग्री सेक्शन में थे और शहर के सभी कॉलेजों के प्राध्यापक उन्हें जानते थे . डी.पी. को पान खाने का शौक था ..... आज भी है और लंच के समय बाहर घूमने जाने पर मैं भी उनके साथ पान खाता और ऎसा केवल उन्हीं के साथ रहते होता . लंच में वह भी डी.पी. के साथ होते और उन्हीं दिनों उनसे मेरा परिचय हुआ . एक दिन डी.पी. बोले , ‘‘रूपसिंह , इन्हें जानते हो ?’’

मैं चुप था । डी.पी. के पास आते-जाते उन्हें कई बार देख चुका था .

‘‘सुधांशु किशोर मिश्र....’’ पान की पीक गटकते हुए डी।पी. बोले , ‘‘यहीं विश्वविद्यालय में हैं और पी-एचडी. कर रहे हैं .’’

मिश्र जी मंद-मंद मुस्कराते रहे । मैंने उनके शोध विषय और निर्देशक के विषय में पूछा . वह कविताओं पर शोध कर रहे थे और वी.एस.एस.डी. कॉलेज नवाबगंज के विभागाध्यक्ष डॉ. गौड़ उनके निर्देशक थे . डॉ. गौड़ एक अच्छे निर्देशक माने जाते थे .

उसके बाद मैं जब भी जाता मिश्र जी से अवश्य मिलता । लेकिन हमारे संबन्ध प्रगाढ़ हुए जब हम दोनों एक साथ आगरा कॉलेज , आगरा में लेक्चरर पद का साक्षात्कार देने गए . कानपुर से हम एक ही ट्रेन में आगरा गए थे . हम दिनभर साथ रहे . हम दोनों ही जानते थे कि हमारा चयन नहीं होना था , लेकिन हम साक्षात्कार का अनुभव प्राप्त करना चाहते थे . नौकरी तो हम कर ही रहे थे , लेकिन प्राध्यापकी हमारी रुचि की होती . हालांकि मेरा ध्यान प्राध्यापकी पाने से अधिक शोध के लिए पंजीकृत हो लेने में था . इस दिशा में डी.पी. ने मेरी सहायता की और उनके प्रयास से डी.वी.एस. कॉलेज के रीडर डॉ. बैजनाथ त्रिपाठी ने इस शर्त पर मुझे अपना छात्र स्वीकार किया कि शोध में वह मेरी बिल्कुल सहायता नहीं करेंगे . सब कुछ मुझे स्वयं करना होगा . वह केवल हस्ताक्षर करने का दायित्व निभाएगें और मौखिक के समय साथ रहेगें . उन्होंने बहुत ईमानदारी से अपने दायित्व का पालन किया था .

डी.पी. के माध्यम से मैं डॉ. तित्रपाठी का छात्र बन अवश्य गया लेकिन पी-एच डी. के लिए विषय की स्वीकृति मिलना निर्देशक मिलने से अधिक कठिन था . उन दिनों कानपुर विश्वविद्यालय जीवित साहित्यकारों पर शोध की अनुमति नहीं देता था . अब नियम ढीले हो चुके हैं . इसी का परिणाम है कि ममता पाण्डे जुलाई 2009 में मेरे कथा साहित्य पर अपना शोध प्रबन्ध प्रस्तुत कर सकीं .
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बात फरवरी 1977 की है । मैं कानपुर में था . किदवईनगर चैराहे की एक पान की दुकान में अखबार देख रहा था . पहले ही पृष्ठ पर कथाकार यशपाल की मृत्यु का समाचार था . दरअसल मैं अपने निर्देशक से ही मिलने जा रहा था जो किदवई नगर में ही रहते थे . उस दिन डॉ. त्रिपाठी ने विषय चयन कर विश्वविद्यालय में संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत करके ही मुरादनगर जाने की सलाह दी . उनके घर से मैं सीधे मारवाड़ी पुस्तकालय गया और दो दिनों तक जाता रहा . अंततः ‘सम-सामयिक परिप्रक्ष्य में यशपाल के कथा-साहित्य का आलोचनात्मक अनुशीलन’ विषय की रूपरेखा मैंने प्रस्तुत कर दी . लेकिन डॉ. विजयेन्द्र स्नातक की विशेषज्ञता में हुई बैठक में उसे निरस्त कर दिया गया . इसने मुझे अधिक ही निराश किया . इसका अर्थ मेरे एक वर्ष की बर्बादी से था . अगली बार मैंने प्रतापनारायण श्रीवास्तव के ‘व्यक्तित्व और कृतित्व’ का चयन किया . मिश्र जी उन दिनों शोध अनुभाग में थे . उस बार विशेषज्ञ थीं कथाकार डॉ. शशिप्रभा शास्त्री . मिश्र जी रजिस्ट्रार से सीधे जुड़े हुए थे और मेरे बारे में उन्हें बताकर अनुरोध कर चुके थे कि वे मेरे विषय को निरस्त न होने दें . उस दिन मीटिगं में मिश्र जी रजिस्ट्रार के ठीक पीछे बैठे और जब मेरे विषय पर चर्चा प्रारंभ हुई उन्होंने रजिस्ट्रार की पीठ पर उंगली गड़ाकर संकेत किया था .

विषय स्वीकृत हो गया था .
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मैं मुरादनगर से स्थानांतरित होकर जुलाई 1980 में दिल्ली आ गया । कानपुर जाना कम हो गया , लेकिन मिश्र जी का दिल्ली आना-जाना प्रारंभ हो गया था . 1981 के अंत की बात है शायद . मुझे एक दिन उनका पत्र मिला कि वह ’अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्था” (All India Institute of Medical Sciences ) में अपने मेडिकल चेक अप के लिए आ रहे हैं . मैं सुबह साढ़े सात बजे उन्हें रिसेप्शन के सामने मिलूं .

मैं मिला और पहली बार पता चला कि उनका वहां आने का सिलसिला कई वर्षों से चल रहा था । उन्हें एक ऐसी बीमारी थी कि हर तीसरे माह उन्हें किसी परीक्षण प्रक्रिया से गुजरना होता था . उससे पहले एम्स में उनका परिचित कोई लड़का था जो उनकी देखभाल किया करता था , लेकिन वह वहां से जा चुका था या उसकी सेवाएं समाप्त हो चुकी थीं . मिश्र जी हास्पिटल के कपड़े पहन अपने कपड़े और अटैची मेरे पास छोड़ चेक अप के लिए चले गए . बेंच पर बैठा मैं उनके लौटने की प्रतीक्षा करता रहा . लगभग एक बजे वह लौटे . हमने एम्स की कैण्टीन में लंच किया और सीधे घर चले गए . मेडिकल की उस प्रक्रिया से गुजरने के बाद मिश्र जी बहुत कष्ट अनुभव कर रहे थे और घर पहुंचकर वह सोफे पर लगभग दो घण्टे तक लेटे रहे थे .

रात भोजन के बाद मैं मिश्र जी को पुरानी दिल्ली स्टेशन जाने वाली बस में बैठा आया था .
उसके बाद एम्स की उनकी हर दिल्ली यात्रा के दौरान मैं सुबह साढ़े सात बजे रिसेप्शन के सामने उनसे मिले लगा । मेडिकल चेक अप के बाद हम घर आते और रात नौ बजे के लगभग मैं उन्हें बस में बैठा आता . यह सिलसिला 1985 या 1986 तक चला . इस बीच शोध के लिए मिला मेरा समय समाप्त हो चुका था और केवल नोट्स लेने के अतिरिक्त मैंने कुछ भी नहीं किया था . मिश्र जी कई वर्ष पहले न केवल पी-एच.डी. कर चुके थे बल्कि वी.एस.एस.डी. कॉलेज में लेक्चरर भी नियुक्त हो चुके थे और डी.लिट्. कर रहे थे . उनकी प्रेरणा और उनके प्रयासों से मुझे शोध पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय मिल गया . दोबारा मिले समय में रातों-दिन एक करके मैंने कार्य पूरा किया और नवम्बर , 1984 में शोध प्रबन्ध प्रस्तुत कर आया .

******* पी।-एच.डी. की डिग्री मिलने तक शिक्षण क्षेत्र में जाने की मेरी इच्छा समाप्त हो चुकी थी . अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की अपनी अंतिम यात्रा के समय मिश्र जी ने बताया कि जिस मेडिकल परीक्षण के लिए उन्हें वहां अपना पड़ता था वह लखनऊ मेडिकल कॉलेज में संभव हो गया था . उसके बाद मैं जब भी कानपुर गया , उनसे कभी मिलना हुआ .... कभी नहीं . सिलसिला बन्द नहीं हुआ , लेकिन अंतराल बढ़ गया था . फोन पर बातें हो जाती . 3 अगस्त 2003 को मैंने शक्तिनगर के किराए के मकान से अपने मकान में शिफ्ट किया . यहां के फोन से भी उनसे बातें हुईं लेकिन एक दिन वह डायरी खो गई जिसमें उनका फोन नंबर था और मेरे घर का नंबर भी कुछ दिनों बाद बदल गया . लगभग दो वर्षों तक हम एक दूसरे से संपर्क नहीं कर पाए . तीन वर्ष पूर्व अचानक एक दिन मोबाइल पर उनकी आवाज सुनकर मेरी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा . उन्होंने बताया कि मेरा नम्बर प्राप्त करने के लिए उन्हें बहुत श्रम करना पड़ा . उन्होंने अपने सहयोगी हिन्दी प्राध्यापक और कवि-आलोचक पंकज चतुर्वेदी से अपनी समस्या बतायी . पंकज चतुर्वेदी ने कादम्बनी में पंकज पाराशर को संपर्क किया . पाराशर ने किससे मेरा मोबाइल नंबर हस्तगत किया पता नहीं , लेकिन ........उन्होंने कहा कि उनकी छात्रा मामता पाण्डे मेरे कथा साहित्य पर शोध करना चाहती है . सामग्री उपलब्ध करवाने में मैं उसकी सहायता करूं ..... और संवाद का सिलसिला पुनः प्रारंभ हो गया . तब-से महीना-दो महीना में हमारी बातें होती रहीं . वह कई वर्ष से कॉलेज में हिन्दी विभागाध्यक्ष थे और इसी वर्ष 26 अगस्त को उसी पद से उन्होंने अवकाश ग्रहण किया था . उन्हें एक वर्ष का सेवा विस्तार भी मिल गया था .

******

16 अक्टूबर ( शुक्रवार ) को मैंने उन्हें मोबाइल पर एस।एम.एस. करके दीवाली की शुभ कामनाएं दीं . उन्होंने उत्तर दिया और लिखा कि वह चार दिनों तक अस्पताल में रहकर आए थे और लकवा के शिकार हो गए थे . मैंने तुरंत फोन किया . रुक-रुककर उन्होंने बात की . पता चला शुगर बढ़ गया था और दाहिना हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया था . वह कई वर्षों से शुगर के मरीज थे और एक बार उन्हें हल्का हार्ट अटैक भी हो चुका था .

‘‘आप स्वस्थ हो लें .....कुछ दिन बाद मैं आपसे बात करूंगा ।’’ मैंने कहा तो ‘‘ ठीक है ’’ कहकर उन्होंने फोन काट दिया .

29 अक्टूबर को मामता पाण्डे का फोन आया , ‘‘सर , बहुत बुरा हुआ ।’’

‘‘ क्या हुआ ?’’ मुझे लगा कि शोधप्रबन्ध संबन्धी उसकी काई समस्या है ।

‘‘सर , नहीं रहे ।’’

‘‘ क्या ऽऽऽ..... कब...... ?’’

‘‘ सत्ताइस अक्टूबर को अपरान्ह तीन बजे .....’’ ममता रोने लगी ।मेरी आवाज नहीं फूटी . ममता रोती हुई लगातार एक ही बात कहे जा रही थी ....‘‘बहुत बुरा हुआ सर .....’’

‘‘हां , बहुत बुरा हुआ ।’’ मैं धीरे से कह पाया , ‘‘मैंने अपना एक अच्छा मित्र - एक पथबन्धु खो दिया था .

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शनिवार, 26 सितंबर 2009

यादों की लकीरें


संस्मरण
''मैं दिनकर से बड़ा कवि होता''- भगवतीचरण वर्मा
रूपसिंह चन्देल
वर्ष याद नहीं लेकिन महीना अक्टूबर का था । राज्यसभा का सदस्य बने उन्हें पर्याप्त समय हो चुका था .

बस से मण्डी हाउस उतरकर हम -यानी मैं और सुभाष नीरव पैेदल फीरोजशाह रोड स्थित उनके बंगले की ओर जा रहे थे । मेरे पी-एच. डी. का विषय यदि कथाकार प्रतापनारायण श्रीवास्तव का व्यक्तित्व और कृतित्व न होता तो शायद ही मैं उन जैसे वड़े कथाकार से मिलने का साहस जुटाता .

प्रतापनारायण श्रीवास्तव के जीवन पर इतनी कम सामग्री मुझे मिली कि मेरा कार्य ठहर गया था । कानपुर इस मामले में मेरे लिए छुंछा सिध्द हुआ था . तभी मुझे किसी ने बताया कि भगवती बाबू बचपन में उनके सहपाठी थे. मुझे यह तो ज्ञात था कि जीवन के प्रारंभिक दौर में भगवती चरण वर्मा का कार्य क्षेत्र कानपुर रहा था , लेकिन दोनों बचपन में एक साथ पढ़े थे , सुनकर लगा था कि मेरी समस्या का समाधान मिल गया था दृ अपने बचपन के सहपाठी के विषय में वर्मा जी विस्तार से बताएंगे . उनके बंगले की ओर बढ़ते हुए श्रीवास्तव जप् के विषय में बहुत कुछ जान लेने का उत्साह मेरे अंदर कुलांचे मार रहा था .

जनता पार्टी के दौरान चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने थे । भगवती बाबू ने साप्ताहिक हिन्दुस्तान में उन पर एक लंबा आलेख लिखा था . वह आलेख चर्चा का विषय रहा था और उसके कुछ दिनों बाद ही भगवती बाबू को राज्य सभा में (१९७८ से १९८१ तक ) दाखिला मिल गया था .

भगवती बाबू से मिलने जाने के लिए नीरव ने उन्हें फोन कर रविवार का समय निश्चित कर लिया । मण्डी हाउस से उनका बंगला पांच मिनट पेैदल की दूरी पर था . नौकर ने दरवाजा खोला और हमें ड्राइंगरूम में बैठाकर गायब हो गया . थोड़ी देर बाद सादे कपड़ों में छोटे'कद -काठी के भगवती बाबू ने प्रवेश किया . चेहरे की झुर्रियां उनकी बढ़ी उम्र की घोषणा कर रही थीं . कुछ दिन पहले ही 'सारिका' में उनकी 'खिचड़ी' कहानी प्रकाशित हुई थी . हमारी बातचीत उसीसे प्रारंभ हुई . कहानी को लेकर वह मुग्ध थे , जबकि वह उनकी एक कमजोर कहानी थी. हमारे आने का उद्देश्य जानकर वह गंभीर हो गए और अत्यंत उदासीनतापूर्वक बोले , ''प्रताप बाबू मेरे सहपाठी तो थे - - अब याद नहीं कितने दिन रहे थे - -बहुत पुरानी बात है - - .''

''मुझे बताया गया कि छठवीं से आठवीं तक आप और वह साथ थे .'' मैं बोला .
''बीच में वह किसी दूसरे स्कूल में चले गए थे । लेकिन कुछ दिन हम साथ अवश्य थे . उसके बाद लंबे समय तक हम नहीं मिले . फिर विश्वभंरनाथ शर्मा कौशिक के यहां हमारी मुलाकातें होने लगी थीं . कौशिक जी के घर शाम को कलाकारों - साहित्यकारों का जमघट लगता था - -- ठण्डाई छनती और हंसी-ठट्ठे गूंजते रहते .''

''श्रीवास्तव जी का एक अप्रकाशित संस्मरण है कौशिक जी के यहां उन बैठकों के विषय में .'' मैंने बीच में ही टोका .
कानपुर उन दिनों साहित्य का केन्द्र था। मुझे भगवती बाबू की ये पंक्तियां याद आयीं जो उन्होंने 1966 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'आधुनिक कवि' में प्रस्तावना स्वरूप लिखी थीं -- '' मेरे साहित्यिक जीवन का प्रारंभ कानपुर में हुआ था --- कानपुर उन दिनों हिन्दी का एक प्रमुख साहित्यिक केन्द्र था . स्व. गणेश शंकर विद्यार्थी के 'प्रताप' नामक साप्ताहिक पत्र तथा गणेश (हम लोग गणेश शंकर विद्यार्थी को गणेश जी के नाम से ही जानते थे ) की प्रेरणा के प्रभाव में कानपुर देशभक्ति की ओजपूर्ण कविताओं का भी केन्द्र बन गया था .''

बीच में मेरे टोकने से कुछ देर तक भगवती बाबू चुप रहे थे । फिर बोले ''एल.एल.बी. करके प्रताप नारायण जोधपुर रियाशत के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट बनकर चले गए थे और मैं जीवन संघर्षों में डूब गया था .''

''क्या आप मानते हैं कि 'विदा' जैसा अपने समय का चर्चित उपन्यास लिखनेवाले श्रीवास्तव जी के लिए वह नौकरी उनके साहित्यिक जीवन के लिए घातक सिध्द हुई थी ?'' ( 1970 तक 'विदा' की 64 हजार प्रतियां बिक चुकी थीं और यह उपन्यास लेखक की 23 वर्ष आयु में 1927 में प्रकाशित हुआ था और मुंशी प्रेमचन्द ने उसकी भूमिका लिखी थी )।

''होना ही था । लेकिन आर्थिक सुरक्षा तो थी . रुतबा तो था - - जब कि मैं आर्थिक संकटों से जूझ रहा था --'' उनके चेहरे पर गंभीरता पसर गयी थी .

''उस संकट ने ही आपको कथा लेखक बना दिया ।''

''निश्चित ही ।''

उन्होंने इस विषय में लिखा है , ''चित्रलेखा उपन्यास मैंने आजीविका के लिए नहीं लिखा , शायद 'तीन वर्ष' उपन्यास भी मैंने आजीविका के लिए नहीं लिखा , लेकिन न जाने कितनी कहानियां मुझे आजीविका के लिए लिखनी पड़ी ।''

मैंने प्रश्न किया , ''आपने कहीं लिखा है कि आपके साहित्यिक जीवन की शरुरूआत कविताआें से हुई थी ?''

'' जी ।''

''अब आप कविता बिल्कुल नहीं लिखते ? '' नीरव का प्रश्न था ।

''कविता की नदी सूख गयी है ।''

बात कविताओं पर केन्द्रित हो गयी थी और तभी उन्होंने सगर्व घोषणा की थी , ''यदि मैंने कविता लिखना छोड़ न दिया होता तो मैं दिनकर से बड़ा कवि होता ।''

सुभाष और मेंने एक-दूसरे की ओर देखा था । भगवती बाबू चुप हो गए थे . विषय परिवर्तन करते हुए मैंने पूछा ,''श्रीवास्तव जी 1948 में जोधपुर से कानपुर लौट आए थे - - - उसके बाद आपकी मुलाकातें हुई ?''

''देखो , जोधपुर जाकर प्रतापनाराण साहित्य की समकालीनता के साथ अपने को जोड़कर नहीं रख सके । अपने साहित्यकार का विकास नहीं कर पाए . सच यह है कि 'विदा' से आगे वह नहीं बढ़ पाये थे . राजा-रानी - - अंग्रेज -- आभिजात्यवर्ग -- - वह इसके इर्द-गिर्द ही घूमते रहे . जबकि साहित्य कहां से कहां पहुंच गया था- - - .'' भगवती बाबू पुन: चुप हो गए थे .

चलते समय मैंने उनसे अनुरोध किया कि यदि वह श्रीवास्तव जी पर संस्मरण लिख दें और वह कहीं प्रकाशित हो जाए तो मेरे लिए बहुत उपयोगी सिध्द होगा ।

''मैं इन दिनों संस्मरण ही लिख रहा हूं । जल्दी ही वे पुस्तकाकार राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित होगें .''

हमारी लगभग एक घण्टे की उस स्मरण्ीय मुलाकात के बाद उनकी संस्मरणों की पुस्तक 'अतीत के गर्त से' प्रकाशित हुई थी , जिसमें एक छोटा-सा संस्मरण प्रतापनारायण श्रीवास्तव पर भी था । लेकिन उस पुस्तक में सर्वाधिक चाेंैकानेवाला संस्मरण दिनकर पर था . उन्होंने उसमें भी वही बात दोहराई थी कि यदि उन्होंने कविताएं लिखना न छोड़ा होता तो वह दिनकर से बड़े कवि हुए होते . दूसरी बात दिनकर की नैतिकता से जुड़ी हुई थी , जिसके कारण दिनकर जीवन के अंतिम दिनों में गृहकलह से परेशान रहे थे . बात जो भी थी वह दिनकर का निजी जीवन था . उनके किसके साथ अवैध संबंन्ध थे इसे उनके मरणोपरांत लिखा जाना उचित नहीं था . .

'' चित्रलेखा' , 'टेढ़े मेढ़े रास्ते' , 'सीधी-सच्ची बातें , 'भूले बिसरे चित्र , 'त्रिपथगा' आदि उपन्यास , कहानियां और 'मेरी कविताएं ' और 'आधुनिक कवि' कविता संग्रहों के रचयिता भगवती चरण वर्मा निश्चित ही प्रतिभाशाली रचनाकर थे . उन्होंने स्वयं कहा है - ''मैं कभी यश के पीछे नहीं दौड़ा --- वह स्वयं ही मुझे मिलता गया .'' साहित्य में इसे चमत्कार से कम नहीं मानना होगा . हालंकि उन्होंने यह भी माना कि '' विरोधी उनके भी हैं , लेकिन विरोध भी तो चर्चा ही देता है .'' आज जब साहित्य में गलाकाट राजनीति , अविश्वास और विद्रूपता का माहौल है -- जब एक ही विचारधारा के तीन साहित्यकार तीन वर्षों तक एक साथ नहीं चल पाते तब अलग-अलग विचारधारा के लखनऊ की त्रिमूर्ति -- यशपाल , अम्तालाल नागर और भगवती चरण वर्मा की याद एक सुखद अनुभूति प्रदान करती है .
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