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रविवार, 8 मई 2011

यादों की लकीरें



आत्मकथ्य

चुनौतियां मुझे प्रेरणा देती हैं


रूपसिंह चन्देल

अपने विषय में कुछ लिखते समय मुझे इस बात का संकोच हो रहा है कि पाठक यह न सोचें कि अतीत के दयनीय पृष्ठों को पलटकर मैंने उनकी सहृदयता बटोरने की चेष्टा की है। 'सारिका' में कमलेश्वर ने साहित्यकारों के आत्मकथ्य एक श्रृखंला 'गर्दिश के दिन' शीर्षक से प्रकाशित की थी और तब कुछ पाठकों और कुछ साहित्कारों को उन रचनाकारों के जीवन-संघर्षों के विषय में ऐसे ही उद्गार व्यक्त करते हुए सुना था। तब से मन में यह भीरु-भाव बैठा रहा कि मेरे जीवन के पैबन्द देखकर पता नहीं कोई क्या सोचे! जीवन के उन पैबन्दों को इस खूबसूरती से ढके रखा कि मित्रों को भी यह एहसास नहीं होने दिया कि संघर्ष ही मेरा सबसे बड़ा मित्र रहा है। जीवन का इतना लंबा पड़ाव पार कर लेने के बाद भी आज भी वह किसी न किसी रूप में मेरे साथ है। अपनी पत्रिका 'कथाबिंब' के 'आमने-सामने' स्तंभ के लिए अरविन्द जी ने जब लिखने के लिए कहा तब उनकी आज्ञा टालने का साहस मैं नहीं जुटा पाया। लेकिन तब से अब तक बहुत-सा पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका है। अस्तु :

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छठवीं का विद्यार्थी था। उन दिनों मेरे एक पड़सी ने पूछा, ''क्या बनना चाहते हो?'' सकुचाते हुए मैंने कहा था,''साहित्यकार''। तब साहित्यकार से मेरा आभिप्राय एक बडे क़वि से था। 1962 में 'जुग्गीलाल कमलापति प्राइमरी पाठशाला, पुरवामीर' (कानपुर) से पांचवीं उत्तीर्ण कर जूनियर हाईस्कूल, महोली में छठवीं में दाखिला लिया था। श्यामनारायण पाण्डेय,सुभद्राकुमारी चौहान और सोहनलाल द्विवेदी जैसे कवियों के राष्ट्रगीतों से परिचय हो चुका था। प्रेमचन्द के साहित्य और जीवन से प्रेरित था। गांव के चार लड़के, बाला प्रसाद त्रिवेदी, रामसनेही,यमुनाप्रसाद गुप्त और मोहनलाल कुरील मेरे साथ तीन मील पैदल चलकर महोली जाते थे। हम सभी एक ही कक्षा में पढ़ते थे और हममें से अधिकांश के पास जूते नहीं होते थे। मेरे पास तो शायद ही कभी रहे हों, अगर कभी रहे भी तो कपड़े के जूते। मेरे पास एक ही जोड़ी कपड़े थे जिसे मैं दूसरे-तीसरे दिन बम्बे (नहर) के पानी में रेहू से साफ कर लिया करता था। रेहू से साफ कपड़े वेैसे भी पीलापन लिए होते और ऊपर से तीन मील आने-जाने की धूल-धक्कड़ ..... कपड़े प्राय: गन्दे ही दिखते। इस बात का एहसास रहता, किन्तु विवशता थी। जब कभी साबुन से धुले कपड़े पहनकर स्कूल जाता मन प्रफुल्लित रहता। जाड़े के दिनों में गन्दे कपड़ों से मन भारी रहता और दिन भर आलस्य-सा बना रहता। मुझे याद है, ऐसे दिनों आंखों से कीचड़ निकलता रहता फिर भी पढ़ने में ठीक था...... अर्थात् कक्षा में होशियार तीन छात्रों में से एक। इसीलिए अध्यापकों को प्रिय था।

आज भी दो घटनाएं भूल नहीं पाया। एक घटना तब की है जब मैंने छठवीं कक्षा की परीक्षा दी थी। उन दिनों उत्तर प्रदेश में गर्मियों के लिए विद्यालय 31 मई को बन्द होते थे। 31 मई को परीक्षा परिणाम (बोर्ड की परीक्षा को छोड़कर) धोषित होते थे। 31 मई,1963 (मंगलवार) का दिन था। मेैं 103 डिग्री बुखार में तप रहा था। परीक्षा परिणाम लेने नहीं जा सका। लेकिन आश्चर्य तब हुआ जब मेरे अंग्रेजी अध्यापक एक अन्य अध्यापक के साथ मुझे देखने और मेरा परीक्षा परिणाम देने आए। आज की स्थिति में क्या ऐसा सोचा जा सकता है! दूसरी घटना अगले वर्ष जाड़े के दिनों की है। बड़े भाई (श्री जगरूपसिंह,जो मुझसे 10 वर्ष बड़े हैं) का बी.ए.अंतिम वर्ष था। वह कानपुर में बी.एस.एस.डी. कॉलेज, नवाबगंज में पढ़ रहे थे और होस्टल में रहते थे। उनकी शादी जून,1963 में हो चुकी थी। सात लोगों का परिवार और आय का कोई ठोस आधार नहीं था। बड़े भाई का अंग्रेजी ज्ञान बहुत अच्छा था। शहर में वह अंग्रेजी के टयूशन करते। मेरे पास कोई गर्म कपड़ा नहीं था और मेरी एक मात्र हल्के नीले रंग की कमीज कंधे से नीचे पीठ में फट चुकी थी। उन्हीं दिनों भाई साहब दो पाउण्ड सलेटी रंग का ऊन खरीदकर लाए थे। भाभी ने आनन-फानन में मेरे लिए पूरी बांह का स्वेटर तैयार कर दिया, जिसने मुंह फैला चुकी कमीज को ढक लिया था। लेकिन मेरी स्थिति मेरे हेड मास्टर से छुपी न थी। एक दिन वह मेरे सामने आ बैठे और घुमा-फिराकर मुझसे यह जानने का प्रयत्न करते रहे कि क्या मेरे पास एक ही कमीज और स्वेटर हैं। मैंने क्या उत्तर दिए यह इस समय याद नहीं लेकिन यह याद है कि मैं बेहद भयभीत रहा था यह सोचकर कि कहीं वह मुझसे स्वेटर उतार देने के लिए न कहें। लेकिन उन्होंने जब कहा, ''किसी चीज की आवश्यकता होगी तो नि:संकोच कहना'' मैंने स्वीकृति में मूड़ी हिला दी थी। शायद अभावों में जीने की आदत ने मुझे कुछ ऐसा खुद्दार बना दिया था कि जीवन में कभी किसी से मांगकर कुछ भी हासिल न करने के संकल्प पर कायम रह सका।

स्कूल में दैनिक जागरण अखबार आता था। उन दिनों भारत-चीन युध्द चल रहा था। महोली स्कूल में ही अखबार से मेरा साक्षात हुआ था। पत्रिकाओं से तो बहुत बाद में परिचित हो सका। उन्हीं दिनों की घटना है। वैसे तो 'जागरण' विद्यार्थियों के हाथ लग ही नहीं पाता था और यदि किसी अध्यापक की मेज पर रखा भी होता तो हेडमास्टर के भय से हम उसे छूने का साहस नहीं कर पाते थे। हर विद्यार्थी उनकी नजर से बचता था। शरारत करते पकड़े गए तो उस समय वह डांटकर छोड़ देते, किन्तु अपने पीरियड में कसर पूरी कर लेते। वह सभी कक्षाओं को गणित पढ़ाते थे। उन दिनों अध्यापकों की मार आम बात थी। यह भय हमें गणित के अभ्यास में जुटाए रखता, लेकिन उस दिन शायद हेडमास्टर अस्वस्थ थे या कहीं गए हुए थे। वही नहीं, एक या दो अध्यापक ही उपस्थित थे और हेडमास्टर की अनुपस्थिति का वे भी लाभ उठा रहे थे।

उस दिन हमारी मौज थी। गुलाबी जाड़े का दिन था वह। बाहर मैदान में टाट-पट्टी बिछी थी और भोजनावकाश का समय था। कक्षा में तीन-चार छात्रों को छोड़कर अधिकांश खेलने भाग गए थे। हममें से कोई 'जागरण्ा' उठा लाया चुपके से। मेरे हाथ भी एक पेज लगा, उसमें किसी की वीर रस की कविता छपी थी, जो भारत-चीन युध्द पर थी। कविता पढ़कर मैं भी वीर रस में डूबने-उतराने लगा। तब मैं कक्षा में सबसे पीछे बैठता था। बहुत डरपोक जो था। खाने की छुट्टी के बाद कक्षा प्रारंभ हुई। बच्चे अपनी मस्ती में थे। मैं उस समय अपने में डूबा जागरण में पढ़ी कविता के तर्ज पर तुकबन्दी में व्यस्त था। काफी मशक्कत के बाद मैं चार पंक्तियां लिखने में सफल रहा था और उस समय मुझे लगा था कि मेरे रूप में किसी महान कवि का पुनर्जन्म हो चुका था।

कितने ही दिनों तक मैं अपनी उस प्रथम कविता को गाता-गुनगुनाता रहा। बाद में तुकबन्दी करने का नशा-सा हो गया। सफेद पन्नों को चौथाई कर छोटी डायरी बना ली और हर समय उसे जेब में रखने लगा। जब भी कोई कविता की पंक्ति मन में उमड़ती, उसमें लिख लेता। ऐसी एक डायरी, जिसमें चार-चार पंक्तियों की कविताएं दर्ज थीं बाला प्रसाद त्रिवेदी के पिता के हाथ लग गयी थी। भारी बरसात का दिन था वह। मैं मामा की चौपाल से उस खोयी डायरी को ढूंढकर असफल लौट रहा था कि उन्होंने, जिन्हें हम बच्चू नाना कहते थे, ने बुलाया। जब उन्होंने वह डायरी दिखाई, मैं संकोच से विजड़ित हो गया। अगर उसके ऊपर मेरा नाम न लिखा होता तो मैं कह देता, मेरी नहीं है। मुझे लगा था जैसे मैं कोई बड़ा अपराध करते हुए पकड़ा गया था, लेकिन उन्होंने मुझे उबार लिया था। डायरी मुझे मिल गयी थी।

कविताओं की तुकबन्दी का काम कम होने के बजाय बढ़ता गया। यहां तक कि मैं तुलसीदास की चौपाइयों और रहीम के दोहों के तर्ज पर रचनाएं लिखने लगा। जब भी मन को किसी बात से ठेस पहुंचती, पीड़ा होती.... एक कविता लिखी जाती। परिवार उन दिनों भयानक आर्थिक संकट से गुजर रहा था। पिताजी को अवकाश ग्रहण किए पांच वर्ष हो चुके थे। उनको नौकरी से मिली जमापूंजी समाप्त हो चुकी थी और हम सभी जानते थे कि भविष्य के दिन और भी अधिक कष्टप्रद होने वाले थे। वे दिन मेरे लिए इतने कष्ट के न थे, जितने मां-पिता के लिए थे। मां पिता जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम में जुटी रहतीं और दोनों मिलकर घर की गाड़ी खींचने का प्रयत्न कर रहे थे।

पिता (सुरजनसिंह चन्देल) एक कर्मठ और जुझारू व्यक्ति थे। उनकी जीवटता का एक ज्वलन्त उदाहरण यह है कि युवावस्था में कानपुर में अल:सुबह गंगा स्नान कर वह लखनऊ के लिए पैदल प्रस्थान करते इस संकल्प के साथ कि सूर्यास्त से पहले गोमती में स्नान करेंगे। और पैंतालीस-पचास मील की लंबी यात्रा तय कर वह संकल्प पूरा करते थे। अगले दिन वह गोमती में स्नान कर सूर्यास्त से पूर्व कानपुर पहुंंच गंगा में स्नान करते थे। भले ही इसे उनकी सनक कहा जाये, लेकिन यह किसी व्यक्ति के दृढ़ निश्चय का परिचायक है। मृत्युपर्यन्त मैंने उन्हें वैसा ही कर्मठ और दृढ़-निश्चयी देखा। नौकरी में रहते उन्होंने परिवार के किसी व्यक्ति को किसी कमी का एहसास नहीं होने दिया। खाली समय वह सत्संगति में व्यतीत करते। बचपन में कुछ दिन मैं कलकत्ता में रहा था। उन दिनों बावनगाछी (हाबड़ा) में पिता जी को रेलवे की ओर से अच्छा मकान मिला हुआ था। हम पहली मंजिल में रहते थे। पिताजी सुबह चार बजे उठ जाते। स्नानकर पैदल काली मन्दिर जाते और वहां से लौटकर सात बजे 'हावड़ा लोकोमोटिव वर्कशॉप' अपनी डयूटी पर। वह बहुत ही सीधे और सरल स्वभाव के थे। जबकि मां जिद्दी और जबर्दस्त स्वाभिमानिनी। समझौता करना या झुकना उन्होंने सीखा ही नहीं था। सामने वाले को ही झुकना पड़ता था। अत: मैंने जहां पिता से संघर्ष से जूझना सीखा, वहीं मां से स्वाभिमान और टूटकर भी न झुकना।


पिताजी के अवकाश ग्रहण करने से बहुत पहले ही मां ने मेरे ननिहाल में घर बना लिया था। नाना के पास बहुत जमीन थी.... गांव में सबसे अधिक। उन्होंने न केवल घर बनाने के लिए मां को जमीन दी बल्कि 13 बीघा खेत भी दिए थे। दरअसल मेरे नाना की मृत्यु तभी हो गयी थी जब मामा ढाई वर्ष और मां डेढ़ वर्ष के थे। दोनों का पालन-पोषण चाचा कंचन सिंह ने किया था। मां को वह बहुत चाहते थे और उनके विवाह के बाद उन्होंने यही चाहा था कि उनकी भतीजी मायके में ही बसे। वैसे भी पिताजी के सौतेले भाई के अतिरिक्त कोई नहीं था। उनके गांव देसामऊ के उनके दस बीघे खेतों (जो आज कानपुर शहर की सरहद पर हैं और जिनकी कीमत दो करोड़ से कम नहीं है) पर उनके भांजे अर्थात मेरी बुआ के लड़के ने कोर्ट में यह हलफनामा देकर कि उनके मामा की मृत्यु हो चुकी है और वे ही उनके वारिस हैं कब्जा कर लिया था और पिता जी ने यह कहकर कि, ''भांजा बेटा समान है..... मुझे कोई शिकायत नहीं'' स्थिति को स्वीकार कर लिया था।

1959 में अवकाश ग्रहण कर गांव आने के समय पिताजी के पास अच्छी जमापूंजी थी जिससे तीन वर्ष तक पुराने ढर्रे पर जीवन बीता था। उन्होंने दो भैंसें,एक गाय और दो भैंसे (खेत जोतने के लिए) खरीद लिए थे। खेती तिहाई में दे दी और स्वयं भैंसों और गाय की सेवा में रहने लगे थे। तीन वर्षों में बैंक का पैसा शून्य हो चला तो उन्हीं भैंसों और गाय का दूध परिवार के भरण-पोषण का सहारा बना था। खेती साथ नहीं दे रही थी बावजूद इसके कि तिहाईदार के साथ पिताजी ने अपने को भी मिट्टी बना लिया था। साफ-सफ्फाफ धोती और मलमल या सिल्क के कुर्ते में रहने वाला व्यक्ति कानपुर के किसी मिल की बनी मोटी लुंगी और बेटे की छोड़ी कमीज से बसर करने के लिए विवश हो गया था। लेकिन उफ नहीं, कोई पीड़ा नहीं, अफसोस नहीं। कभी-कभी यह अवश्य कहते कि ''रिटायरमेंट के समय कलकत्ता में दो खोली मिल रही थीं तीन-तीन हजार में, खरीद लेता तो आज यह सब न करना पड़ता।''

पिताजी के कलकत्ता से चलने से पूर्व भाई साहब ने हाईस्कूल कर लिया था। उन्हें रेलवे में नौकरी मिल रही थी.... चार सौ रुपए रिश्वत देनी थी। रिश्वत देना पिताजी के सिध्दान्त के विरुध्द था। बी.ए. कर भाई साहब नौकरी की तलाश में जूठ गए और सोलह महीने भटकते रहे थे। उनकी नौकरी लगने तक परिवार के पास आय का स्रोत मात्र भैंसों व गाय का दूध रहा। मां के सारे जेवर पेट भरने के लिए बिक गए थे या दूधिया के पास रेहन जा चुके थे, जिन्हें कभी वापस लौटाया नहीं जा सका। कई बार मेरी फीस के पैसे भी कठिनाई से जुट पाते। कॉपी-किताबें खरीदने के लिए पैसे न होते। मैं घर की स्थिति समझता था और स्वयं भी कोई न-कोई मार्ग निकालने की सोचता रहता, और निकाला भी। 1964 में सातवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करते ही चिन्तित हो उठा कि आठवीं की कॉपी-किताबें केैसे खरीदी जाएंगी। एक विकल्प सूझा। मामा के खेत कट रहे थे। चमरौटे की कुछ औरतें और बच्चे सीला (खेत काटते समय टूटकर गिरी बालियां) बीनने जाते थे। मामा के खेत गांव में सभी के खेतों से अधिक पैदावार देते थे। गेहूं, जौ, चना, सरसों-लाही फट पड़ता। सीला बीनने वालों का नेतृत्व नानी करतीं । नानी जैसी देवी-स्वरूपा स्त्री मैंने जीवन में दूसरी नहीं देखी। मैंने नानी से प्रस्ताव किया कि मैं भी उनके साथ सीला बीनने जाउंगा। हंसकर उन्होंने स्वीकृति दे दी। सीला बीनने के मेरे निहितार्थ को शायद वे भांप न पायी थीं।

नानी की स्वीकृति पा मैं कितना खुश था इसका अन्दाजा वही लगा सकता है, जिसने वैसी स्थिति देखी होगी। मई-जून (तब खेती की कटाई जून प्रारंभ... और कभी-कभी जून मध्य तक चलती थी) की भयंकर तपिश में मैं गेहूं, जौ, और चना की बालियां जिस गति से टूंगता रहा था, उससे साथ वाले आश्चर्य करते रहे थे। कुछ सरसों भी हाथ लगी थी। सबको कूट-काटकर बेचने से जो मिला उसने आठवीं की पुस्तकें-कॉपियां खरीदने की चिन्ता से मुझे मुक्त कर दिया था।

आठवीं में पहुंचा तो कविताएं लिखने में व्यवधान पड़ा, पढ़ाई का दबाव और हेडमास्टर की छड़ी का भय बढ़ ग़या था। यह भी था कि अच्छे अंकों में उत्तीर्ण होना है, जिससे आगे फीस माफ रहे। मेरी परीक्षा से पहले भाई साहब की नौकरी एच.ए.एल. कानपुर में लग गयी थी। घर ने राहत की सांस ली थी।

परीक्षा के बाद खाली हुआ तो कुछ लिखने की इच्छा हुई। मई का महीना था वह। तुकबन्दी से मन ऊब चुका था। दरी-चादर बिछाकर बरौठे में आसन जमाया और लिखने लगा, 'नौकरी की खेज' । तब तक लंबी कहानी और उपन्यास विधा से परिचय न हुआ था। फिर भी लिखता गया था। दरअसल उसका नायक मैं स्वयं था। वह कहानी तत्काल नहीं जन्मी थी। तीन वर्षों तक मेरी डयूटी प्रतिदिन शाम को घेर में लगती आ रही थीं। पिताजी सुबह जानवरों को चराने ले जाते। शाम जानवर आगे आते, पिताजी काफी बाद में। घेर में पहुंचते ही जानवरों को उनके खूंटों से बांधने का काम मेरा होता। मैं घण्टा-दो घण्टा पहले घेर में पहुंच जाता और चारपाई पर लेट कल्पना की ऊंची उड़ान भरता रहता। 'नौकरी की खोज' उसी का परिणाम थी। लगभग सत्तर-पचहत्तर पृष्ठों की थी वह कहानी। बाद में वह कैसे नष्ट हुई याद नहीं।

जुलाई, 1965 में नौंवीं में 'भास्करानन्द इण्टर कॉलेज', नरवल में विज्ञान में प्रवेश लिया। यह वही कॉलेज है जहां से स्व. कन्हैयालाल नन्दन ने भी हाई स्कूल किया था। लेकिन यह बात बहुत बाद में नन्दन जी से मिलने के बाद ज्ञात हुई थी। यही नहीं नरवल झण्डा गान के रचयिता श्यामलाल पार्षद की जन्मस्थली भी है।

इन्हीं दिनों गांव के एक सीनियर छात्र, प्रेम प्रताम अवस्थी, जो कानपुर में पढ़ रहे थे, से मुझे पांच जासूसी उपन्यास प्राप्त हुए। बड़े चाव से दो ही पढ़ पाया था कि रविवार की छुट्टी में आए भाई साहब के हाथ पांचों लग गए। फिर क्या था! वह घटना आज भी भूल नहीं पाया। उनके शब्दों के कोड़े बरसते रहे और मैं सिर नीचा किए चुपचाप सुनता रहा था। उसी शाम पांचों उपन्यासों को मैंने मिट्टी का तेल डालकर जला दिया था।

हाईस्कूल के बाद भाई साहब मुझे शहर ले गए। उसी वर्ष गर्मी में (1967) में छोटी बहन की शादी हुई थी। मेरे छोटे बहनोई जाजमऊ इण्टर कॉलेज में पढ़ते थे। उन्होंने भी उसी वर्ष हाई स्कूल किया था। हम दोनों ने विज्ञान विषय में प्रवेश लिया। कुछ दिन होस्टल में रहकर हम सभी भाई साहब के पास रहने आ गए। खासकर हमारी सुविधा को ध्यान में रखकर भाई साहब ने हरिजिन्दर नगर के पास बड़ा कमरा किराए पर ले लिया था, लेकिन मेरा मन उखड़ा-सा रहने लगा था। कारण था गणित का पल्ले न पड़ना। कोर्स आगे बढ़ता जा रहा था और मैं पिछड़ता जा रहा था। मैं परेशान हो उठा। मैंने निर्णय किया कि मुझे गांव लौटकर 'भास्करानन्द' में प्रवेश लेना चाहिए। शहर मेरे लिए बना ही नहीं है या मैं शहर के लिए। संयोग से उसी वर्ष वहां इण्टर में विज्ञान शुरू हुआ था। गांव लौटने की मेरी जिद के समक्ष भाई साहब को परास्त होना पड़ा। यह अगस्त 1967 की बात होगी। उन्होंने किराए के लिए पांच रुपए दिए और मैं शहर को प्रणाम कर हाथ में किताबों का थैला थाम गांव लौट पड़ा। मन इतना खिन्न था कि पैदल चला तो चलता ही गया। तीस किलोमीटर की यात्रा पैदल तय कर दोपहर दो बजे गांव पहुचा। रास्ते भर सोचता रहा कि भाई साहब को नाराज कर अच्छा नहीं किया, लेकिन यह भी सोचता रहा कि यदि उसी कॉलेज में पढ़ता रहता तो फेल होना तय था।

मेरा गांव लौटना मां को अच्छा भी लगा और नहीं भी। भाई साहब से सारा घर डरता था। एक तो कमाऊ वही थे। दूसरे वे घर वालों के मध्य मंभीरता ओढ़े रहते थे। मां का कहना था कि मेरे गांव लौटने का आरोप उन्हीं पर लगेगा और हुआ भी यही। भाई जब गांव आए, मुझे लेकर कलह हुई। लेकिन मां ने 'भास्करानन्द' में मेरे प्रवेश के लिए पैसों की व्यवस्था कर दी थी। किसी प्रकार ग्यारहवीं पास की। लेकिन उसी वर्ष (9 जुलाई,1968) मुझे भयानक 'टायफायड' हो गया जो 14 दिनों तक रहा। इतने ही दिनों में न केवल उसने मेरा शरीर निचोड़ दिया, बल्कि अनेक 'साइड एफेक्ट्स' भी छोड़ गया। मैं महीनों इस याग्य नहीं रहा कि कॉलेज जा सकता। पढ़ाई रोकनी पड़ी। वह पूरा वर्ष जानवर चराते बीता। ऐसी स्थिति में साहित्य की सुध लेने की कल्पना स्वप्न में भी नहीं आयी। कुछ बीमारियाें ने शरीर में अड्डा जमा लिया। उनसे मुक्ति के लिए जंगल की न जाने कितनी जड़ी-बूटियों से परिचय हुआ। कई डॉक्टर, हकीम और वैद्यों के सम्पर्क में आया। आयुर्वेद की कई पुरानी पुस्तकें चाट डाली। लेकिन लाभ नहीं हुआ।

इस बेकार और खाली वर्ष ने मुझे अपने जीवन पर पुनरावलोकन के लिए विवश किया। मुझे लगा कि गांव में रहकर निश्चित ही मेरा जीवन नर्क हो जाएगा। मैं गांव में ही खप जाने के लिए नहीं पैदा हुआ। कुछ बनना है तो शहर लौटना ही होगा। 1969 के प्रारंभ से ही मैंने मां से शहर जाकर पुन: पढ़ने की इच्छा व्यक्त करनी प्रारंभ कर दी। मेरा आभिप्राय था कि अवसर देख वह भाई साहब से मेरी इच्छा जाहिर करें। मां के कहने पर भाई साहब ने बेरुखी से उत्तर दिया कि ''यह शहर में नहीं पढ़ पाएगा, इसके लिए गांव ही ठीक है।'' अंतत: पिताजी के हस्तक्षेप के बाद वे तैयार तो हुए, लेकिन पढ़ाई के लिए नहीं, आई.टी.आई. में ट्रेनिगं दिलवाने के लिए। मुझे उनकी सलाह माननी पड़ी। जुलाई में मुझे वहां प्रवेश मिला। रहने की व्यवस्था होस्टल में हो गयी। होस्टल मुफ्त था। खर्च के लिए मैं प्रतिमाह तीस रुपए भाई साहब से लेता था और उसमें जिस ठाठ से रहता था, आज सोचकर आश्चर्य होता है।

मेरे संघर्ष का नया दौर हाईस्कूल के बाद ही शुरू हो गया था। 1970 जुलाई में आई.टी.आई. से निकलने के बाद भाई साहब के साथ रहने लगा। उन्हीं दिनों (20 सितम्बर,1970) को पिताजी का देहान्त हुआ। मैं उस दिन इण्टरमीडिएट का प्राईवेट फार्म भरने के लिए शहर में था। कुछ दिनों बाद ही मैं भी अस्वस्थ हो गया। सभी मेरी खिल्ली उड़ाते कि मुझे कोई बीमारी नहीं...शक की बीमारी है। जून,1971 तक मेरी स्थिति बिगड़ती चली गयी और मेरा वजन 54 किलो से घटकर 40 किलोग्राम रह गया। एक दिन कुछ ऐसा घटित हुआ कि भाई साहब भी घबड़ा गए। किदवई नगर के डॉ. के.के. भार्गव को दिखाया। पता चला कि 'इल्यूसिकिल आंत' बढ़ गयी है। 'एक्स-रे' ने स्पष्ट कर दिया कि यदि शीघ्र ही ऑपरेशन न किया गया तो वह फट जाएगी। 20 जून,1971 को मैं हैलट अस्पताल में भर्ती हुआ और 11 जुलाई, को डॉ. एस.पी.जैन ने ऑपरेशन किया। यह मर्ज 'टायफायड' की देन था। उसके बाद मैं पूर्णरूप से स्वस्थ हो गया और आज तक हूं।

1971 में प्राइवेट छात्र के रूप में बारहवीं की परीक्षा की तैयारी के साथ नौकरी की तलाश जारी रही थी। प्रतिदिन सुबह दस बजे साइकिल पर घर से निकलता और दिन भर एक फैक्ट्री से दूसरी या एक फर्म से दूसरी भटककर नौकरी खोजता रहता। कितनी ही जगहों में 'नहीं है' का दो टूक रूखा जवाब मिलता तो कहीं-कहीं अपमानित कर निकाला जाता। ऐसी ही एक घटना न्यू मार्केट के पास एक 'जॉब प्रेस' के दफ्तर की है। 1971 में चार महीने नयागंज के सेल्स-इनकम टैक्स के एक वकील के घर के कार्यालय में काम किया। सुबह आठ बजे से दोपहर बारह बजे तक और मिलते थे पचास रुपए महीना। सुबह दफ्तर पहुंचने पर मुझे उसका टेलीफोन-मेज साफ करना होता और फाइलें ठीक ढंग से सजानी होतीं। कई बार सब्जी या घर के लिए मेवे लाने होते। यही नहीं वकील साहब का प्रस्ताव था कि मैं लंच साथ लाया करूं और बारह से चार बजे तक उसकी मां को पढ़ा दिया करूं, जो अपढ़ थी, तो वह मेरे वेतन में पचीस रुपए मासिक की वृध्दि कर देगा। मैंने इनकार कर दिया। मेरे उपन्यास 'शहर गवाह है' में वकील के जिस टापपिस्ट का वर्णन है वह कोई और नहीं।

चार माह बाद बीमारी के कारण मैंने वह नौकरी छोड़ दी। स्वस्थ होने के बाद महीनों भटककर भी जब नौकरी नहीं मिली तो 1972 के आखिरी दिनों में मुझे पुन: वकील साहब की शरण में जाना पड़ा और पचास रुपए में चार घण्टे प्रतिदिन उसकी उपेक्षापूर्ण नजरों का सामना करने के लिए विवश होना पड़ा था। यहीं 'ब्रम्हकुमारी आश्रम' की वास्तविकता का परिचय मुझे मिला। वकील परिवार उसका अन्ध-भक्त था और सप्ताह में एक बार अनेक सम्पन्न युवक-युवतियां सुबह आठ बजे के आसपास उसके यहां आते थे। एक बड़े हॉल में पर्दे के पीछे वे सब क्या करते, मेरे लिए रहस्य होता। बाद में अनेक विवादास्पद बातें इसके विषय में मैंने सुनीं थीं।

बेकारी के दिनों में मैंने बी.ए. करने का संकल्प किया। 'रेगुलर' पढ़ने की तौफीक न थी और विश्वविद्यालय ने प्राइवेट की खुली छूट तब तक नहीं दी थी। केवल अध्यापकों के लिए प्राइवेट की छूट थी.... भले ही वे किसी भी स्तर के हों। मेरा मित्र इकरार्मुहमान हाशमी मेरे साथ ही बेकारी से जूझ रहा था। हम दोनों ने ही किसी स्कूल के सहयोग से बी.ए. का प्राइवेट फॉर्म भरने का निर्णय किया। उसने अनेक मान्यता प्राप्त प्राइमरी और जूनियर हाई स्कूलों के हेडमास्टरों और मास्टरों से संपर्क करना शुरू किया। एकाध तैयार भी हुए तो रिश्वत मांगी सौ रुपए। कहां से लाते इतना पैेसा! मैं यह सब भाई साहब से छुपाकर कर रहा था। क्योंकि उनकी शर्त थी पहले नौकरी....शेष सब बाद में। मैंने इसके लिए एक जूनियर हाईस्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया, जो घर के पास था। दोनों ही लालच थे....फॉर्म भरने और कुछ मुद्रा लाभ का। लेकिन एक माह सिर खपाने के बाद जब उस घानी से तेल निकलता नजर नहीं आया तो पढ़ाना छोड़ दिया। इकराम भी अनेक स्कूलों के चक्कर काटकर हार चुका था। एक दिन भाई साहब ने अपने कई मित्रों के सामने कहा कि जितनी ऊर्जा मैं बी.ए. का फॉर्म भरने में खर्च कर रहा हूं यदि उसकी आधी भी नौकरी पाने के लिए करूं तो नौकरी मिल सकती है। उनकी बात कुछ समझ में आयी और मैं नए सिरे से नौकरी की खोज में लग गया। उसके लिए हर दूसरे दिन रोजगार कार्यालय जाने लगा।

दिन बीतते रहे और नौकरी दूर भागती रही। आखिर एक दिन किसी ने बताया कि 'फूड कॉर्पोशन ऑफ इण्डिया' में लेबरर्स की भर्ती होने वाली है। उसके लिए झखरकटी रोजगार कार्यालय में रजिस्ट्रेशन आवश्यक था। वहीं से लेबरर्स की वेकेंसी जाती थीं। मैं और इकराम आठवीं की सार्टिफिकेट ले गन्दे पायजामे-कमीज में जा पहुंचे वहां। क्लर्क को सन्देह हुआ हमारी शैक्षणिक योग्यता पर। आखिर हमें शपथ लेनी पड़ी कि हम आठवीं ही पास हैं। रजिस्ट्रशन तो हुआ, लेकिन हम 'फूड कॉर्पोरेशन' से कॉल लेटर की प्रतीक्षा ही करते रहे।

अंतत: लंबी बेकारी के बाद 17 अप्रैल,1973 को मुझे रक्षा लेखा विभाग में नौकरी मिली। आर्डनैंस फैक्ट्री कानपुर में पोस्टिंग हुई। नौकरी लगते ही पढ़ने की दबी ललक पुन: उभरी और मैंने डी.बी.एस. कॉलेज गोविन्दनगर में सुबह शिफ्ट में बी.ए. में प्रवेश ले लिया। मात्र चार दिन ही कॉलेज गया कि मेरा स्थानान्तरण आर्डनैंस फैक्ट्री, मुरादनगर कर दिया गया। कानपुर से उखड़कर 31 अक्तूबर, 1973 को मुरादनगर पहुंचा। संयोग से उसी वर्ष कानपुर विश्वविद्यालय ने प्राइवेट परीक्षा की खुली छूट दे दी थी। लेकिन विश्वविद्यालय क्षेत्र में रहने की शर्त भी थी। जिसके लिए प्रमाण-पत्र देना होता था। यह काम भाई साहब ने संभाला। मैं कानपुर जाकर फॉर्म भरता रहा और किताबों से भरी अटैची उठाए मुरादनगर पहुंचता रहा। वहां फैक्ट्री होस्टल में रहता था, जो जंगल में है। पढ़ने को भरपूर एकान्त मिला। दफ्तर में न के बराबर काम था जिसका मैंने उपयोग किया। परिणामत: एम.ए. (हिन्दी) में 1976 में विश्वविद्यालय में जो बीस विद्यार्थी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए उनमें मैं एक था। उन दिनों कानपुर विश्वविद्यालय से चार सौ कॉलेज संम्बध्द थे। सबसे अधिक प्रसन्नता इस बात की थी कि मैं डी.ए.वी. कॉलेज कानपुर से सम्मिलित हुआ था और उस वर्ष वहां से मैं ही एकमात्र प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाला छात्र था। यह 1976 की बात है। इसी वर्ष दिसम्बर में पुखरांया (कानपुर) डिग्री कॉलेज में हिन्दी लेक्चरर के साक्षात्कार में शामिल हुआ। मैं चुना गया। लेकिन,जैसा कि बाद में ज्ञात हुआ, कॉलेज के चेयरमैन, जो कानपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति थे एक लड़की में रुचि रखते थे। बोर्ड निरस्त हुआ और वहां अगले तीन वर्ष तक कोई नहीं चुना गया। दिल्ली के भी कई कॉलेजों में अभ्यर्थी रहा, लेकिन जानता था कि केवल याग्यता ही ऐसी जगहों के लिए पर्याप्त नहीं होती। जो मुख्य योग्यता चाहिए थी वह मुझमें नहीं थी और मैं किसी कॉलेज में नहीं चुना जा सका। इस विषय पर आधारित कहानी 'चेहरे' 1988 में लिखी थी, जो 'सम्बोधन' और 'सण्डे मेल' में प्रकाशित और चर्चित हुई थी। मेरे 'नटसार' उपन्यास का केन्द्रीय विषय ही विश्वविद्यालय की राजनीति है जिसे मैंने श्यामल राय उर्फ बेबे के माध्यम से कहा है। प्राध्यापकों की राजनीति,अवसरवाद और लम्पटता के साथ साहित्य और पत्रकारिता में व्याप्त राजनीति और अवसरवाद को भी इसमें चित्रित किया गया है। शायद प्राध्यापक न बनना मेरे हित में रहा। मेरी नौकरी की चुनौतियां सदैव मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती रहीं। वह एक ऐसा नर्क था जिससे मुक्ति के लिए 1976 के बाद से ही मुझमें छटपटाहट थी, लेकिन मध्यवर्गीय जीवन की विवशताओं ने 30 नवम्बर, 2003 को वह अवसर प्रदान किया। अवकाश ग्रहण के छ: वर्ष रहते हुए मैंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। उसके बाद मैंने निरंतर कार्य किया और वह किया जो मैं करना चाहता था। महान रूसी उपन्यासकार लियो तोल्स्तोय के अंतिम और अप्रतिम उपन्यास -'हाजी मुराद' का अनुवाद किया, जिसका अनुवाद हिन्दी में पहले कभी नहीं हुआ था। 'शहर गवाह है' और 'गुलाम बादशाह' उपन्यास लिखे।'दॉस्तोएव्स्की के जीवन के अछूते पक्षों पर केन्द्रित मौलिक दृष्टिकोण से उनकी जीवनी - 'दॉस्तोएव्स्की के प्रेम' लिखा। 'हाजी मुराद' के अनुवाद पर वरिष्ठ कथाकार ज्ञानरंजन ने लिखा - ''अप्रतिम''। लेकिन इस 'अप्रतिम' को अपने सलाहकार के सुझाव पर 'किताबघर' ने पन्द्रह दिनों के अंदर वापस कर दिया था। एक मित्र की सलाह पर मैंने इसके एक अंश के साथ 'संवाद प्रकाशन' के आलोक श्रीवास्तव को पत्र लिखा। उससे पहले उनसे मेरा संपर्क नहीं था। आलोक ने पूरा उपन्यास पढ़ने की इच्छा जाहिर की। पढ़कर उसे तुरंत प्रकाशित करने का निर्णय किया। 'दॉस्तोएव्स्की के प्रेम' उनके आग्रह पर ही लिखी गयी और संवाद से ही प्रकाशित हुई। संवाद ने उत्कृष्ट विश्व साहित्य का अनुवाद प्रकाशित कर प्रकाशन की दुनिया में नए कीर्तिमान स्थापित किया है। पिछले दिनों मैंने तोल्स्तोय के परिवारजनों, मित्रों, लेखकों, रंगकर्मियों आदि के उन पर लिखे उनतीस संस्मरणों का अनुवाद किया जो संवाद प्रकाशन से शीध्र ही प्रकाश्य है।

यद्यपि एम.ए. के बाद मैंने पी-एच.डी. करने का निर्णय किया, तथापि अनेक प्रयासों के बावजूद कोई निर्देशक नहीं मिला। जिससे भी मिला उसका एक ही उत्तर रहा, आपने प्राइवेट एम.ए. किया है, शोध नहीं कर पायेंगे। प्राइवेट परीक्षार्थी होना मेरी अयोग्यता बन गया था...... प्रथम श्रेणी योग्यता न बन सकी। यही नहीं जो निर्देशक तैयार भी होते वे पैसों की मांग करते। अपने अधीन रजिस्टे्रशन करवाने और पी-एच.डी. पूरी करवाने के तीन हजार से पांच हजार तक की मांग की गयी। कानपुर क्राइस्टचर्ज कॉलेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष (शायद बालमुमुन्द गुप्त) ने पांच हजार रुपयों की मांग की, जबकि मोदी कॉलेज के तत्कालीन विभागाध्यक्ष बाजपेई ने तीन हजार पंजीकरण के अतिरिक्त प्रतिवर्ष एक हजार रुपयों की मांग की थी। हिन्दी के नाम पर हो रही लूट से मैं हत्प्रभ था। लेकिन बहुत प्रयास के बाद कानपुर विश्वविद्यालय में कार्यरत अपने मित्र श्री डी.पी. शुक्ल के माध्यम से मेरी यह समस्या सुलझ गयी थी। कानपुर के डी.वी.एस. कॉलेज के रीडर डॉ. बैजनाथ त्रिपाठी इस शर्त पर अपने अधीन मेरे पंजीकरण के लिए तैयार हुए कि वह मेरी कोई सहायता नहीं करेंगे.... सब कुछ मुझे स्वयं ही करना होगा और वह मैंने सफलतापूर्वक किया भी। 1985 में पी-एच.डी. की डिग्री मिलने के बाद 'रविवारीय हिन्दुस्तान' में मैंने लंबा आलेख लिखा इस लूट और प्राध्यापकों के नैतिक-चारित्रिक पतन के विषय में। अपने छात्रों का कितना शोषण करते हैं ये प्राध्यापक (अधिकांश) कि जानकर सिर शर्म से झुक जाता है। यदि शोध विद्यार्थी लड़की हुई तब शोषण पराकाष्ठा पर पहुंचने की संभावना रहती है।

1977 में मुरादनगर के कुछ साहित्यकार मित्रों के सम्पर्क में आया। वे एक साहित्यिक संस्था 'विविधा' चलाते थे, जिसमें कथाकार सुभाष नीरव और प्रेमचन्द गर्ग मुख्य थे। मैं उसकी गोष्ठियों में शामिल होने लगा। बड़ा उत्साह था उन लोगों में। मुझमें सोया साहित्यकार अंगड़ाई लेने लगा था। उन दिनों मेरे द्वारा प्रस्तुत -'समसामयिक परिप्रेक्ष्य में यशपाल के कथासाहित्य का अनुशीलन' शोध-विषय डॉ. विजयेन्द्र स्नातक की अध्यक्षता में हुई विद्वत परिषद की बैठक में निरस्त हो चुका था। मैं दूसरे विषय की खोज में था। इसी खोज के दोरान मैं कानपुर के प्रसिध्द विद्वान-समाजशात्री और उन दिनों 'कंचनप्रभा' पत्रिका के सम्पादक शम्भूरत्न त्रिपाठी के सम्पर्क में आया। कंचनप्रभा के कार्यालय में ही मेरी मुलाकात गीतकार विजयकिशोर मानव से हुई जो उन दिनों दैनिक जागरण का रविवारीय परिशिष्ठ देखते थे। वहीं मेरी पहली मुलाकात कानपुर के वरिष्ठ कथाकार राजेन्द्र राव से हुई थी। वह मुझे पहले से ही जानते थे जबकि एक कथाकार के रूप में तब तक मेरी कोई पहचान नहीं थी। मुझे बाद में ज्ञात हुआ कि उन दिनों कानपुर में मेरी चर्चा मेरी तब तक छुटपुट प्रकाशित रचनाओं के कारण नहीं बल्कि एक प्राइवेट छात्र के रूप में एम.ए. में प्रथम श्रेणी प्राप्त करने के कारण थी। त्रिपाठी जी मेरे मुक्त प्रशंसक थे। वह मात्र ग्रेजुएट थे लेकिन उनके द्वारा लिखी समाजशास्त्र की पुस्तकें विश्वविद्यालय में पढ़ाई जा रही थीं। यही नहीं वे हिन्दी-साहित्य मर्मज्ञ भी थे। उन्होंने मुझे कई शोध विषय सुझाए, लेकिन वे इतने शास्त्रीय थे कि मैंने उनपर कार्य करने में अपने को असमर्थ पाया। अंतत: 'प्रतापनारायण श्रीवास्तव के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रस्तुत मेरा विषय स्वीकृत हो गया था। 'विविधा' से जुड़ने के बाद मेरे लेखन में तेजी आई थी। कुछ रचनाएं इतस्तत: प्रकाशित भी होने लगी थीं।

मुरादगर छोटी-सी जगह है जहां केवल आर्डनैंस फैक्ट्री और उसका ही एस्टेट है। 'विविधा' के तीन मित्र सुभाष नीरव, सुधीर अज्ञात और सुधीर गौतम दिल्ली में नौकरी करते थे। ये लोग विभिन्न पुस्तकालयों के सदस्य थे। वहां रहते हुए इनके माध्यम से मुझे अनेक हिन्दी और विदेशी लेखकों को पढ़ने का अवसर मिला। 'सारिका', 'धर्मयुग', 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' आदि पत्रिकाएं भी इन्हीं लोगों ... विशेषरूप से नीरव के माध्यम से मुझे मिलती थीं। विविधा के दो सदस्य - सुभाष नीरव और मुझे छोड़कर शेष सभी अपनी-अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो जाने के कारण साहित्य से दूर हो गए। इस संस्था का बार-बार उल्लेख मैं इसलिए करता हूं कि मैं आज जो भी हूं उसमें इसकी महत भूमिका स्वीकार करता हूं।

शोध के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के तत्कालीन हिन्दी विभागाध्यक्ष से विश्वविद्यालय के केन्द्रीय पुस्तकालय की सदस्यता के लिए विशेष अनुमति प्राप्त कर मैं वहां का सदस्य बना। मारवाड़ी पुस्तकालय, चांदनी चौक, दिल्ली के पुस्तकालयाध्यक्ष कल्याण पारीख ने न केवल सहजता से सदस्यता प्रदान की बल्कि सुधा, माधुरी आदि पुरानी पत्रिकाओं के अंक साथ ले जाने की अनुमति भी प्रदान की थी, जिसकी अनुमति कोई पुस्तकालय नहीं देता।

1979 में मेरी पहली कहानी माक्र्सवादी पत्र 'जनयुग' में प्रकाशित हुई। जून 1979 में शादी के बाद से अक्टूबर 1980 तक मैं गाजियाबाद रहा। 11 अक्टूबर,1980 को मैं शक्तिनगर, दिल्लीं शिफ्ट हुआ, जहां से 3 अगस्त, 2003 को सादतपुर के अपने मकान में आया। दिल्ली में एक ही मकान में मकान मालिक से बिना किसी विवाद के इतने लंबे समय तक रह लेना मेरे जीवन की उल्लेखनीय घटना है। उल्लेखनीय इस अर्थ में क्योंकि यदि मुझे प्रतिवर्ष मकान बदलते रहना पड़ता तो मैं जितना लिख सका उतना शायद ही लिख पाता। एक अन्य कारण से भी यह महत्वपूर्ण है। हम पति-पत्नी नौकरीपेशा थे और बच्चों की सुरक्षा की दृष्टि से इससे अधिक उपयुक्त मकान मिलना कठिन था। मुझे सदैव मकान मालिक सोमनाथ रतन का सहयोग मिलता रहा। इस मकान में रहते हुए मैंने जमकर लिखा- कहानियां, उपन्यास, बाल कहानियां, लघुकथाएं, आलेख, निपोर्ताज, यात्रा संस्मरण, संस्मरण, समीक्षाएं, साक्षात्कार आदि।

यद्यपि पहली पुस्तक यत्किंचित (कविता संग्रह) मैंने और नीरव ने मार्च,1979 में अपने खर्च से संयुक्त रूप से प्रकाशित करवायी थी, जिसे पढ़कर डॉ. हरिबंशराय बच्चन ने मुझे लिखा था, ''मुझमें कवि बनने की प्रतिभा नहीं....कुछ भी बन सकते हो, लेकिन कवि नहीं बन सकते।'' मैंने स्वयं अनुभव किया कि उनका कथन सच था। उसके बाद मैंने कविताएं नहीं लिखी। मैंने अपना ध्यान कथा-साहित्य पर केन्द्रित किया। उन्हीं दिनों मैं प्रसिध्द बालसाहित्यकार डॉ. राष्ट्रबंन्धु के सम्पर्क में आया और कहानियों के साथ बाल कहानियां भी लिखने लगा। अब तक मेरे दस बाल कहानी संग्रह और तीन किशोर उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। हालांकि अब बाल कहानियां लिखना स्थगित हो चुका है वैसे ही जैसे लघुकथा।


1982 में मेरा पहला बाल कहानी-संग्रह 'राजा नहीं बनूंगा' प्रकाशित हुआ। किसी प्रकाशक से प्रकाशित होने वाली यह मेरी पहली कृति थी। 1983 में 'किताब घर' से 'अपराध:समस्या और समाधान' (अपराध विज्ञान) पुस्तक प्रकाशित हुई। वहीं से मेरा पहला कहानी-संग्रह -'पेरिस की दो कब्रें' 1984 में प्रकाशित हुआ। पुस्तकों के प्रकाशन का जो सिलसिला प्रारंभ हुआ वह बदस्तूर जारी है। अब तक मेरी 42 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें सात उपन्यास, बारह कहानी-संग्रह, तीन किशोर उपन्यास, यात्रा संस्मरण, आलोचना, लघुकथा-संग्रह, अनुवाद, जीवनी, आदि हैं। पांच पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य हैं, जिनमें एक कहानी-संग्रह (भीड़ में), अनुवाद, उपन्यास, संस्मरण (यादों की लकीरें - भाग एक) और साहित्यकारों के साक्षात्कारों की पुस्तक (शब्दशिल्पियों के साथ) हैं।

रेणु ने अपने पात्रों के विषय में अपने एक कहानी संग्रह की भूमिका में लिखा कि उनके पात्र उनके जीवन से किसी न-किसी रूप में जुड़े रहे हैं। अर्थात उन्होंने उन पात्रों को ही केन्द्र में रखकर लिखा जिन्हें वे जानते थे। मुझे भी यह कहते हुए अच्छा लग रहा है कि अधिकांशतया मेरे पात्र मेरे जाने-पहचाने ही हैं। लेकिन भोगे हुए यथार्थ के साथ देखे या पढ़े यथार्थ को भी अपने अन्दर जीने के बाद मैंने सफलतापूर्वक लिखा। मेरी 'भेड़िए' 'सड़क' 'खाकी वर्दी' जैसी अनेक कहानियां इसीप्रकार की हैं। लेकिन मेरे सभी उपन्यास तथा आदमखोर, पापी, हारा हुआ आदमी, उनकी वापसी, आखिरी ख़त' आदि कहानियां जाने-पहचाने चरित्रों पर ही लिखी गयी हैं। मेरी 'क्रान्तिकारी' कहानी, जो स्व. सत्येन कुमार की पत्रिका 'कहानी मासिक चयन' में 'और क्रान्ति शुरू हो गयी' शीर्षक से प्रकाशित हुई थी, के प्रकाशित होते ही बवाल मच गया था। मेरी रिश्तेदार स्व. शीला सिध्दान्तकर ने आरोप लगाया कि यह कहानी उनके पति को लेकर लिखी गयी थी। उन्होंने मुझे मरवाने की धमकी दी। मैंने जानना चाहा था कि कहानी के मुख्य पात्र शान्तनु को वास्तव में क्या उन्होंने पहचान लिया था जिसकी शातिर कारगुजारियों को मैं आज तक पकड़ नहीं पाया। मैंने जब-जब उसे पकड़ने का प्रयास किया और उसे केन्द्र में रख कोई रचना लिखी वह आगे इतना कुछ कर जाता रहा कि लगा कि वह फिर मेरे हाथ से फिसल गया।

प्राघ्यापन की दुनिया में अनेक ऐसे लोग हैं जो दिन में माक्र्सवाद का लबादा ओढ़े रहते हैं और रात के अंधियारे में सत्ता के गलियारे में घूमते दिखाई देते हैं। ये सुविधाभोगी छद्म माक्र्सवादी लोग हैं और माक्र्सवाद इनके लिए सुविधा-सम्पन्नता प्राप्त करने का साधन होता है। शीला सिध्दान्तकर भी अपने को माक्र्सवादी कहती थीं। लेकिन 'ये' लोगों का इसप्रकार इस्तेमाल करने में माहिर थे कि शोषण की पराकाष्ठा तक जिसका इस्तेमाल करते वह उफ तक न कर पाता। मैंने इस्तेमाल होने से इंकार किया और इन लोगों ने मेरे विरुध्द षडयंत्र प्रारंभ कर दिए जो मुझे तबाह करने के लिए पर्याप्त थे। मैं बचा यह मेरा भाग्य ही था (इस पर फिर कभी विस्तार से)। आज मुझे लगता है कि शीला जी तो अपने पति का मोहरा मात्र थीं।

यह बात अगस्त 1981 की है। उस समय मैंने इन लोगो की तुच्छ महत्वांक्षाओं के विषय में लोगों (अपने रिश्तेदारों) को आगाह किया था लेकिन हुआ उल्टा..... मेरे ससुराल पक्ष के सभी लोगों ने मुझे ही कटघरे में खड़ा कर दिया था। कहा गया कि यह सब मैं उनसेर् ईष्यावश कह रहा था। मैं अलग-थलग पड़ गया। लेकिन मार्च, 2001 में मेरा कहा जब सच साबित हुआ तब उन सबके के पास हाथ मसलने के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं बचा था। पति के साथ षडयंत्र कर शीला जी ने अपने पिता के कानपुर के लाटूश रोड स्थित चार सौ वर्ग गज में बने मकान (जिसकी कीमत आज दो करोड़ से अधिक होगी) की वसीयत छद्म रूप से पिता से अपने नाम करवा ली थी और आठ भाई-बहन देखते रह गए थे। हालांकि वह उस मकान का कुछ कर पातीं उससे पहले ही कैंसर से उनकी मृत्यु हो गयी थी। लेकिन वह वसीयत आज भी उनके पति ने सहेज रखी है। संभव है कभी भविष्य में उसका उपयोग हो।

मेरे रिश्तेदारों ने जितना माानसिक कष्ट मुझे पहुंचाया, मेरे कुछ मित्रों ने उससे अधिक पहुंचाने का प्रयत्न किया। मेरे एक साहित्यिक मित्र मेरे उपन्यास 'रमला बहू' (1994 किताबघर) के प्रकाशन से इतना विचलित हुए कि उन्होंने मेरे प्रकाशकों को मेरे विरुध्द भड़काना प्रारंभ कर दिया। इन मित्र की किस रूप में मैंने सहायता की थी यह बताना भारतीय संस्कृति के विरुध्द है। मेरे दो प्रकाशकों को भड़काने में वह सफल भी रहे, लेकिन इसका मुझे लाभ ही हुआ। यह मेरे लिए एक बड़ी चुनौती थी। मैं निरंतर लिख रहा था यही उनके लिए कष्ट का कारण था। अपनी पुस्तकों के लिए मैंने नए प्रकाशक खोजे और आश्चर्यजनक रूप से उसके पश्चात मैं अनेक प्रकाशकों के संपर्क में आया। अब तक मेरी पुस्तकें चौदह प्रकाशकों से प्रकाशित हो चुकी हैं। यह सिलसिला जारी है।

एक उदाहरण और। मेरा उपन्यास 'पाथर टीला' अक्टूबर,1998 में प्रकाशित हुआ। प्रकाशक उस पर विचार-गोष्ठी करवाना चाहते थे। मेरे एक अन्य साहित्यिक मित्र ने सामयिक प्रकाशन, जहां से उपन्यास प्रकाशित हुआ था, के महेश भारद्वाज को तीन बार फोन करके उपन्यास पर विचार-गोष्ठी न करवाने के लिए कहा, लेकिन महेश के अनुसार -''जितना ही वह फोन कर विचार-गोष्ठी न करवाने के लिए कहते उतना ही मैं उसे करवाने के लिए दृढ़-संकल्प होता।'' साहित्य में मेरे विरुध्द चलने वाली दुरभिसंधियों ने मुझे कमजोर नहीं बल्कि मजबूत किया। मैं निरंतर कार्यरत हूं और जीवन के अंतिम क्षण तक कार्य करना चाहता हूं। चाहता हूं कि एक ऐसा उपन्यास लिख सकूं जो मेरे नाम का पर्याय बन सके। कुछ मित्रों का मानना है कि यह काम 'पाथर टीला' ने पूरा कर दिया है। लेकिन मुझे संतोष नहीं है। 'खुदीराम बोस' के प्रकाशित होते ही यूनीवार्ता ने उस पर विशेष फीचर प्रकाशित करवाया जो एक साथ एक ही दिन देश के कई सौ समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ। कहा गया कि 'खुदीराम बोस' पर हिन्दी में वह पहला उपन्यास था। मेरा अनुमान है कि आज भी वह पहला ही है। 'पाथर टीला' के विषय में भी हंस में यह लिखा गया कि हिन्दी का यह पहला उपन्यास है जिसमें खलनायक नायक के रूप में चित्रित हुआ है। मेरे उपन्यास 'नटसार' का नायक भी खलनायक ही है।

सफलताओं से मुझे प्रसन्नता होती है लेकिन असफलताओं से मैं निराश नहीं होता। नेपोलियन के बारे में विक्टर ह्यूगो ने अपने उपन्यास 'ले मेजराबल' में लिखा , '' वह आस्थावादी व्यक्ति था, जो सुख में प्रसन्न रहता ओैर दुख में शांत और मानता था कि समय बदलेगा अवश्य ... जो है वही नहीं रहेगा।'' उसकी यह बात मुझे बल देती है।
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शुक्रवार, 4 मार्च 2011

यादों की लकीरें (भाग दो)


संस्मरण (5)

होस्टल, मथाई सी.जे. और फिरकी

रूपसिंह चन्देल

कानपुर की भव्य बाजारों में से एक गुमटी नंबर पांच। साफ सड़क,चमकती दुकानें और दुकानों पर बैठे और खरीददारी करते साफ-सुथरे चमकदार चेहरे। यह पंजाबी बाहुल्य क्षेत्र है। अधिकतर पाकिस्तान से आए लोग और उन्हीं का व्यवसाय है यहां। पास ही जी.टी.रोड पर सफेद संगमरमर का चित्ताकर्षक गुरुद्वारा है। हालांकि आज न तब जैसी चमकदार सड़क रही न दुकानें....... बढ़ती आबादी और राजनैतिक भ्रष्टाचार ने जब कानपुर शहर के अन्य क्षेत्रों को नर्क में तब्दील होते देने में कोई कमी नहीं छोड़ी तब गुमटी नंबर पांच की बाजार अपने को सुरक्षित कैसे रख सकती थी। लेकिन 1969-70 में ऐसा नहीं था। उन दिनों मैं आई.टी.आई. का छात्र था और मेरे प्रशिक्षण का समय था दोपहर दो बजे से शाम छः तक। इंस्टीट्यूट जे.के. मंदिर के पश्चिम ओर गुमटी नंबर पांच (जिसे कानपुर के लोग केवल गुमटी कहते हैं) पूर्व ओर अवस्थित है। प्रायः इंस्टीट्यूट से निकल मैं अकेले या किसी प्रशिक्षु के साथ जे.के. मंदिर की दीवार पर जा बैठता और साफ-शफ़्फ़ाक़ परिधानों में लिपटे स्त्री-पुरुषों और बच्चों को आते-जाते देखता रहता। अकेले होता तब भविष्य के सपने बुनता हुआ घण्टों बिता देता, जो मुझे अंधकारमय प्रतीत होता था। उन दिनों मैं युवावस्था की दहलीज पर कदम रख रहा था। भविष्य के ढेरों सपने थे और चारों ओर फैले तिमिर में उन्हें पकड़ कैसे मुट्ठी में कैद किया जाए यही मेरे सोच की उड़ान होती थी।
लेकिन जब साथ में कोई साथी होता तब बातों के विषय क्या होते अब याद नहीं, लेकिन स्पष्टतया कोई गंभीर मुद्दे नहीं ही होते थे। अध्ययन बहुत सीमित था और पत्र-पत्रिकाओं से न के बराबर परिचय हुआ था। विज्ञान से ग्यारहवीं करके एक वर्ष जानवरों के सान्निध्य में खेत-जंगल भटकने के बाद तय पाया गया था कि ग्रेजुएशन-पोस्ट ग्रेजुएशन के बजाय कोई प्रोफेशनल कोर्स किया जाए जिससे बड़े परिवार की गाड़ी सहजता से खींचने में बड़े भाई के साथ मैं भी अपना कंधा दे सकूं। स्थितियों को कम उम्र से ही समझने लगा था और मन में यह संकल्प भी था कि जीवन में कुछ करने के लिए स्वावलंबी होना ही पड़ेगा।

मैंने जुलाई 1969 में इंस्टीट्यूट में प्रवेश लिया। वह प्रवेश भी उतना आसान न रहा होता यदि भाई साहब के एक सहयोगी ने सहायता न की होती। भाई साहब हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड में प्रशासन विभाग में थे और शायद नियुक्तियां देखते थे। जिन सहयोगी की बात की, उनकी नियुक्ति भी भाई साहब के माध्यम से हुई थी। उससे पहले वह इंस्टीट्यूट से किसी रूप में संबद्ध रहे थे। उनकी संबद्धता मेरे काम आयी थी। काम इसलिए कि मेरी शैक्षणिक योग्यता तब हाईस्कूल थी जबकि वहां इतनी कम योग्यता का कोई अभ्यर्थी नहीं था। सभी ग्रेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट थे। लेकिन मुझे इस बात का लाभ मिला था कि जिस प्रशिक्षण के लिए मैंने आवेदन किया था उसके लिए निम्नतम अर्हता हाईस्कूल ही थी।

चालीस छात्रों की क्लास में मैं एक मात्र हाईस्कूल, जिसकी अंग्रजी माशा-अल्लाह। जब कुछ छात्र अंग्रेजी में बातें करते तब मैं उनके चेहरे देखता और मन ही मन यह संकल्प करता रहता कि मुझे उस कोर्स में उत्तीर्ण होना ही है। कोर्स की पढ़ाई का माध्यम अंग्रजी.......इंस्ट्रक्टर आता, लेक्चर देता और चला जाता। आधा पल्ले पड़ता और आधा नहीं। मैंने कठोर श्रम किया और परीक्षा में चालीस में से जो सात छात्र उत्तीर्ण हुए उनमें से एक मैं भी था।

इंस्टीट्यूट में प्रवेश मिलने के बाद समस्या आई रहने की। भाई साहब वहां से 15-16 किलोमीटर दूर रहते थे। वहां से प्रतिदिन आने-जाने की समस्या का समाधान उन्होंने खोज निकाला। शस्त्रीनगर की लेबर कॉलोनी में इंस्टीट्यूट का होस्टल था। उन्होंने पुनः अपने सहयोगी की सेवाएं लीं और मुझे होस्टल में एकमोडेशन मिल गया। दो मंजिला कॉलोनी है वह। इंस्टीट्यूट ने होस्टल के लिए पूरा एक ब्लॉक ले रखा था.... शायद सोलह फ्लैट्स का। मुझे भूतल का फ्लैट मिला। दो बड़े कमरें-बड़ा आंगन। दो तख्त और एक मेज। एक सप्ताह ही बीता था कि एक दिन सुबह किसी ने दरवाजा खटखटाया। दरवाजा खोला तो पांच फुट चार इंच लंबा, चमकती आंखों, सुतवां नाक, चपटे गाल, और गहरा कृष्णवर्णी एक युवक सामने खड़ा था जिसने मोती जैसे चमकते दांतों में मुस्कराते हुए कहा, ‘‘मैं मथाई सी.जे......मुझे यह फ्लैट एलाट हुआ है।’’

‘‘हां, हां ....अंदर आ जाओ।’’ मैं उसका सामान उठाने के लिए आगे बढ़ा, जिसके लिए उसने मुझे रोक दिया। मैं जानता था कि एक न एक दिन मेरे साथ रहने के लिए कोई आएगा ही। दूसरे फ्लैट्स में दो-तीन छात्र रह रहे थे.... और आधे से अधिक छात्र पुराने थे।

मथाई अपना सामान अंदर ले आया तो मैंने दरवाजा बंद कर दिया। मैंने खिड़की के साथ के तख्त पर आसन जमा रखा था। सामने के तख्त की ओर इशारा कर बोला, ‘‘उस पर बिस्तर लगा लो।’’

‘‘वह शाम को करूंगा। अभी इंस्टीट्यूट जाना है।’’ मथाई ने कुछ सामान तख्त के नीचे फेका, कुछ कमरे में बने टॉल पर और पूछा, ‘‘आप कब तक लौटते हैं ?’’

‘‘साढ़े छः बजे तक।’’

‘‘ताले की डुप्लीकेट ’की’ है?’’

‘‘है।’’ मैंने दूसरी चाबी उसे दे दी।

मैंने नोट किया कि वह जब मुस्कराता, जीभ दांतो से लगा लेता। यद्यपि उसका हिन्दी बोलने का लहजा केरलाइट था, लेकिन हिन्दी वह अच्छी बोल-समझ लेता। उसने मुझे बताया कि उसने बाकायदा स्कूल में हिन्दी पढ़ी और परीक्षा उत्तीर्ण की थी।

मथाई के प्रशिक्षण का समय सुबह नौ बजे से शाम छः बजे था। वह इलेक्ट्रिकल में डिप्लोमा कर रहा था। हम दोनों अलग भोजन पकाते। वह स्टोव में प्रायः मसूर की लाल दाल और सेला चावल पकाता जिसका माड़ निकाल देता। दाल वह दोनों वक्त के लिए सुबह ही पका लेता। वह साढ़े आठ बजे पका-खाकर चला जाता। उसके जाने के बाद मैं अपनी बुरादे की अंगीठी सुलगाता।

एक दिन किसी रविवार मथाई ने साग्रह लंच के समय मुझे अपनी दाल सेवन के लिए दी। दाल खाकर मैं हतप्रभ था। इतना स्वादिष्ट...। दाल में वह मसालों का भरपूर प्रयोग करता। उसकी दाल का स्वाद आज भी मैं अनुभव करता हूं। वह छौंकर सीधे भगौने में पकाता था। उस जैसी मसूर की दाल पकाने की मैंने कितनी ही बार कोशिश की, लेकिन वह स्वाद नहीं मिला।

रात पढ़ने के लिए मेज का उपयोग मथाई करता। मेरा तख्त खिड़की के साथ था, इसलिए पढ़ते समय मेरा चेहरा सामने दीवार की ओर और पीठ खिड़की की ओर होते। खिड़की के बाहर सड़क थी जो हर समय चलती रहती थी। सड़क के उस पार एक और ब्लॉक था। उस ब्लॉक में मेरे फ्लैट के सामने प्रथम तल के फ्लैट की खिड़की पूरे समय खुली रहती। मेज पर जब मथाई का कब्जा होता, उसका चेहरा खिड़की की ओर होता और पढ़ते हुए भी उसकी नजरें सड़क पार सामने ब्लॉक के उस खुली खिड़की पर टिकी होतीं। बीच-बीच में मथाई कभी किसी हिन्दी फिल्म तो कभी किसी मलयाली फिल्म का गाना गुनगुनाता रहता। जब वह गाना गुनगुनाता, मेरी नजर सामने वाले फ्लैट की खिड़की की ओर उठ जाती। उस कमरे में उनतीस-तीस वर्षीया एक सुन्दर लंबी युवती इधर-उधर आती-जाती दिखाई देती। युवती इतनी तेजी से उस कमरे में आती-जाती कि मथाई ने उसे फिरकी नाम दे दिया। कभी ही वह खिड़की के सामने खड़ी होती, लेकिन जब भी खड़ी होती मथाई के गाने की आवाज कुछ ऊंची हो जाती, लेकिन इतनी भी नहीं कि वह सड़क पार दूर उस फ्लैट की खिड़की तक जा पहुंचती। कभी-कभी वह युवती चार-पांच वर्ष की अपनी बेटी को दुलारती दिखाई देती। उस क्षण मथाई गाता नहीं था.....एकटक उधर देखता रहता था।

‘‘ये है कौन?’’ एक दिन उसने मुझसे पूछा।

‘‘जाकर पता कर लो।’’

‘‘उंह....।’’ वह खिलखिला उठा।

लेकिन उसे यह जानने के लिए अधिक दिन प्रतीक्षा नहीं करना पड़ा। एक दिन उस कमरे में उस युवती की ही उम्र का सरदार युवक दिखा तो उसने मेरा ध्यान खींचते हुए कहा, ‘‘रूपसिंह, वह सरदारिनी है।’’

मैंने देखा युवक सरदार भी सुन्दर था।

मथाई सी.जे. मुझसे दो वर्ष बड़ा था और उस आयु की उस स्वाभाविक चंचलता के अतिरिक्त उसमें कोई ऐब नहीं था। हॉस्टल में वह किसी अन्य से संबन्ध नहीं रखता था। उसकी सीमित दुनिया थी जो कानपुर के कुछ केरलवासियों तक ही सीमित थी। लेकिन वे लोग होस्टल नहीं आते थे। मथाई ही उनके यहां जाता। उसकी बड़ी बहन कानपुर के अकबरपुर तहसील में फेमिली प्लानिगं से संबद्ध थी और शायद नर्स थी। कभी-कभी वह अपने उस छोटे भाई से मिलने अपने फील्ड आफीसर के साथ, जो एक केरलाइट ब्राम्हण था, मोटरसाइकिल पर आती थी। फील्ड आफीसर लंबा-हट्टा कट्टा, गोरा और खूबसूरत व्यक्ति था..... जिसकी आयु तीस से पैंतीस के मध्य थी। सी.जे. की बहन दुबली-पतली भाई की भांति गहरी श्यामवर्णी सत्ताइस-अट्ठाइस के आस-पास थी।

मथाई सी.जे. के साथ तीन महीने ही बीते थे कि एक दिन शाम एक और युवक रिक्शे पर टीन का बॉक्स, एक कनस्तर और होल्डाल लादे आया और बोला, उसे भी वह फ्लैट एलाट किया गया है। वह कानपुर के पास औरय्या का रहनेवाला था। हम दोनों ने उसका स्वागत किया। युवक बहुत बातूनी था। उसकी वाचालता से हम विचलित थे, क्योंकि हमारे अपने लक्ष्य थे, जबकि वह लक्ष्यहीन लगा।

‘‘ये हमारी पढ़ाई चौपट कर देगा।’’ मैंने कहा।

‘‘कुछ इलाज करना होगा।’’ मथाई बोला ।

अगले दिन युवक ने कनस्तर से देशी घी और मेवा पड़े आटा के लड्डू हम लोगों को खाने को दिए। बहुत स्वादिष्ट थे।

‘‘किसने बनाए?’’ मैंने पूछा।

‘‘मां ने।’’

‘‘तुम्हारी मां तुम्हे बहुत प्यार करती हैं।’’

युवक भावुक हो उठा, ‘‘बहुत प्यार करती हैं। मैं आना नहीं चाहता था, लेकिन पिता ने जबर्दस्ती इधर ला पटका।’’

‘‘मां का प्रेम होता ही ऐसा है...।’’ मथाई बोला।

युवक की आंखें घुचघुचा आईं।

बतचीत में हम दोनों ने उस युवक को मां के प्रेम के प्रति इतना उकसाया कि तीन या चार दिन बाद ही, ‘‘मैं घर जा रहा हूं.... एक सप्ताह बाद आउंगा।’’ कहकर वह घर चला गया।

उसके जाने पर हमने राहत की सांस ली। एक सप्ताह बाद दो-तीन दिन और बीत गए । वह नहीं लौटा तब हमारी नजरें उसके कनस्तर पर जा टिकीं। लड्डुओं (जिसे वहां पीड़ा कहा जाता है) का स्वाद मुंह में बरकरार था।

एक रात मैं बोला, ‘‘मथाई इसने कनस्तर में ताला डाला हुआ है।’’

‘‘उसके लड्डू खाना चाहते हो?’’ मुस्कराते हुए मथाई बोला।

‘‘चाहता हूं।’’

‘‘तो ताला भी खुल जाएगा।’’ कहता हुआ मथाई आंगन में गया और एक तार लेकर लौटा। उसने उस तार से कनस्तर के छोटे-से ताले को खोल दिया। ताला चिटखनीवाला था, जिसे दबाकर बंद किया जा सकता था। उस दिन के बाद वह तार हमने तब तक संभालकर रखा जब तक उस कनस्तर में पांच-छः लड्डू छोड़ शेष सभी हमारे उदर में नहीं पहुंच गए।

तीन सप्ताह बाद वह युवक लौटा, लेकिन रहने के लिए नहीं....सामान उठा ले जाने के लिए। उसने कनस्तर खोलकर भी नहीं देखा। जिस रिक्शे पर आया था, उसी पर सामान लाद वह चला गया था।

*****

एक दिन मैं शाम साढ़े छः बजे जे.के. मंदिर की दीवार पर बैठा आने-जाने वालों का नजारा ले रहा था। मंदिर के चारों ओर बहुत लंबी-चौड़ी जगह है और पाण्डुनगर और गुमटी की ओर अर्थात मंदिर के पश्चिम-पूर्व गेट हैं। पश्चिमी गेट यानी पाण्डुनगर की ओर का गेट छोटा है, केवल लोगों के आने-जाने के लिए, जबकि उसका मेन गेट गुमटी की ओर है। यह मंदिर सफेद संगमरमर पर निर्मित दिल्ली के बिरला मंदिर की अनुकृति है और उससे कई गुना अधिक भव्य।

मैंने नीचे देखा, मथाई हाथ में डायरी थामे जा रहा था। वह जब भी इंस्टीट्यूट जाता डायरी अवश्य उसके हाथ में होती थी। एक बार पूछने पर उसने बताया था कि इंस्ट्रक्टर की बातें वह उसमें दर्ज करता था और कुछ अन्य आवश्यक बातें भी। मैंने ऊपर से आवाज दी। मुझे मंडेर पर बैठा देख उसके चेहरे पर मुस्कान खिल उठी और दूधिया दांत यमक उठे। उसने हाथ के इशारे से मुझे नीचे आने का संकेत किया। मैंने भी इशारे से ही पूछा -‘‘किसलिए?’’ उसने साथ चलने का इशारा किया। मैं उसके साथ हो लिया। पूछने पर उसने बताया कि वह गुमटी जा रहा था रेस्टॉरेण्ट में इडली खाने।

‘‘तुम्हें इडली पसंद है?’’ उसने पूछा।

‘‘नापसंद नहीं है।’’

वह चुप हो गया। प्रायः ही वह चुप रहता। किसी प्रश्न का उत्तर संक्षेप में देता और जब मैं अघिक बातें करने लगता तब बचने के लिए कोई मलयाली फिल्मी गाना गुनगुनाने लगता। वह मेरा रूममेट था, इसलिए मुझसे बातें करना उसकी विवशता थी, लेकिन न भी होता तब भी मेरा यकीन था कि वह मुझे नापसंद नहीं करता। उसके स्थान पर यदि कोई अन्य युवक मेरे साथ होता तो शायद मैं उतनी पढ़ाई नहीं कर पाता और उस कोर्स में उत्तीर्ण हो पाता कहना कठिन है।

दरअसल वहां हम दोनों और दो-तीन अन्य युवकों को छोड़ शेष सभी उद्दण्ड और बदमाश किस्म के लड़के थे। मेरे पड़ोसी फ्लैट के ऊपरी मंजिल में दो मुसलमान लड़के रहते थे और सुना कि वे कई वर्षों से उसमें रह रहे थे। दो वर्षों के कोर्स में वे चार वर्ष बिता चुके थे। उनकी गतिविधियों से लगता और दूसरें लड़कों में चर्चा भी थी कि दरअसल इंस्टीट्यूट में वे केवल होस्टल के लिए रह रहे थे, जबकि उनके धंधे कुछ और थे । क्या, यह जानने की न मुझे फुर्सत थी न चाहत, लेकिन पड़ोसी बी.एन. कनौजिया, जो मेरे ही क्लास में था और जिसकी ऊपरी मंजिल में वे रहते थे, प्रायः सुबह देर से उठकर आंाखें मलता हुआ बताया करता ‘‘सालों ने रात भर सोने नहीं दिया।’’

‘‘क्यों?’’

‘‘रात एक बजे मैं पढ़ रहा था कि मेरी खिड़की के सामने जीप आकर रुकी। दो लड़कियां और एक लड़का उतरे और ऊपर चले गए। फिर नींद कैसे आती..... रात भर साले धमाचौकड़ी करते रहे और मैं जागता रहा।’’ बड़ी बंटे जैसी आंखें मलता हुआ कनौजिया मुंह बनाकर कहता और अपने सांवले, फूले, चौड़े मुंह में ठठाकर हंस देता। कनौजिया बहुत टिप-टॉप रहता था। अपने को सजाने-संवारने में विशेष ध्यान देता। कानपुर में मैं जब तक रहा, उससे मेरा संपर्क बना रहा था। इंस्टीट्यूट से निकलने के कुछ दिनों बाद ही उसका विवाह हो गया था और उसकी पत्नी को देख मैंने उससे कहा था कि भाभी की शक्ल दीप्तिनवल जैसी है। कनौजिया बहुत प्रसन्न हुआ था।

शादी के कुछ दिनों बाद डी.एम.एस.आर.डी. (डी.आर.डी.ओ. की एक लैब) कानपुर में उसकी नौकरी लग गई थी। स्वैच्छिक सेवावकाश ग्रहण करने से पहले और बाद में कई बार मैं इस लैब के गेस्ट हाउस में ठहरा और ऑफिस के काम से लैब भी गया, लेकिन वहां कनौजिया नहीं मिला। पूछने पर ज्ञात हुआ कि प्रमोशन पाकर वह देहरादून चला गया था।

******

उस दिन शाम सी.जे. मुझे लेकर गुमटी के एक दक्षिण भारतीय रेस्टॉरेण्ट में गया। इडली का आर्डर देकर हम मेज पर बैठ गए। मेरी बगल की मेज पर एक सरदार परिवार बैठा हुआ था। मैं उसे नहीं पहचान पाया, लेकिन सी.जे. ने पहचन लिया। उसने मुझे इशारा किया, लेकिन मैंने उसके इशारे पर ध्यान नहीं दिया। वह कुछ कहना चाहता था, लेकिन कह नहीं पा रहा था। जब मैं कुछ नहीं समझा, उसने मेरा हाथ पकड़ा और बाहर चलने के लिए कहा। मैं समझ नहीं पा रहा था कि बेयरा इडली लेकर आने वाला था और मथाई बाहर जाने के लिए कह रहा था। वह मुझे लेकर आया था और अब .......मैं उसके साथ बाहर आ गया। वह मुझे सड़क पार खींच ले गया।

‘‘मामला क्या है सी.जे.?’’ मैं चीख उठा।

‘‘बाप रे....तुमने देखा नहीं....?’’

‘‘क्या?’’

‘‘बगल की मेज पर ....।’’ उसकी सांस उखड़ी हुई थी।

‘‘बगल की मेज पर ....हां क्या था बगल की मेज पर।’’

‘‘अरे यार....।’’ केरलाइट लहजे में वह बोला, ‘‘फिरकी अपनी बच्ची और हजबैंण्ड के साथ बैठी थी।’’ अब वह प्रकृतिस्थ था।

‘‘धत्तेरे की....।’’ मैंने उसे धौल जमाते हुए कहा।

‘‘किसी दूसरे रेस्टॉरेण्ट में चलते हैं।’’

‘‘होस्टल चलते है। ....बहुत दिनों से तुम्हारे द्वारा पकायी मसूर की दाल नहीं खायी। आज तुम मेरे लिए दाल और चावल पकाओगे।’’

‘‘ओ.के.।’’ वह हंस पड़ा।

अप्रैल का महीना था। पसीना पोछते हम दोनों तीन-चार किलोमीटर का रास्ता पैदल तय करने का निर्णय कर होस्टल लौट पडे़ थे।

*****
जून, 1970 में इंस्टीट्यूट से मेरा वास्ता समाप्त हो चुका था, जबकि सी.जे. को एक वर्ष और वहां रहना था। यद्यपि मैं अक्टूबर 1973 तक कानपुर में रहा, लेकिन इंस्टीट्यूट छोड़ने के बाद सी.जे. से मेरी मुलाकात नहीं हुई। किसी से ज्ञात हुआ था कि इंस्टीट्यूट से निकलने के बाद वह फर्टिलाइजर कार्पोरेशन ऑफ इंडिया में पहले एप्रैण्टिश के रूप में फिर वहीं स्थायी नौकरी पा गया था।

*****

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

यादों की लकीरें

छाया चित्र - बलराम अग्रवाल
संस्मरण

पहला मित्र

रूपसिंह चन्देल

उससे मेरी पहली मुलाकात 1956 के मार्च या अप्रैल में हुई थी । उस वर्ष की होली कलकत्ता में मनाकर माँ के साथ मैं और छोटी बहन गांव लौटे थे । वहां मुझे पढ़ाने के पिता जी और बड़े भाई के सारे उपक्रम व्यर्थ रहे थे और शायद यह भी सोचा गया होगा कि दो वर्ष बाद पिता जी के रिटायर होने पर अंतत: मुझे गांव के स्कूल में ही पढ़ना होगा । गांव से जाने के समय मैं चार वर्ष के आस-पास रहा हूंगा । उस समय उससे मेरे संपर्क की याद मुझे नहीं है । शायद तब वह गांव में था भी नहीं । उसके पिता फौज में थे और परिवार साथ रखते थे । निश्चित ही तब वह पिता के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान घूमता रहा था, लेकिन कलकत्ता से मेरे लौटने पर वह गांव में था गुल्ली-डंडा और कंचे खेलता हुआ । पता चला उसके पिता फौज से अवकाश ग्रहण कर चुके थे ।
उसका एक घर मेरे घर के सामने था (आज भी है) पक्का लिंटलवाला । मेरा मिट्टी की कच्ची इंटों का बना हुआ । उसके घर से सटा हुआ पक्का चबूतरा है , जिसमें एक शिवलिगं है और एक कोने में त्रिशूल गड़ा हुआ है। चबूतरे के पूर्वी छोटे-से हिस्से की फर्श टूट गयी थी जिसमें रेत डाल दी गई थी । मेरे और उसके घर के बीच दस फीट चौड़ी गली है। गली में उसे गांव के किसी न किसी लड़के के साथ कंचे खेलता प्रतिदिन सुबह मैं अपने चबूतरे पर और शाम उसके पक्के चबूतरे पर बैठकर देखता रहता ।

उसका नाम था बाला ... बाला प्रसाद त्रिवेदी । बड़ी ऑंखें, गोल चेहरा, तांबई रंग और हृष्ट-पुष्ट शरीर । जैसा वह बचपन में था वैसा ही अपनी अंतिम मुलाकात में मैंने उसे देखा था। वह मुझे खेलने के लिए बुलाता, लेकिन मैं खेलता नही । खेलने में मेरी रुचि नहीं थी। निठल्ला मैं उसे खेलते देखता और यहीं से हमारी मित्रता प्रारंभ हुई थी। मेरे घर के सामने उसका जो घर था, वह दो हिस्सों में बटा हुआ था। उसका आधा भाग उसके मंझले ताऊ के पास था और आधे में उसके पिता रहते थे। मेरे घर के सामने की गली से मुड़ती एक और संकरी गली है, उसमें पचास कदम पर उसका एक और मकान था, जिसमें वह अपनी माँ, विधवा बुआ और भाई-बहनों के साथ रहता था। बाद में उसकी माँ ने उसे भी पक्का बनवा लिया था ।
वह मुझसे एक वर्ष बड़ा था लेकिन माँ ने एक मील दूर पुरवामीर के 'जुग्गीलाल कमलापति प्राइमरी पाठशाला' में जब मेरा नाम लिखाया तब पता चला कि वह मेरी कक्षा में पहले से ही था। मेरी शिक्षा तो लेट-लपाट शुरू ही हुई थी, लेकिन शायद पिता के साथ रहने के कारण उसकी मुझसे भी देर से प्रारंभ हुई थी। विद्यालय में एक साथ होने के कारण मेरा अधिकांश समय उसके साथ बीतता। सुबह अपना बस्ता संभाल मैं जब उसके घर पहुंचता, वह चाय के साथ पराठे का राश्ता कर रहा होता। हम पगडंडी के रास्ते पड़ोसी गांव पुरवामीर की ओर लपकते जहां हमारी पाठशाला थी। लौटते समय भी हम साथ होते। गांव के तीन औेर लड़के हमारी कक्षा में थे। प्राय: वे हम दोनों से अलग चलते। कारण यह कि वे बाला को पसंद नहीं करते थ । पसंद न करने का कारण था उसकी शरारतें। बात-बात में वह लड़ जाता। शरीर में सबसे जबर था, इसलिए सामने वाले पर भारी पड़ता। आए दिन उसके घर शिकायत पहुंचती। लेकिन वह मुझसे प्रेम करता.... मेरी हर बात मानता। मेरे दूसरे सहपाठियों का ही नहीं, गांव वालों और अध्यापकों का यह मानना था कि हमारी मित्रता अनमेल थी। कई बार हम दोनों के सामने लोग कहते, ''रूप तुम्हें ब्राम्हण और इसे क्षत्रिय घर में जन्म लेना चाहिए था।'' बाला ब्राम्हण था। वह जितना हृष्ट-पुष्ट था मैं उतना ही दुर्बल। गांव में सींकिया पहलवान कहा जाता मुझे। दूसरों से लड़-भिड़ने वाला बाला मेरी डांट सुन लेता और खींसे निपोर देता, लेकिन ऐसा तभी होता जब गलती उसकी होती और मैं उस क्षण उपस्थित होता।
(बाएं से इकबाल बहादुर सिंह,बाला प्र.त्रिवेदी और लेखक -चित्र (नव.१९६६)

हम हाई स्कूल तक एक साथ रहे। आठवीं के बाद मैंने साइंस ली और उसने कामर्स। उत्तर प्रदेश में हाई स्कूल से स्ट्रीम तय कर लेना होता है। प्राइमरी उत्तीर्ण करने के बाद जूनियर हाईस्कूल के लिए हमने गांव से तीन मील दूर महोली के विद्यालय में प्रवेश लिया था। तब तक मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हो चुकी थी। उन तीन वर्षों की पढ़ाई के दौरान हम दोनों के मध्य एक बार किसी बात पर सिकठिया-पुरवा की बाजार के पास तालाब किनारे (उन दिनों वह तालाब सिघांड़ों की बेल से पटा पड़ा था) मल्लयुध्द हुआ था। हम पगडंडी के रास्ते गांव लौट रहे थे। गांव के हमारे तीनों सहपाठी भी उस दिन साथ थे। किसी बात पर बाला और मुझमें बहस छिड़ी हुई थी और उस बहस ने इतना भयंकर रूप लिया कि ताल ठोक हम आमने-सामने थे। एक-दूसरे के बस्ते साथियों ने संभाले और हम भिड़ गए थे खुले मैदान। दुबला-पतला होने के बावजूद मुझमें ताकत कम न थी। उठा-पटक ऐसी कि कभी वह मेरे ऊपर होता तो कभी मैं। एक बार उसकी पीठ पर बैठ मैंने उसका दाहिना हाथ उमेठना शुरू किया। वह सीत्कार कर रहा था। शुक्र था कि मेरे गांव के सीताराम अवस्थी (जो हम दोनों के पड़सी थे) अचानक प्रकट हो गए थे और उनकी दहाड़ सुन मैंने उसका हाथ छोड़ दिया था। सीताराम अवस्थी ने न केवल हमें बुरी तरह डांटा था, बल्कि घर और स्कूल मे शिकायत की धमकी भी दी थी। मैं लड़ाई को बाहर तक ही रखना चाहता था। नहीं चाहता था कि मेरे पिता-माँ तक या स्कूल तक बात पहुंचे। स्कूल में अध्यापकों से लेकर हेडमास्टर तक का मैं प्रिय छात्र था ... सीधा-सादा।उनकी दृष्टि में मैं अपनी वही छवि बनाए रखना चाहता था। मैंने कपड़े पहने, बस्ता साथी से लिया और तेजी से गांव के लिए भाग खड़ा हुआ था।
उसके बाद कई महीनों तक न हम साथ आए-गए और न बोल-चाल रही। बाद में उसने गलती स्वीकार कर माफी मांगी और हमारी मित्रता पुन: उसी ढर्रे पर चल पड़ी थी।
*******
बाला खेल का शौकीन था ..... वालीबाल और कबड्डी। दूसरे खेलों की गांव में गुंजाइश नहीं थी। वालीबाल के लिए वह कभी-कभी रेलवे स्टेशन जाता, जहां शायं कुछ युवक खेलते थे। अक्टूबर-नवंबर में जब किसान अपने खेतों को रवी की फसल बोने के लिए जोतकर पाटा देते तब खेत चौरस हो जाते। बाला एण्ड कंपनी ऐसे खेतों में रात की छिटकी चांदनी में कबड्डी खेलते। सुबह वह मुझे उत्साहित करता ,''आज तुम भी चलना ... गजब का आनंद आता है ।''
उसे खेलने में ही आनंद नहीं आता था, बागों से फल लूटने में भी वह आनंद लेता। गांव के बाहर दक्षिण दिशा में एक मुसलमान का अमरूदों का बड़ा बाग था। ऐसे कई बाग आज भी गांव में हैं और उनके अमरूद इलाहाबादी अमरूदों जैसे गुदाज और मीठे होते हैं। एक दिन वह बोला, ''आज शाम चलना मेरे साथ....।''
''कहां ?''
''घूमने......स्कूल से आकर घर में घुस लेते हो। कभी घूम भी लिया करो।''
यह सातवीं कक्षा के दिनों की बात है।
शाम लगभग साढ़े पांच बजे वह मुझे लेने आ गया।
''कहां जा रहे हो ?'' तेजी से बढ़ते धुंधलके और ठंड को भांप माँ ने पूछा।
''बाला के साथ जा रहा हूं....अभी आता हूं।''
''दूर मत जाना....शाम होते ही साउज गांव के नजदीक आ जाते हैं।''
गांव के आस-पास जंगल के नाम पर बाग थे और बहुतायत में थे (अब उतने नहीं रहे)। एक मील की दूरी पर गांव के पूरब और दक्षिण में दो नाले थे, जो बरसात के दिनों में किसी नदी का रूप ले लेते थे। इन नालों के दोनों ओर झाड़-झंखाड़ थे, जिनमें कोई खतरनाक जानवर नहीं, सियार, लोमड़ी और खरगोश छुपे होते या कभी-कभी कोई स्याही दिख जाती। गांव के निकट जो बाग घने थे उनमें भी झाड़ियां थीं और कोई जानवर वहां भी छुपा होता। दिन में वे झाड़ियों में होते जबकि रात शुरू होते ही वे गांव के निकट आ जाते। रातभर हमें सियारों की हुहुआहट सुनाई देती। जब लगातार कई दिनों तक सियार गांव के और अधिक निकट आकर हुहुआते तब माँ-नानी कहतीं कि गांव में कुछ विपदा आने वाली है। यह उनका अनुभूत सत्य था ।
''अमुक की तबीयत ज्यादा खराब है .... भगवान उसकी रक्षा करना।''
जब कभी कई दिनों तक हुहुआने के बाद सियारों का हुहुआना कम हो जाता, वे कहतीं, ''भगवान उस पर मेहरबान है .... विपदा टल गयी।''
रास्ते में बाला बोला, ''हाफी जी के बाग में अमरूदों की बहार है .... आज उधर ही चलते हैं ।''
मैं डर रहा था, लेकिन स्वादिष्ट अमरूदों की कल्पना से मेरे मुंह में भी पानी आ गया था। हम हाफी जी के बाग के पीछे पहुंचे। बाग चारों ओर से ऊंची दीवार से घिरा हुआ था और था भी ऊंचाई पर। मेरा साहस उसके अंदर जाने का नहीं हो रहा था, लेकिन बाला उस्ताद था। उसने एक ऐसी जगह पहचान रखी थी जहां से बिना आहट बाग के अंदर प्रवेश किया और निकला जा सकता था। वह एक ही छलांग में बिना आहट बाग में पहुंच गया। उसने मुझे इशारा किया। अंधेरे में केवल उसका हाथ नजर आया। अमरूदों की महक मुझे ललचा रही थी। मैं भी साहस जुटा ऊपर पहुंच गया। हम अंधेरे में टटोलकर अमरूद तोड़ने लगे और कुर्ते की जेबों में ठूंसने लगे।

बाग की फसल किसी कुंजड़े ने खरीद रखी थी। बाग के बीच उसने फूस की झोपड़ी डाल रखी थी, जहां वह सपरिवार दिन-रात रहता था। दिन में वह गांव-गांव - और बाजार में अमरूद बेचता और उसकी पत्नी-बच्चे रखवाली करते। अमरूद पक्षियों.... खासकर सुग्गों का प्रिय आहार होता है। उसके लिए बाग के चारों ओर पेड़ों से बांस के डंडे बांधकर रस्सी से उनको मड़ैया से वे संचालित करते। रस्सी खींचने से डंडे पेड़ से टकराते .... आवाज होती और पक्षी उड़ जाते। दिनभर उसके बच्चे यह करते रहते, जबकि पत्नी घूम-घूमकर पके अमरूद तोड़ती ओैर जानवरों पर नजर रखती।
यद्यपि हम बहुत संभलकर अपना काम कर रहे थे, लेकिन आहट कुंजड़े तक पहुंच चुकी थी। उसने भक से टार्च की रोशनी उधर फेकी। पहचान नहीं पाया, लेकिन इतना समझ गया कि बाग में कोई जानवर नहीं मानुस घुसे थे। वह गाली देता डंडा लेकर हमारी ओर दौड़ा, लेकिन उसकी टार्च की रोशनी पड़ते ही हम प्रवेश की जगह से नीचे कूद गये और सिर पर पैर रख भाग खड़े हुए थे।
इस प्रसंग को केन्द्र में रखकर मैंने 'अमरूदों की चोरी' शीर्षक से एक बाल कहानी लिखी थी।
*******

हमारी हाई स्कूल की बोर्ड परीक्षा निकट थी और हम दोनों ने ही उस वर्ष पढ़ाई नहीं की थी। उत्तर प्रदेश में आठवीं की परीक्षा जिला बोर्ड द्वारा ली जाती थी और गांव में मैं पहला लड़का था जिसने प्रथम श्रेणी पायी थी। हाई स्कूल में फेल हो जाने का खतरा या कम अंक लेकर पास होने से मैं प्रकम्पित था। सोचता, फिर भी पढ़ाई नहीं कर रहा था। कह सकता हूं कि पूरे वर्ष मैंने पड़ोसी गांव के एक दूधिया के बेटे, जो मुझसे सीनियर था और लगातार इण्टरमीडिएट में फेल होता रहा था, के चक्कर में केवल गप्प-गोष्ठी में समय नष्ट किया था। वह मेरे गांव दूध लेने आता और दूध लेकर सात बजे के लगभग मेरे चबूतरे से साइकिल टिकाकर मुझे आवाज देता। मुझे उसके आने का इंतजार रहता। उसकी एक आवाज में मैं डयोढ़ी पार होता और सामने के पक्के चबूतरें पर रात नौ बजे तक हमारी गोष्ठी होती रहती। इस गोष्ठी में बाला कभी शामिल नहीं हुआ। उसके न पढ़ने के अपने कारण रहे होगें। तभी 31 जनवरी,1967 को मुझे बड़े भाई से मिलने कानपुर जाना पड़ा। रविवार का दिन था। कानपुर मेरे गांव से तीस किलोमीटर दूर है। और उन दिनों मेरे पास नई हीरो साइकिल थी, जिसे मैं हर समय चमकाकर रखता था। मुझे उसी से जाना था। मेरे गांव से जी.टी.रोड एक किलोमीटर उत्तर है और वह कानपुर के मध्य से गुजरती है। भाई साहब उन दिनों लाल बंगला में रहते थे, जो जी.टी.रोड के किनारे बसा है।

भाई साहब हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड में नौकरी करते थे ...घर का एकमात्र आर्थिक स्रोत। माहांत में या तो वह स्वयं आकर घर खर्च दे जाते या मैं जाकर ले आता। उस दिन मुझे उनसे पैसे लेने जाना था और उसी दिन उनके साले बाबूसिंह को भी कानपुर जाना था। एक मुलाकात में उनसे समय-दिन और स्थान निश्चित हो गया था। तय हुआ था कि महाराजपुर थाना के आगे, जहां नरवल से आने वाला रास्ता जी.टी.रोड से मिलता है वहीं मंदिर के पास हम दस बजे मिलेंगे।
मैं निश्चित समय पर साइकिल मंदिर की दीवार से टिका मंदिर की दीवार पर नरवल की ओर से आने वाली सड़क पर टकटकी लगाकर बैठ गया था। दीवार अधिक ऊंची न थी । मंदिर लगभग एक एकड़ क्षेत्र में था। बाबू सिंह की प्रतीक्षा में जब दो घण्टे से ऊपर समय बीत गया तब मंदिर के पुजारी ने मेरे पास आकर पूछा ,''किसी की प्रतीक्षा में हो बेटा ?''
''जी ।'' मैंने पूरी बात बतायी ।
''अंदर आ जाओ।''
वह मुझे गेट से अंदर प्रागंण में ले गए जहां बिछी चारपाई पर मुझे बैठाते हुए उन्होंने मेरे बारे में जानकारी ली। कुछ देर तक कुछ सोचने के बाद वह कागज-पेंसिल ले आए और बोले, ''किसी फूल का नाम सोचो।''
मेरे सोचते समय उन्होंने उस फूल का नाम लिख लिया था। मेरे बताते ही उन्होंने अपना लिखा कागज मेरी ओर बढ़ा दिया। उन्होंने फूल का वही नाम लिखा था। फिर उन्होंने कहा, ''किसी फल का नाम सोचो।''
मेरे सोचने तक वह उस फल का नाम भी लिख चुके थे।
एक-दो और बातों ने मुझे उनके प्रति आकर्षित किया।
'यह तो बहुत विद्वान व्यंक्ति हैं।' मैंने सोचा। मैं यह सोच रहा था और वह मेरे चेहरे को पढ़ रहे थे। देर की चुप्पी के बाद वह बोले, ''बेटा तुमने पूरे वर्ष पढ़ाई नहीं की.... और हाई स्कूल की परीक्षा देने जा रहे हो!''
मैंने स्वीकार किया ।
''परीक्षा कब से है ?''
''29 फरवरी से।''
''एक महीना है।'' वह फिर कुछ देर चुप रहे, फिर बोले, ''एक महीना है। मैं पढ़ पा रहा हूं कि यदि तुम अभी भी जमकर परिश्रम करोगे तो अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो जाओगे ।''
पुजारी की बात ने मुझे आंदोलित किया। एक बज चुका था और बाबूसिंह का अता-पता नहीं था। मैंने पुजारी से इजाजात ली और भाई साहब से मिलने चला गया। रास्ते भर मैं पुजारी की बात सोचता रहा। घर लौटा तब एक संकल्प था मन में कि कल से रात दिन एक कर देना है पढ़ाई में। रात ही मैंने बाला को यह बताया। वह भी पूरे वर्ष न पढ़ने से परेशान था। हमने तय किया कि गोरखनाथ निगम के बाग में सुबह ही हम पढ़ने चले जाएगें और शाम पांच बजे तक वहीं रहेंगे। दिन भर पढ़ेंगे ....केवल आध घण्टे का विश्राम लेंगे।
यह बाग हमारे घर से दो सौ मीटर की दूरी पर था बिल्कुल गांव से सटा हुआ ...उत्तर दिशा में। उस बाग से सटा हुआ था मुसलमानों का बेरों का बाग।
अगले दिन से हम वहां जाने लगे। प्रेपरेशन लीव चल रही थीं। दृढ़ संकल्प के साथ हमने टाइम-टेबल बनाकर पढ़ाई की। बीच-बीच में बाला अवश्य इधर-उधर घूम आता और मौका पाकर बेर भी तोड़ लाता। शाम पांच बजे अपने बस्ते संभाल हम घर लौटते। मेरे पास घड़ी नहीं थी। उसके पास थी। उसने अपनी घड़ी मुझे दे दी और वह परीक्षा तक मेरे पास ही रही, जिसने समय संयोजित करने में मेरी बहुत सहायता की थी।
मैं सात बजे सो जाता माँ से यह कहकर कि वह साढ़े बारह बजे मुझे जगा देंगी। बाला अपने पिता के कमरे में सोता यह कहकर कि मैं जब उठूंगा उसे भी जगा दूंगा। मुझे आश्यर्य होता जब माँ बिना घड़ी-एलार्म मुझे ठीक साढ़े बारह बजे उठा देतीं। दो बजे कहा तो दो बजे....ऐसा वह कैसे संभव कर लेती थीं..... आज भी मेरे लिए रहस्य है। मैं सुबह तक पढ़ता और अगले दिन की फिर वही दिनचर्या होती। इतना घनघोर परिश्रम मैंने कभी नहीं किया था। परिणामत: मेरी आंखों में पीलापन छा गया। धुंधला दिखने लगा। परीक्षा के बाद इसका देसी इलाज किया और स्वस्थ हुआ।
आज भी सोचता हूं कि यदि मंदिर के पुजारी से मुलाकात न हुई होती तो पता नहीं मेरा भविष्य क्या रहा होता। मैं और बाला दोनों ही पास हो गए थे। कुछ अंकों से मेरी प्रथम श्रेणी रह गयी थी। बाला भी द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हो गया था।
*******
हाई स्कूल का परीक्षा परिणाम आने से पहले ही उसका विवाह हो गया। वह बहुत प्रसन्न था। पत्नी सुन्दर और सुशील थी। हाई स्कूल के बाद उसने पढ़ाई नहीं की। वह नौकरी की तलाश में लग गया था। रेगुलर इंटरमीडिएट मैं भी नहीं कर सका। बीच मे्रं 1969-70 मे आई.टी.आई. किया और उसी की भांति नौकरी के लिए भटकने लगा। (इकरामुर्रहमान हाशमी पर लिखे अपने संस्मरण में मैंने इस विषय पर विस्तार से लिखा है।)
जून 1970 में आई.टी.आई से निकलने के बाद मैं भाई साहब के साथ रहने के लिए बेगमपुरवा कॉलोनी में शिफ्ट कर गया था। उन्हीं दिनों भाई साहब ने कॉलोनी में दूसरी मंजिल पर एक और फ्लैट खरीदा था। उन्होंने पड़ोसी बमशंकर बाजपेई से कहकर बाला को उनके प्रिण्टिगं प्रेस में प्रशिक्षु के रूप में लगवा दिया। वेतन न के बराबर था, लेकिन वह अपना गुजर कर लेता। स्वयं ही स्टोव में खाना पकाता और प्रेस तक पांच-छ: किलोमीटर पैदल जाता, लेकिन लौटते समय बाजपेई के साथ उनकी साइकिल से आता। तब तक उसके परिवार की आर्थिक स्थिति डांवाडोल हो चुकी थी और शायद वह एक बेटे का पिता भी बन चुका था। पर्याप्त तनाव में रहता। तनाव में रहते हुए भी वह उसे प्रकट नहीं करता था। दूसरी मंजिल के फ्लैट में मैं उसके साथ रहता था। कभी-कभी वह लंबी आह भरकर कहता, ''रूप, तम्हारे लिए जगरूप कोशिश करने वाले हैं, लेकिन मेरे लिए मेरे घर का कोई कुछ करने को तैयार नहीं। पिता जी ने परिवार से नाता तोड़ लिया है।''
उसके पिता को फौज से पेंशन मिलती थी और वह घर के लिए धेला नहीं देते थे। उसकी माँ गाय -भैंस पालकर उनका दूध बेच परिवार पाल रही थीं। उसकी चिन्ता स्वाभाविक थी।
एक बार सप्ताह भर गांव रहकर वह लौटा। बहुत उत्साहित था। मैंने कारण पूछा।
''रूप, तुम समझो कि जल्दी ही मेरी नौकरी लग जाएगी।''
''कहीं जुगाड़ बन गया है ?''
''मुझे पहले मालूम होता तो इतने दिनों तक बाजपेई जी के प्रेस में अक्षर (कंपोजिगं) न बिठाता रहता।''

''कुछ मुझे भी बताओ।'' मैं स्वयं उन दिनों साइकिल के पैडल घिस रहा था और मेरा अनुमान है कि शहर की शायद ही कोई मिल रही होगी जहां मैं नहीं गया था। कितने ही छोटे दफ्तर .....और सभी जगह खेदजनक आश्वासन। भाई साहब के लिए अपनी क्लर्की से घर संभालना कठिन हो रहा था।
''इस बार बाबू जी ने तरस खाकर मुझे बताया कि उनके फुफेरे भाई इन दिनों कानपुर के मेयर हैं ।'' वह कह रहा था ।
''हां ऽऽऽ'' मुझे आश्चर्य हुआ। इतना निकट का रिश्ता।
''तिवारी जी मेरे बाबा की बहन के बेटा हैं। उन दिनों कोई तिवारी कानपुर के मेयर थे.... शहर के सभ्रांत व्यक्ति।''
''उन्होंने अब तक क्यों नहीं बताया था ?'' मैंने पूछा।
''बाबू जी उनसे कहना नहीं चाहते थे..... हमारी उनकी हैसियत में बहुत अंतर है शायद इसलिए....''
''तो क्या ...?''
''बस बाबू जी को उनके पास जाना गवारा नहीं .....और इसीलिए उन्होंने आज तक नहीं बताया ।''
''तुम मिलो तिवारी जी से..... अपने बाबा का परिचय देकर।''

''कल ही जाउगां....तुम भी अपनी सर्टीफिकेट लेकर चलना ....मेरा काम बनेगा जब तब तुम्हारे लिए भी कहूंगा ।''
''चलूंगा।''
''बताऊं,'' बाला ने क्षणभर की चुप्पी के बाद कहा, ''तिवारी महाराज फर्टीलाइजर कार्पोरेशन ऑफ इंडिया' के चेयरमैंन हैं.... और आजकल वहां सभी प्रकार की भर्ती चल रही हैं। नया खुला है न कार्पोरेशन कानपुर में।''
''समय नष्ट नहीं करना चाहिए बाला। कल ही चलते हैं।''
और दूसरे ही दिन हम दोनों तिवारी जी के यहां थे सुबह दस बजे के लगभग। आलीशान कोठी। मिलने वालों की भीड़। कोठी के गेट पर दरबान ने रोका, लेकिन वह समय जनता से मिलने का था। मामूली तहकीकात के बाद हम अंदर थे। मुलाकातियों की पंक्ति में लंबे समय तक अपने नंबर की प्रतीक्षा करते हुए हम हॉल में एक ओर बैठ गए थे। हॉल से लगा तिवारी जी का मुलाकाती कमरा था .... कमरा नहीं विशाल हॉल ....खिड़कियों-दरवाजों पर झूलते मंहगे लंबे परदे, फर्शे पर बिछी कार्पेट, जिसपर पैर रखने में उसके गंदा हो जाने का संकोच हमारे चेहरों पर स्पष्ट था। नंबर आने पर हम दोनों साथ ही मिलने गए। आलीशान सोफे पर क्रीम कलर के सिल्क के कुर्ता और भक पायजामा में साठ के आस-पास की आयु के लंबे, गोरे-चिट्टे चमकते चेहरे वाले तिवारी जी आसीन थे।

बाला ने अपना परिचय दिया, ''मैं नौगवां गौतम के कृष्णकुमार त्रिवेदी का बेटा हूं।''
अपने ममेरे भाई का नाम सुनकर भी तिवारी जी के चेहरे पर पहचान का कोई चिन्ह प्रकट नहीं हुआ। ना ही उन्होंने ममेरे भाई के बारे में कुछ पूछा।
''क्या काम हैं ?'' दूसरों की भांति एक रूटीन प्रश्न।
बाला ने आने का आभिप्रय बताया।
''एप्लीकेशन और प्रमाण-पत्र लाए हो ?''
'जी।'' हम दोनों एप्लीकेशन प्रमाणपत्रों के साथ ले गए थे। बाला ने वे उन्हें पकड़ा दिए। लेकिन मेरा मन नहीं हुआ अपनी एप्लीकेशन देने का। बाला ने इशारा भी किया, लेकिन मैं चुप बैठा रहा था।
कुछ देर की चुप्पी के बाद तिवारी जी बोले, '' ठीक है । कुछ होगा तब तुम्हें बुला लेगें।''
हम दोनों ने तिवारी जो के उठ जाने के संकेत को समझा और तुरंत उठकर बाहर आ गए। लेकिन इस बार बाला ने वह गलती नहीं की जो अंदर जाने पर की थी। तब वह तिवारी जी के चरण-स्पर्श करना भूल गया था। लौटते समय उसने वह भूल सुधार ली थी।

''तुम्हारा काम बन जाएगा।'' रास्ते में मैंने उससे कहा।
''मुझे उम्मीद नहीं है ...(.तिवारी महाराज वह ऐसे ही बोल रहा था) उसने पहचाना ही नहीं। बाबू जी का नाम सुनकर भी उन्होंने कुछ भी नहीं पूछा ।
बाला का अनुमान सही सिद्ध हुआ था ।

लगभग एक वर्ष तक बाला ने प्रेस में हाथ-पैर मारे लेकिन कंपोजिंग में वह अच्छी गति नहीं बना पाया। बाजपेई उसे कुछ नहीं कहते लेकिन भाई साहब को बताते ,''ठाकुर साहब, बाला काम सीखने में रुचि नहीं ले रहा।'' और वास्तव में ही उसका मन नहीं लग रहा था। एक दिन खीजकर उसने कहा, ''इस काम से मेरी गुजर न होगी। मैं नहीं सीख पाउंगा।'' और एक दिन उसने घोषणा की कि वह गांव वापस जा रहा है। मैं अपने संघर्षों में डूबा हुआ था। बाद में पता चला कि वह अपने बड़े ताऊ के बड़े लड़के बद्रीप्रसाद त्रिवेदी के पास चला गया था, जो महाराष्ट्र के किसी शहर में रेलवे में छोटे पद पर कार्यरत थे। बद्री ने किसी प्रकार उसे रेलवे पुलिस में भर्ती करवा दिया था। नौकरी लगने के बाद मैं मुरादनगर, फिर दिल्ली आ गया। गांव जाना कम हो गया। लेकिन मुझे बाला के समाचार मिलते रहते।
1973 के बाद लंबे समय तक हम नहीं मिले और जब मिले तब पता चला कि वह गांव लौट आया था। यह मुलाकात गांव में हुई थी। वह रेलवे की नौकरी छोड़ आया था.... छोड़ नहीं बल्कि उसे निकाल दिया गया था। वह झगड़ा करने की आदत से विवश था। अपने किसी सहयोगी से उसका झगड़ा हुआ और उसने उस पर घातक प्रहार किया था। परिणामस्वरूप नौकरी से हाथ धोना पड़ा। मैं गांव गया तब वह मुझसे मिलने आया और लगभग एक घण्टा मेरे पास बैठा। लेकिन उसकी नौकरी के विषय में कुछ भी पूछने का साहस मुझमें नहीं था और न ही उसने बताया। यह बात 1988 की है। उसने मेरा दिल्ली का पता लिया। मैंनें उसे अपना वर्तमान पता दिया, क्योंकि मैंने इस मकान का आधा भाग इस उद्देश्य से बनवाया था कि यहां शिफ्ट करूंगा। बाला को पता देने के समय मैं शक्तिनगर में किराए के मकान में रह रहा था और कुछ दिनों के अंदर ही अपने मकान में आने का विचार था, लेकिन बच्चों की शिक्षा को ध्यान में रखकर बाद में इस विचार को त्यागना पड़ा था। उसने बताया था कि उसकी छोटी बहन का विवाह दिल्ली में हुआ था और वह जल्दी ही दिल्ली आएगा ।
वह दिल्ली आया और मेरे मकान में भी आया, लेकिन यहां ताला बंद था। शक्तिनगर का पता उसके पास नहीं था। डेढ़-दो वर्ष बाद मैं फिर गांव गया। इस बार वह गांव में नहीं था। उस दिन मेरा मन अपने खेतों की ओर जाने का हुआ। अपने खेतों की ओर जाऊं और पास के रेलवे स्टेशन (करबिगवां) तक न जाऊं यह संभव नहीं था। इस रेलवे स्टेशन से मेरी अनेक यादें जुड़ी हुई हैं। गांव में रहते हुए मैं प्राय: शाम के समय उधर निकल जाता और स्टेशन के बाहर एक चबूतरे पर बैठकर आगरा-इलाहाबाद पैसेंजर से आने वाले यात्रियों को देखता। उस दिन मेरा मन स्टेशन को एक बार पुन: देखने का हुआ। वहां मुझे बदलू मोची मिले, जो उसी प्रकार स्टेशन के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे बैठे हुए थे, जिस प्रकार वह मेरी किशोरावस्था में मुझे बैठे दिखाई देते थ। घर के जूते-चप्पलें गठवांने के लिए मुझे एक मील चलकर स्टेशन तक जाना पड़ता, जबकि बदलू मेरे गांव के ही थे। ऐसा इसलिए क्योंकि वह अपना सामान स्टेशन में ही कहीं रख आते थे। बदलू बहुत बूढ़े हो चुके थे। मैंने जिस बदलू को किशोरावस्था में देखा था उनमें और उस दिन के बदलू में बहुत अंतर था। चेहरा झुर्रियों भरा......हाथ-पैर सूखे हुए.....लेकिन वह तब भी जूते गांठ रहे थे ।
स्टेशन में बहुत कुछ बदल गया था, नहीं बदला था तो पुन्नी पाण्डे के भतीजे का व्यवसाय। वर्षों बाद भी मैंने उसे उसी प्रकार यात्रियों को पानी पिलाते देखा। उम्र अपनी छाप उसके चेहरे पर छोड़ चुकी थी। गोरे चेहरे पर कालिमा उतर आयी थी, जो उसके कठिनतर जीवन की गवाही दे रही थी ।
वहां से लौटते हुए रेलवे फाटक के पास अचानक बाला से मेरी मुलाकात हो गयी। वह किसी बारात में जा रहा था। बारात बैलगाडियों में थी। मुझे देखते ही वह बैलगाड़ी से उछलकर कूदा और आंखे निकालकर लगा धमकाने, ''तुम्हारा खून पीने का मन कर रहा है .....मुझे तुमने सादतपुर का पता दिया....मैं गया....वहां ताला बंद था। तुमने शक्तिनगर का पता क्यों नहीं दिया था ! नहीं मिलना था तब दिया ही क्यों था ?''
शर्मिन्दा मैंने बहुत सफाई दी, लेकिन उसने एक नहीं सुनी। बोलता रहा। ट्रेन निकल गई थी और फाटक खुलने वाला था। वह बोला, ''अपना शक्तिनगर का पता दो ।''
मैंने उसके आदेश का पालन किया।
''ठीक है....जल्दी ही वहां आऊंगा।'' कहकर वह उछलकर बैलगाड़ी पर सवार हो गया था।
लेकिन वह शक्तिनगर कभी नहीं आया।
बाला के साथ वह मेरी अंतिम भेंट थी। उसके बाद उसके विषय में मुझे जो सूचना मिलती वह अत्यंत कष्टकारी होती। उसके पास कोई रोजगार नहीं था .... शायद वह कुछ करना भी नहीं चाहता था। कोढ़ में खाज यह कि वह पीने लगा था। ऐसा-वैसा नहीं.....पूरी बोतल एक साथ पी जाता और पीने के लिए उसे हर दिन शराब चाहिए थी। बड़ा बेटा कहीं कुछ करने लगा था, लेकिन हालात बेहतर नहीं थे ।
शराब के साथ ही उसने मदक की लत डाल ली थी। गांव में मदक की पहली लत उसके बड़े ताऊ यानी बद्रीप्रसाद त्रिवेदी के पिता ने डाली थी। वह पूरे दिन उसी में धुत रहते थे और उनसे ही वह लत गांव के कितने ही लोगों को लग गयी थी। कई लोग तबाह हुए थे और कई युवावस्था में ही परलोकवासी हो चुके थे। अब वही लत बाला ने अपना ली थी। अपने उपन्यास 'पाथरटीला' में मैंने मदक का विस्तृत चित्रण किया है।
मदक और शराब ने बाला के हट्टे-कट्टे शरीर को निचोड़ दिया। ऐसा नहीं कि वह इसके दुष्परिणाम नहीं जानता रहा होगा। शायद वह अपने जीवन से अत्यंत असंतुष्ट और निराश था और उसने अपने को समाप्त कर लेने का निर्णय कर लिया था। उसने जो चाहा होगा, वही हुआ। हाल की कानपुर यात्रा के दौरान मुझे सूचना मिली कि सात-आठ माह पूर्व वह इस संसार को अलविदा कह गया था।
अपने पहले मित्र के ऐसे अंत से मैं आहत था। उसका अंतिम स्वप्न भी मैंने लगभग इतने ही दिनों पहले देखा था। शायद वह मुझे स्वप्न में अलविदा कहने आया था और संभव है, वह वही दिन रहा हो जिस दिन वह इस संसार से विदा हुआ था।
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दिल्ली-110 094
फोन : 09810830957

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

यादों की लकीरें


संस्मरण-३
प्रखर प्रतिभा के धनी थे नन्दन जी
रूपसिंह चन्देल
आठवें दशक के मध्य की बात है । धर्मयुग के किसी अंक में हृदयखेड़ा के एक सज्जन पर केन्द्रित रेखाचित्र प्रकाशित हुआ । हृदयखेड़ा मेरे गांव से तीन मील की दूरी पर दक्षिण की ओर पाण्डुनदी किनारे बसा गांव है, जहां मेरी छोटी बहन का विवाह 1967 में हुआ था । वर्ष में दो-तीन बार वहां जाना होता । रेखाचित्र जिसके विषय में था उन्हें मैं नहीं जानता था, लेकिन उसके लेखक के नाम से परिचित था । वह धर्मयुग के सहायक सम्पादक कन्हैंयालाल नन्दन थे । तब नन्दन जी के नाम से ही परिचित था, लेकिन उस रेखाचित्र ने मुझे इतना प्रभावित किया कि उसने नन्दन जी के प्रति मेरी उत्सुकता बढ़ा दी । मैंने बहनोई से पूछा । उन्होंने इतना ही बताया कि नन्दन जी उनके पड़ोसी गांव परसदेपुर के रहने वाले हैं । परसदेपुर का हृदयखेड़ा से फासला मात्र एक फर्लागं है । कितनी ही बार मैं उस गांव के बीच से होकर गुजर चुका था । मेरे गांव से उसकी दूरी भी तीन मील है.......बीच में करबिगवां रेलवे स्टेशन ...... यानी रेलवे लाइन के उत्तर मेरा गांव और दक्षिण परसदेपुर ।
इस जानकारी ने कि नन्दन जी मेरे पड़ोसी गांव के हैं उनके बारे में अधिक जानने की इच्छा उत्पन्न कर दी । उन दिनों मैं मुरादनगर में था और साहित्य से मेरा रिश्ता धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बनी और सारिका आदि कुछ पत्र-पत्रिकाएं पढ़ने तक ही सीमित था । मैंने नन्दन जी के बारे में अपने भाई साहब से पूछा ।
‘‘तुम नहीं जानते ?’’ उनके प्रश्न से मैं अचकचा गया था । चुप रहा ।
‘‘रामावतार चेतन के बहनोई हैं । मुम्बई में रहते हैं .... परसदेपुर में सोनेलाल शुक्ल के पड़ोसी हैं ।’’ और वह करबिगवां स्टेशन में कभी हुई नन्दन जी से अपनी मुलाकात का जिक्र करने लगे ।
मैं अपनी अनभिज्ञता पर चुप ही रहा । सोनेलाल शुक्ल से कई बार मिला था, क्योंकि वह मेरे गांव आते रहते थे । मेरे पड़ोसी कृष्णकुमार त्रिवेदी उनके मामा थे और चेतन जी की कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ता रहा था ।
हिन्दी साहित्य की दो हस्तियां मेरे पड़ोसी गांव की थीं, इससे मैं गर्वित हुआ था ।
नन्दन जी से यह पहला परिचिय इतना आकर्षक था कि मैं उनसे मिलने के विषय में सोचने लगा, लेकिन यह संभव न था । कई वर्ष बीत गए । एक दिन ज्ञात हुआ कि नन्दन जी ‘सारिका’ के सम्पादक होकर दिल्ली आ गए हैं, लेकिन मित्रों ने उनकी व्यस्तता और महत्व का जो खाका खींचा उसने मुझे हतोत्साहित किया । मैं उनसे मिलने जाने की सोचता तो रहा, लेकिन कुछ तय नहीं कर पाया । तभी एक दिन एक मित्र ने बताया कि नन्दन जी मुरादगर आए थे.....कुछ दिन पहले ।
‘‘किसलिए ?’’
‘‘हमने काव्य गोष्ठी की थी उसकी अध्यक्षता के लिए ।’’
‘‘और मुझे सूचित नहीं किया !’’
मित्र चुप रहे । शायद मुझे सूचित न करने का उन्हें खेद हो रहा था ।
‘‘मैं मिलना चाहता था ।’’ मैंने शिथिल स्वर में कहा ।
‘‘इसमें मुश्किल क्या है ! कभी भी उनके घर-दफ्तर में जाकर मिल लो । बहुत ही आत्मीय व्यक्ति हैं । मैं दो बार उनसे उनके घर मिला हूं .....।’’
मित्र से नन्दन जी के घर का फोन नम्बर और पता लेने के बाद भी महीनों बीत गए । मैं नन्दन जी से मिलने जाने के विषय में सोचता ही रहा ।
****
अंततः अप्रैल 1979 के प्रथम सप्ताह मैंने एक दिन आर्डनैंस फैक्ट्री के टेलीफोन एक्सचैंज से नन्दन जी को फोन किया । अपना परिचय दिया और मिलने की इच्छा प्रकट की ।
‘‘किसी भी रविवार आ जाओ ।’’ धीर-गंभीर आवाज कानों से टकराई ।
‘‘इसी रविवार दस बजे तक मैं आपके यहां पहुंच जाऊंगा ।’’ मैंने कहा ।
‘‘ठीक है ....आइए ।’’
नन्दन जी उन दिनों जंगपुरा (शायद एच ब्लाक) में रहते थे । मैं ठीक समय पर उनके यहां पहुंचा । पायजामा पर सिल्क के क्रीम कलर कुर्ते पर उनका व्यक्तित्व भव्य और आकर्षक था । सब कुछ बहुत ही साफ-सुथरा ....आभिजात्य । नन्दन जी सोफे पर मेरे बगल में बैठे और भाभी जी हमारे सामने । हम चार धण्टों तक अबाध बातें करते रहे । तब तक किसी बड़े साहित्यकार-पत्रकार से मेरी पहली ही मुलाकात इतने लंबे समय तक नहीं हुई थी । गांव से लेकर शिक्षा , प्राध्यापकी, पत्रकारिता, साहित्य आदि पर नन्दन जी अपने विषय में बताते रहे । शायद ही कोई विषय ऐसा था जिस पर हमने चर्चा न की थी । जब उन्होंने बताया कि उन्होंने ‘भास्करानंद इण्टर कालेज नरवल’ से हाईस्कूल किया था तब मेरी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा था । मैंने उन्हें बताया कि मैंने भी उसी कालेज से हाईस्कूल किया था ।
बीच-बीच में नन्दन जी फोन सुनने के लिए उठ जाते, लेकिन उसके बाद फिर उसी स्थान पर आ बैठते । बीच में एक बार लगभग आध घण्टा के लिए वह चले गए तब भाभी जी से मैं बातें करता रहा, जिन्हें दिल्ली रास नहीं आ रहा था । वह मुम्बई की प्रशंसा कर रही थीं, जहां लड़कियां दिल्ली की अपेक्षा अधिक सुरक्षित अनुभव करती थीं ।
उस दिन की उस लंबी मुलाकात की स्मृतियां आज भी अक्ष्क्षुण हैं ।
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यह वह दौर था जब मैं कविता में असफल होने के बाद कहानी पर ध्यान केन्द्रित कर रहा था । मेरी पहली कहानी मार्क्सवादी अखबार ‘जनयुग’ ने प्रकाशित की, और लिखने और प्रकाशित होने का सिलसिला शुरू हो गया था । एक कहानी ‘सारिका’ को भेजी और कई महीनों की प्रतीक्षा के बाद सारिका कार्यालय जाने का निर्णय किया । तब तक मैं दिल्ली शिफ्ट हो चुका था ।
मिलने के लिए चपरासी से नन्दन जी के पास चिट भेजवाई । तब सारिका के सम्पादकीय विभाग के किसी व्यक्ति से मेरा परिचय नहीं था , इसलिए चपरासी के बगल की कुर्सी पर बैठकर प्रतीक्षा करने लगा । दस मिनट की प्रतीक्षा के बाद नन्दन जी ने मुझे बुलाया । कंधे पर लटकते थैले को गोद पर रख मैं उनके सामने किसी मगही देहाती की भांति बैठ गया ।
‘‘कहें ?’’ फाइलों पर कुछ पढ़ते हुए नन्दन जी ने पूछा ।
‘‘यूं ही दर्शन करने आ गया । ’’ मेरी हर बात पर देहातीपन प्रकट हो रहा था , जिसे नन्दन जी ने कब का अलविदा कह दिया था .... शायद गांव से निकलते ही ।
‘‘हुंह ।’’ उस दिन मेरे सामने बैठे नन्दन जी घर वाले नन्दन जी न थे । हर बात का बहुत ही संक्षिप्त उत्तर ....और कभी-कभी वह भी नहीं । लगभग पूरे समय फाइल में चेहरा गड़ाए वह कुछ पढ़ते-लिखते रहे । मेरे लिए चाय मंगवा दी और ,‘‘ मैंने अभी-अभी पी है ’’ मुस्कराते हुए उन्होंने कहा, ‘‘आप पियें ...तब तक मैं कुछ काम कर लूं ।’’ वह फाइल में खो गए थे ।
इसी दौरान अवधनारायण मुद्गल वहां आए । नन्दन जी से उन्होंने कुछ डिस्कस किया और उल्टे पांव लौट गए । नन्दन जी के संबोधन से ही मैंने जाना था कि वह मुद्गल जी थे ।
मैंने उठने से पहले अपनी कहानी की चर्चा की ।
‘‘देखूंगा....।’’ फिर चुप्पी ।
‘अब मुझे उठ जाना चाहिए ।’ मैंने सोचा और ‘‘अच्छा भाई साहब ।’’ खड़े हो मैंने हाथ जोड़ दिए ।
नन्दन जी ने चेहरा उठा चश्मे के पीछे से एक नजर मुझ पर डाली, मुस्कराए, ‘‘ओ.के. डियर ।’’
सारिका को भेजी कहानी पन्द्रह दिनों बाद लौट आयी और उसके बाद मैंने वहां कहानी न भेजने का निर्णय किया । इसका एक ही कारण था कि मैं दोबारा कभी किसी कहानी के विषय में नन्दन जी से पूछने से बचना चाहता था और वहां हालात यह थे कि परिचितों की रचनाएं देते ही प्रकाशित हो जाती थीं, जबकि कितने ही लेखकों को उनकी रचनाओं पर वर्षों बाद निर्णय प्राप्त होते थे । एक बार रचनाओं के ढेर में वे दबतीं तो किसे होश कि उसे खंगाले । नन्दन जी तक रचना पहुंचती भी न थी ।
और नन्दन जी के कार्यकाल में मैंने कोई कहानी सारिका में नहीं भेजी । सारिका में जो एक मात्र मेरी कहानी प्रकाशित हुई वह ‘पापी’ थी, जिसे मुद्गल जी ने उपन्यासिका के रूप में मई,1990 में प्रकाशित किया और इस कहानी की भी एक रोचक कहानी है, जो कभी बाद में लिखी जाएगी ।
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फरवरी 1983 या 1984 की बात है । कानपुर की संस्था ‘बाल कल्याण संस्थान’ ने उस वर्ष बालसाहित्य पुरस्कार का निर्णायक नन्दन पत्रिका के सम्पादक जयप्रकाश भारती को बनाया था। 1982 से उन्होंने मुझे संस्थान का संयोजक बना रखा था । प्रधानमंत्री इंदिरा जी के निवास में 19.11.1982 को अपने संयोजन में मैं संस्थान का एक सफल आयोजन कर चुका था और केवल उसी कार्यक्रम का संयोजक था , लेकिन संस्थान दिल्ली से जुड़े मामलों का कार्यभार ‘‘मैं संस्था का संयोजक हूं...इसे संभालूं’’ कहकर मुझे सौंप देता ।
उस अवसर पर भी दिल्ली के साहित्यकारों से संपर्क करना, एकाध के लिए रेल टिकट खरीदना आदि कार्य मुझे करने पड़े । जयप्रकाश भारती ने पुरस्कार के लिए जिन लोगों को चुना वे उनके निकटतम व्यक्ति थे, लेकिन सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह कि संस्थान के बड़े पुरस्कार के लिए उन्होंने हिन्दुस्तान टाइम्स समूह में कार्यरत अपनी परिचिता महिला पत्रकार का चयन किया । यह पुरस्कार बहुत विवादित रहा था । उस महिला और भारती जी को लेकर अनेक प्रकार की कुचर्चां थी (आज दोंनो ही जीवित नहीं इसलिए उसपर बस इतनी ही ), लेकिन जिस बात के लिए मैंने इस प्रसंग की चर्चा की वह नन्दन जी से जुड़ी हुई है ।
कार्यक्रम कानपुर के चैम्बर आफ कामर्स में था । नन्दन जी कालका मेल से ठीक समय पर वहां पहुंचे । अध्यक्षता की और जब वह अध्यक्षीय भाषण दे रहे थे तब उन्होंने कहा ,‘‘ मैं जयप्रकाष भारती जी को संस्थान द्वारा उनकी पत्नी को पुरस्कृत किए जाने के लिए बधाई देता हूं ।’’
भारती जी और उनके द्वारा चयनित पत्रकार-बालसाहित्यकार मंच पर ही थे । मैं भी मंच पर नन्दन जी के बगल में बैठा था । नन्दन जी के यह कहते ही भारती जी का चेहरा फक पड़ गया और उस पत्रकार , जो अपनी संगमरमरी शरीर और सौन्दर्य के लिए आकर्षण का केन्द्र थीं, ने नन्दन जी की ओर फुसफुसाते हुए कहा , ‘‘आपने यह क्या कहा ?’’
भारती जी भी कुछ बुदबुदाए थे, जो किसी ने नहीं सुना था, क्योंकि दर्शक-श्रोता तो नहीं, लेकिन उपस्थित साहित्यकारों के ठहाकों में उनकी आवाज दब गई थी ।
नन्दन जी प्रत्युत्पन्नमति व्यक्ति थे । तुरंत बोले, ‘‘मेरा आभिप्राय भारती जी की पत्नी स्नेहलता अग्रवाल जी से है ... जिन्हें कुछ दिन पहले एक संस्थान ने ...’’ कुछ रुककर बोले, ‘‘ एन.सी.आर.टी. ने बालसाहित्य के लिए पुरस्कृत किया है ।’’ (नन्दन जी उस पुरस्कार के निर्णायक मंडल में रहे थे ) ।
बात आई गई हो गई । लेकिन इसने सिद्ध कर दिया कि नन्दन जी की नजर हर ओर हरेक की गतिविधि पर रहती थी .... सही मायने में वह पत्रकार थे और एक प्रखर पत्रकार थे । इसी भरोसे टापम्स समूह ने उन्हें सारिका के बाद पराग और फिर दिनमान का कार्यभार सौंपा था । अपने समय के वह एक मात्र ऐसे पत्रकार थे जो एक साथ तीन महत्वपूर्ण पत्रिकाएं देख रहे थे ।
*****
उसके बाद साहित्यिक कार्यक्रमों में प्रायः नन्दन जी से मुलाकात होने लगी थी ।
‘‘कैसे हो रूपसिंह ? ’’ मेरे कंधे पर हाथ रख वह पूछते और , ‘‘ठीक हूं भाई साहब ।’’ मैं कहता ।
मेरा मानना है कि पत्रकारिता की दुनिया विचित्र और बेरहम होती है । कब कौन शीर्ष पर होगा और कौन जमीन पर कहना कठिन है । नन्दन जी के साथ भी ऐसा ही हुआ । एक साथ तीन महत्वपूर्ण पत्रिकाओं के सम्पादक और बड़े हालनुमा भव्य कमरे में बैठने वाले नन्दन जी को एक दिन नवभारत टाइम्स के ‘रविवासरीय’ का प्रभारी बनाकर (जो एक सहायक सम्पादक का कार्य होता है ) 10, दरियगंज से टाइम्स बिल्डिगं में एक केबिन में बैठा दिया गया । निश्चित ही उनके लिए यह विषपान जैसी स्थिति रही होगी , लेकिन उन्होंने उस विष को अपने चेहरे पर शाश्वत मुस्कान बरकरार रखते हुए पी लिया । कई महीने वह उस पद पर रहे । सारिका से बलराम और रमेश बतरा भी उनके साथ गए थे । तब तक इन दोनों से मेरी अच्छी मित्रता हो चुकी थी ।
1988 की बात है । सचिन प्रकाशन के लिए मैंने ‘बाल कहानी कोश’ सम्पादित किया , जिसके लिए दो सौ कहानियां मैंने एकत्र की थीं । नन्दन जी से कहानी मांगने के लिए मैं टाइम्स कार्यालय गया । बलराम ने नन्दन जी से कहा , ‘‘रूपसिंह मिलना चाहते हैं ।’’
‘‘पिछले वर्ष मैंने तुम्हारे एक दोस्त के लिए सिफारिश की थी...अब ये भी....।’’ नन्दन जी को भ्रम हुआ था ।
बलराम ने कहा , ‘‘नहीं, चन्देल किसी और काम से आए हैं ।’’
बहर आकर बलराम ने मुझे यह बात बताई और हंसने लगे । दरअसल नन्दन जी उन दिनों हिन्दी अकादमी दिल्ली के सदस्य थे और शायद पुरस्कार चयन समिति में थे । बलराम के जिस मित्र की सिफारिश की बात उन्होंने की थी, वह मेरे भी मित्र थे । खैर, मैं नन्दन जी से मिला । एक बार पुनः आत्मीय मुलाकात । उन्होंने ड्राअर से निकालकर अपनी बाल कहानी ‘आगरा में अकबर’ मेरी ओर बढ़ा दी ।
दुर्भाग्य कि वह ‘बाल कहानी कोश’ आज तक प्रकाशित नहीं हुआ , क्योंकि दिवालिया हो जाने के कारण सचिन प्रकाशन बन्द हो गया था और पाण्डुलिपि की कोई प्रति मैंने अपने पास नहीं रखी थी ।
इस घटना के कुछ समय बाद ही नन्दन जी सण्डे मेल के सम्पादक होकर चले गए । उन्होंने उसे स्थापित किया । उनके साथ टाइम्स समूह के अनेक पत्रकार भी गए थे । 1991 में मेरे द्वारा सम्पादित लघुकथा संकलन ‘प्रकारान्तर’ किताबघर से प्रकाशित हुआ । हिन्दी में तब तक जितने भी लघुकथा संग्रह या संकलन प्रकाशित हुए थे, सामग्री और साज-सज्जा की दृष्टि से वह अत्यंत आकर्षक था । यह संकलन मैंने तीन लोंगो - कन्हैयालाल नन्दन, हिमांशु जोशी, और विजय किशोर मानव को समर्पित किया था।
नन्दन जी की प्रति देने मैं सण्डे मेल कार्यालय गया । नन्दन जी प्रसन्न, लेकिन उस दिन भी वह मुझे उतना ही व्यस्त दिखे, जितना सारिका में मेरी मुलाकात के समय दिखे थे । यह सच है कि वह समय के साथ चलने वाले व्यक्ति थे .... अतीत को लात मार भविष्य की सोचते और वर्तमान को जीते ....और भरपूर जीते।
सण्डेमेल की उस मुलाकात के बाद गाहे-बगाहे ही उनसे मिलना हुआ । मुलाकात भले ही कम होने लगी थी , लेकिन कभी-कभार फोन पर बात हो जाती । बात उन दिनों की है जब वह गगनांचल पत्रिका देख रहे थे । मेरे एक मित्र उनके लिए कुछ काम कर रहे थे । उन दिनों मैंने (शायद सन् 2000 में) कमलेश्वर जी का चालीस पृष्ठों का लंबा साक्षात्कार किया था । उसका लंबा अंश मेरे मित्र ने गगनाचंल के लिए ले लिया । ले तो लिया, लेकिन अंश का बड़ा होना उनके लिए समस्या था । ‘‘मैं नन्दन जी से बात कर लेता हूं ’’ मैंने मित्र को सुझाव दिया । फोन पर मेरी बात सुनते ही नन्दन जी बोले , ‘‘रूपसिंह , पूरा अंश छपेगा ...... उसे दे दो । मैं कमलेश्वर के लिए कुछ भी कर सकता हूं ।’’
6 जनवरी 2001 को कनाट प्लेस के मोहन सिंह प्लेस के इण्डियन काफी हाउस’ में विष्णु प्रभाकर की अध्यक्षता में कमलेश्वर जी का जन्म दिन मनाया गया । हिमांशु जोशी जी ने मुझे फोन किया । वहां बीस साहित्यकार -पत्रकार थे । नन्दन जी भी थे और बलराम भी । कार्यक्रम समाप्त होने के बाद नन्दन जी ने मेरे कंधे पर हाथ रख पूछा , ‘‘रूपसिंह, क्या हाल हैं ?’’
‘‘ठीक हूं भाई साहब ।’’
‘‘तुम्हे जब भी मेरी आवश्यकता हो याद करना ।’’ लंबी मुस्कान बिखेरते हुए वह बोले, ‘‘यह घोड़ा बूढ़ा बेशक हो गया है , लेकिन बेकार नहीं हुआ ...।’’ उन्होंने बलराम की ओर इशारा करते हुए आगे कहा , ‘‘उससे पूछो ।’’
मैं बेहद संकुचित हो उठा था । कुछ कह नहीं पाया, केवल हाथ जोड़ दिए थे । नन्दन जी मेरे प्रति बेहद आत्मीय हो उठे थे और उनकी यह आत्मीयता निरंतर बढ़ती गई थी । शायद उन्हें इस बात का अहसास हो गया था कि कानपुर के नाम पर उनसे बहुत कुछ पा जाने वाले या पाने की आकांक्षा रखने वाले लोगों जैसा यह शख्श नहीं है । उनके प्रति इस शख्श का आदर निःस्वार्थ है । बीस-बाइस वर्षों के परिचय में इसने उनकी सक्षमता से कुछ पाने की चाहत नहीं की । और यह सब कहते हुए भी वह जानते थे कि यह व्यक्ति शायद ही कभी किसी बात के लिए उनसे कुछ कहेगा । वह सही थे । और यही कारण था कि उनका प्रेम मेरे प्रति बढ़ता गया था ।
न्यूयार्क में होने वाले विश्व हिन्दी सम्मेलन की स्मारिका के सम्पादन का कार्य उन्हें करना था । एक पत्र मिला , जिसमें डा. ”शिवप्रसाद सिंह के उपन्यास ‘अलग-अलग वैतरिणी’ पर निश्चित तिथि तक आलेख मुझे लिख भेजने के लिए उन्होंने लिखा था । उन दिनों मैं लियो तोल्स्तोय के उपन्यास ‘हाजी मुराद’ के अनुवाद को अंतिम रूप दे रहा था । मेरे पास शिवप्रसाद जी के उपन्यास ‘नीला चांद’ पर अच्छा आलेख था । मैंने नन्दन जी को लिखा कि ‘अलग -अलग वैतरिणी’ के बजाय मैं ‘नीला चांद’ पर लिख भेजता हूं । उनका तुरंत पत्र आया ,‘‘ एक सप्ताह का अतिरित समय ले लो, लेकिन लिखो ‘अलग-अलग वैतरिणी’ पर ही ।’’ मुझे उनकी आज्ञा का पालन करना ही पड़ा था । बाद में एक दिन शाम सवा पांच बजे उनका फोन आया ।
‘‘रूपसिंह कैसे हो ?’’
‘‘आपका आशीर्वाद है भाई साहब ।’’
कुछ इधर-उधर की बातें और अंत में ,‘‘आज तुम पर प्रेम उमड़ आया ...... तुम्हें प्रेम करने का मन हुआ ....।’’ और एक जबर्दस्त ठहाका ।
मैं भी ठहाका लगा हंस पड़ा था ।
‘‘अच्छा प्रसन्न रहो ।’’ आशीर्वचन ।
और उनके पचहत्तरहवें जन्म दिन का निमंत्रण । इण्डिया इण्टरनेशनल सेण्टर में आयोजन था । लगा पूरी दिल्ली के साहित्यकार-पत्रकार उमड़ आए थे । नन्दन जी के कुछ मित्र बाहर से भी आए थे । उस दिन नन्दन जी बहुत ही बूढ़े दिखे थे । बीमारी ने उन्हें खोखला कर दिया था । डायलिसस पर रहना पड़ रहा था । 1933 में परसदेपुर (जिला - फतेहपुर (उत्तर प्रदेश ) में जन्मे इस प्रखर पत्रकार -साहित्यकार ने 25 सितम्बर , 2010 को नई दिल्ली के राकलैण्ड अस्पताल में तड़के तीन बजकर दस मिनट पर 77 वर्ष की आयु में इस संसार को अलविदा कह दिया ।
अत्यंत सामान्य परिवार में जन्में नन्दन जी का जीवन बेहद उथल-पुथलपूर्ण रहा । प्रेमचंद से प्रेरित हो उन्होंने अंतर्जातीय विवाह किया , जिसके बारे में उन्होंने अपने एक आलेख में लिखा था । उनके जाने से पत्रकारिता और लेखन जगत को अपूरणीय क्षति हुई है ।
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रविवार, 3 अक्टूबर 2010

यादों की लकीरें



संस्मरण

चंदनिया बुइया उर्फ चांदनी देवी

रूपसिंह चन्देल

16 अगस्त ,1981 (रविवार) को उनसे मेरी अंतिम मुलाकात हुई थी । सुबह छः बजे का वक्त था । आसमान में हल्के बादल थे और रह-रहकर फुहारें पड़ रही थीं । उनसे मिलने के लिए मैं पांच मिनट पहले घर से निकल आया । वह दरवाजे के बाहर खड़ी थीं । मैंने आगे बढ़कर उनके चरणस्पर्श किए ।
‘‘जा रहे हौ ? एकौ दिन न रुकेव ।’’
‘‘कल दफ्तर है ।’’
‘‘बिटेऊ जा रही हैं ?’’
‘‘बहुत मुश्किल से दो महीने के लिए तैयार हुई हैं ।’’
‘का बताई बबुआ .... बहुत समझावा पर सुनै का तैयार नहीं । ई उमिर मा आदमी का अपन बच्चन के पास रहा चाही .... कब तलक अकेली पड़ी रहिहैं, लेकिन ई कान ते सुनति हैं अउर दुसरे ते निकारि देति हैं ।’’
मैं उनके घर के सामने गली के साथ खड़े नीम के पेड़ की ओर खिसकने लगा । वह भी मेरे साथ खिसकने लगीं । मैंने गौर से उन्हें देखा । बहुत बूढ़ी हो गयी थीं । चेहरे पर झुर्रियां छायी हुई थीं ।
तभी मेरे घर के दरवाजे पर ताला बंद होने की आवाज आयी । उनके स्वर में हड़बड़ाहट थी । मैं तुरंत भांप गया कि वह मेरी मां का सामना करने से बचना चाहती थीं ....... मेरी मां यानी उनकी बेटी । वह मेरी नानी थीं ......अस्सी पार ।
‘‘हम चली बबुआ ..... देखिहैं तो कहिहैं कि हम तुमका कुछ पट्टी पढ़ावत रही ।’’
मैंने पुनः उनके चरणस्पर्श किए । आशीसती नानी घर की ओर लपक लीं थीं।
घर में ताला बंद कर मां सामने के त्रिवेदी परिवार के किसी सदस्य से कह रही थीं , ‘‘का बताई , जबरदस्ती जांय का पडि़ रहा है ।’’
उधर से सांत्वना में क्या कहा गया , सुन नहीं पाया । मैं नीम के पेड़ के पास खड़ा मां के आने के प्रतीक्षा कर रहा था और सोच रहा था , नानी और उनके स्वभाव के विषय में । नानी जितनी सीधी-सहज, सरल थीं, मां उतनी ही अक्खड़ । अड़ जाएं तो दुनिया की कोई ताकत उन्हें डिगा नहीं सकती थी । पूरी रात मैं उन्हें कुछ दिन अपने साथ चलकर दिल्ली रहने के लिए मनाता रहा था । नानी से भी कहा था कि वह भी समझाएं, लेकिन ‘‘हमरे कहैं ते वह जाती हुई भी न जइहैं बबुआ ।’’ नानी ने असमर्थता व्यक्त की थी , ‘‘तुम्हरे आवैं ते पहले कहा रही.......पर उनने कहा कि मैं तो चाहती ही हूं कि वह गांव मा न रहैं ।’’
और इसीलिए नानी मां का सामना टालना चाहती थीं ।
त्रिवेदी परिवार से मिलकर और ऐसा आभास देकर कि जिन्दा बचीं तो वह जल्दी ही दिल्ली को अलविदा कह आएगीं, मां भारी कदमों से आगे बढ़ रही थीं ।
पुरवामीर बस अड्डे तक पूरे रास्ते वह बुड़बुड़ाती रहीं और इस गति से चलती रहीं मानो कसाईघर जाने वाली कोई गाय । मुझे कानपुर से आसाम मेल पकड़ने की जल्दी थी और जब भी इस विषय में उन्हें कहता वह चीख उठतीं , ‘‘ मैं तेज नहीं चल सकती । जल्दी है तो चले जाव ।’’
उस दिन नानी मेरे दिमाग में यो अटकीं कि आसाम मेल में पूरे समय वह मेरे साथ रहीं और उसके बाद भी कितने ही ऐसे अवसर आए जब उनकी स्मृतियों ने मुझे अपने में समेटा और घण्टों उनकी याद में बीत गए ।
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जब भी हम बच्चे नानी का नाम पूछते वह सकुचा जातीं । कितनी ही बार पूछने के बाद एक बार बोलीं, ‘‘चंदनिया बुइया ।’’ और हो होकर हंस पड़ी थीं । नाम ठीक समझ में नहीं आया । दोबारा पूछा । फिर वही..... तीसरी बार सही नाम सुना गया । ‘लेकिन यह कोई नाम न हुआ ।’ मै मन ही मन सोचता रहा । सोचता रहा ....... वर्षों .... उम्र गुजर गई और नानी भी गुजर गईं, लेकिन उनके नाम का सही उच्चारण मैं खोजता रहा । यह बात तभी ज्ञात हो गयी थी कि यमुना पार अर्थात् बांदा-हमीरपुर में बुइया का अर्थ देवी या बाई से था , जो वहां सभी लड़कियों के नाम के साथ जोड़ दिया जाता था ।
अनुमान लगाया कि वह चांदनी देवी थीं । चांदनी देवी अर्थात मेरी नानी की मृत्यु 1982 में जब हुई तब वह लगभग नव्वे वर्ष की थीं । इस प्रकार उनका जन्म 1890-91 के आसपास कभी बांदा जिला (उत्तर प्रदेश) के एक गांव में हुआ था । तीन भाइयों की इकलौती बहन । सभी भाई लंबे छः फुटा , लेकिन बहन की कद-काठी सामान्य थी । गेहुआं रंग, गोल चेहरा, बड़ी आंखें ,हृष्ट-पुष्ट शरीर ..... होश संभालने के बाद मैंने उन्हें वैसा ही देखा था । जब मैंने होश संभाला , जाहिर है वह सत्तर के आस-पास थीं , लेकिन ऐसा नहीं लगता था कि वह बूढ़ी हो गयी थीं । उनके बूढ़े होने की प्रक्रिया बेटे (मेरे मामा) के दूसरे विवाह के बाद प्रारंभ हुई थी ।
’’’’’
चांदनी देवी की उम्र जब खेतों से ज्वार और बाजरे के भुट्टे चुन लाने की थी, तभी उनका विवाह मेरे नाना के साथ कर दिया गया । नाना, जिन्हें मैंने कभी नहीं देखा । मेरी मां या मेरे मामा (इन्द्रजीत सिंह गौतम) ने भी अपने पिता को नहीं जाना । मामा साढ़े तीन और मां जब ढाई वर्ष के थे किसी अनजान ज्वर से नाना की मृत्यु हो गयी थी । नानी तब पचीस -छब्बीस वर्ष की थीं ..... जवानी में वैधव्य । घर में तीन देवर और अकाल वर्ष । अकाल भी ऐसा कि बड़े-बड़े किसानों ने घुटने टेक दिए । घरों में चूहे दण्ड लगाते और खेतों में किसान जेठ की तपती दोपहर में जौ-चना के दाने खोजते । अकाल इतना भीषण था कि सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच गई । लोग भूखों मरने लगे । उस पर अंग्रेज सरकार और उसके जमींदारों का आतंक जीने से अधिक उन्हें मृत्यु वरण के लिए प्रेरित कर रहा था ।
तीन वर्ष अकाल की भेंट चढ़े । नानी ने उन दिनों का एकाधिक बार वर्णन किया था । घर में दो मटके चना बचे हुए थे । रात घर के हर सदस्य के हिसाब से एक मुट्ठी चना भिगो दिए जाते । सुबह अंगौछे में भीगे चना बांध नाना के भाई खेतों में पत्थर हुई मिट्टी से जूझते । बड़े-बड़े ढेलों को तोड़ते और मन को आश्वस्त करते कि आसाढ़ में यदि वर्षा हुई तब वे अच्छी फसल उगा सकेगें । वर्षा तो नहीं हुई, लेकिन उनका सबसे छोटा भाई लू की चपेट में आकर प्राण गंवा बैठा । अब शेष बचे दो भाई , जिनमें मझले कंचन सिंह सन् 1967 तक जीवित रहे थे ।
अकाल के दिनों एक दिन जमींदार का कारिन्दा सिपाहियों सहित नानी के घर आ धमका लगान वसूली के लिए । छूछे घर से क्या वसूली करता ? उसने बेइज्जत करने के लिए सिपाहियों को हुक्म दिया कि वे घर की ड्योंढ़ी उखाड़ लें । गांवों में आज भी ड्योढ़ी किसी भी घर की प्रतिष्ठा से जुड़ी होती है । सिपाही आगे बढ़े ही थे कि नानी दरवाजे की ओट हो आ खड़ी हुईं और दबंग आवाज में बोलीं , ‘‘ खबरदार, ड्योंढ़ी को हाथ मत लगाना ।’’
सिपाही ठहर गए । कारिन्दा का चेहरा देखने लगे ।
‘‘डर गए स्सालो .... आगे बढ़ो ....।’’
‘‘बढ़ो आगे .... गर्दन पर गड़ासा पड़ेगा ।’’ नानी दुर्गा बनी दरवाजे की ओट खड़ी थीं ।
कारिन्दा भी सहमा , ‘‘ठकुरानी, अकड़ से काम नहीं चलेगा । रोकड़ा गिन दो लगान का ....।’’
‘‘बताव।’’
कारिन्दा ने हिसाब बताया । नानी ने टेंट से चांदी के सिक्के निकाले और कारिन्दा की ओर फेककर कहा , ‘‘अब शकल न दिखाएव ।’’
‘‘वाह ठकुरानी ।’’ बेसाख्ता कारिन्दा के मुंह से निकला था।
नना के दोनों भाई नानी का चेहरा देखते रहे थे , लेकिन वे नानी का इतना सम्मान करते थे कि उनसे उलट यह नहीं पूछा कि ‘‘भौजाई, घर में फांके के हालात है और तुम चांदी के सिक्के छुपाए बैठी थी ।’’
वे नहीं पूछ पाए लेकिन मैंने यह बात पूछी थी । नानी ने बताया कि ‘‘कारिन्दा दो साल से लगान वसूली के लिए नहीं आया था । उसे किसान के परेशान हाल होने का ही इंतजार होता था। मैंने कुछ रकम केवल इसीलिए बचा रखी थी । कम खाकर गुजर हो ही रहा था । लेकिन लगान न देने पर अगर वह खेतों से बेदखल कर देता तब क्या होता ..... भूखे रहकर भी खेत बचाना जरूरी था ।’’
इस घटना के कुछ वर्षों में घर में पुनः सम्पन्नता आ बिराजी थी । लेकिन उस सम्पन्नता का उपभोग कंचन नाना के दूसरे भाई नहीं कर सके । कंचन नाना को अकला छोड़ वह भी एक दिन मृत्यु का शिकार हो गए थे ।
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भरे-पूरे घर में अब बची थीं नानी, मामा और मां और शायद नानी की एक विधवा ननद। उन सबका बोझ कंचन नाना के कंधों पर था । कंचन नाना का रंग बिल्कुल कंचन जैसा .... साफ-सुथरा, चमकदार चेहरा । सूर्य की रोशनी में उनका चेहरा बिल्कुल सोने की भांति दहकता । कुल मिलाकर वह भव्य व्यक्तित्व के धनी थे ।
कंचन नाना ने अपनी जिम्मदारी का निर्वहन सफलतापूर्वक किया । कुछ दिनों बाद अकाल पीडि़त नानी के तीनों भाई भी उनके यहां आ जमे थे । नाना के पास अच्छी खेती थी ...गांव में सबसे अधिक मातबर खेत । कई बाग और पड़ती पड़ी जमीन । वह पड़ती जमीन ही कंचन नाना ने बाद में मेरे पिता को दी थी ।
नानी के सबसे बड़े भाई दुलार सिंह और छोटे गजराज सिंह को ही मैं जानता था । तीसरे और शायद मंझले भाई कुछ दिन रहकर अपने गांव वापस लौट गए थे और अपनी किसी खता के कारण कभी नाना के घर नहीं आए । जबकि दुलार सिंह और गजराज सिंह ने नाना के खेत संभाल लिए थे और अपने भांजा-भांजी की परवरिश में रुचि लेने लगे थे । दोनों ही अविवाहित थे और सारी जिन्दगी अविवाहित रहे थे । कंचन नाना भी अविवाहित रहे थे ।
नानी के भाइयों के आने के बाद कंचन नाना ने खेती से अपने को मुक्त कर लिया था और गांव से पांच या छः मील दूर पाण्डुनदी के किनारे सिउली नामक गांव में जी.टी.रोड के किनारे शराब का ठेका ले लिया था । वर्षों वह उसे चलाते रहे । अच्छा धन कमाया और चार गांवों में सम्पन्न व्यक्तियों में शामिल हो गए । लेकिन तभी एक सुबह सोकर उठने पर उन्होंने पाया कि दुनिया देखने की उनकी क्षमता नष्ट हो चुकी थी । वह अंधे हो गए थे । लेकिन मेरी मां और मामा के विवाह तक वह बिल्कुल ठीक थे । यह घटना उसके कुछ दिनों बाद की थी ।
कंचन नाना ने जिस समर्पण के साथ घर संभाला था और भौजाई और उनके बच्चों की देखभाल की थी , नाना के अंधे होने के बाद नानी ने कभी उन्हें कोई कष्ट नहीं होने दिया । वह उनके हर सुख -दुख का खयाल रखती थीं । अंधा होने के बाद नाना घर छोड़कर गांव के बाहर सड़क किनारे के बाग में आकर रहने लगे थे , जहां पहले से ही जानवर बंधते थे और दो कोठरियां बनी हुई थीं ।
शादी के बाद मेरी मां कलकत्ता चली गईं और मामा की पहली पत्नी दो लड़कियों को जन्म देने के बाद जीवित नहीं रहीं । लंबे समय तक विधुर जीवन जीने के बाद मामा का पुनर्विवाह बांदा के ही किसी गांव में हुआ । मेरा अनुमान है कि मामा और इस दूसरी मामी में आयु का पन्द्रह से अघिक वर्षों का अंतर था । कुछ दिनों में ही मामा उस नवोढा की मुट्ठी में थे और नानी अधिकार-वंचिता ।
और वहीं से प्रारंभ हुआ था नानी के दुर्दिनों का सिलसिला और हम उनके लिए कुछ भी कर सकने में अपने को असमर्थ पा रहे थे । दो कारण थे ..... पहला यह कि मामी गजब की लड़ाकू थी । उसे अपने डील-डौल पर घमण्ड था । दूसरा कारण था हमारे घर की विद्रूप आर्थिक स्थिति । पिता अवकाश पाकर घर आ गए थे और कुछ ही वर्षों में उनकी जमा-पूंजी खत्म हो चुकी थी । किस आधार पर एक और पेट हम पालते , जबकि मामा गांव के समृद्धतम व्यक्तियों में गिने जाते थे ।
गहरे सांवले रंग की मामी , मोटी नाक, बड़ी आंखें और चेचकारू चेहरे वाली हृष्ट-पुष्ट शरीरा थी । नाक में जब मोटी छदाम जितनी लौंग पहनती और मटककर चलती तब धरती हिलती प्रतीत होती । कुछ वर्षों में ही उसने एक के बाद कई बच्चे पैदा किए ......शायद आठ-नौ । एक डेढ-दो साल का होता कि पता चलता दूसरा आने वाला है । पैदा करती हुई पालने के लिए वह उन्हें नानी के हवाले कर देती । बच्चा जनने से तीन महीना पहले से लेकर चार-पांच महीने बाद तक वह घर के काम छूती भी न थी । नारियल और मिश्री उसका प्रिय खाद्य था । आभूषणों की वह शौकीन थी और उसकी बाक्स का आकार उनके कारण बड़ा होता जा रहा था । घर का सम्पूर्ण स्वामित्व अपने अधीन रखने के बावजूद वह चोरी छुपे छत के रास्ते घर से सटे मुसलमानों के घरों की औरतों को आनाज बेचती और वह बेच अपने लिए दबाकर रखती । जब पचहत्तर की आयु में पूरे घर के बर्तन मांजते मैं नानी को देखता तब कलेजा मुंह को हो आता , और जब भी इस विषय में नानी से कहता कि हम उससे या मामा से बात करके किसी को बर्तन मांजने के लिए लगा लेने के लिए कह देते हैं तब नानी का चेहरा पीला पड़ जाता । लटपटी जुबान से वह कहतीं , ‘‘न बबुआ.... न कहौ । किस्मत मा जो लिखा है होंय देव ।’’
किशोरावस्था से ही मैं अन्याय के विरोध में आवाज उठाने लगा था । मैं अपने को रोक नहीं पाया । एक दिन मामी के पास गया और बोला, ‘‘ मांई (मामी) शर्म करो , इतना बड़ा शरीर पलंग पर पसरा रखा है और इतनी बूढ़ी सास से खांची भर बर्तन मंजवा रही हो ।’’
वह तमककर पलंग पर उठ बैठी और तमतमाती हुई नानी की ओर लपकी ,‘‘ये बूढ़ा.....तुम गांव भर मा हमारी बुराई करती घूमती हो ........ छोडि़ देव बर्तन ।’’ और उसने नानी को धकियाकर एक ओर करने का प्रयास किया और बर्तनों को पैर से दूर खिसका दिया । उसके धकियाने से नानी पीढ़े पर अपना संतुलन नहीं संभाल पायीं । एक ओर लुढ़क गयीं । आगे बढ़कर मैंने उन्हें संभाला ।
नानी बुक्का फाड़कर रोने लगीं, ‘‘हाय बबुआ रूप, ई दिन द्याखैं का बदा रहै ।’’
‘‘ज्यादा बुलकी न बहाव बूढ़ा, आज से ई बबुआ रूप ही तुम्हें खिलैहैं । यहां खाना-रहना है तो ई बर्तन धोवैं का ही पड़ी ।’’ पैर पटकती वह चली गई थी ।
मैं किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रहा था - असहाय ! नानी के आंखों की ओर देखने का साहस मुझमें नहीं रहा था ।
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(प्रकाश्य संस्मरण पुस्तक - ‘रोशनी की लकीरें’ (भाग दो ) में प्रकाश्य एक संस्मरण ।)