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शुक्रवार, 22 जून 2012

यादों की लकीरें - भाग दो







माइकी





संस्मरण-५


टीपू

रूपसिंह चन्देल

 दिसंबर,१९६५ के आखिरी दिनों की बात है. ठिठुरती ठंड थी. तेज पछुआ हवाएं चल रहीं थी जो गर्म कपड़ों को भेदती बदन को सिहरा देतीं.  इमली के विशालकाय पेड़, जो अधबने गांव पंचायत भवन और सत्तो जमादारिन के घर के बीच सड़क किनारे पत्रविहीन फलों से लदा-फदा सिर उठाए खड़ा था, के नीचे मां ने उसे लुढ़कते-चीखते देखा था.  उसके तीन और भाई-बहन थे, लेकिन उन सबमें शायद वही अधिक कमजोर था. अपनी मां की कोशिशों के बावजूद वह खाली पड़े पंचायत भवन का ऊंचा चबूतरा नहीं चढ़ पाता था जबकि उसके भाई बहनों ने तेज ठंडी हवा से बचने के लिए वहां शरण ले रखी थी. दिन में जब तेज धूप निकलती वे मां के साथ बाहर निकलते और इमली के पेड़ के इर्द-गिर्द दौड़ते घूमते. तब वह भी उनके साथ हो लेता. पकी इमली चुगने या ढेलों से कच्ची तोड़ गिराने के लालच में जब भी मैं पेड़ के नीचे गया उसे पेड़ और पंचायत भवन के बीच डोलते पाया. लेकिन मैं अधिक ध्यान नहीं दे सका शायद इसलिए कि मेरे ध्यान में इमली होती थी.

मां प्रतिदिन सुबह-शाम गाय-भैंसे दोहने के लिए घेर जाते समय उधर से निकलतीं और उसे देखतीं. उस दिन ठंड कुछ अधिक ही थी. शाम दूध दुहकर  घर लौटने पर उन्होंने उसका जिक्र किया,”इतनी ठंड में मर जाएगा बेचारा.” मां का स्वर द्रवित था.

“हम उसे पाल न लें?” मैंने कहा, “मैंने भी उसे देखा है—बहुत प्यारा है …”

“बाबू से पूछ लो.” बाबू का अर्थ पिता से था. कलकत्ता से अवकाश प्राप्त करके गांव लौटने के बाद पिता जी ने नाना द्वारा दिए गए खाली पड़े एक हजार वर्ग गज के प्लॉट को चहार दिवारी करवाकर उसमें एक बड़ा कमरा, जिसे गांव में कोठरी कहा जाता है,  बनावाया था, जो दो भागों में बटा हुआ था. आधे भाग को जाड़े के दिनों में गाय-भैंसों को बांधने के लिए उपयोग किया जाता और आधे में भूसा भरा जाता था.  कोठरी के बाहर छप्पर डाला गया था, जिसके एक ओर जानवरों के लिए नांदे बनायी गयीं थीं और दूसरी ओर लेटने-बैठने की व्यवस्था की गयी थी. पिता जी ने उसे ही अपनी कुटी बना लिया था, जो पासियों के मोहल्ले  के बीच  घर से दस मिनट के रास्ते पर था. वह सुबह नाश्ता, दोपहर भोजन और कुछ देर आराम करने और रात भोजन के लिए ही घर आते थे.

उसे लाने के लिए मेरी छोटी बहन मुन्नी भी उत्साहित थी. रात बाबू जब भोजन के लिए आए हम दोनों ने उन्हें उसके विषय में बताया और उसे घर लाने की जिद की.

“अपनी अम्मा से पूछ लो.” उन्होंने गेंद मां के पाले की ओर उछाल दी. वैसे भी उसे रहना घर में था और मां की अनुमति आवश्यक थी.

“अम्मा तैयार हैं.”

पिता जी चुप रहे. अगले दिन सुबह घेर से लौटते हुए मां उसे उठा लायीं. उन दिनों वह एक या डेढ़ महीने का था. कई दिनों तक हम उसके नामकरण पर बहस करते रहे. मैं उसका नाम टीपू रखना चाहता था. सभी के पास अपने नाम थे लेकिन अंततः मेरा सुझाया नाम ही रखा गया. मैं टीपू सुल्तान की वीरता से अत्यधिक प्रभावित था. शायद कुछ दिनों पहले ही उससे संबन्धित कुछ सामग्री मैंने पढ़ी थी और मेरे दिल और दिमाग पर वह नाम छाया हुआ था.

कुछ दिनों में ही वह हमारे आंगन में उछलने-कूदने लगा था. मैं नरवल से लौटता (जहां भास्करानंद इंटर कॉलेज में मैं नवीं कक्षा मे  पढ़ता था) और उसके साथ खेलता. बड़े भाई प्रति शनिवार अपने कार्यालय (एच.ए.एल.) से छूटकर अपरान्ह चार बजे तक गांव आ जाते थे. जब वह आए मैं उसके साथ घेर में था. मां और छोटी बहन भी वहीं थे. कुछ देर बाद भाई साहब वहां आए और मुझे उसके साथ खेलता देख उनकी भौंहें तन गयीं.

“इसे कहां से लाए?” उन्होंने सीधे मुझसे पूछा.

उन दिनों भाई साहब का घर पर बहुत दबदबा था. यह बात पहले भी लिख चुका हूं कि उन दिनों एक मात्र कमाने वाले वही थे. आर्थिक श्रोत के दो ही आधार थे. उनकी नौकरी और गाय-भैंसों का कटता जाने वाला दूध. भाई साहब का प्रश्न सुनकर मैं सकपका गया. वैसे भी उन्हें देखते ही मैं और मुन्नी इधर-उधर खिसक लेते थे. लेकिन इस बार निश्तार नहीं था. वह सामने खड़े प्रश्न कर रहे थे और मैं अपराधी की भांति मुंह लटकाए खड़ा था. वह अपनी मस्ती में घेर में घूम रहा था.

“इसे जहां से लाए हो---वहीं छोड़ आओ.” हुक्म सुनाकर भाई साहब घेर से बाहर निकल गए थे.

उनके जाते ही रुंआसे स्वर में हमने अम्मा से पूछा, “अब क्या करें?”

“कहीं नहीं जाएगा.” मां बोली थीं. मां हृदय से कोमल थीं, लेकिन बेहद जिद्दी. एक बार किसी बात का निश्चय कर लें तो हजार नुकसान के बाद भी वह अपनी बात पर अडिग रहती थीं. वह बेहद खुद्दार थीं. मां का निर्णय सुनकर हमारी बांछे खिल गयीं थीं.

“जगरूप (बड़े भाई) डेढ़ दिन के लिए आते हैं---यह उनका क्या बिगाड़ेगा---बड़ा होकर बाबू के साथ यहां घेर में रहेगा---सुरक्षा ही रहेगी.” मां ने दूर की बात सोच रखी थी.

घेर से लौटते हुए दूध की बाल्टी मैंने थामी थी और मां ने टीपू को गोद में उठा लिया था.

भाई साहब ने यह दृश्य देखा, लेकिन कुछ बोले नहीं. हमने सोचा कि उन्होंने उसे सड़क छाप कुत्ता सकझा होगा. अब उन्हें पता चला कि हमने इसे पाल लिया है इसीलिए चुप हैं.

रात या तो वह मेरे पायताने चारपाई पर रजाई के नीचे दुबका रहता या मां के. कुछ दिनों में ही वह  बड़ा और हृष्ट-पुष्ट हो गया. अब वह सुबह-शाम मां के साथ उनके बगल में चलता हुआ घेर जाता और उनके साथ लौटता—उनके बॉडीगार्ड की भांति.

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समय बीतता गया. एक वर्ष में उसने अपनी पूरी ग्रोथ ले ली. था तो देसी नस्ल का लेकिन देखने में सुन्दर था. कुछ दिनों तक चुप रहने के बाद भाई साहब ने पुनः उसे भगा देने का राग अलापना शुरू कर दिया था. हमारा प्रयास होता कि  शनिवार-रविवार वह अधिक से अधिक समय तक घेर में रहे. लेकिन पिता जी के खेतों की ओर जाने और मां के घर में रहने पर उसे अकेले वहां छोड़ा भी नहीं जा सकता था. ऎसी स्थिति में हम उसे मामा की चौपाल में रखते. उनका घर मेरे घर से जुड़ा हुआ था. लेकिन इस सबके बावजूद भाई साहब और मां के बीच उसे लेकर वाक युद्ध होने लगा था. मां किसी भी कीमत में उसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं थीं. हम भी यही चाहते थे. जबकि भाई साहब उसे भगा देना चाहते थे. पिता जी अपने स्वभाव के अनुसार चुप रहते थे.

वह शाम मां के साथ जब घेर से लौटता घर के बाहर चबूतरे पर बैठता. मुस्लिम  मोहल्ला  मेरे मोहल्ले से सटा हुआ था और सुबह फतेहपुर-कानपुर शटल पकड़ने के लिए उस मोहल्ले के कुछ लोग तहमद बांध स्टेशन जाते और शाम उसी वेशभूषा में कानपुर से लौटते हुए मेरे दरवाजे के सामने से गुजरते. उन्हें देखकर वह भौंकता. आश्चर्यजनक बात यह थी कि गांव के अन्य किसी के भी वहां से निकलने पर वह भौंकता नहीं था. कुछ दिनों तक मुसलमानों ने दबी जुबान शिकायत की, “बिट्टी (मां का गांव का नाम) इसे बांधकर रखो—किसी को काट लेगा.”

लेकिन हम लोगों ने उसे बांधा नहीं.  एक दिन मुश्ताक अहमद ने जब मां से कहा, “बिटेऊ, हम सब पर ही क्यों भौंकता है?”

“भइया का कही?” मां ने उत्तर दिया.

“इसे हमारी बिरादरी से खास चिढ़ है. आप इसे बांधकर रखो वर्ना किसी दिन हम इसे गोली मार देंगे.”

कई मुसलमान परिवारों में दोनाली थी. मां ने एक-दो दिन सोचा फिर उसे सुबह-शाम बांधने लगीं. अब वह उन लोगों के आते-जाते उछल-उछलकर आक्रामक मुद्रा में भौंकता. बाद में स्थिति यह हुई कि वह दिन में भी किसी तहमद वाले को देखकर आक्रामक मुद्रा में भौंकने लगा था. उसे बांधकर रखन विवशता हो गयी. इसका परिणाम यह हुआ कि उसके चारों पैर टेढ़े हो गए.  उसकी चाल धीमी और खराब हो गयी थी. भाई साहब को जब वह स्वस्थ सुन्दर अवस्था में स्वीकार नहीं था तब उस स्थिति में वह उसे कैसे बर्दाश्त करते. अब प्रत्येक शनिवार-रविवार उसे लेकर मां से उनकी लंबी बहसें होने लगीं थीं. मां अपमानित अनुभव करती हुई रोतीं लेकिन टीपू को अपने से अलग न करने का अपना निर्णय दोहरा देतीं.

कुछ समय और बीता. १९६७ की होली का दिन था. सब होली के रंग में मस्त थे. टीपू मामा की चौपाल के बाहर  नीम के पेड़ के नीचे लेटा हुआ था. बारह बजे के लगभग भाई साहब उधर पहुंचे और उसे आराम फरमाते देखकर उनका पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया. मैं चौपाल के बाहर चबूतरे पर बैठा हुआ था. मां घर में पकवान बना रही थीं. टीपू ने बड़े भाई को देखा तो सिमटकर बैठ गया. शायद कुछ अनहोनी को उसने भांप लिया था. बड़े भाई टीपू की ओर बढ़े और हुमककर उसकी पीठ पर लात जमाते हुए चीखे, “भाग स्साले---“.

टीपू किकियाता पासियों के मोहल्ले की ओर भाग गया. मेरा साहस नहीं हुआ कि मैं उसके पीछे दौड़कर जाता और उसे पकड़ लाता. भाई साहब वहां तब भी खड़े थे. मैं कलप कर रह गया. लेकिन यह सोचकर कि कुछ देर बाद टीपू स्वयं ही वापस लौट आएगा…मन को मनाकर रंग खेलने की तैयारी में व्यस्त हो गया था. मेरे गांव में रंग दोपहर दो बजे के बाद खेला जाता था.  लोग गाते-बजाते हर गली-मोहल्ले में हर दरवाजे जाते और रंग खेलते-गले मिलते. रंग देर रात तक चलता . रात नौ बजे के लगभग जब मैं घर लौटा मां ने टीपू के विषय में पूछा. मैंने दोपहर की घटना उन्हें बतायी. आहत स्वर में मां बोलीं, “आखिर जगरूप ने अपने मन का कर लिया…दोपहर खाने के लिए उसे खोजती रहीं---सभी जगह आवाज दी---घेर में खोजा, लेकिन वह नहीं मिला. इतनी रात बीत गयी –वह नहीं लौटा.”

मुझे याद है कि उस रात न मां ने भोजन किया और न मैंने. अगले दिन सुबह छः बजे ही भाई साहब कानपुर चले गए थे. साढ़े सात बजे उन्हें आफिस पहुंचना था. मैं टीपू को खोजने के लिए खेतों की ओर गया. स्टेशन गया---उसे बागों में आवाजें दी लेकिन उसका कहीं अता-पता नहीं था. घेर से लौटने के बाद मां ने भी गांव के आस-पास उसे खोजने का प्रयास किया . हमारी खोज कई दिनों तक जारी रही. हमने गांव के चारों ओर उसे खोजा---यहां तक आसपास के दूसरे गांवों में भी खोजने गया.यह जानने के लिए जंगल छान मारा कि कहीं किसी साउज ने उसे न खा लिया हो. लेकिन ऎसा भी नहीं दिखा. हमारे लिए यह रहस्य ही रहा कि वह कहां लुप्त हो गया था. निश्चित ही वह अपने विषय में घर में होने वाले कोहराम को समझता रहा होगा और भाई साहब की मार से आहत होकर उसने उस घर,गांव को  ही नहीं उस क्षेत्र को भी छोड़ देने का निर्णय किया होगा.

मैं टीपू को कभी भूल नहीं पाया. आज भी उसकी वही छवि मेरे मस्तिष्क में अंकित है. टीपू की स्मृति ही ने मुझे माइकी को लाने के लिए उत्साहित किया. माइकी आज  मेरे जीवन का ऎसा अभिन्न अंग बन गया है कि न यह मेरे बिना रह सकता है और न मैं इसके बिना.

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6 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (24-062012) को चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

सुभाष नीरव ने कहा…

यह संस्मरण भी अपनी मार्मिकता के लिए याद किया जाएगा। बहुत ही सधी हुई और साहित्यिक, कलात्मक भाषा में एक और जानदार संस्मरण… कुछ लोगों को कुत्ते का नाम किसी एतिहासिक बड़ी हस्ती के नाम पर रखा जाना, आपत्तिजनक लग सकता है… दूसरी बात,क्या इसका शीर्षक 'टीपू से माइकी' या इसी प्रकार का कोई और शीर्षक नहीं रखा जा सकता?

ashok andrey ने कहा…

bhai chandel tumhara yeh sansmaran pada,padte vakt sochta raha ki jeev chhoti-chhoti baton ke prati kitne sanvvedan sheel hota hain yeh samajhne kii baat hai.ham log aksar ise nakarte rehte hain.jo galat hai.tumne tippu ke madhyam se unke prati ek ese drishtikon ko udgatit kiya hai jise sabhi ko mehsusna tatha unke prati prem bhav ko viksit karna chahiye jise har jeev samajhta hai.aur phir doggi to vaise bhee vaphadar hota hai,har mushkil men apne palak ka saath deta hai.bahut sundar.

PRAN SHARMA ने कहा…

IS MAARMIK SANSMARAN PAR EK UMDA
FILM BAN SAKTEE HAI . KISEE N KISEE
NIRMAATA KO ISKE NIRMAN KE LIYE AAGE
AANAA CHAHIYE .

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

आज 09/07/2012 को आपकी यह पोस्ट (दीप्ति शर्मा जी की प्रस्तुति मे ) http://nayi-purani-halchal.blogspot.com पर पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Shanti Garg ने कहा…

बहुत बेहतरीन रचना....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।