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मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

यादों की लकीरें



संस्मरण


विनष्ट होना एक प्रतिभा का


रूपसिंह चन्देल

उनकी लापरवाही कहें या सोची-समझी आत्मघाती जिद , लेकिन उससे हिन्दी ने न केवल एक प्रतिभाशाली लेखक बल्कि एक प्रखर पत्रकार खो दिया . बात रमेश बतरा की है . रमेश से मेरी मुलाकात 1984 में हुई थी . वह सारिका में उपसम्पादक थे और 10 , दरियागंज , नई दिल्ली में बैठते थे , जहां सारिका , दिनमान और पराग के कार्यालय भी थे . सारिका कार्यालय जाने का मेरा सिलसिला 1982 के आसपास प्रारंभ हुआ था . तब मेरा परिचय केवल बलराम से था और महीना -दो महीने में कंधे पर जूट का थैला लटकाए ( जिसका उन दिनों फैशन था ) मैं सारिका जा पहुंचता और कुछ देर बलराम के सामने पड़ी कुर्सी पर बैठता और बलराम को काम करते या किसी से बतियाते देखता रहता . यदि मैं एक घण्टा वहां बैठता तो बलराम से नहीं के बराबर ही बात होती. कारण मैं भलीभांति समझता था. तब तक मेरा कोई साहित्यिक वजूद नहीं था और न ही मैं इस स्थिति में था कि किसी को कोई बड़ा क्या छोटा लाभ ही पहुंचा सकता . साहित्य में ऐसी स्थितियां सदैव रहीं लेकिन आठवेंं दशक में उनका विकास हुआ और आज वह सब चरम पर है ।

1984 तक सारिका में मेरी केवल एक -दो लघुकथाएं ही प्रकाशित हुई थीं । कहानियां सखेद लौटती रही थीं । उसमें मेरी केवल एक ही लंबी कहानी 'पापी' उपन्यासिका के रूप में मई 1990 में प्रकाशित हुई . उसके बाद सारिका बंद हो गयी थी .

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रमेश बत्तरा से सुभाष नीरव का गहन परिचय तब तक स्थापित हो चुका था. मेरा पहला कहानी संग्रह ‘पेरिस की दो कब्रें’ 1984 में किताबघर से प्रकाशित हुआ . सारिका में जिन दो लोगों को मैंने संग्रह दिया , वे बलराम और रमेश बतरा थे . रमेश से तभी परिचय हुआ , और उस परिचय के लिए मुझे सुभाष नीरव के परिचय का सहारा लेना पड़ा था .

बतरा से परिचय होने के बाद मैं जब भी सारिका जाता उन्हीं के पास बैठता । उन दिनों वहां के

सम्पादकीय विभाग में लेखकों का आवागमन लगा रहता था । मेरा जाना प्राय: शनिवार को होता और मुझ जैसे कुछ अन्य सरकारी बाबू लेखकों के लिए भी वही दिन सुविधाजनक होता था और उनके पत्र-पत्रिकाओं के कार्यालय जाने के पीछे वहां कार्यरत लोगों से याराना निभाने से अधिक अपनी रचना के लिए उनकी दृष्टि में बने रहने का भाव ही अधिक होता था और निश्चित ही मेरे मन में भी यह नहीं था यह कहना हकीकत से मुंह चुराना होगा . गाहे-बगाहे लेखक अपने परिचित उप-सम्पादक को वहां विचारार्थ पड़ी अपनी कहानी की याद भी दिलाते और मुझे याद है कि परिचय के बाद मैंने भी रमेश बतरा से अपनी एक कहानी की बाबत पूछा था और पान की पीक हलक से नीचे उतारते हुए मुंह ऊपर उठा मुस्कराते हुए बतरा ने कहा था ,''पता करूंगा .''

और सारिका में रहते उन्होंने शायद ही कभी मेरी कहानी के विषय में पता किया और आज मैं समझ सकता हूं कि वह इतना सहज भी न था । कहानी कहानियों के अंबार में किसके पास थी , कैसे पता चल सकता था । सारिका में कहानियों के विलंबित होने का चौदह वर्षों का रिकार्ड दर्ज है ।

लेकिन सभी लेखकों को लंबी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती थी । मेरे कुछ समकालीन ऐसे थे, सारिका में जिनका विशेष खयाल रखा जाता था और जब वे कंधे पर जींस का थैला लटकाए वहां के सम्पादकीय हॉल में प्रवेश करते किसी हीरो की भांति उनका स्वागत किया जाता , लेकिन उस स्वागत में रमेश बतरा का स्वर शामिल नहीं होता था . यहां यह बताना अनुचित नहीं कि सारिका के उन दिनों के वे हीरो लेखक आज कहीं नहीं हैं . वे अपनी रचनाओं की उत्कृष्टता के बल पर नहीं छपते थे (रचनाएं ऐसी थी भी नहीं ) , छपते थे अपने संपर्कों के कारण . खैर यह इतर प्रसंग है जिस पर फिर कभी लिखा जाएगा .

रमेश बतरा का व्यवहार सभी के साथ समान होता । पहचान के लिए भटकते मुझ जैसे युवक के साथ वह जितनी बात करते , दूसरों से भी उससे अधिक नहीं करते थे . रमेश की कम बोलने की आदत थी… कम श्ब्दों में , लेकिन सार्थक , बात कहते .

पान के वह शौकीन थे . लेकिन शराब के भी थे , मुझे जानकारी नहीं थी . मैं केवल इतना ही जानता था कि आधुनिक लुघुकथा विधा को आंदोलन का रूप देने में उस व्यक्ति की अहम भूमिका थी . रमेश की पहल पर ही उनके सम्पादन में जालंधर से मिकलने वाली 'तारिका ' का लघुकथा विशेषांक प्रकाशित हुआ था और पहली बार किसी पत्रिका ने यह कार्य किया था . सारिका में रहते हुए उसमें लघुकथाओं के प्रकाशन की रूपरेखा तय करने में रमेश बतरा की भूमिका को समझा जा सकता है . सारिका के लघुकथा विशेषांकों ने इस विधा के अनेक लेखक तैयार किए और उन सभी के संपर्क रमेश बतरा से थे , जिन्हें वे अपने लिए प्ररणा श्रोत मानते थे . लघुकथाकारों के प्रति रमेश के हृदय में एक विशेष भाव था . अनुमान लगाया जा सकता है कि वह इस विधा के विकास के प्रति कितना समर्पित थे . वह स्वयं एक सशक्त लघुकथाकार थे लेकिन उन्होंने अनेक उल्लेखनीय कहानियां भी लिखीं थीं . सारिका से नवभारत टाइम्स में जाने से पूर्व उन्होंने मुझसे जिक्र किया कि वह एक उपन्यास लिखने की योजना बना रहे हैं , लेकिन वह उसे लिख नहीं सके थे .

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कमलेश्वर के बाद कन्हैयालाल नंदन सारिका के सम्पादक बने थे । बाद में नंदन जी ने सारिका के साथ-साथ दिनमान और पराग का कार्यभार भी संभाला . उन दिनों पत्रकारिता की दुनिया में कन्हैयालाल नंदन एक चमकता हुआ सितारा थे . लेकिन कुछ वर्षों में ही स्थिति ऐसी बदली कि उन्हें केवल नवभारत टाइम्स के रविवासरीय के प्रभारी के रूप में ही कार्य करना पड़ा . अब वह 10 , दरियागंज के बजाय बहादुरशाह ज़फरमार्ग स्थित टाइम्स ऑफ इंडिया बिल्डिगं में बैठने लगे थे . रमेश बतरा भी नंदन जी के साथ नवभारत टाइम्स में शिफ्ट हो गए थे . रमेश से मिलने मैं कभी-कभी वहां जाने लगा था .

मैंने नवभारत टाइम्स के रविवासरीय संस्करण में प्रकाशनार्थ एक कहानी भेजी । लगभग छ: महीने बीत गए . एक दिन रमेश को कहानी की याद दिलाई . बोले , ''नंदन जी के पास है . छप जाएगी .'' कुछ देर बाद उन्होंने उठते हुए कहा , ''चल तुझे पान खिलाऊं '' पनवाड़ी की दुकान तक जाते हुए गंभीर स्वर में उन्होंने कहा , ''चंदेल , एक बात कहूं.....?''

''हां....''
''अखबारों में कहानी प्रकाशित करवाने का मोह त्याग दो ....''
''क्यों ?''
''क्योंकि जिन्दगीभर तुम अखबार में छपते रहोगे तब भी कहानीकार की पहचान नहीं मिलेगी ।बेहतर होगा कि लघुपत्रिकाओं में प्रकाशित हो .''

मैंने रमेश की बात पर गंभीरता-पूर्वक विचार किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि रमेश ने ठीक कहा था ।

रमेश बतरा ने 1989 में स्कूटर खरीदा सौ सी।सी. का . उसे लेकर वह बहुत दुखी थे . दुख था कि किसी को पीछे बैठा लेने पर पुल की चढ़ाई पर स्कूटर हांफता हुए खड़ा हो जाता था . सोचिए जब पत्नी जया रावत को बैठाकर वह चलते होगें और पुल की चढ़ाई पर स्कूटर खड़ा हो जाता होगा तब उनपर क्या बीतती होगी . एस.पी. पिता की बेटी जया को रमेश के हिचक-हिचक कर चलने वाले स्कूटर से कोफ्त अवश्य होती होगी . उन्हीं दिनों उन्होंने एक पत्रिका निकालने की योजना बनाई - हिन्दी-पंजाबी की संयुक्त पत्रिका निकालना चाहते थे वह . मित्रों से सहयोग लेना प्रारंभ किया . नीरव को रसीद बुक भी पकड़ा दी . कम से कम सौ रुयए की राशि देनी थी जो बिना रसीद ही मैं उन्हें दे आया था . एक दिन उन्होंने बताया कि लगभग छ: हजार रुयए एकत्रित हो गए हैं . अब वह रचनाएं मंगाएंगें और पत्रिका छ: महीनों के अंदर पत्रिका हमारे हाथ में होगी . लेकिन वह सब होता उससे पहले ही वह टाइम्स ऑफ इंडिया छोड़ नंदन जी के साथ सण्डेमेल में सहायक सम्पादक होकर चले गए थे . नंदन जी सण्डेमेल के सम्पादक थे .

बाद में मित्रों ने बताया कि पत्रिका के लिए एकत्रित धनराशि उन्होंने खर्च कर दी थी ।

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सण्डेमेल में उनसे मेरी दो मुलाकातें ही हुई । एक तब जब एक साथ प्रकाशित अपने दो कहानी संग्रह - 'हारा हुआ आदमी ' (पारुल प्रकाशन) और 'आदमखोर तथा अन्य कहानियां ' (पराग प्रकाशन ) उन्हें सण्डेमेल में समीक्षार्थ देने गया था और दोबारा कुछ दिनों बाद ही तब जब अपने द्वारा सम्पादित लघुकथा संकलन 'प्रकारांतर' की प्रति नंदन जी को भेंट करने गया , क्योंकि जिन तीन साहित्यकारों को संकलन समर्पित था उनमें नंदन जी एक थे . उसके बाद वर्षों रमेश से मेरी मुलाकात नहीं हुई . सुभाष नीरव से उनके समाचार मिलते रहते , क्योंकि दोनों के पारिवारिक संबन्ध थे और सुभाष उनसे दफ्तर में कम घर ही अधिक मिलते थे . सुभाष को या तो पता नहीं था या उन्होंने जिक्र करना उचित नहीं समझा .... रमेश और उनकी पत्नी के बीच पटरी बैठ नहीं पा रही थी . कारण जो भी रहा हो .... रमेश तनाव में रहने लगे , और पीने की मात्रा बढ़ गयी . कुछ मित्रों के अनुसार वह सण्डेमेल कार्यालय में भी पीने लगे थे और वहां से उनके हटने के कारणों में शायद यह भी एक रहा होगा .

सण्डे मेल से नौकरी छूटने और तनावपूर्ण पारिवारिक स्थितियों के कारण रमेश ने शायद अपने को तबाह (Ruin) कर लेने की ठान ली थी । एक प्रतिभा का इस प्रकार विनष्ट होना दुर्भाग्यपूर्ण था . ऐसी स्थिति में मित्र बिखरने लगते हैं . इस सबका जो दुष्परिणाम होना था.... हुआ ..... रमेश का स्वास्थ्य चौपट हो गया . शरीर में अनेक बीमारियों ने घोसला बना लिया . गुर्दे खराब हो गए और एक दिन उन्हें अस्पताल के हवाले होना पड़ा . नियमित उन्हें अस्पताल देखने जाने वालों में कमलेश्वर थे , जिन्होंने डाक्टरों से कहा था , ''रमेश का ऑपरेशन आवश्यक है तो आप करें डाक्टर ..... पैसों की परवाह न करें . जितना पैसा खर्च होगा मैं दूंगा .'' यह बात कमलेश्वर जैसा मानवीय सरोकारों से युक्त कोई दिलेर व्यक्ति ही कह सकता था . अनुमान लगया जा सकता है कि अपने साथ काम करने वालों को कमलेश्वर कितना प्रेम करते थे . रमेश ने मुम्बई में सारिका में कमलेश्वर जी के साथ काम किया था . लेकिन रमेश बतरा की स्थिति इतनी खराब थी कि ऑपरेशन के बाद भी डाक्टरों को उनके बचने की आशा न थी .

अंतत: 15 मार्च , 1999 को रमेश बतरा इस संसार को अलविदा कह गए थे । हिन्दी कथा-साहित्य का एक स्तंभ गिर गया था . कहानीकार के रूप में आलोचक अब उन्हें भूल चुके हैं , लेकिन लघुकथाकारों ने आधुनिक लघुकथारों के बीच उन्हें शीर्ष स्थान पर अवस्थित कर रखा है और मुझे विश्वास है कि वहां उनका स्थान सदा के लिए सुरक्षित रहेगा . जहां तक कहानी की बात है , आज रमेश की कहानियों की उपेक्षा करने वाले आलोचक उनके सारिका में रहने के दौरान उनके नाम और कहानियों की माला जपते थे . इससे हिन्दी आलोचना के दोगलेपन को समझा जा सकता है .

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रमेश बतरा की मृत्यु के बाद मित्रों ने साहित्य अकादमी में उनकी शोक सभा के आयेजन का कार्यक्रम तय किया और अकादमी प्रशासन से हॉल के लिए अनुरोध किया , लेकिन साहित्य अकादमी ने बहुत ही बेरुखी के साथ हॉल देने से इंकार कर दिया था । प्रशासन ने हॉल देने से इंकार किया लेकिन साहित्यकारों-पत्रकारों को साहित्य अकादमी अपने लॉन में शोक सभा करने से रोक नहीं सकी . 18 मार्च 1999 को शायं चार बजे बड़ी संख्या में वहां एकत्र होकर पत्रकारों और साहित्यकारों ने रमेश बतरा को श्रद्धांजलि दी थी .

उस दिन साहित्यिक सरोकारों और साहित्यकारों के लिए समर्पित रहने की बात करने वाली साहित्य अकादमी का जो चरित्र प्रकट हुआ पतन की ओर उसके बढ़ते कदमों का वह एक प्रमाण था ।

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18 टिप्‍पणियां:

सहज साहित्य ने कहा…

भाई रमेश बतरा जी से मेरी मुलाकात 1989 में(जुलाई या अगस्त का महीना रहा होगा)शाहदरा की एक लघुकथा गोष्ठी में हुई । सुकेश साहनी भी आए थे ।गाज़ियाबाद से कमलेश भट्ट 'कमल' भी साथ थे । बतरा जी के भारी भरकम हाथ की ऊष्मा मुझे आज भी याद है । सण्डे मेल में मेरी लघुकथा-खुशबू तथा गीतकार किशन सरोज का इण्टर्व्यू भी छापा ।उनकी लघुकथाओं में गज़ब का कसाव है ।विषय की नवीनता तो है ही ।
आपका यह संस्मरण प्रभावशाली है।

pran ने कहा…

KAHANI HO,UPNYAAS HO YAA SANSMARAN HO,AAPKEE
LEKHNI KHOOB CHALTEE HAI.RAMESH BATRA PAR LIKHA
AAPKA SANSMARN BHEE RAMAKAANT KE SANSMARAN SE
KAM NAHIN HAI.AATMEEYTAA SAARE LEKH MEIN HAI.

shahroz ने कहा…

main unse unke aakhri dinon mein mil paaya .aur .....kya kahun bahut saral aur nirmal paaya.ye bhi dekha ki jinke liye unhon ne bahut kuch kia tha.vo unse nazar ghumaaye ghooma karte the.

bahut yaad aayi.

aaj bhi kai prtibhaayen nasht ho rahi hain.
ye chalan hai ki ham log jite-jee aise logon se kinaare rahte hain.aur marte hi unke gungaan karne lagte hain.

बेनामी ने कहा…

bhayee chnadel,

ramesh batra se meri mulakat to kabhi nahin hui lekin unke baare mein padha aur suna hai. aapka sansmaran padha. jankari badhi hai.

krishnabihari

बेनामी ने कहा…

तेरी छोटी-सी एक भूल ने सारा गुलशन जला दिया--भाई रमेश बतरा के संदर्भ में यह पंक्ति मालूम नहीं क्यों मुझे अक्सर याद आ जाती है। आज पत्रकारिता अथवा कहानी के क्षेत्र में यदि उनको कोई याद नहीं करता है तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। आज का युग लाभ दिला सकने वालों को ही याद करने व याद रखने का युग है। शायद इसी वजह से मेरा मन विशेषत: दिल्ली को साहित्य, पत्रकारिता और राजनीति का केन्द्र मानने की बजाय इनकी मण्डी मानता है, लेकिन हताशा का अनुभव नहीं करता है। मरने वालों की तो बात ही क्या, दिल्ली वाले तो लाभकारी न रह गए जिन्दा लोगों पर कफन डाल देते हैं; और इन्होंने जिस पर कफन डाल दिया, समझ लो इनके लिए तो वह हमेशा के लिए मर गया।

दिल्ली में रहते हुए भी आपने रमेश बतरा जैसे उपेक्षित व्यक्तित्व पर कलम चलाने की आवश्यकता महसूस की और उसे अंजाम भी दिया, इससे सिद्ध होता है कि दिल्ली में गाँव और गँवार दोनों अभी भी जीवित हैं। मुझे रमेश बतरा की बताई हुई एक बात हमेशा याद रहती है--'बलराम, अनबन होने पर जब बाप के सामने से उठकर सड़क पर आ गया था, तब बदन पर पहन रखे कपड़ों के अलावा मेरे पास कुछ नहीं था…और जब पत्नी का घर छोड़कर सड़क पर आया, तब याद आया कि नजर का अपना चश्मा मैं मेज पर ही रखा छोड़ आया हूँ। तकलीफ तो हुई, लेकिन उसे लेने के लिए मैं दोबारा उस घर की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ा।' मैं समझता हूँ कि यह उनके आत्माभिमान की ऊँचाई थी कि एक देहरी से बाहर आ जाने के बाद न तो वे पिता की और न ही पत्नी की देहरी के भीतर पुन: प्रविष्ट हुए।
बावजूद बहुत-सारी अच्छाइयों के रमेश बतरा दैहिक-पतन की ओर बढ़ते अपने कदमों को नहीं रोक सके। उनकी मौत के लिए मैं उनके सर्किल के सिर्फ एक व्यक्ति को जिम्मेदार मानता हूँ--खुद रमेश बतरा को।


भाईसाहब, नेट की किसी खराबी के कारण टिप्पणी को आप तक मेल के जरिए भेजना पड़ रहा है। कृपया देख लें।
बलराम अग्रवाल

Tejinder ने कहा…

भाई चंदेल जी,

आज रमेश बत्तरा पर आपका संस्मरण पढ़ कर मन में कहीं एक टीस सी उभरी। मेरी उनसे तीन चार मुलाक़ातें हुई थीं - दो सारिका के दफ़्तर में दरिया गंज में और दो सण्डे मेल के दफ़्तर में।

मुझे न तो अपने दोस्त पर कोई टिप्पणी करनी है और न ही आज के ज़माने से शिकायत। रमेश ने अपने जीवन का ढर्रा स्वयं तय किया और ख़ुद ही भुगता भी। मुझे लगता है कि हर व्यक्ति अपना भाग्य स्वयं लिखता है और स्वयं ही फ़सल भी काटता है।

मैनें कभी भी रमेश को अपने कर्मों पर अफ़सोस करते नहीं सुना। लेकिन मुझे एक बात का अफ़सोस हमेशा रहेगा कि रमेश बत्तरा जितना बड़ा कथाकार हो सकता था, वह हो नहीं पाया।

रमेश बत्तरा, महेश दर्पण, सुरेश उनियाल, वीरेन्द्र जैन और बलराम - सारिका के पंज प्यारे हमेशा हमारे दिलों में जीवित रहेंगे।

रूप भाई एक ख़ूबसूरत लेख के लिये बधाई।

तेजेन्द्र शर्मा
महासचिव - कथा यूके
लंदन

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

मान्यवर कंबोज जी

विलंब से आप और बलराम अग्रवाल के प्रति आभार व्यक्त कर रहा हूं क्योंकि रमेश का यह संस्मरण जिस रूप में प्रस्तुत कर सका हूं आप दोनों का सहयोग मिले बिना शायद इस रूप में संभव नहीं हो पाता. आपने मेरे लिए रमेश के दो चित्र उपलब्ध करवाये और बलराम अग्रवाल ने उनकी मृत्यु तिथि का मेरा भ्रम दूर किया.

आप दोनों के प्रति पुनः आभार .

चन्देल

सुभाष नीरव ने कहा…

भाई चन्देल, तुम्हारा रमेश बत्तरा से जो भी थोड़ा-बहुत परिचय रहा, उस आधार पर तुमने उन्हें अपने संस्मरण के माध्यम से याद तो किया। ऐसा तुम्हारे भीतर के एक अति संवेदनशील साहित्यकार के कारण ही है। वरना रमेश बत्तरा के संग उठने-बैठने वालों और सारिका, रविवार्ता, संडे मेल में उनके संग काम करने वाले सहकर्मियों को वे कब याद आते हैं। भाई बलराम अग्रवाल ने दिल्ली और यहां के साहित्यिक वातावरण को लेकर बेहद कड़वी सच्चाई की और संकेत किया है। यहाँ तो साहित्यिक राजनीति के चलते अच्छे खासे समर्थ लेखक पर उसके जीवित रहते ही जब कफ़न डाल देने के षड्यंत्र होते रहते हों, तब उसकी मृत्यु पश्चात भला कौन याद करेगा उसे। रमेश बत्तरा जैसे होनहार और समर्थ लेखक ने कोई कम महत्वपूर्ण साहित्य नहीं लिखा है। लघुकथाएं और कहानियाँ भले ही उन्होंने गिनती में कम लिखी हों, पर वे सब उनके समकालीन लेखकों की रचनाओं से किसी भी तरह से कमतर नहीं थीं/हैं। “दूसरी मौत”’ “फाटक” जैसी कहानियों अविस्मरणीय कहानियाँ हैं उनकी। “दूसरी मौत” अपने शिल्प और नवीन प्रयोग के चलते एक रूटीन-से विषय ‘दहेज’ पर बहुत ही सशक्त और प्रभावकारी कहानी है। इस कहानी का रमेश ने स्वयं नाट्य रूपान्तर भी किया था जिसे मैंने टाइप किया था। यह नाटक दिल्ली के अलावा जहाँ-जहाँ भी खेला गया, बहुत सफल रहा।

सुभाष नीरव ने कहा…

(पिछ्ली टिप्पणी का शेषांश(एक)…)
लेकिन, रमेश बत्तरा बहुत ही सौम्य और शान्त रहने वाले व्यक्ति थे, किसी साहित्यिक दंद-फंद में विश्वास नहीं करते थे, वे प्रायोजित ढ़ंग से अपनी रचनाओं/किताबों पर चर्चा करवाने से सदैव कतराते रहे। मुझे याद है जब जनवादी लेखक मंच की ओर से उनके कहानी संग्रह “फाटक’ पर कांस्टीच्यूशनल क्लब में गोष्ठी रखी गई थी, उन्होंने मुझसे कहा था – ‘सुभाष, ये मेरे मित्र हैं और मेरी किताब पर गोष्ठी रख रहे हैं पर मैं जानता हूँ, इससे होने-हवाने वाला कुछ नहीं। ये सब मित्रता निभाने वाली बात है।’

सुभाष नीरव ने कहा…

(पिछ्ली टिप्पणी का शेषांश(दो)…)
रमेश बत्तरा, सौम्य और शान्त व्यक्ति तो थे पर गलत बात को गलत कहने से नहीं चूकते थे। राजेन्द्र यादव जी ने हिन्दी अकादमी के लिए हिन्दी कहानियों पर एक किताब संपादित की थी जिसमें उन्होंने हिन्दी के बहुचर्चित कथाकार भीष्म साहनी की कोई कहानी शामिल नहीं की थी। इसके विरोध में रमेश ने एक आलेख लिखा था जिसे छपने से पूर्व मुझे पढ़वाया था। आलेख में राजेन्द्र जी की जो उन्होंने खिंचाई की थी, उसे मैं देखकर दंग था। मेरे मुंह से कुछ नहीं निकला था, बस मैं रमेश के चेहरे की ओर कुछ क्षण देखता रह गया था।

सुभाष नीरव ने कहा…

(पिछ्ली टिप्पणी का शेषांश(तीन)…)
वे मेरी हैरानी और आशय समझ गए और मुंह में रखे पान को थूक कर (मुंह में पान होने के कारण वे बहुत कम बोलते थे और जब उन्हें कुछ बोलना होता था तो पहले पान को थूकते थे, फिर बोलते थे) बोले- “यार, हद हो गई। राजेन्द्र यादव जैसा व्यक्ति ऐसा करे, अजीब नहीं लगता तुझे? क्या भीष्म साहनी हिन्दी कथा साहित्य से खारिज कर दिया जाने वाला नाम है ? ऐसा कोई नौसिखिया लेखक करता तो बात समझ में आती थी, पर राजेन्द्र यादव ऐसा करे तो इसमें गंदी राजनीति और किसी षड्यंत्र की बू आती है और मैं तो अपना विरोध दर्ज करके रहूंगा।” ऐसे कई उदाहरण हैं जिन्हें मैं दूँ तो मेरी यह टिप्पणी और लम्बी हो जाएगी।
मेरे और मेरे परिवार से उनके आत्मीय संबंध थे। मुझे लघुकथा लेखन और अनुवाद की ओर प्रेरित करने वाले भी वही थे, इस बात को मैंने अपने आत्मकथ्य (जो ‘कथाबिंब” में प्रकाशित हुआ और नेट पर मेरे ब्लॉग ‘सृजन-यात्रा’ पर भी है) में भी स्वीकार किया है। सचमुच यार, तुम्हारा यह संस्मरण पढ़कर रमेश बत्तरा से जुड़ी कई यादें ताज़ा हो आई हैं।
सुभाष नीरव

बेनामी ने कहा…

सुधा ओम ढींगरा ने कहा

रमेश बतरा पर आपका संस्मरण पढ़ा. अतीत की यादों में बहुत देर तक खोई रही. रमेश मेरे बहुत अच्छे दोस्त, सलाहकार, मार्गदर्शक थे. मेरी रमेश की अंतिम मुलाकात सन्डे मेल में हुई थी. मैं उन दिनों परिवार से मिलने भारत आई हुई थी. फ़ोन किया तो उन्होंने अपने ऑफिस में ही बुला लिया. मैंने गहरे नीले रंग का सुनहरी पट्टिओं वाला सूट (सलवार कमीज़ ) पहना हुआ था. वह किसी से बात कर रहे थे और मुझे दरवाज़े पर देख कर खड़ेहो गए (जो मुझे अजीब लगा था, वे ऐसा नहीं करते थे ) और फिर बैठने को कहा. मुझे याद नहीं वह किस से बात कर रहे थे, पर कोई गम्भीर समस्या थी. बात समाप्त कर उन्होंने छूटते ही कहा- कुड़ी तूँ ज़रा नहीं बदली. वैसी की वैसी ही हो .. रंगों की पसंद में भी तबदीली नहीं आई..और मुझे याद आया जब भी मैं रमेश से मिली मेरे कपड़े नीले रंग से मिलते जुलते रंग के ही होते थे. अरे आप को इतना तक याद है ..कह कर मैं खिलखिला पड़ी थी.

शेष आगे-----

बेनामी ने कहा…

सुधा ओम ढींगरा की टिप्पणी का शेषांश-----

जब से उनसे मिली थी, पहली बार मैंने उन्हें अपनी ओर इतनी गंभीरता से देखते देखा था ( तब हैरान हुई थी, और उनकी मृत्यु के समय महसूस हुआ कि यह हमारी अंतिम मुलकात थी, और शायद उनकी तरफ से इशारा था ) और शांत स्वर में बोले -तुम्हारा खिलखिलाना कौन भूल सकता है ? इसका मतलब तुम खुश हो. मैं हमेशा खुले दिल से खिलखिला कर हँसती थी (और आज भी वैसे ही हँसती हूँ ) और वे अक्सर कहा करते थे--लड़की, तेरी हँसीं घंटियाँ बजाती है, तू इसी तरह हँसती रहना और मेरे सिर पर स्नेह से हाथ रख देते थे, मुझे आशीर्वाद सा लगता था. तभी उन्होंने एक महिला को बुलाया और कहा कि इसका इंटरव्यू लो, यह अमेरिका में हिन्दी का बहुत काम कर रही है. मैं अचंभित हो गई -मेरी ओर देख कर बोले -मैं तुम्हारी पूरी खबर रखता हूँ और मुस्करा दिए. मैंने इंटरव्यू देने से मना कर दिया, एक दो बार रमेश और उस महिला ने कहा भी पर मैं ज़िद पर अड़ी रही कि मैं मिलने आई हूँ , छपने-छपाने नहीं. उनके जाने के बाद और आज भी पश्चाताप है कि इंटरव्यू दे दिया होता तो मेरे पास भी एक यादहोती. उसके बाद काफी पीने हम साथ ही कहीं काफी हॉउस में गए, दिल्ली से मैं अभी भी इतनी परिचित नहीं हूँ. इतनी यादें ताज़ा हो गईं कि लिखने लगूंगी तो पृष्ट भर जायेंगे. अभी बस इतना ही..

सुधा ओम ढींगरा

सुरेश यादव ने कहा…

बहुत ही मार्मिक प्रसंग है.इस बहाने बहुत से चहरे भी उजागर हुए .सुभाष नीरव और बलराम अग्रवाल ने अपनी नजदीकी जोड़ कर टिप्पड़ियों के मद्ध्यम से ही संस्मरण को सार्थकता प्रदान की है चंदेल जी सस्मरण लिखने का आप का अंदाज प्रभावी है .आप को बधाई.

बेनामी ने कहा…

अशोक गुप्ता ने कहा :

रमेश बत्रा पर संस्मरण देख कर रूप को निशब्द बाँहों में भर लेने का मन कर आया. रमेश के जाने के बाद ऐसी किसी प्रस्तुति का गहरा निर्वात था. इस बीच मैंने प्रेम जन्मेजय, प्रदीप पन्त, सुभाष नीरव, ज्ञानप्रकाश विवेक, बलराम, हरिनारायण और न जाने किस किस से कुछ ऐसा करने की ज़रूरत ज़ाहिर की लेकिन रूप के हाथों यह काम शुरू हुआ. निश्चित रूप से अभी ऐसा बहुत कुछ बाकी है जो कहा जाना चाहिए... एक गहरे विश्लेषण की भी ज़रूरत है जो उस लांछित प्रक्रिया को उजागर करे जिसने एक प्रतिभाशाली जिंदादिल शख्स को ऎसी अराजक असमय मौत दी. सिर्फ जया के सिर ठीकरा फोड़ने से तह तक नहीं पहुंचा जा सकता.
रमेश के साथ साथ जया की भी स्मृतियाँ मेरे मन में सघन हैं. अपनी शादी के भी पहले रमेश जया के साथ अगर मेरे पास फरीदाबाद में आया था. तब मुझे तथा मेरी पत्नी को जया को देख कर अच्छा लगा था. उसने हमें अपने व्यवहार तथा रमेश के प्रति गहरे लगाव से प्रभावित किया था. इसके अलावा, राजोरी गार्डेन वाले मकान में मैंने कई बार देखा था कि रमेश के रहते भी जया को घरेलू सामान, यहाँ तक कि सिगरेट पान खरीदने नीचे बाज़ार में अकेले जाना पड़ता था और वह जाती थी. कम से कम, उसका ऐसे पान की दुकान पर जाना मुझे अटपटा लगता था, मैंने रमेश से कहा भी... इसी तरह शायद ज्यादा पीने के कारण रमेश के पैर बहुत दुखते थे. मैंने कई बार जया को रमेश के पैर दबाते देखा, बिना इस परवाह के, कि कोई क्या सोचेगा... मैंने खुद इस स्थिति में रमेश के पैर दबाएँ हैं... इस नाते, जया हो सकता है कि बाद में प्रतिकूल हो गयी हो, लेकिन उसकी शुरुआत पूरी प्रतिबद्धता से हुई थी, इसका गवाह मैं हूँ.
मेरा सारिका में जाना, सारिका के दिल्ली आते ही हो गया था, और बल्लभ डोभाल कि मार्फ़त मैं रमेश से ही मिलने पहुँच था... उसके बाद तो यह आलम ही गया कि कई बार मुझे १० दरियागंज में रास्ते में मुदगल जी मिले और इसके पहले मैं उन्हें नमस्ते कर पाता उन्होंने तपाक से मुझे सूचना दी, .. आज तो रमेश नहीं आया है.. जाहिर है, उनका यह वाक्य एक व्यंग होता.... हालांकि मेरा मिलना जुलना सभी से होता था. सारिका के पूरे दिल्ली कार्यकाल में मेरी पांच एक कहानियां, दो रिपोर्ताज, कई लघु कथाएँ सारिका में छपीं लेकिन जितनी छपीं, उस से कहीं ज्यादा रमेश के हाथों फाड़ कर रद्दी की टोकरी में डाली गयीं और एक एक कहानी पर उसने मुझे आधा आधा घंटे का पाठ पढाया. नीचे सरदार की दुकान पर जा कर चाय पिलाई सो अलग. यह उसी की दीक्षा का परिणाम है जो मेरी कहानियां, सारिका के बाद हंस, समकालीन भारतीय साहित्य, इन्द्रप्रस्थ भारती, इण्डिया टुडे, आउटलुक हिंदी समेत कहाँ नहीं पहुंची.. मानो, कहीं से भी कहानी के लौटने का कोटा रमेश की रद्दी की टोकरी ने ही पूरा करा दिया था.
रमेश मेरे लिए एक लाईट हाउज़ बन कर रहा.. सिर्फ मेरे लिए ही नहीं, शायद बहुतों के लिए.. वह एक विलक्षण व्यक्तित्व था लेकिन इतना भी नहीं , कि वह ऐसी विलक्षण मौत मरे. इस के कारण खोजे जाने चाहिए, क्यों कि हमारे बीच अभी बहुत से प्रतिभाशाली रमेश हैं, जो स्वस्थ एवं दीर्घायु हों, हम ऐसा चाहते हैं.
यह काम हम दोस्त लोग ही कर सकते है. केवल फोटो पर माला चढ़ा कर हाथ जोड़ लेना, कम से कम दोस्त के लिए काफी नहीं है.
रूप को एक बार फिर निशब्द आभार.....
अशोक गुप्ता
मोबाइल 9871187875

ashok andrey ने कहा…

priya chandel jis tarah tumne ramesh batraa jee ke bahaane yaadon ke jharokhon se neekal kar naee peedi ko sandesh de rhe ho veh apne aap me bahumulya hai iss tarah se ek nayee prampraa ko sthapit kar rhe ho jo jaruree bhee hai hum log iss bahaane oonse tathaa oonke sahitya se bhee rubroo hote hain badhai
ashok andrey

ashok andrey ने कहा…

priya chandel jis tarah tumne ramesh batraa jee ke bahaane yaadon ke jharokhon se neekal kar naee peedi ko sandesh de rhe ho veh apne aap me bahumulya hai iss tarah se ek nayee prampraa ko sthapit kar rhe ho jo jaruree bhee hai hum log iss bahaane oonse tathaa oonke sahitya se bhee rubroo hote hain badhai
ashok andrey

निर्मला कपिला ने कहा…

आपका संस्मरण बहुत अच्छा लगा । प्रसंग बहुत मार्मिक है । आपके ब्लाग पर आ कर साहित्य की महान हस्तिओं से परिचय हो रहा है आपसे बहुत कुछ सीखने को भी मिल रहा है धन्यवाद्