<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2880097249222214869</id><updated>2012-02-13T17:54:15.374-08:00</updated><category term='सोफिया की डायरी'/><category term='पुस्तक चर्चा'/><category term='आलेख'/><category term='आत्मकथ्य'/><category term='अतीत के पन्नों पर यादों की लकीरें'/><category term='संस्मरण'/><category term='उपन्यास अंश'/><category term='यादों की दीवारें'/><category term='यादों की लकीरें'/><title type='text'>रचना यात्रा</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>29</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2880097249222214869.post-38707440339023189</id><published>2012-02-13T17:49:00.001-08:00</published><updated>2012-02-13T17:54:15.395-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यादों की लकीरें'/><title type='text'>यादों की लकीरें-भाग दो</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#339999;"&gt;संस्मरण&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff6600;"&gt;सशक्त-सक्रिय रचनाकार थे द्रोणवीर कोहली&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;रूपसिंह चन्देल&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;“भई नाराज हो.” यह आवाज २४ जनवरी, २०१२ से निरंतर मेरे कानों में गूंज रही है. फोन पर उनका जो पहला वाक्य सुनाई देता वह यही होता. सधी और खनकती आवाज और उसके बाद “बहुत दिन हो गए थे आपकी आवाज सुने हुए---सोचा शायद कुछ नाराजगी है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“आपसे नाराजगी---मैं स्वप्न में भी नहीं सोच सकता.” मैं कहता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-1J1FjYYSZvc/Tzm94NtJEYI/AAAAAAAAAS0/U21VYddmyTA/s1600/D.Kohali.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5708802776118137218" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 124px; CURSOR: hand; HEIGHT: 172px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/-1J1FjYYSZvc/Tzm94NtJEYI/AAAAAAAAAS0/U21VYddmyTA/s200/D.Kohali.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;ऎसा तब होता जब हमारे मध्य लंबे समय तक संवाद नहीं होता. महीने में एक-दो बार हम अवश्य बातें करते. कभी-कभी तीसरे-चौथे दिन भी, लेकिन तभी जब कुछ विशेष बात होती. अंतराल तब होता तब हम दोनों ही किसी न किसी काम में व्यस्त होते. फोन पर बातें चाहे तीसरे-चौथे दिन हुईं या पन्द्रह-बीस दिनों में या दो-चार माह बाद---लंबी बातें होतीं. चालीस-पैंतालीस मिनट से कम नहीं. बीच-बीच में हमारे ठहाके लगते. शिष्ट मजाक उनके स्वभाव में था, और हम आयु की सीमाएं भूल जाते. वार्तालाप के विषय प्रायः साहित्यिक होते---देश-विदेश का साहित्य. वे जो पढ़ रहे होते उसकी चर्चा करते या जो लिख रहे होते उसकी. साहित्य की चर्चा हो और साहित्यिक राजनीति की न हो ऎसा कैसे हो सकता था. वह भी होती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम एक-दूसरे से कब मिले या संवाद कब प्रारंभ हुआ सही वर्ष-तारीख याद नहीं, लेकिन अनुमान है कि १९९४ की बात थी. उनका उपन्यास ’तकसीम’ प्रकाशित हुआ था और मेरा ’रमला बहू’. मुझे याद है कि एक रात उनका फोन आया था और मेरे ’हलो’ कहते ही उन्होंने कहा था, “मैं द्रोणवीर कोहली बोल रहा हूं---आपने मेरा नाम सुना होगा.“ उनकी विनम्रता ने मुझे उनकी ओर आकर्षित किया था. उन दिनों वह ग्रेटर कैलाश में रह रहे थे. बातों और फिर मिलने का सिलसिला चल निकला था. यह तो मुझे बहुत बाद में ज्ञात हुआ कि धर्मयुग के बुनियाद अली वही थे. आठवें दशक के उत्तरार्द्ध के दिनों की बात थी. धर्मयुग में बुनियाद अली के नाम से एक पाक्षिक धारावाहिक स्तंभ प्रकाशित होता था जो दिल्ली की साहित्यिक गतिविधियों पर केन्द्रित होता था. उसे जिस रूप में प्रस्तुत किया जाता वह इतना आकर्षक होता कि उन दिनों उसी स्तंभ के लिए मुझे धर्मयुग की प्रतीक्षा रहती थी. तब मैं दिल्ली में नही रहता था और न ही मेरे मित्रों को यह जानकारी थी कि बुनियाद अली नामका व्यक्ति कौन था. हम इस पर चर्चा करते और अनुमान लगाने का प्रयत्न करते परन्तु अनुमान कोहली जी के आसपास भी नहीं फटक पाता था. लेकिन दिल्ली के साहित्यकार जान चुके थे और उस स्तंभ ने कितने ही लोगों को कोहली जी का शत्रु बना दिया था. उस स्तंभ में वह जो लिख रहे थे वह कड़वा सच था लेकिन हिन्दी साहित्य में कड़वाहट पैदा करने वाले देश के भ्रष्ट राजनेताओं की भांति अपनी चमक पर दाग दिखाया जाना बर्दाश्त नहीं कर सकते. परिणामतः कोहली जी के उत्कृष्ट अवदान की ओर सबने ठंडी नजरों से देखा या आंखें मूंद लीं और उनके समकालीनों ने, जो दसियों वर्ष पहले लेखन से मुख मोड़ चुके थे, नाक-भौं भी सिकोड़ी लेकिन उन्होंने उस सबकी परवाह नहीं करते हुए निरंतर लिखा और जीवन के अंतिम दिनों तक लिखते रहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;द्रोणवीर जी का जन्म पाकिस्तान में १९ जनवरी, १९३२ को हुआ था. उन्हें अपनी सही जन्म तिथि ज्ञात नहीं थी. वह प्रायः कहते कि वह १९३२-३३ में कभी जन्मे थे, लेकिन सरकारी नौकरी में थे तो वहां कोई निश्चित जन्म तिथि दर्ज होनी ही थी. उनके एक मित्र ने मृत्यु की सूचना देते हुए कहा था, “१९ जनवरी को वह अस्सी वर्ष के हुए थे.” अर्थात यही तिथि सरकारी रिकार्ड में दर्ज थी. वह केन्द्र सरकार के ’सूचना एवं प्रसारण’ विभाग में थे. इसका विशद उल्लेख उन्होंने अपने उपन्यास ’ध्रुव सत्य’ में किया है. छः सौ पृष्ठों से अधिक का यह उपन्यास एक प्रकार से उनका आत्मकथात्मक उपन्यास है. किस्सागोई शैली और आकर्षक भाषा में इस उपन्यास की गतिशीलता इसे एक उल्लेखनीय उपन्यास बनाती है. इसके विषय में जब मैंने उनसे चर्चा की कि इसके नायक के रूप में मुझे वह स्वयं दिखाई देते रहे तब हंसकर उन्होंने कहा था, “सारा भोगा हुआ यथार्थ है”, लेकिन इसे आत्मकथा मत समझ लेना ---है यह उपन्यास ही. उनके सभी उपन्यासों में किस्सागोई शैली परिलक्षित है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके उपन्यास ’वाह कैंप’ में उनका स्वयं के भोगे यथार्थ के साथ देखा यथार्थ भी अभिव्यक्त हुआ है. उनका यह उपन्यास विभाजन पर यशपाल के ’जूठा सच’ के बाद दूसरा उत्कृष्ट उपन्यास है. कुछ लोग भीष्म साहनी के ’तमस’ को दूसरे क्रम में रख सकते हैं---लेकिन ऎसा वे ही करेंगे जिन्होंने ’वाह कैंप’ नहीं पढ़ा होगा. विभाजन की त्रासदी को व्यक्तिगत रूप से न यशपाल ने भोगा था और न ही भीष्म जी ने, जबकि ’वाह कैंप’ के लेखक ने उसे स्वयं भोगा और निकट से देखा था. उनके अनुसार वह स्वयं ’वाह कैंप’ में रहे थे. यद्यपि किसी रचना की उत्कृष्टता की कसौटी किसी त्रासदी को स्वयं भोगकर लिखे जाने में निहित नहीं है---पढ़-सुनकर अंतर्मथंन कर रचनाकार उसे उत्कृष्टता प्रदान करता है. चीजों को वह जितना ही आत्मसात करता है रचना उतनी ही उत्कृष्ट होती है. ’झूठा सच’ इसका प्रमाण है. तथापि यदि भोगे यथार्थ को कोई रचनाकार लंबे समय के अंतर्मथंन के बाद लिखता है और डूबकर लिखता है तब वह ’वाह कैंप’ जैसी उल्लेखनीय कृति को जन्म देता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोहली जी कुछ भी लिखने से पहले चीजों का गहनता से अध्ययन करते थे---लंबे समय तक उसपर अतंर्मथंन करते और जब लिखते तब पूरे धैर्य का परिचय देते. पहले वह सीधे टाइपराइटर पर लिखते थे लेकिन जब कंप्यूटर का ज्ञान प्राप्त कर लिया तब उसपर लिखने लगे थे और कहते थे, “आप भी कंप्यूटर पर लिखा करो, क्योंकि उसमें संशोधन आसान होता है.” वह उपन्यास पर कई-कई बार कार्य करते और जब संतुष्ट हो लेते तभी उसे प्रकाशक को सौंपते. अपने लिखे के प्रति वह इतना आस्थावान थे कि किसी का तर्कहीन संशोधन उन्हें स्वीकार नहीं होता था. ऎसा न करके उन्होंने एक प्रकाशक के असाहित्यिक सलाहकार की नाराजगी मोल ले ली थी और परिणामतः वहां से अपने अगले उपन्यास की वापसी की पीड़ा भी सही थी. लेकिन अपनी इसी नीति के लिए अपने प्रकाश्य उपन्यास पर राजपाल एंड संस के विश्वनाथ जी की प्रशंसा भी पायी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोहली जी लंबे, मेरे अनुमान से पांच फीट ग्यारह इंच के लगभग---बिल्कुल स्लिम-ट्रिम—पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति थे. पहली मुलाकात से अंतिम तक उनके चेहरे पर दाढ़ी देखी. उन्होंने आकाशवाणी से समाचार सम्पादक के पद से बावन वर्ष की आयु में स्वैच्छिक सेवावकाश ग्रहण किया था. सामान्य से सम्पन्नता तक की उनकी यात्रा अनेक कठिन मार्गों से होकर गुजरी थी. उन्होंने ग्रेटर कैलाश के मकान से लेकर गुड़गांव में पांच सौ गज में मकान बनाने की दास्तान सुनाते हुए भाभी जी की ओर इशारा कर कहा था, “ सब इनके कारण संभव हुआ…वर्ना मैं तो क्लर्क था.” जबकि भाभी जी भी सामान्य स्कूल अध्यापिका ही थीं. दरअसल वह जीवन और साहित्य में संतुलन और बेहतर प्रबंधन का परिणाम था. “जीवन भी एक प्रबंधन है.” वह कहा करते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुड़गांव के मकान में पहुंचने के बाद उनकी लेखनी की गति बढ़ गयी थी और वह एक के बाद दूसरा उपन्यास हिन्दी जगत को देने लगे थे. जब अपना मौलिक कुछ न लिख रहे होते तब अनुवाद करते. उन्होंने ज़ोला के एक उपन्यास का अनुवाद किया और पिछले दिनों भी एक अनुवाद उन्होंने पूरा किया था. मुझे कहते, “स्वैच्छिक सेवाकाश इसलिए नहीं लिया कि खाली समय नष्ट करें---आपने भी काम करने के लिए स्वैच्छिक सेवाकाश लिया और मैंने भी---कुछ रचनात्मक नहीं कर रहे तो मनपसंद पुस्तक का अनुवाद ही करो---कुछ करो---कभी अपने को खाली मत रहने दो. अनुवाद भी रचनात्मक कार्य ही होता है. उससे हम बहुत कुछ सीखते हैं.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी सीख का ही परिणाम कहूंगा कि स्वैच्छिक सेवाकाश लेने के बाद मैंने जो पहला काम किया वह महान रूसी लेखक लियो तोलस्तोय के अंतिम उपन्यास ’हाज़ी मुराद’ के अनुवाद का था. उसके बाद मैंने कितना ही काम किया. जब भी फोन पर बात होती वह यह अवश्य पूछते, “क्या लिख रहे हो---लिखते हुए मैंने डिस्टर्ब तो नहीं किया” ---और यदि मैंने यह कहा कि इन दिनों कुछ नहीं कर रहा तो वह समझाते, “भई, हमें लिखने के अलावा जब कुछ आता ही नहीं तब वह मत रोको---कुछ करते रहो. हम राजनीति कर नहीं सकते---चाटुकारिता स्वभाव में नहीं---कि एक उपन्यास कालजयी बना दिया जाये या दो-चार कहानियों के बल पर दुनिया में चर्चा होने लगे.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने जमकर काम किया. ”मुल्क अवाणों का’, ’हवेलियों वाले’, ’चौखट’ , ’तकसीम’, ’नानी’ और हाल में नया ज्ञानोदय में प्रकाशित उनका उपन्यास जिसमें अमेरिका में बस गए एक परिवार की वास्तविकता रेखांकित की गई थी. राजपाल एण्ड संस से प्रकाश्य उपन्यास के बाद वह एक और उपन्यास पर कार्य कर रहे थे. वह बहुआयामी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे. बाल-साहित्य, कहानी, उपन्यास, रिपोर्ताज, साक्षात्कार, यात्रा संस्मरण आदि अनेक विधाओं में उन्होंने कार्य किया. सूचना एवं प्रसारण सेवा में कार्यरत रहते हुए वह भारत सरकार के प्रकाशन विभाग की पत्रिका ’बाल भारती’ के सम्पादक रहे थे. ’ध्रुव सत्य’ में ’बाल भारती’ के प्रारंभिक दौर का अच्छा चित्रण उन्होंने किया है. वह ’सैनिक समाचार’ के सम्पादक भी रहे और आकाशवाणी नई दिल्ली में समाचार सम्पादक पद को भी सुशोभित किया. उन्होंने केवल लेखन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के कारण स्वैच्छिक सेवावकाश लिया था. दरअसल नौकरी सरकारी हो या निजी संस्थान की, एक खुद्दार लेखक उसे कभी अपने अनुकूल नहीं पाता. कुछ विवशता में करते हैं. यह विवशता आर्थिक होती है. लेकिन कुछ ऎसे भी लेखक हैं जो सरकारी नौकरी को उत्सवजनित ढंग से आजीवन करते हैं. वे सत्ता या व्यवस्था से ताल-मेल ही नहीं बैठा लेते बल्कि उसका हिस्सा बनकर सुख-सुविधा और सम्पन्नता हासिल करते रहते हैं. पद को साहित्य में अपनी पहुंच के लिए इस्तेमाल करते हैं और सफल लेखक होने की मानसिक संतुष्टि पाते हैं. कोहली जी भी साधारण पद पर नहीं थे. अवकाश ग्रहण न करते तो और बड़े पद पर पहुंचते, लेकिन उन जैसे लेखक सत्ता और व्यवस्था का हिस्सा बनने से इंकार करते हैं जहां चंद सुविधाओं के लिए अपने ज़मीर को मारना होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वैच्छिक सेवावकाश लेने के बाद उन्होंने वह लिखा जो वह लिखना चाहते थे और बीच के कुछ समय के व्यवधान को छोड़कर (जब वह बेटी और अपना मकान गुड़गांव में बनवा रहे थे) वह निरतंर सक्रिय रहे. उनकी बेटी-दामाद अमेरिका में डॉक्टर हैं अतः वर्ष में एक बार डेढ़-दो महीने के लिए वहां अवश्य जाते रहे, लेकिन उसके अतिरिक्त भी उन्होंने योरोप के अनेक देशों की यात्राएं की थीं. दुबई आदि की यात्राएं भी उन्होंने कीं. अर्थात वह एक भ्रमणशील रचनाकार थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह जितने अच्छे लेखक थे वक्ता उतने अच्छे नहीं थे. उम्र के अंतिम पड़ाव तक मंच पर जाकर बोलने में उन्हें संकोच होता था. जब भी कहीं बुलाए गए, बोले अवश्य और जब उस प्रकरण की चर्चा की तब हंसकर बताया , “भई, मुझे बहुत साहस जुटाना पड़ा था बोलने के लिए.” उनकी दूसरी कमी थी कि वह अपनी प्रकाशित पुस्तक मित्रों को देने में संकोच करते थे. पूछने पर कहा, “कोई मित्र पढ़ने का अनावश्यक दबाव न माने---इसलिए.” प्रायः स्वयं कभी किसी पत्रिका को पुस्तक समीक्षार्थ नहीं भेजते थे. प्रकाशक को पत्र-पत्रिकाओं की सूची दे देते थे. उनकी इस उदासीनता का परिणाम होता कि उनकी पुस्तकों की एक-दो से अधिक समीक्षाएं प्रकाशित नहीं होती थीं. पिछले दिनों उन्होंने एक अलोचक का उल्लेख बहुत दुखी भाव से किया. किसी मित्र के सुझाव और दबाव देने पर उन्होंने ’ध्रुवसत्य’ की एक प्रति आलोचक महोदय को भेज दी. आलोचक जी एक समीक्षा पत्रिका से संबद्ध थे. कुछ दिनों बाद फोन किया तो आलोचक जी बोले, “मैं किसी लेखक की भेजी पुस्तक कभी नहीं पढ़ता.” निश्चित ही कोहली जी उनके उत्तर से आहत हुए थे, जबकि वास्तविकता यह है कि विश्वविद्यालय के कुछ साहित्यकारनुमा प्राध्यापकों और छुटभैया लेखकों की पुस्तकों को आलोचक जी कंधे पर लादते रहे, पढ़ते और लिखते रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोहली जी नफासत पसंद खांटी पंजाबी थे. जिसप्रकार तनकर चलते उसीप्रकार तनकर रहते और लिखते थे. लोगों को उनका यह ढंग पसंद नहीं था---खासकर उनके समकालीनों को. कॉफी हाउस आते, लेकिन निन्दापुराण का हिस्सा नहीं बनते थे. लोग इसे उनका आभिजात्य- अहंकार मानते थे. लेकिन हकीकत यह थी कि उनके समकालीन ही नहीं उनके बाद की पीढ़ी भी उनकी लेखकीय सक्रियता से आतंकित थी और इसे हिन्दी साहित्य का दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि प्रायः सक्रिय रचनाकारों के प्रति साहित्यकार-आलोचक चुप्पी साध लेते हैं—एक षडयंत्र के तहत. यह क्षुद्र राजनीति है. जगदीश चन्द्र भी इस क्षुद्र राजनीति का शिकार रहे और द्रोणवीर कोहली भी. यह संयोग ही कहा जाएगा कि दोनों ही एक ही विभाग से थे. लेकिन उन्होंने अपनी रचनाओं में समय के जिस सच को अभिव्यक्ति प्रदान की है वह अमिट है---समय स्वयं उनका मूल्याकंन करेगा.&lt;br /&gt;-०-०-०-०-०-&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2880097249222214869-38707440339023189?l=wwwrachanayatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/feeds/38707440339023189/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2880097249222214869&amp;postID=38707440339023189' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/38707440339023189'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/38707440339023189'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/2012/02/blog-post.html' title='यादों की लकीरें-भाग दो'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-1J1FjYYSZvc/Tzm94NtJEYI/AAAAAAAAAS0/U21VYddmyTA/s72-c/D.Kohali.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2880097249222214869.post-5001845097829113420</id><published>2012-01-13T17:51:00.000-08:00</published><updated>2012-01-13T17:54:35.376-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्मरण'/><title type='text'>यादों की लकीरें - भाग-दो</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:180%;color:#000099;"&gt;संस्मरण&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#cc0000;"&gt;आचार्य मुंशी राम &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#cc0000;"&gt;शर्मा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#cc0000;"&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;रूपसिंह चन्देल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;अप्रैल, १९७८ की बात है. उन दिनों मेरे मन में एक ही धुन सवारथी---विश्वविद्यालय से शोध विषय की स्वीकृति. फरवरी में यशपाल केकथा-साहित्य पर प्रस्तुत विषय अस्वीकृत हो चुका था. लेकिन मैं पीएच.डी. करने का संकल्प करचुका था अतः कुछ उदास तो हुआ लेकिन हताश नहीं. मेरे कानपुर के दौरे बढ़ गएथे. हफ्तों वहां पड़ा रहता. एक सप्ताह का अवकाश लेकर जाता और बीमारी केबहाने दो-तीन सप्ताह रुकता. मेरे शोध निर्देशक ने किसी भी प्रकार कीसहायता से पहले ही हाथ खड़े कर दिए थे. जो भी करना था स्वयं के बल पर. इससिलसिले में कितने ही लोगों से मिला. ‘कंचनप्रभा’ पत्रिका के सम्पादक श्रीयुत शंभूरत्न त्रिपाठी (अब स्वर्गीय) से भी उन्हीं दिनों मुलाकात हुई थी. वह थे तोसमाजशास्त्र के व्यक्ति लेकिन हिन्दी साहित्य में भी उनकी गहरी पैठ थी.उन्होंने अनेक विषय सुझाए, लेकिन वे इतने मुश्किल थे कि या तो मैं उसीसमय असमर्थता व्यक्त कर देता या कुछ दिन पुस्तकालयों की खाक छानकर हताशहो जाता. मतलब का कुछ भी नहीं मिलता. तब तक मैं कथा-साहित्य की ओर उन्मुखहो चुका था. कुछ कहानियां लिखी थीं. यद्यपि उन्हें प्रकाशनार्थभेजने का साहस नहीं जुटा पाया था तथापि मेरी रुचि कथा साहित्य में ही शोधकरने की थी.&lt;br /&gt;अवकाश के दिन की एक सुबह, किदवई नगर में एक दुकान पर पानखाने के लिए रुका. प्रायः सुबह नौ बजे के लगभग मैं अपने निर्देशक सेमिलने साइकिल से जाता था, जो किदवई नगर के ’एल’ ब्लॉक में रहते थे. मिलने जाते हुए मैं उस दुकान से पान अवश्य खाता था. पान बनवातेसमय दैनिक जागरण भी पढ़ लेता. उस दिन कानपुर के वरिष्ठ कथाकारप्रतापनारायण श्रीवास्तव के निधन का समाचार प्रकाशित हुआ था. मेरेमस्तिष्क की घंटी बजी थी. ऎसी ही घंटी यशपाल के कथा-साहित्य पर विषय चयन केसमय भी बजी थी. उसी पनवाड़ी के यहां सुबह के उसी वक्त अखबार में उनकीमृत्यु का समाचार पढ़कर मैं अपने निर्देशक के यहां दौड़ गया था और उनसेचर्चा करके सीधे बिरहना रोड स्थित ’मारवाड़ी पुस्तकालय’ गया था, जहांदिनभर बैठकर यशपाल पर नोट्स तैयार किए थे और दो दिन के अंदर संक्षिप्तरूपरेखा प्रस्तुत कर दी थी.&lt;br /&gt;श्रीवास्तव जी के निधन का समाचार पढ़कर भी समय नष्ट न कर मैं शोध-निर्देशक डा. बैजनाथ त्रिपाठी से मिलने गया. श्रीवास्तव जी के बारे में उनसे चर्चा की और सीधे ’मारवाड़ी पुस्तकालय’ जा पहुंचा. श्रीवास्तव जी का अधिकांश साहित्य वहां उपलब्ध था. यशपाल जी की भांति ही मैंने नोट्स तैयार किए और किसी अन्य छात्र द्वारा विषय प्रस्तुत करने से पहले ही रूपरेखा विश्वविद्यालय में प्रस्तुत कर आया.यह सब मेरे वश में था, लेकिन विषय की स्वीकृति विश्वविद्यालय में विषय निर्धारित करने वाली कमिटी के अधिकार की बात थी जिसकी बैठक साल या छः माह में एक बार होती थी. डा. सुधांशु किशोर मिश्र पर लिखे अपने संस्मरण में इस विषय पर मैं विस्तार से प्रकाश डाल चुका हूं. लेकिन उनकी सहायता कितनी लाभप्रद होने वाली थी, कहना कठिन था. इसके लिए उन तमाम स्रोतों को पकड़ना आवश्यक था विषय स्वीकृति में जिनके सहायक होने की संभावना थी.एक निजी छात्र के रूप में एम.ए. में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने काएक सुखद परिणाम यह हुआ था कि कानपुर के भद्र समाज में मेरी पहुंच और पूछबढ़ गयी थी. शंभूरत्न त्रिपाठी मेरे मुक्तकठ प्रशंसक थे. मेरे ऎसे हीप्रशंसकों में श्री सूर्यभान सिंह गौतम और उनकी पत्नी तरुणलता गौतम भी थे.तरुणलता जी आगरा के वरिष्ठ पत्रकार स्व. राजेन्द्र रघुवंशी की भतीजी थीं,जो इप्टा के संस्थापक सदस्यों में से एक और राजेन्द्र यादव के मित्र थे.बहरहाल, उन दोनों ने भी मेरी सहायता की थी. होता यह कि कानपुर प्रवासकाल में मैं घर में बिल्कुल नहीं टिकता था. दिनभर साइकिल शहर की सड़कों परदौड़ती रहती और किसी न किसी से मिलने जाता रहता. जिन लोगों से मिलने जाताउनमें गौतम दम्पति भी थे. उन्होंने मुझे आचार्य डा. मुंशीराम शर्मा सेमिलवाया, जो उन्हीं के मोहल्ले आर्यनगर में रहते थे. आर्यनगर कानपुर काअभिजात्य मोहल्ला है—खासकर नया आर्यनगर. वे दोनों आचार्य मुंशीरामशर्मा के भक्त थे. यह तो बाद में ज्ञात हुआ कि वे जिस मकान में रहते थेवह आचार्य शर्मा का ही था, जिसे उन्होंने कुछ वर्ष पहले उन्हें बेच दिया था.वह एक बड़ा, लेकिन पुराना मकान था. आचार्य शर्मा ने वहां से दस मिनट पैदलके रास्ते पर आर्यनगर की नयी बस्ती में मकान बनवा लिया था.इस प्रकार मैं एक ऎसे व्यक्ति—आचार्य डा. मुंशीराम शर्मा—से मिला जो संस्कृत और हिन्दी के प्रकांड विद्वान थे. आचार्य शर्मा डी.ए.वी. कॉलेज कानपुर के हिन्दी विभागाध्यक्षपद से अवकाश प्राप्त थे और उन दिनों वह अस्सी पार थे. पहली मुलाकात केसमय मैं उनके विषय में इतना ही जानता था. बाद में जाना कि उनके संबन्धचन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह आदि क्रान्तिकारियों के साथ रहे थे. जिन दिनोंवह डी.ए.वी.इंटर कॉलेज में प्रवक्ता थे, भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद और दूसरेक्रान्तिकारी डी.ए.वी. हॉस्टेल में आकर रहते थे. उन दिनों कानपुरक्रान्तिकारियों की शरणस्थली ही नहीं कर्मस्थली भी था. अपने जन्मकाल से हीयह नगर न केवल अपनी व्यावसायिक विशेषताओं के लिए बल्कि साहित्य और कला केलिए तो प्रसिद्ध था ही, क्रान्तिकारियों का प्रमुख केन्द्र भी था.क्रान्ति शायद इस नगर की मिट्टी में बसी हुई है. १८५७ की क्रान्ति कीयोजना बनाने वाले अजीमुल्ला खां इसी नगर में पले-बढ़े थे. यहीं एक अंग्रेजके घर बावर्ची का काम करते हुए उन्होंने यहां के तत्कालीन एकमात्रप्राइमरी विद्यालय में अंग्रेजी और उस अंग्रेज के बच्चों को फ्रांसीसीपढ़ाने आने वाले शिक्षक से फ्रांसीसी का ज्ञान प्राप्त किया था. नाना साहबके सलाहकार और बाद में मंत्री बनने से पहले वह उसी प्राइमरी विद्यालय मेंअध्यापक रहे थे. १८५७ की क्रांति के कार्यान्वयन का श्रेय भले ही नानासाहब को जाता है, लेकिन उसकी संपूर्ण योजना अजीमुल्ला खां के मस्तिष्क कीही उपज थी.&lt;br /&gt;क्रांति, कला और साहित्य का स्वाभाविक विकास कानपुर की धरती में हो रहाथा. यह नगर प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्णशर्मा नवीन, विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक,भगवतीचरण वर्मा, प्रतापनारायण श्रीवास्तव, गणेशशंकर विद्यार्थी, और कुछसमय के लिए कथाकार प्रेमचंद की भी कर्मभूमि रहा है यह नगर. और भी कितने हीनाम हैं. इस नगर की ऎसी ही एक विभूति थे आचार्य मुंशीराम शर्मा. शर्मा जीक्रांतिकारियों के छुपने-छुपाने में सहायक रहते थे. ब्रितानी शासनकाल में यह एक जोखिमभरा काम था. जिन दिनों मैं उनसे मिला, उन दिनों वह प्रतिदिन संस्कृत के कुछ श्लोकों का सृजन कर रहे थे. मुझे बताया गया कि स्वरचित ऎसे श्लोकों का एक ग्रंथ शीघ्र ही प्रकाशित करवाने की उनकी योजना थी. ग्रंथ प्रकाशित हुआ या नहीं मुझे जानकारी नहीं. आचार्य शर्मा जी से मिलवाने के लिए श्रीमती तरुणलता गौतम मेरे साथ गई थीं. आचार्य जी से उन्होंने मेरे विषय में पहले ही चर्चा की हुई थी. पहली मुलाकातसंक्षिप्त रही थी—मात्र परिचय और शोध विषय तक सीमित. उसके बाद जब भीमैं कानपुर में होता एक-दो बार आचार्य जी से मिलने अवश्य जाता था….भलेही मैं कई महीनों बाद गया, लेकिन उन्होंने कभी भुलाया नहीं था.उनके पड़ोस में रहते थे डॉ. प्रेम नारायण शुक्ल. शुक्ल जी उनके शिष्य रहेथे और उन दिनों डी.ए.वी. कॉलेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष थे. दूसरी मुलाकातमें आचार्य जी ने बताया कि उन्होंने मेरे विषय में शुक्ल जी से चर्चा कीथी. मैं समझ नहीं पाया था कि शुक्ल जी से चर्चा का अर्थ क्या था. यह वहीप्रेमनारायण शुक्ल थे जिनसे मैं सितंबर १९७६ में पीएच.डी. करने केअपने निर्णय के बाद डी.ए.वी. कॉलेज में बहुत उत्साह से इस आशय से मिलाथा कि उनके कॉलेज में उस वर्ष प्रथम श्रेणी पाने वाला एकमात्र छात्र मैंथा और वह मुझे अपने निर्देशन में पीएच.डी. के लिए पंजीकृत करवा लेंगे.भूतल में सीढ़ियों के पास खड़ा मैं उनकी प्रतीक्षा कर रहा था. वह नीचेउतरे. हाथ में पुस्तकें—धोती-कुर्ता में मध्यम कद. मैंने चरण स्पर्श करपरिचय दिया. प्रसन्न हुए, लेकिन जब मेरे मिलने का अभिप्राय जाना, चेहरेपर भावहीनता ओढ़ बोले, “निजी छात्र के रूप में तुमने एम.ए. किया है इसलिएअपने अधीन मैं तुम्हें पंजीकृत नहीं करवा सकता.” मैं बुझ गया था.उन्हीं प्रेमनारायण शुक्ल से आचार्य मुंशीरामशर्मा जी द्वारा चर्चा करने की बात सुनकर मैं चौंका था. मैंने सफाई देते हुए कहा था कि मुझे शोध निर्देशकनहीं चाहिए. मैंने अपने निर्देशक का नाम बताया और कहा कि मैं चाहता हूंकि इस बार प्रतापनारायण श्रीवास्तव पर प्रस्तुत मेरा विषय अस्वीकृत न हो.&lt;br /&gt;“उसी विषय में प्रेम से मैंने चर्चा की थी. वह संयोजक को कह देंगे.”&lt;br /&gt;मैं चुप रहा था. उस वर्ष संयोजक लखनऊ विश्वविद्यालय के कोई डॉ. अग्रवालथे. मीटिंग की तिथि मुझे डॉ. सुधांशु किशोर मिश्र से ज्ञात हो गयी थी.मैं कानपुर पहुंचा और आचार्य शर्मा से मिला. उन्होंने शुक्ल जी को फोनकरके अपने पास बुलाया. शुक्ल जी तुरंत आए. आचार्य जी ने मेरी ओर संकेत करकहा, “यही हैं रूपसिंह चन्देल. प्रतापनारायण श्रीवास्तव के व्यक्तित्व औरकृतित्व पर इनका विषय प्रस्तुत है.”&lt;br /&gt;“मुझे याद है. आप चिन्ता न करें.” शुक्ल जी ने अपने गुरू से कहा और मेरी ओर उन्मुख हुए, “मेरे साथ आओ.”&lt;br /&gt;आचार्य मुंशीराम जी ने भी मुझे उनके साथ जाने के लिए कहा.मैं शुक्ल जी के साथ उनके निवास पर गया. शुक्ल जी बोले, “परसों मीटिंगहै. डॉ. अग्रवाल से मेरी बात हुई थी. वह सुबह दस बजे की ट्रेन से कानपुरसेण्ट्रल स्टेशन पहुंचेंगे….आप टैक्सी लेकर उन्हें वहां रिसीव करें औरमेरे घर पहुंचा दें. वह टैक्सी दिनभर डॉ. अग्रवाल जी के साथ रहेगी.”&lt;br /&gt;“जी डाक्टर साहब.” मैंने कहने के लिए कह तो दिया था, लेकिन उनकी बातसुनकर मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी थी. पहली बात, टैक्सी का दिनभरका खर्च—मेरी सोच से बाहर की बात थी. दूसरी बात, जीवन में इस प्रकार कावह पहला अनुभव था. यह एक प्रकार का खुला भ्रष्टाचार था. इससे पहले शोधकरवाने के नाम पर कुछ प्रोफसरों ने मुझसे पैसों की मांग की थी, जिनकेप्रस्ताव सुनकर मैंने उनसे पुनः संपर्क नहीं किया था. उनके खिलाफ कुछ करसकने की हैसियत नहीं थी सिवा चुप रहने के. यह भी वैसा ही प्रस्ताव था.तब तक इतनी जानकारी तो हो ही चुकी थी कि कितने ही शोधार्थियों को ऎसीशर्तें मानने के लिए विवश होना पड़ता है. इससे भी खराब शर्तें—हिन्दीशोध के नाम पर भयानक शोषण—डॉ. शुक्ल जैसे दो-चार प्रोफेसर प्रत्येकविश्वविद्यालय में होते हैं, यह भी जानता था.&lt;br /&gt;“मेरा फोन नंबर लिख लो—कल सुबह मुझे फोन कर लेना. मैं डॉ. अग्रवाल कानिश्चित कार्यक्रम पूछकर बता दूंगा.”&lt;br /&gt;“बुरे फंसे.” मैंने सोचा, लेकिन तत्क्षण मुझे डॉ. मुंशीराम शर्मा की यादआयी और मैंने डॉ. शुक्ल का फोन नंबर लिखा और उनके घर से बाहर आ गया था.&lt;br /&gt;रातभर बेहद उहा-पोह की स्थिति में रहा. अंततः सुबह डॉ. शुक्ल को फोन करनेका निर्णय किया. फोन पर उन्होंने बताया कि डॉ. अग्रवाल की योजना बदल गयीहै. तुम्हें स्टेशन जाने की आवश्यकता नहीं है. मैंने राहत की सांस ली थी.&lt;br /&gt;उस मीटिंग की अध्यक्ष थीं प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. शशिप्रभा शास्त्री औरजैसाकि डॉ. सुधांशु किशोर मिश्र पर लिखे अपने संस्मरण में लिख चुका हूं—विषय की स्वीकृति में डॉ. मिश्र और विश्वविद्यालय में कार्यरत श्रीडी.पी. शुक्ल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. मुझे नहीं मालूम किप्रेमनारायण शुक्ल ने कुछ किया था या नहीं, लेकिन बाद में यह जानकारीअवश्य मिली थी कि हिन्दी शोध के लिए कानपुर विश्वविद्यालय का जो भीसंयोजक होता था, डॉ. शुक्ल उसे लपक लेते थे. अधिकांश उन्हीं विषयों कोस्वीकृति दी जाती जिन्हें डॉ. शुक्ल चाहते थे. लेकिन उस दिन आचार्य मुंशीरामशर्मा के निवास पर हुई मुलाकात ही डॉ. प्रेमनारायण शुक्ल से मेरी अंतिममुलाकात थी, जबकि उसके बाद भी मैं आचार्य शर्मा से मिलने जाता रहा था. यहसिलसिला तभी थमा जब कानपुर जाने का अंतराल बढ़ा और साथ ही बढ़ी व्यस्तता.&lt;br /&gt;और एक दिन समाचार पत्र में उनकी मृत्यु का समाचार पढ़ा. कानपुर का एक बेहदआत्मीय और मानवीय चेहरा हमारे मध्य नहीं रहा था. समाचार-पत्र में यहसमाचार भी था कि अंतिम समय तक आचार्य शर्मा का संस्कृत श्लोक लिखने कासिलसिला जारी रहा था.&lt;br /&gt;-०-०-०-०-&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2880097249222214869-5001845097829113420?l=wwwrachanayatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/feeds/5001845097829113420/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2880097249222214869&amp;postID=5001845097829113420' title='12 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/5001845097829113420'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/5001845097829113420'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='यादों की लकीरें - भाग-दो'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2880097249222214869.post-1149748629145254074</id><published>2011-12-18T05:26:00.000-08:00</published><updated>2011-12-18T05:27:56.221-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्मरण'/><title type='text'>यादों की लकीरें</title><content type='html'>संस्मरण&lt;br /&gt;बड़ी दीदी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुक्रवार 29 अप्रैल,2005 का गर्मीभरा दिन। मुझे कनॉट प्लेस स्थित कॉफी होम में अपने दो मित्रों से पांच बजे मिलना था। सुबह नौ बजे से अपरान्ह दो बजे तक लियो तोलस्तोय के अंतिम उपन्यास हाज़ी मुराद का अनुवाद कार्य करता रहा। स्वैच्छिक सेवावकाश ग्रहण करने के पश्चात् सबसे पहला काम मैंने दो वर्षों से स्थगित होते आ रहे उस कार्य को सम्पन्न करने का किया था।&lt;br /&gt;उस दिन कॉफी होम बंद होने तक हम वहां बैठे रहे। जब लोग चले गए और कर्मचारियों ने मेजें खिसकाना प्रारंभ किया हम बाहर निकल आए। बाहर भी कुछ देर बातें करते रहे... साहित्यिक बातें। रात जब साढ़े नौ बजे के लगभग मैं घर पहुंचा, पता चला शाम पांच बजे से नौ बजे के मध्य कानपुर से तीन फोन आ चुके थे।&lt;br /&gt;''क्यों?''&lt;br /&gt;''दीदी नहीं रहीं।''&lt;br /&gt;''कब?''&lt;br /&gt;''आज शाम चार बजे।''&lt;br /&gt;'दीदी' - यानी मेरी बड़ी बहन भाग्यवती, जो नाम से ही भाग्यवती थीं और जब तक पिता के घर रहीं भाग्यवती ही रहीं, लेकिन पति के घर जाते ही दुर्भाग्य ने जो एक बार उन्हें अपने फंदे में लपेटा तो मृत्युपर्यंत वह उसके फंदे को काट नहीं पायीं।&lt;br /&gt;अशांत मन कुछ देर मैं कानपुर पहुंचने पर विचार करता रहा। समय नष्ट न कर मैंने रेलवे इन्क्वारी फोन मिलाकर कानपुर जाने वाली अंतिम ट्रेन के विषय में जानकारी मांगी। ज्ञात हुआ कि अंतिम ट्रेन साढ़े दस बजे रात की थी। उस ट्रेन को पकड़ना असंभव था। छोटे भाई राजकुमार को कानपुर फोन करके वस्तुस्थिति स्पष्ट कर अंत्येष्टि के विषय में पूछा। ज्ञात हुआ कि सुबह दस बजे तक सम्पन्न हो जाएगी। &lt;br /&gt;'अब?' मैं सोचता रहा और रातभर सो नहीं पाया।&lt;br /&gt;.0.0.0.0.&lt;br /&gt;मैं जब डेढ़ वर्ष का था, बड़ी दीदी का विवाह कर दिया गया था। पिता जी कलकत्ता में थे। मां को किसी ने सुझाया कि उनकी बबनी के लिए उसने एक सुयोग्य वर देखा है कानपुर से तीस मील दूर पियासी नामके गांव में (बाद में इस गांव का नाम भरतपुर पड़ा)। यह गांव कानपुर के घाटमपुर तहसील में है जिसका निकटतम रेलवे स्टेशन पतारा वहां से छ: मील है। उन दिनों वहां पहुंचने के लिए पैदल के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था। मेरे बहनोई की सुयोग्यता यह थी कि तीन भाइयों में वह सबसे छोटे थे, लगभग तीस-पैंतीस बीघा उपजाऊ खेत और भाइयों ने उन्हें पहलवानी की छूट दे रखी थी। हालांकि वह मुझे कभी पहलवान जैसे नहीं दिखे। होश संभालने पर जब भी उन्हें देखा--लंबे, छरहरे,सांवले, लंबोतरे चेहरे पर छोटा-सा मुंह, छोटे बाल, छोटी आंखें, हड्डियां निकलीं, उभरी नाक। भाइयों की छूट ने उन्हें आलसी और निकम्मा बना दिया था। दोनों बड़े भाई खेत संभालते और अपने व्यवसाय भी, लेकिन सदन सिंह सेंगर...यही नाम है मेरे बहनोई का, तहमद बांधे गांव में घूमते...अपने हमउम्रों के साथ किसी चौपाल में ताश फेट रहे होते।&lt;br /&gt;दीदी का जब विवाह हुआ वह तेरह-चौदह साल की थीं। दो-तीन वर्षों तक वह अच्छी बहू...देवरानी के रूप में ससुराल में रहीं। उनके सास-श्वसुर नहीं थे। भाइयों ने सोचा होगा कि शादी के पश्चात् सदन सिंह अपनी जिम्मेदारी अनुभव करेंगे और पहलवानी के साथ, जिसके लिए सुबह-शाम अखाड़े में उतरने की आवश्यकता होती है, के बाद खेतों की ओर ध्यान देंगे, लेकिन पचीस-छब्बीस वर्ष की उम्र तक खेत-खलिहान से मुक्त रहे सदन सिंह को वह सब रास नहीं आया। भाइयों की बात की उपेक्षा कर वह बदस्तूर चौपालों की शोभा बढ़ाते रहे और घर में वातावरण तनावपूर्ण होने लगा। दीदी पति के लिए दिए जाने वाले ताने सुनने को विवश थीं। अंतत: उन्होंने स्वयं कमर कसी और खेत-खलिहान तो नहीं, लेकिन घर के काम के साथ घेर का काम करने का विचार किया और एक दिन सुबह जब सदन सिंह के दोनों भाई जानवरों के सानी-चारा के लिए घेर में पहुंचे देखकर हैरान-परेशान रह गए कि उनकी छोटकी बहू जानवरों के नीचे का गोबर एकत्र कर चुकी थी। भूसे में रातिब मिलाकर भैंसों और बैलों के सामने डाल चुकी थीं और जानवर नांद में भकर-भकर मुंह मार रहे थे।&lt;br /&gt;''छोटकी, मैं यह क्या देख रहा हूं?'' मंझले जेठ बदन सिंह बोले, ''सदन लंबी तानकर सो रहे हैं और तुम.....।''&lt;br /&gt;छोटकी ने घूंघट सिर से नीचे खींच लिया, और जानवरों के नीचे झाड़ू लगाना जारी रखा। बोली नहीं। बदन सिंह का पुरुषत्व कोई उत्तर न पाकर आहत हुआ। घेर घर से सटा हुआ था। वह पलटे जबकि बड़े जेठ खड़े रहे...अपने बड़प्पन के बोझ तले दबे। बदन सिंह ने घर जाकर अपनी पत्नी से छोटकी की शिकायत की, ''यह क्या तमाशा है राकेश की अम्मा...छोटकी नाक कटवाने पर तुली हुई है इस खानदान की।''&lt;br /&gt;''का हुआ...?''&lt;br /&gt;''चलकर घेर में देखो।''&lt;br /&gt;और छोटकी की दोनों जेठानियां मिनटों में घेर में हाज़िर थीं। शोर सुनकर सदन सिंह भी अपनी तहमद संभालते घेर जा पहुंचे। छोटकी किंकर्तव्यविमूढ़ हाथ में झाड़ू थाम घूंघट को और नीचे तक सरकाकर खड़ी हो गयीं।&lt;br /&gt;''बदजात, मैं यह क्या तमाशा देख रहा हूं?'' सदन सिंह फुंकारे। उनका पुरुष अहं जाग्रत हो उठा था। छोटकी सोच ही रही थीं कि पति के स्थान पर स्वयं काम करके उन्होंने क्या अपराध किया था।' लेकिन उनकी सोच पूरी भी नहीं हुई थी कि सदन सिंह का मुगदर उठाने वाला हाथ उनकी पीठ पर पड़ा था और छोटकी 'हा, अम्मा...।' के चीत्कार के साथ छाती थाम ज़मीन पर बैठ गयी थीं। जिस अम्मा को उन्होंने याद किया था उसे गलियाते सदन सिंह के हाथ-पांव छोटकी पर चल रहे थे और उनके भाई-भौजाई मुंह बांधे दृश्य देख रहे थे। वे पुलकित थे या दुखी कहना कठिन है, लेकिन सदन सिंह ने पत्नी को उस दिन इतना पीटा कि पन्द्रह दिनों तक वह बिस्तर पर पड़ी दूध में हल्दी पीकर आंतरिक चोटों के ठीक होने का इंतज़ार करती रही थीं।&lt;br /&gt;.0.0.0.0.0.&lt;br /&gt;दीदी की प्रताड़ना की अनंत कथाएं हैं। सदन सिंह का हाथ खुल चुका था...अब वह मामूली-सी बातों पद भी दीदी पर बरस पड़ता। दीदी पिटती, मां-पिता को याद करतीं...छटपटातीं और उसी खूंटे से बंधी रहतीं। मां...जिन तक समाचार पहुंचाना उनके लिए सहज न था। पढ़ना-लिखना उन्हें बखूबी आता था...अपढ़ मां-पिता ने अपनी संतानों को पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन उन दिनों गांव के निकट के गांव में मात्र प्राइमरी तक शिक्षा की ही सुविधा थी। आगे पढ़ने के लिए तीन: मील दूर जाना पड़ता। दीदी की पढ़ाई में पहली बाधा दूर जाने की थी और दूसरी बाधा उस परिचित ने ला उपस्थित की थी जिसने सदन सिंह की सुयोग्यता का ऐसा दृश्य उपस्थित किया था कि मां ने उस सुयोग्य वर को छोड़ना उचित नहीं समझा था। दीदी पांचवीं तक ही पढ़ सकी थीं। लेकिन ''सर्वश्री उपमा योग भगवान की किरपा से.....'' से प्रारंभ कर पत्र लिखना उन्हें आता था। लेकिन एक अंतर्देशीय लिखकर उसे दूर गांव स्थित पोस्ट आफिस में छोड़ने की व्यवस्था वह कैसे करतीं और मां भी क्या उनकी सहायता के लिए दौड़ आतीं! भले ही वह अक्खड़, खुद्वार और निर्भीक थीं...किसी से भी न दबने वालीं, लेकिन यहां मामला कुछ और ही था। लड़की की ससुराल से जुड़ा मामला.....अति संवेदनशील। मेरे पिता और बड़े भाई कलकत्ता में थे। दीदी अपनी स्थितियां और सीमाएं जानती थीं और यातना सहने के लिए अभिशप्त थीं। उधर उनकी ससुराल का वातावरण अधिकाधिक तनावपूर्ण होता जा रहा था। जेठानियां देवर के खुल चुके हाथ का आनंद लेने लगी थीं और उनके कान भी भरने लगी थीं। दीदी की मामूली त्रुटि भी उनके लिए प्रताड़ना का कारण बन जाती। प्रताड़ना ऐसी कि आह भरने पर भी प्रतिबंध था। आखिर एक दिन पीड़ा फूट ही पड़ी थी। आंगन में पहले दिन के घेर का दृश्य उपस्थित था। सदन सिंह के लात-घूंसों की बौछार के बीच फुंकार उठी थीं रामदुलारी की बेटी, ''बहुत हो चुका...आप डांव-डांव घूमो और मैं यहां ताने सुनूं। मार डालो वह अच्छा, लेकिन ताने नहीं सुन सकती। खेतों में निराई करने गई थी...चोरी-छिनारा करने नहीं। आप अपने शरीर को नहीं खटा सकते, अपने हिस्से के काम के लिए मजदूर रखने की तौफीक पैदा नहीं कर सकते तो कोई तो काम करेगा ही...या तो खेतों में सब के बराबर काम करें या मुझे करने दें और अगर वह भी स्वीकार नही तो मुझे मेरे मायके छोड़ दें...फिर जो मन आए करें....।''&lt;br /&gt;पहली बार दीदी की आवाज फूटी थी और वह भी सदन सिंह के दोनों भाइयों और भौजाइयों के सामने और सदन सिंह के हाथ रुक गए थे। हालांकि वह रुकावट अस्थाई साबित हुई थी, लेकिन दीदी को लगा था कि उनकी बात का असर हुआ था पति पर। और हुआ था...अगली सुबह सदन सिंह के दोनों भाइयों ने देखा था कि हल कंधे पर रख सदन बैलों के साथ खेतों की ओर जा रहे थे। लेकिन अनभ्यस्त हाथ और खेत में टेढ़े-मेझे चलते पैरों ने कुछ देर सही खेत जोतने के बाद हल की कुशिया जमीन में धंसकर चलने के बजाए मात्र रेखा-सी खींचती चलने लगी थी और ऐसी स्थिति में जो होना था वह हुआ। कुशिया का फाल उछलकर सदन सिंह के पैर में जा धंसा था। हल छूट गया था और सदन सिंह लंगड़ाते, खून बहाते पैर घसीटते सड़क किनारे एक खेत की मेड़ पर खड़े आम के पेड़ की ओर दौड़ पड़े थे। बैल उनके बिना जमीन पर बेड़ा पड़े घिसटते हल को तब भी खींच रहे थे। संयोग था कि दोनों बड़े भाई उसी समय वहां पहुंचे थे। एक ने दौड़कर हल को बैलों से अलग किया था, क्योंकि जो गति कुशिया ने सदन सिंह के पैर की की थी, वह दोनों बैलों के पैरों की होनी निश्चित थी।&lt;br /&gt;सदन सिंह के घायल होने का दोष भी दीदी के सिर पड़ा। 'कुलच्छनी, गृहतोड़नी-बोरनी' जैसी कितनी ही उपमाओं से उन्हें विभूषित होना पड़ा और अपराधबोध से ग्रस्त वह भी अपने को वैसा ही मान रही थीं।&lt;br /&gt;''मैं इसकी शक्ल नहीं देखना चाहता।'' सदन सिंह का फरमान जारी हुआ तो निर्णय किया गया कि उन्हें मायके पहुंचा दिया जाए। गांव के किसी व्यक्ति के साथ दीदी को मायके भेज दिया गया। मायके आने के बाद मां को दीदी की दारुण स्थिति ज्ञात हुई। तीन या चार महीना ही वह मायके में रही थीं कि एक दिन सफेद झक धोती-कुर्ता पहने चमरौधा चटकाते शाम आगरा-इलाहाबाद पैसेंजर से सदन सिंह प्रकट हुए। वह दीदी को लेने आए थे। दामाद बेटी को ले जाने आया था, मां ने दबी जुबान उनसे शिकायत की और दामाद ने मुस्कराकर कहा, ''अरे अम्मा, मैंने तो आपकी बिटिया की खेतों में काम करने से बदन में लगी धूल झाड़ी थी...अब आपको शिकायत का मौका नहीं मिलेगा। मैंने परचून की दुकान खोल ली है। खेतों में काम करने के लिए अपनी जगह एक मजदूर लगा दिया है। किसी को कहने का मौका नहीं दूंगा...आप निश्चिंत रहें अम्मा...।''&lt;br /&gt;और मां निश्चिंत हुई थीं, लेकिन दीदी नहीं। वह सेंगरों के छद्म को भलीभांति पहचान चुकी थीं। और ससुराल पहुंचने के कुछ दिनों बाद ही उनकी आशंका सही सिध्द हुई थी। सदन सिंह ने दुकान तो कर ली थी, लेकिन वह ताश खेलने वालों का अड्डा बन गयी थी। गांव के उनके आवारा साथी वहां एकत्र होते...मुफ्त की बीड़ी-सिगरेट फूंकते...जल्दी ही दुकान घाटे का सौदा सिध्द हुई। सदन सिंह न कभी अपने प्रति जिम्मेदार हुए न घर के प्रति और न पत्नी के प्रति। भाइयों में कसमसाहट हो रही थी।&lt;br /&gt;''ऐसा कब तक चलेगा?'' का प्रश्न दोनों बड़े भाइयों के बीच उछलने लगा था, ''हम खटें-कमाएं और सदन मौज करें। छोटकी हल तो नहीं चला सकती...घूर तक जाकर गोबर नहीं फेक सकती....।''&lt;br /&gt;छोटकी ने सुना। हल वह भले ही नहीं चला सकती थीं, लेकिन गोबर, सानी-पानी, निराई,गोड़ाई, बुआई से लेकर जानवरों के लिए मशीन पर कुट्टी काटने जैसे काम छोटकी ने अपने सिर ओढ़ लिया। अब उनके इन सब कामों का विरोध भी कम हो चुका था। गांव में नाक कट चुकी थी, लेकिन वह नाक तो गांव के और भी कितने ही निखट्टू पतियों की उनकी पत्नियों के कारण पहले ही कट चुकी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.0.0.0.0.0.&lt;br /&gt;समय बीतता रहा। दीदी दो बेटियों और दो बेटों की मां बन गयीं। पारिवारिक विग्रह बढ़ा और भाइयों में बटवारा हो गया। बटवारा सदन सिंह को सबक सिखाने के लिए था, लेकिन दूसरे के श्रम पर गुलछर्रे उड़ाने वाले कम लोग ही अपने को संभाल पाते हैं। सदन सिंह ने अपने हिस्से के खेत तिहाई पर दे दिए और स्वयं तहमद बांधे गांव में घूमते रहे। दीदी ने घर-खेत की जिम्मेदारी संभालीं, बच्चों की पढ़ाई और बड़ी बेटी के विवाह की चिन्ता ने उन्हें वह सब करने के लिए विवश किया जो किसी पुरुष किसान को करना होता है। इस सबके बावजूद सदन सिंह का कोपभाजन वह जब-तब होती रहीं, लेकिन बटवारे के बाद दीदी के अथक श्रम पर जीने वाले उस इंसान का साहस दीदी पर हाथ उठाने का कम ही होने लगा था। शायद एक कारण बड़े होते बच्चे रहे हों। दीदी ने अठारह की होते हीे बड़ी बेटी का विवाह कर दिया था।&lt;br /&gt;.0.0.0.0.0.&lt;br /&gt;दीदी ने नानी जैसा स्वभाव पाया था। घोर अपमान और प्रताड़ना सहकर भी परिवार के लिए समर्पित रहना क्या भारतीय ग्राम्य नारी की नियति है! दीदी ने अपने बल पर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर ली थी। 1962 से 1965 के मध्य जब मायके की आर्थिक स्थिति दयनीय हो गयी थी, दीदी ने पति से छुपाकर सहायता की थी। उन्हीं दिनों पिता ने शादी के समय उन्हें एक सेर चांदी के दिए वे कड़े बहुत ही भारी मन से मांगा था, जिन्हें देते समय पिता जी ने कहा था, ''बेटा, ईश्वर न करे मुझे ये मांगना पड़े, लेकिन यदि ऐसी स्थिति आ ही जाएगी तब तुम इन्हें अपने भाइयों के लिए दे देना। और यह बात सदन को भी बता देना।''&lt;br /&gt;मुझे याद है कड़े मांगने से पहले मां-पिता जी के बीच हुई वार्तालाप और दोनों के चेहरों के भाव। पिता के चेहरे के भाव बयां कर रहे थे कि बेटी से कड़े मांगने से पहले वे मर क्यों नहीं जाते। लेकिन वे मरे नहीं थे। उन्हें शेष परिवार के पोषण के लिए बेटी को अपनी कही बात याद दिलानी ही पड़ी थी और दीदी ने सहेजकर रखे वे कड़े पिता जी के हवाले कर दिए थे। शायद उन्होंने कभी उन्हें पैरों में नहीं डाला था। छोटे कद का कर्मठता का गवाह उनका दुबला शरीर शायद आध-आघ सेर के कड़ों का वजन पैरों पर स्वीकार करने से इंकार कर देता।&lt;br /&gt;जिन दिनों हम बहनोई को दीदी के विरुध्द किसी प्रताड़ना के लिए रोकने की स्थिति में आ गए थे उन दिनों उनका कहर थमा हुआ था। कारण था घर-खेतों में दीदी की जूझ और बच्चों की परवरिश। बच्चों के लिए सदन सिंह भी चिन्तित दिखने लगे थे और इसी कारण जब बड़ा बेटा छठवीं क्लास में पहुंचा, वह उसे शहर में पढ़ाने के लिए बड़े भाई साहब के पास छोड़ गए थे। उन दिनों मेरा छोटा भाई भी छठवीं में बड़े भाई साहब के पास रहकर पढ़ रहा था। उसे पढ़ाई की परवाह नहीं थी। हम लोगों की डांट-फटकार ...यहां तक कि मारपीट भी उस पर बेअसर थी। उसके साथ राघवेन्द्र की पढ़ाई चौपट होने का खतरा भांप भाई साहब ने बहनोई को उसे वापस ले जाने के लिए संदेश भेजा। यह बात उन्हें नागवार लगनी थी...और लगी। लेकिन दीदी तो दीदी थीं...उन्होंने कभी नाराज होना जाना ही नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े बेटे ने इंटर करने के बाद एयर फोर्स ज्वायन किया तो दीदी को लगा कि उनके दुख के दिन बीतने वाले हैं। लेकिन कुछ ही वर्षों में उनका भ्रमभंग हो गया था। बड़ा बेटा पिता के नक्शे-कदम पर था...खानदान का प्रभाव। मां के प्रति पिता के दर्ुव्यवहार के लिए वह मां को दोष देता....उसके सामने भी बहनोई दीदी को पीटते और वह प्रस्तर मूर्ति बना रहता। लेकिन छोटा बेटा जिसे हम पप्पू पुकारते थे, मन ही मन पिता के प्रति विद्रोही हो रहा था। उसने इंटर किया तो पिता ने उसे खेतों में काम करने की सलाह दी। वह चुप रहा, लेकिन तभी एक दिन किसी बात पर बहनोई ने दीदी पर हाथ उठा दिया। पप्पू घर में था। दीदी पर पिता का हाथ पड़ता इससे पहले ही दौड़कर उसने उनका हाथ पकड़ लिया और ऊंची आवाज में बोला, ''चाचा (बड़े भाई के बच्चों का अनुसरण करते हुए मेरे भांजे-भांजियां भी पिता को चाचा कहने लगे थे) जब से होश संभाला आपको अम्मा को मारता-पीटता देखता रहा...अब नहीं। खैरियत इसी में है कि अब आप यह सब बंद कर दें।''&lt;br /&gt;विवाद बढ़ा। सदन सिंह नाग की भांति फुंकारते उछलते रहे, लेकिन जवान बेटे के सामने कुछ करने में असमर्थ थे, जो उनसे भी लंबा दो इंच कम छ: फुट का था।&lt;br /&gt;''आज और अभी निकल जा घर से....।'' सदन सिंह चीखे थे। पप्पू ने घर छोड़ दिया, लेकिन दीदी उसके पीछे दौड़ीं और गांव के छोर पर उसे रोककर समझाने में सफल रहीं कि उसके जाने के बाद पति का उनके प्रति दर्ुव्यहार बढ़ जाएगा जो कुछ वर्षों से थमा हुआ था। पप्पू लौट आया। वास्तव में पति से भय से अधिक एक मां की पुत्र के प्रति ममता ने उन्हें उसे लौटा लाने के लिए दौड़ाया था।&lt;br /&gt;पप्पू के लौट आने से सदन सिंह की खीझ बढ़ गयी, लेकिन अब उम्र जवान खून का सामना करने की न रही थी। छटपटाकर रह गए थे सदन सिंह। &lt;br /&gt;.0.0.0.0.0.0.&lt;br /&gt;नवंबर, 1984 के अंत में दीदी बड़े बेटे के साथ मेरे यहां आयीं। अवकाश समाप्तकर भुज वापस लौटते समय बेटा उन्हें मेरे यहां छोड़ गया। चार माह रहीं वह। उन्ही दिनों पप्पू को पिता ने घर से निकाल बाहर किया। वह भी दिल्ली आ गया। स्टेशन से सीधे मां से मिलने मेरे यहां आया। उसने रात बितायी। दीदी ने उसे गांव लौट जाने के लिए समझाया, लेकिन वह वापस न लौटने के दृढ़ निश्चय के साथ आया था। अगले दिन वह अपने बहनोई के किसी रिश्तेदार के यहां बुध्दविहार चला गया। दीदी के रहते वह दो बार उनसे मिलने कुछ घण्टे के लिए आया। उसने किसी एक्सपोर्ट कंपनी में एकाउण्ट्स का का काम संभाल लिया था। वह लंबा,स्वस्थ-सुदर्शन युवक था।&lt;br /&gt;चार माह बाद पति की बीमारी का समाचार पाकर दीदी गांव चली गयीं। मैं उनके निर्णय पर सोचने लगा था कि जिस पति ने आजीवन उन्हें सताया उसकी मामूली बीमारी के समाचार ने उन्हें विचलित कर दिया...क्या यही भारतीय नारी का वास्तविक स्वरूप है! शायद परंपरा से उसे यह सिखाया जाता रहा कि वही घर की असली संरक्षिका है...वह सर्व-स्वरूपा है। पुरुषों ने नारी को बांध रखने के कितने ही छद्म किए...वह प्रताड़ित भी होती रही और प्रताड़ित करने वालों के लिए मरने को भी तैयार होती रही। सत्यवान कैसा भी हो उसे सावित्री ही बनना होता है। मैं नहीं चाहता था कि वह जाएं , लेकिन उन्होंने मेरे सुझाव को दरकिनार कर दिया था।&lt;br /&gt;''खेत कटने के लिए तैयार हैं रूप...अगर वह सच ही बीमार हैं तब न जांये ते आधी पैदावार ही मिलेगी।''&lt;br /&gt;बहनोई की बीमारी शायद खेतों को लेकर ही थी और इसे दीदी ने भांप लिया था।&lt;br /&gt;.0.0.0.0.0.0.&lt;br /&gt;दीदी ने छोटी बेटी की भी शादी कर दी और अब उनके दिन ठीक बीत रहे थे। 1994 में उन्होंने छोटे बेटे का विवाह निश्चित किया। 12 या तेरह मार्च को शादी होनी थी। पप्पू हम लोगों से मिलकर और ''शादी में आप सब अवश्य आना मामा....।'' कहकर कानपुर गया, लेकिन शादी से दो दिन पूर्व रात बारह बजे किदवई नगर से यशोदानगर जाने वाली रोड पर एक ट्रक से स्कूटर टकरा जाने से उसकी मृत्यु हो गयी थी। तब तक दीदी का बड़ा बेटा नौकरी से स्वेच्छया सेवाकाश लेकर कानपुर में बस गया था। पप्पू की मृत्यु ने दीदी को तोड़ दिया। वह बीमार रहने लगीं... मधुमेह और दूसरी तमाम बीमारियां।&lt;br /&gt;राघवेन्द्र ने कार्पोरेशन बैंक ज्वायन किया और नोएडा में उसकी पोस्टिंग हुई। वह गाजियाबाद रह रहा था। एक दिन दीदी का खत मिला जिसमें उन्होंने दुखी भाव से लिखा था कि बहनोई अब फिर बात-बात पर उन पर हाथ छोड़ने लगे हैं। बड़े भाई साहब ने दीदी को अपने साथ कानपुर आकर रहने के लिए समझाया, लेकिन अपना घर छोड़ने को वह तैयार नहीं हुईं। यह उचित भी था। जिस घर को उन्होंने अपने अथक श्रम से सजाया-संवारा था, उसे छोड़कर भाई के घर रहना उन्होंने उचित नहीं समझा था। उस पत्र में दीदी ने लिखा था कि मैं राघवेन्द्र को कहूं कि वह पिता को समझाए ....पिता बड़े बेटा-बहू की बात मानते हैं।&lt;br /&gt;हम पति-पत्नी गाजियाबाद गए। पत्र पढ़कर राघवेन्द्र बोला, ''मामा, सारा दोष अम्मा का ही है।''&lt;br /&gt;हम हत्प्रभ-निराश लौटे। बड़ा बेटा पिता के पक्ष में खड़ा था...वह पहले भी उन्हीं के पक्ष में था और छोटा अब था नहीं। कहानी बाद में मालूम हुई। राघवेन्द्र पिता पर खेत बेचने का दबाव डाल रहा था। पिता तैयार थे, लेकिन दीदी न बेचने के लिए अड़ी हुई थीं। उन्हें बड़े बेटे की मंशा में खोट दिख रहा था और खेत न बिकते देख बेटा मां के विरुध्द था।&lt;br /&gt;खेत नहीं बिके। बहनोई ने भी हथियार डाल दिए थे। लेकिन तभी एक दिन सूचना मिली कि राघवेन्द्र अंतर्ध्यान हो गया। कहां गया किसी को पता नहीं था। दीदी का हाल बेहाल था जिनका दूसरा बेटा, भले ही वह उनके विरुध्द था, सन् 2000 में अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर गायब हो गया था। हम अनुमान ही लगाते रहे और वह नहीं लौटा। दीदी उस बेटे को एक नज़र देख लेने की आस लिए 29 अप्रैल, 2005 को इस संसार को अलविदा कह गयीं। दीदी की मृत्यु के एक वर्ष बाद एक दिन पता चला कि राघवेन्द्र की पत्नी-बच्चे भी कहीं चले गये। स्पष्ट है कि राघवेन्द्र के पास ही वे गये थे। मेरे बहनोई को शायद दीदी की मृत्यु का ही इंतजार था।&lt;br /&gt;मुझे यह अपराध बोध है कि मैं बड़ी दीदी के लिए कुछ नहीं कर सका सिवाय इसके कि उन्हें समर्पित दो कहानियां....'उनकी वापसी' (साप्ताहिक हिन्दुस्तान-1985) और ‘आखिरी खत’ (साहित्य अमृत-1995) लिखीं और दोनों ही कहानियाँ चर्चित रहीं।&lt;br /&gt;-0-0-0-0-0-&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2880097249222214869-1149748629145254074?l=wwwrachanayatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/feeds/1149748629145254074/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2880097249222214869&amp;postID=1149748629145254074' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/1149748629145254074'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/1149748629145254074'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='यादों की लकीरें'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2880097249222214869.post-5941548516277498714</id><published>2011-05-08T07:43:00.001-07:00</published><updated>2011-05-08T07:48:16.466-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आत्मकथ्य'/><title type='text'>यादों की लकीरें</title><content type='html'>&lt;a 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मैंने उनकी सहृदयता बटोरने की चेष्टा की है। 'सारिका' में कमलेश्वर ने साहित्यकारों के आत्मकथ्य एक श्रृखंला 'गर्दिश के दिन' शीर्षक से प्रकाशित की थी और तब कुछ पाठकों और कुछ साहित्कारों को उन रचनाकारों के जीवन-संघर्षों के विषय में ऐसे ही उद्गार व्यक्त करते हुए सुना था। तब से मन में यह भीरु-भाव बैठा रहा कि मेरे जीवन के पैबन्द देखकर पता नहीं कोई क्या सोचे! जीवन के उन पैबन्दों को इस खूबसूरती से ढके रखा कि मित्रों को भी यह एहसास नहीं होने दिया कि संघर्ष ही मेरा सबसे बड़ा मित्र रहा है। जीवन का इतना लंबा पड़ाव पार कर लेने के बाद भी आज भी वह किसी न किसी रूप में मेरे साथ है। अपनी पत्रिका 'कथाबिंब' के 'आमने-सामने' स्तंभ के लिए अरविन्द जी ने जब लिखने के लिए कहा तब उनकी आज्ञा टालने का साहस मैं नहीं जुटा पाया। लेकिन तब से अब तक बहुत-सा पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका है। अस्तु :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'''''' &lt;br /&gt;छठवीं का विद्यार्थी था। उन दिनों मेरे एक पड़सी ने पूछा, ''क्या बनना चाहते हो?'' सकुचाते हुए मैंने कहा था,''साहित्यकार''। तब साहित्यकार से मेरा आभिप्राय एक बडे क़वि से था। 1962 में 'जुग्गीलाल कमलापति प्राइमरी पाठशाला, पुरवामीर' (कानपुर) से पांचवीं उत्तीर्ण कर जूनियर हाईस्कूल, महोली में छठवीं में दाखिला लिया था। श्यामनारायण पाण्डेय,सुभद्राकुमारी चौहान और सोहनलाल द्विवेदी जैसे कवियों के राष्ट्रगीतों से परिचय हो चुका था। प्रेमचन्द के साहित्य और जीवन से प्रेरित था। गांव के चार लड़के, बाला प्रसाद त्रिवेदी, रामसनेही,यमुनाप्रसाद गुप्त और मोहनलाल कुरील मेरे साथ तीन मील पैदल चलकर महोली जाते थे। हम सभी एक ही कक्षा में पढ़ते थे और हममें से अधिकांश के पास जूते नहीं होते थे। मेरे पास तो शायद ही कभी रहे हों, अगर कभी रहे भी तो कपड़े के जूते। मेरे पास एक ही जोड़ी कपड़े थे जिसे मैं दूसरे-तीसरे दिन बम्बे (नहर) के पानी में रेहू से साफ कर लिया करता था। रेहू से साफ कपड़े वेैसे भी पीलापन लिए होते और ऊपर से तीन मील आने-जाने की धूल-धक्कड़ ..... कपड़े प्राय: गन्दे ही दिखते। इस बात का एहसास रहता, किन्तु विवशता थी। जब कभी साबुन से धुले कपड़े पहनकर स्कूल जाता मन प्रफुल्लित रहता। जाड़े के दिनों में गन्दे कपड़ों से मन भारी रहता और दिन भर आलस्य-सा बना रहता। मुझे याद है, ऐसे दिनों आंखों से कीचड़ निकलता रहता फिर भी पढ़ने में ठीक था...... अर्थात् कक्षा में होशियार तीन छात्रों में से एक। इसीलिए अध्यापकों को प्रिय था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज भी दो घटनाएं भूल नहीं पाया। एक घटना तब की है जब मैंने छठवीं कक्षा की परीक्षा दी थी। उन दिनों उत्तर प्रदेश में गर्मियों के लिए विद्यालय 31 मई को बन्द होते थे। 31 मई को परीक्षा परिणाम (बोर्ड की परीक्षा को छोड़कर) धोषित होते थे। 31 मई,1963 (मंगलवार) का दिन था। मेैं 103 डिग्री बुखार में तप रहा था। परीक्षा परिणाम लेने नहीं जा सका। लेकिन आश्चर्य तब हुआ जब मेरे अंग्रेजी अध्यापक एक अन्य अध्यापक के साथ मुझे देखने और मेरा परीक्षा परिणाम देने आए। आज की स्थिति में क्या ऐसा सोचा जा सकता है! दूसरी घटना अगले वर्ष जाड़े के दिनों की है। बड़े भाई (श्री जगरूपसिंह,जो मुझसे 10 वर्ष बड़े हैं) का बी.ए.अंतिम वर्ष था। वह कानपुर में बी.एस.एस.डी. कॉलेज, नवाबगंज में पढ़ रहे थे और होस्टल में रहते थे। उनकी शादी जून,1963 में हो चुकी थी। सात लोगों का परिवार और आय का कोई ठोस आधार नहीं था। बड़े भाई का अंग्रेजी ज्ञान बहुत अच्छा था। शहर में वह अंग्रेजी के टयूशन करते। मेरे पास कोई गर्म कपड़ा नहीं था और मेरी एक मात्र हल्के नीले रंग की कमीज कंधे से नीचे पीठ में फट चुकी थी। उन्हीं दिनों भाई साहब दो पाउण्ड सलेटी रंग का ऊन खरीदकर लाए थे। भाभी ने आनन-फानन में मेरे लिए पूरी बांह का स्वेटर तैयार कर दिया, जिसने मुंह फैला चुकी कमीज को ढक लिया था। लेकिन मेरी स्थिति मेरे हेड मास्टर से छुपी न थी। एक दिन वह मेरे सामने आ बैठे और घुमा-फिराकर मुझसे यह जानने का प्रयत्न करते रहे कि क्या मेरे पास एक ही कमीज और स्वेटर हैं। मैंने क्या उत्तर दिए यह इस समय याद नहीं लेकिन यह याद है कि मैं बेहद भयभीत रहा था यह सोचकर कि कहीं वह मुझसे स्वेटर उतार देने के लिए न कहें। लेकिन उन्होंने जब कहा, ''किसी चीज की आवश्यकता होगी तो नि:संकोच कहना'' मैंने स्वीकृति में मूड़ी हिला दी थी। शायद अभावों में जीने की आदत ने मुझे कुछ ऐसा खुद्दार बना दिया था कि जीवन में कभी किसी से मांगकर कुछ भी हासिल न करने के संकल्प पर कायम रह सका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्कूल में दैनिक जागरण अखबार आता था। उन दिनों भारत-चीन युध्द चल रहा था। महोली स्कूल में ही अखबार से मेरा साक्षात हुआ था। पत्रिकाओं से तो बहुत बाद में परिचित हो सका। उन्हीं दिनों की घटना है। वैसे तो 'जागरण' विद्यार्थियों के हाथ लग ही नहीं पाता था और यदि किसी अध्यापक की मेज पर रखा भी होता तो हेडमास्टर के भय से हम उसे छूने का साहस नहीं कर पाते थे। हर विद्यार्थी उनकी नजर से बचता था। शरारत करते पकड़े गए तो उस समय वह डांटकर छोड़ देते, किन्तु अपने पीरियड में कसर पूरी कर लेते। वह सभी कक्षाओं को गणित पढ़ाते थे। उन दिनों अध्यापकों की मार आम बात थी। यह भय हमें गणित के अभ्यास में जुटाए रखता, लेकिन उस दिन शायद हेडमास्टर अस्वस्थ थे या कहीं गए हुए थे। वही नहीं, एक या दो अध्यापक ही उपस्थित थे और हेडमास्टर की अनुपस्थिति का वे भी लाभ उठा रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन हमारी मौज थी। गुलाबी जाड़े का दिन था वह। बाहर मैदान में टाट-पट्टी बिछी थी और भोजनावकाश का समय था। कक्षा में तीन-चार छात्रों को छोड़कर अधिकांश खेलने भाग गए थे। हममें से कोई 'जागरण्ा' उठा लाया चुपके से। मेरे हाथ भी एक पेज लगा, उसमें किसी की वीर रस की कविता छपी थी, जो भारत-चीन युध्द पर थी। कविता पढ़कर मैं भी वीर रस में डूबने-उतराने लगा। तब मैं कक्षा में सबसे पीछे बैठता था। बहुत डरपोक जो था। खाने की छुट्टी के बाद कक्षा प्रारंभ हुई। बच्चे अपनी मस्ती में थे। मैं उस समय अपने में डूबा जागरण में पढ़ी कविता के तर्ज पर तुकबन्दी में व्यस्त था। काफी मशक्कत के बाद मैं चार पंक्तियां लिखने में सफल रहा था और उस समय मुझे लगा था कि मेरे रूप में किसी महान कवि का पुनर्जन्म हो चुका था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितने ही दिनों तक मैं अपनी उस प्रथम कविता को गाता-गुनगुनाता रहा। बाद में तुकबन्दी करने का नशा-सा हो गया। सफेद पन्नों को चौथाई कर छोटी डायरी बना ली और हर समय उसे जेब में रखने लगा। जब भी कोई कविता की पंक्ति मन में उमड़ती, उसमें लिख लेता। ऐसी एक डायरी, जिसमें चार-चार पंक्तियों की कविताएं दर्ज थीं बाला प्रसाद त्रिवेदी के पिता के हाथ लग गयी थी। भारी बरसात का दिन था वह। मैं मामा की चौपाल से उस खोयी डायरी को ढूंढकर असफल लौट रहा था कि उन्होंने, जिन्हें हम बच्चू नाना कहते थे, ने बुलाया। जब उन्होंने वह डायरी दिखाई, मैं संकोच से विजड़ित हो गया। अगर उसके ऊपर मेरा नाम न लिखा होता तो मैं कह देता, मेरी नहीं है। मुझे लगा था जैसे मैं कोई बड़ा अपराध करते हुए पकड़ा गया था, लेकिन उन्होंने मुझे उबार लिया था। डायरी मुझे मिल गयी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविताओं की तुकबन्दी का काम कम होने के बजाय बढ़ता गया। यहां तक कि मैं तुलसीदास की चौपाइयों और रहीम के दोहों के तर्ज पर रचनाएं लिखने लगा। जब भी मन को किसी बात से ठेस पहुंचती, पीड़ा होती.... एक कविता लिखी जाती। परिवार उन दिनों भयानक आर्थिक संकट से गुजर रहा था। पिताजी को अवकाश ग्रहण किए पांच वर्ष हो चुके थे। उनको नौकरी से मिली जमापूंजी समाप्त हो चुकी थी और हम सभी जानते थे कि भविष्य के दिन और भी अधिक कष्टप्रद होने वाले थे। वे दिन मेरे लिए इतने कष्ट के न थे, जितने मां-पिता के लिए थे। मां पिता जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम में जुटी रहतीं और दोनों मिलकर घर की गाड़ी खींचने का प्रयत्न कर रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता (सुरजनसिंह चन्देल) एक कर्मठ और जुझारू व्यक्ति थे। उनकी जीवटता का एक ज्वलन्त उदाहरण यह है कि युवावस्था में कानपुर में अल:सुबह गंगा स्नान कर वह लखनऊ के लिए पैदल प्रस्थान करते इस संकल्प के साथ कि सूर्यास्त से पहले गोमती में स्नान करेंगे। और पैंतालीस-पचास मील की लंबी यात्रा तय कर वह संकल्प पूरा करते थे। अगले दिन वह गोमती में स्नान कर सूर्यास्त से पूर्व कानपुर पहुंंच गंगा में स्नान करते थे। भले ही इसे उनकी सनक कहा जाये, लेकिन यह किसी व्यक्ति के दृढ़ निश्चय का परिचायक है। मृत्युपर्यन्त मैंने उन्हें वैसा ही कर्मठ और दृढ़-निश्चयी देखा। नौकरी में रहते उन्होंने परिवार के किसी व्यक्ति को किसी कमी का एहसास नहीं होने दिया। खाली समय वह सत्संगति में व्यतीत करते। बचपन में कुछ दिन मैं कलकत्ता में रहा था। उन दिनों बावनगाछी (हाबड़ा) में पिता जी को रेलवे की ओर से अच्छा मकान मिला हुआ था। हम पहली मंजिल में रहते थे। पिताजी सुबह चार बजे उठ जाते। स्नानकर पैदल काली मन्दिर जाते और वहां से लौटकर सात बजे 'हावड़ा लोकोमोटिव वर्कशॉप' अपनी डयूटी पर। वह बहुत ही सीधे और सरल स्वभाव के थे। जबकि मां जिद्दी और जबर्दस्त स्वाभिमानिनी। समझौता करना या झुकना उन्होंने सीखा ही नहीं था। सामने वाले को ही झुकना पड़ता था। अत: मैंने जहां पिता से संघर्ष से जूझना सीखा, वहीं मां से स्वाभिमान और टूटकर भी न झुकना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिताजी के अवकाश ग्रहण करने से बहुत पहले ही मां ने मेरे ननिहाल में घर बना लिया था। नाना के पास बहुत जमीन थी.... गांव में सबसे अधिक। उन्होंने न केवल घर बनाने के लिए मां को जमीन दी बल्कि 13 बीघा खेत भी दिए थे। दरअसल मेरे नाना की मृत्यु तभी हो गयी थी जब मामा ढाई वर्ष और मां डेढ़ वर्ष के थे। दोनों का पालन-पोषण चाचा कंचन सिंह ने किया था। मां को वह बहुत चाहते थे और उनके विवाह के बाद उन्होंने यही चाहा था कि उनकी भतीजी मायके में ही बसे। वैसे भी पिताजी के सौतेले भाई के अतिरिक्त कोई नहीं था। उनके गांव देसामऊ के उनके दस बीघे खेतों (जो आज कानपुर शहर की सरहद पर हैं और जिनकी कीमत दो करोड़ से कम नहीं है) पर उनके भांजे अर्थात मेरी बुआ के लड़के ने कोर्ट में यह हलफनामा देकर कि उनके मामा की मृत्यु हो चुकी है और वे ही उनके वारिस हैं कब्जा कर लिया था और पिता जी ने यह कहकर कि, ''भांजा बेटा समान है..... मुझे कोई शिकायत नहीं'' स्थिति को स्वीकार कर लिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1959 में अवकाश ग्रहण कर गांव आने के समय पिताजी के पास अच्छी जमापूंजी थी जिससे तीन वर्ष तक पुराने ढर्रे पर जीवन बीता था। उन्होंने दो भैंसें,एक गाय और दो भैंसे (खेत जोतने के लिए) खरीद लिए थे। खेती तिहाई में दे दी और स्वयं भैंसों और गाय की सेवा में रहने लगे थे। तीन वर्षों में बैंक का पैसा शून्य हो चला तो उन्हीं भैंसों और गाय का दूध परिवार के भरण-पोषण का सहारा बना था। खेती साथ नहीं दे रही थी बावजूद इसके कि तिहाईदार के साथ पिताजी ने अपने को भी मिट्टी बना लिया था। साफ-सफ्फाफ धोती और मलमल या सिल्क के कुर्ते में रहने वाला व्यक्ति कानपुर के किसी मिल की बनी मोटी लुंगी और बेटे की छोड़ी कमीज से बसर करने के लिए विवश हो गया था। लेकिन उफ नहीं, कोई पीड़ा नहीं, अफसोस नहीं। कभी-कभी यह अवश्य कहते कि ''रिटायरमेंट के समय कलकत्ता में दो खोली मिल रही थीं तीन-तीन हजार में, खरीद लेता तो आज यह सब न करना पड़ता।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिताजी के कलकत्ता से चलने से पूर्व भाई साहब ने हाईस्कूल कर लिया था। उन्हें रेलवे में नौकरी मिल रही थी.... चार सौ रुपए रिश्वत देनी थी। रिश्वत देना पिताजी के सिध्दान्त के विरुध्द था। बी.ए. कर भाई साहब नौकरी की तलाश में जूठ गए और सोलह महीने भटकते रहे थे। उनकी नौकरी लगने तक परिवार के पास आय का स्रोत मात्र भैंसों व गाय का दूध रहा। मां के सारे जेवर पेट भरने के लिए बिक गए थे या दूधिया के पास रेहन जा चुके थे, जिन्हें कभी वापस लौटाया नहीं जा सका। कई बार मेरी फीस के पैसे भी कठिनाई से जुट पाते। कॉपी-किताबें खरीदने के लिए पैसे न होते। मैं घर की स्थिति समझता था और स्वयं भी कोई न-कोई मार्ग निकालने की सोचता रहता, और निकाला भी। 1964 में सातवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करते ही चिन्तित हो उठा कि आठवीं की कॉपी-किताबें केैसे खरीदी जाएंगी। एक विकल्प सूझा। मामा के खेत कट रहे थे। चमरौटे की कुछ औरतें और बच्चे सीला (खेत काटते समय टूटकर गिरी बालियां) बीनने जाते थे। मामा के खेत गांव में सभी के खेतों से अधिक पैदावार देते थे। गेहूं, जौ, चना, सरसों-लाही फट पड़ता। सीला बीनने वालों का नेतृत्व नानी करतीं । नानी जैसी देवी-स्वरूपा स्त्री मैंने जीवन में दूसरी नहीं देखी। मैंने नानी से प्रस्ताव किया कि मैं भी उनके साथ सीला बीनने जाउंगा। हंसकर उन्होंने स्वीकृति दे दी। सीला बीनने के मेरे निहितार्थ को शायद वे भांप न पायी थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नानी की स्वीकृति पा मैं कितना खुश था इसका अन्दाजा वही लगा सकता है, जिसने वैसी स्थिति देखी होगी। मई-जून (तब खेती की कटाई जून प्रारंभ... और कभी-कभी जून मध्य तक चलती थी) की भयंकर तपिश में मैं गेहूं, जौ, और चना की बालियां जिस गति से टूंगता रहा था, उससे साथ वाले आश्चर्य करते रहे थे। कुछ सरसों भी हाथ लगी थी। सबको कूट-काटकर बेचने से जो मिला उसने आठवीं की पुस्तकें-कॉपियां खरीदने की चिन्ता से मुझे मुक्त कर दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आठवीं में पहुंचा तो कविताएं लिखने में व्यवधान पड़ा, पढ़ाई का दबाव और हेडमास्टर की छड़ी का भय बढ़ ग़या था। यह भी था कि अच्छे अंकों में उत्तीर्ण होना है, जिससे आगे फीस माफ रहे। मेरी परीक्षा से पहले भाई साहब की नौकरी एच.ए.एल. कानपुर में लग गयी थी। घर ने राहत की सांस ली थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परीक्षा के बाद खाली हुआ तो कुछ लिखने की इच्छा हुई। मई का महीना था वह। तुकबन्दी से मन ऊब चुका था। दरी-चादर बिछाकर बरौठे में आसन जमाया और लिखने लगा, 'नौकरी की खेज' । तब तक लंबी कहानी और उपन्यास विधा से परिचय न हुआ था। फिर भी लिखता गया था। दरअसल उसका नायक मैं स्वयं था। वह कहानी तत्काल नहीं जन्मी थी। तीन वर्षों तक मेरी डयूटी प्रतिदिन शाम को घेर में लगती आ रही थीं। पिताजी सुबह जानवरों को चराने ले जाते। शाम जानवर आगे आते, पिताजी काफी बाद में। घेर में पहुंचते ही जानवरों को उनके खूंटों से बांधने का काम मेरा होता। मैं घण्टा-दो घण्टा पहले घेर में पहुंच जाता और चारपाई पर लेट कल्पना की ऊंची उड़ान भरता रहता। 'नौकरी की खोज' उसी का परिणाम थी। लगभग सत्तर-पचहत्तर पृष्ठों की थी वह कहानी। बाद में वह कैसे नष्ट हुई याद नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जुलाई, 1965 में नौंवीं में 'भास्करानन्द इण्टर कॉलेज', नरवल में विज्ञान में प्रवेश लिया। यह वही कॉलेज है जहां से स्व. कन्हैयालाल नन्दन ने भी हाई स्कूल किया था। लेकिन यह बात बहुत बाद में नन्दन जी से मिलने के बाद ज्ञात हुई थी। यही नहीं नरवल झण्डा गान के रचयिता श्यामलाल पार्षद की जन्मस्थली भी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्हीं दिनों गांव के एक सीनियर छात्र, प्रेम प्रताम अवस्थी, जो कानपुर में पढ़ रहे थे, से मुझे पांच जासूसी उपन्यास प्राप्त हुए। बड़े चाव से दो ही पढ़ पाया था कि रविवार की छुट्टी में आए भाई साहब के हाथ पांचों लग गए। फिर क्या था! वह घटना आज भी भूल नहीं पाया। उनके शब्दों के कोड़े बरसते रहे और मैं सिर नीचा किए चुपचाप सुनता रहा था। उसी शाम पांचों उपन्यासों को मैंने मिट्टी का तेल डालकर जला दिया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाईस्कूल के बाद भाई साहब मुझे शहर ले गए। उसी वर्ष गर्मी में (1967) में छोटी बहन की शादी हुई थी। मेरे छोटे बहनोई जाजमऊ इण्टर कॉलेज में पढ़ते थे। उन्होंने भी उसी वर्ष हाई स्कूल किया था। हम दोनों ने विज्ञान विषय में प्रवेश लिया। कुछ दिन होस्टल में रहकर हम सभी भाई साहब के पास रहने आ गए। खासकर हमारी सुविधा को ध्यान में रखकर भाई साहब ने हरिजिन्दर नगर के पास बड़ा कमरा किराए पर ले लिया था, लेकिन मेरा मन उखड़ा-सा रहने लगा था। कारण था गणित का पल्ले न पड़ना। कोर्स आगे बढ़ता जा रहा था और मैं पिछड़ता जा रहा था। मैं परेशान हो उठा। मैंने निर्णय किया कि मुझे गांव लौटकर 'भास्करानन्द' में प्रवेश लेना चाहिए। शहर मेरे लिए बना ही नहीं है या मैं शहर के लिए। संयोग से उसी वर्ष वहां इण्टर में विज्ञान शुरू हुआ था। गांव लौटने की मेरी जिद के समक्ष भाई साहब को परास्त होना पड़ा। यह अगस्त 1967 की बात होगी। उन्होंने किराए के लिए पांच रुपए दिए और मैं शहर को प्रणाम कर हाथ में किताबों का थैला थाम गांव लौट पड़ा। मन इतना खिन्न था कि पैदल चला तो चलता ही गया। तीस किलोमीटर की यात्रा पैदल तय कर दोपहर दो बजे गांव पहुचा। रास्ते भर सोचता रहा कि भाई साहब को नाराज कर अच्छा नहीं किया, लेकिन यह भी सोचता रहा कि यदि उसी कॉलेज में पढ़ता रहता तो फेल होना तय था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा गांव लौटना मां को अच्छा भी लगा और नहीं भी। भाई साहब से सारा घर डरता था। एक तो कमाऊ वही थे। दूसरे वे घर वालों के मध्य मंभीरता ओढ़े रहते थे। मां का कहना था कि मेरे गांव लौटने का आरोप उन्हीं पर लगेगा और हुआ भी यही। भाई जब गांव आए, मुझे लेकर कलह हुई। लेकिन मां ने 'भास्करानन्द' में मेरे प्रवेश के लिए पैसों की व्यवस्था कर दी थी। किसी प्रकार ग्यारहवीं पास की। लेकिन उसी वर्ष (9 जुलाई,1968) मुझे भयानक 'टायफायड' हो गया जो 14 दिनों तक रहा। इतने ही दिनों में न केवल उसने मेरा शरीर निचोड़ दिया, बल्कि अनेक 'साइड एफेक्ट्स' भी छोड़ गया। मैं महीनों इस याग्य नहीं रहा कि कॉलेज जा सकता। पढ़ाई रोकनी पड़ी। वह पूरा वर्ष जानवर चराते बीता। ऐसी स्थिति में साहित्य की सुध लेने की कल्पना स्वप्न में भी नहीं आयी। कुछ बीमारियाें ने शरीर में अड्डा जमा लिया। उनसे मुक्ति के लिए जंगल की न जाने कितनी जड़ी-बूटियों से परिचय हुआ। कई डॉक्टर, हकीम और वैद्यों के सम्पर्क में आया। आयुर्वेद की कई पुरानी पुस्तकें चाट डाली। लेकिन लाभ नहीं हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बेकार और खाली वर्ष ने मुझे अपने जीवन पर पुनरावलोकन के लिए विवश किया। मुझे लगा कि गांव में रहकर निश्चित ही मेरा जीवन नर्क हो जाएगा। मैं गांव में ही खप जाने के लिए नहीं पैदा हुआ। कुछ बनना है तो शहर लौटना ही होगा। 1969 के प्रारंभ से ही मैंने मां से शहर जाकर पुन: पढ़ने की इच्छा व्यक्त करनी प्रारंभ कर दी। मेरा आभिप्राय था कि अवसर देख वह भाई साहब से मेरी इच्छा जाहिर करें। मां के कहने पर भाई साहब ने बेरुखी से उत्तर दिया कि ''यह शहर में नहीं पढ़ पाएगा, इसके लिए गांव ही ठीक है।'' अंतत: पिताजी के हस्तक्षेप के बाद वे तैयार तो हुए, लेकिन पढ़ाई के लिए नहीं, आई.टी.आई. में ट्रेनिगं दिलवाने के लिए। मुझे उनकी सलाह माननी पड़ी। जुलाई में मुझे वहां प्रवेश मिला। रहने की व्यवस्था होस्टल में हो गयी। होस्टल मुफ्त था। खर्च के लिए मैं प्रतिमाह तीस रुपए भाई साहब से लेता था और उसमें जिस ठाठ से रहता था, आज सोचकर आश्चर्य होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे संघर्ष का नया दौर हाईस्कूल के बाद ही शुरू हो गया था। 1970 जुलाई में आई.टी.आई. से निकलने के बाद भाई साहब के साथ रहने लगा। उन्हीं दिनों (20 सितम्बर,1970) को पिताजी का देहान्त हुआ। मैं उस दिन इण्टरमीडिएट का प्राईवेट फार्म भरने के लिए शहर में था। कुछ दिनों बाद ही मैं भी अस्वस्थ हो गया। सभी मेरी खिल्ली उड़ाते कि मुझे कोई बीमारी नहीं...शक की बीमारी है। जून,1971 तक मेरी स्थिति बिगड़ती चली गयी और मेरा वजन 54 किलो से घटकर 40 किलोग्राम रह गया। एक दिन कुछ ऐसा घटित हुआ कि भाई साहब भी घबड़ा गए। किदवई नगर के डॉ. के.के. भार्गव को दिखाया। पता चला कि 'इल्यूसिकिल आंत' बढ़ गयी है। 'एक्स-रे' ने स्पष्ट कर दिया कि यदि शीघ्र ही ऑपरेशन न किया गया तो वह फट जाएगी। 20 जून,1971 को मैं हैलट अस्पताल में भर्ती हुआ और 11 जुलाई, को डॉ. एस.पी.जैन ने ऑपरेशन किया। यह मर्ज 'टायफायड' की देन था। उसके बाद मैं पूर्णरूप से स्वस्थ हो गया और आज तक हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1971 में प्राइवेट छात्र के रूप में बारहवीं की परीक्षा की तैयारी के साथ नौकरी की तलाश जारी रही थी। प्रतिदिन सुबह दस बजे साइकिल पर घर से निकलता और दिन भर एक फैक्ट्री से दूसरी या एक फर्म से दूसरी भटककर नौकरी खोजता रहता। कितनी ही जगहों में 'नहीं है' का दो टूक रूखा जवाब मिलता तो कहीं-कहीं अपमानित कर निकाला जाता। ऐसी ही एक घटना न्यू मार्केट के पास एक 'जॉब प्रेस' के दफ्तर की है। 1971 में चार महीने नयागंज के सेल्स-इनकम टैक्स के एक वकील के घर के कार्यालय में काम किया। सुबह आठ बजे से दोपहर बारह बजे तक और मिलते थे पचास रुपए महीना। सुबह दफ्तर पहुंचने पर मुझे उसका टेलीफोन-मेज साफ करना होता और फाइलें ठीक ढंग से सजानी होतीं। कई बार सब्जी या घर के लिए मेवे लाने होते। यही नहीं वकील साहब का प्रस्ताव था कि मैं लंच साथ लाया करूं और बारह से चार बजे तक उसकी मां को पढ़ा दिया करूं, जो अपढ़ थी, तो वह मेरे वेतन में पचीस रुपए मासिक की वृध्दि कर देगा। मैंने इनकार कर दिया। मेरे उपन्यास 'शहर गवाह है' में वकील के जिस टापपिस्ट का वर्णन है वह कोई और नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चार माह बाद बीमारी के कारण मैंने वह नौकरी छोड़ दी। स्वस्थ होने के बाद महीनों भटककर भी जब नौकरी नहीं मिली तो 1972 के आखिरी दिनों में मुझे पुन: वकील साहब की शरण में जाना पड़ा और पचास रुपए में चार घण्टे प्रतिदिन उसकी उपेक्षापूर्ण नजरों का सामना करने के लिए विवश होना पड़ा था। यहीं 'ब्रम्हकुमारी आश्रम' की वास्तविकता का परिचय मुझे मिला। वकील परिवार उसका अन्ध-भक्त था और सप्ताह में एक बार अनेक सम्पन्न युवक-युवतियां सुबह आठ बजे के आसपास उसके यहां आते थे। एक बड़े हॉल में पर्दे के पीछे वे सब क्या करते, मेरे लिए रहस्य होता। बाद में अनेक विवादास्पद बातें इसके विषय में मैंने सुनीं थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेकारी के दिनों में मैंने बी.ए. करने का संकल्प किया। 'रेगुलर' पढ़ने की तौफीक न थी और विश्वविद्यालय ने प्राइवेट की खुली छूट तब तक नहीं दी थी। केवल अध्यापकों के लिए प्राइवेट की छूट थी.... भले ही वे किसी भी स्तर के हों। मेरा मित्र इकरार्मुहमान हाशमी मेरे साथ ही बेकारी से जूझ रहा था। हम दोनों ने ही किसी स्कूल के सहयोग से बी.ए. का प्राइवेट फॉर्म भरने का निर्णय किया। उसने अनेक मान्यता प्राप्त प्राइमरी और जूनियर हाई स्कूलों के हेडमास्टरों और मास्टरों से संपर्क करना शुरू किया। एकाध तैयार भी हुए तो रिश्वत मांगी सौ रुपए। कहां से लाते इतना पैेसा! मैं यह सब भाई साहब से छुपाकर कर रहा था। क्योंकि उनकी शर्त थी पहले नौकरी....शेष सब बाद में। मैंने इसके लिए एक जूनियर हाईस्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया, जो घर के पास था। दोनों ही लालच थे....फॉर्म भरने और कुछ मुद्रा लाभ का। लेकिन एक माह सिर खपाने के बाद जब उस घानी से तेल निकलता नजर नहीं आया तो पढ़ाना छोड़ दिया। इकराम भी अनेक स्कूलों के चक्कर काटकर हार चुका था। एक दिन भाई साहब ने अपने कई मित्रों के सामने कहा कि जितनी ऊर्जा मैं बी.ए. का फॉर्म भरने में खर्च कर रहा हूं यदि उसकी आधी भी नौकरी पाने के लिए करूं तो नौकरी मिल सकती है। उनकी बात कुछ समझ में आयी और मैं नए सिरे से नौकरी की खोज में लग गया। उसके लिए हर दूसरे दिन रोजगार कार्यालय जाने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिन बीतते रहे और नौकरी दूर भागती रही। आखिर एक दिन किसी ने बताया कि 'फूड कॉर्पोशन ऑफ इण्डिया' में लेबरर्स की भर्ती होने वाली है। उसके लिए झखरकटी रोजगार कार्यालय में रजिस्ट्रेशन आवश्यक था। वहीं से लेबरर्स की वेकेंसी जाती थीं। मैं और इकराम आठवीं की सार्टिफिकेट ले गन्दे पायजामे-कमीज में जा पहुंचे वहां। क्लर्क को सन्देह हुआ हमारी शैक्षणिक योग्यता पर। आखिर हमें शपथ लेनी पड़ी कि हम आठवीं ही पास हैं। रजिस्ट्रशन तो हुआ, लेकिन हम 'फूड कॉर्पोरेशन' से कॉल लेटर की प्रतीक्षा ही करते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंतत: लंबी बेकारी के बाद 17 अप्रैल,1973 को मुझे रक्षा लेखा विभाग में नौकरी मिली। आर्डनैंस फैक्ट्री कानपुर में पोस्टिंग हुई। नौकरी लगते ही पढ़ने की दबी ललक पुन: उभरी और मैंने डी.बी.एस. कॉलेज गोविन्दनगर में सुबह शिफ्ट में बी.ए. में प्रवेश ले लिया। मात्र चार दिन ही कॉलेज गया कि मेरा स्थानान्तरण आर्डनैंस फैक्ट्री, मुरादनगर कर दिया गया। कानपुर से उखड़कर 31 अक्तूबर, 1973 को मुरादनगर पहुंचा। संयोग से उसी वर्ष कानपुर विश्वविद्यालय ने प्राइवेट परीक्षा की खुली छूट दे दी थी। लेकिन विश्वविद्यालय क्षेत्र में रहने की शर्त भी थी। जिसके लिए प्रमाण-पत्र देना होता था। यह काम भाई साहब ने संभाला। मैं कानपुर जाकर फॉर्म भरता रहा और किताबों से भरी अटैची उठाए मुरादनगर पहुंचता रहा। वहां फैक्ट्री होस्टल में रहता था, जो जंगल में है। पढ़ने को भरपूर एकान्त मिला। दफ्तर में न के बराबर काम था जिसका मैंने उपयोग किया। परिणामत: एम.ए. (हिन्दी) में 1976 में विश्वविद्यालय में जो बीस विद्यार्थी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए उनमें मैं एक था। उन दिनों कानपुर विश्वविद्यालय से चार सौ कॉलेज संम्बध्द थे। सबसे अधिक प्रसन्नता इस बात की थी कि मैं डी.ए.वी. कॉलेज कानपुर से सम्मिलित हुआ था और उस वर्ष वहां से मैं ही एकमात्र प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाला छात्र था। यह 1976 की बात है। इसी वर्ष दिसम्बर में पुखरांया (कानपुर) डिग्री कॉलेज में हिन्दी लेक्चरर के साक्षात्कार में शामिल हुआ। मैं चुना गया। लेकिन,जैसा कि बाद में ज्ञात हुआ, कॉलेज के चेयरमैन, जो कानपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति थे एक लड़की में रुचि रखते थे। बोर्ड निरस्त हुआ और वहां अगले तीन वर्ष तक कोई नहीं चुना गया। दिल्ली के भी कई कॉलेजों में अभ्यर्थी रहा, लेकिन जानता था कि केवल याग्यता ही ऐसी जगहों के लिए पर्याप्त नहीं होती। जो मुख्य योग्यता चाहिए थी वह मुझमें नहीं थी और मैं किसी कॉलेज में नहीं चुना जा सका। इस विषय पर आधारित कहानी 'चेहरे' 1988 में लिखी थी, जो 'सम्बोधन' और 'सण्डे मेल' में प्रकाशित और चर्चित हुई थी। मेरे 'नटसार' उपन्यास का केन्द्रीय विषय ही विश्वविद्यालय की राजनीति है जिसे मैंने श्यामल राय उर्फ बेबे के माध्यम से कहा है। प्राध्यापकों की राजनीति,अवसरवाद और लम्पटता के साथ साहित्य और पत्रकारिता में व्याप्त राजनीति और अवसरवाद को भी इसमें चित्रित किया गया है। शायद प्राध्यापक न बनना मेरे हित में रहा। मेरी नौकरी की चुनौतियां सदैव मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती रहीं। वह एक ऐसा नर्क था जिससे मुक्ति के लिए 1976 के बाद से ही मुझमें छटपटाहट थी, लेकिन मध्यवर्गीय जीवन की विवशताओं ने 30 नवम्बर, 2003 को वह अवसर प्रदान किया। अवकाश ग्रहण के छ: वर्ष रहते हुए मैंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। उसके बाद मैंने निरंतर कार्य किया और वह किया जो मैं करना चाहता था। महान रूसी उपन्यासकार लियो तोल्स्तोय के अंतिम और अप्रतिम उपन्यास -'हाजी मुराद' का अनुवाद किया, जिसका अनुवाद हिन्दी में पहले कभी नहीं हुआ था। 'शहर गवाह है' और 'गुलाम बादशाह' उपन्यास लिखे।'दॉस्तोएव्स्की के जीवन के अछूते पक्षों पर केन्द्रित मौलिक दृष्टिकोण से उनकी जीवनी - 'दॉस्तोएव्स्की के प्रेम' लिखा। 'हाजी मुराद' के अनुवाद पर वरिष्ठ कथाकार ज्ञानरंजन ने लिखा - ''अप्रतिम''। लेकिन इस 'अप्रतिम' को अपने सलाहकार के सुझाव पर 'किताबघर' ने पन्द्रह दिनों के अंदर वापस कर दिया था। एक मित्र की सलाह पर मैंने इसके एक अंश के साथ 'संवाद प्रकाशन' के आलोक श्रीवास्तव को पत्र लिखा। उससे पहले उनसे मेरा संपर्क नहीं था। आलोक ने पूरा उपन्यास पढ़ने की इच्छा जाहिर की। पढ़कर उसे तुरंत प्रकाशित करने का निर्णय किया। 'दॉस्तोएव्स्की के प्रेम' उनके आग्रह पर ही लिखी गयी और संवाद से ही प्रकाशित हुई। संवाद ने उत्कृष्ट विश्व साहित्य का अनुवाद प्रकाशित कर प्रकाशन की दुनिया में नए कीर्तिमान स्थापित किया है। पिछले दिनों मैंने तोल्स्तोय के परिवारजनों, मित्रों, लेखकों, रंगकर्मियों आदि के उन पर लिखे उनतीस संस्मरणों का अनुवाद किया जो संवाद प्रकाशन से शीध्र ही प्रकाश्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि एम.ए. के बाद मैंने पी-एच.डी. करने का निर्णय किया, तथापि अनेक प्रयासों के बावजूद कोई निर्देशक नहीं मिला। जिससे भी मिला उसका एक ही उत्तर रहा, आपने प्राइवेट एम.ए. किया है, शोध नहीं कर पायेंगे। प्राइवेट परीक्षार्थी होना मेरी अयोग्यता बन गया था...... प्रथम श्रेणी योग्यता न बन सकी। यही नहीं जो निर्देशक तैयार भी होते वे पैसों की मांग करते। अपने अधीन रजिस्टे्रशन करवाने और पी-एच.डी. पूरी करवाने के तीन हजार से पांच हजार तक की मांग की गयी। कानपुर क्राइस्टचर्ज कॉलेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष (शायद बालमुमुन्द गुप्त) ने पांच हजार रुपयों की मांग की, जबकि मोदी कॉलेज के तत्कालीन विभागाध्यक्ष बाजपेई ने तीन हजार पंजीकरण के अतिरिक्त प्रतिवर्ष एक हजार रुपयों की मांग की थी। हिन्दी के नाम पर हो रही लूट से मैं हत्प्रभ था। लेकिन बहुत प्रयास के बाद कानपुर विश्वविद्यालय में कार्यरत अपने मित्र श्री डी.पी. शुक्ल के माध्यम से मेरी यह समस्या सुलझ गयी थी। कानपुर के डी.वी.एस. कॉलेज के रीडर डॉ. बैजनाथ त्रिपाठी इस शर्त पर अपने अधीन मेरे पंजीकरण के लिए तैयार हुए कि वह मेरी कोई सहायता नहीं करेंगे.... सब कुछ मुझे स्वयं ही करना होगा और वह मैंने सफलतापूर्वक किया भी। 1985 में पी-एच.डी. की डिग्री मिलने के बाद 'रविवारीय हिन्दुस्तान' में मैंने लंबा आलेख लिखा इस लूट और प्राध्यापकों के नैतिक-चारित्रिक पतन के विषय में। अपने छात्रों का कितना शोषण करते हैं ये प्राध्यापक (अधिकांश) कि जानकर सिर शर्म से झुक जाता है। यदि शोध विद्यार्थी लड़की हुई तब शोषण पराकाष्ठा पर पहुंचने की संभावना रहती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1977 में मुरादनगर के कुछ साहित्यकार मित्रों के सम्पर्क में आया। वे एक साहित्यिक संस्था 'विविधा' चलाते थे, जिसमें कथाकार सुभाष नीरव और प्रेमचन्द गर्ग मुख्य थे। मैं उसकी गोष्ठियों में शामिल होने लगा। बड़ा उत्साह था उन लोगों में। मुझमें सोया साहित्यकार अंगड़ाई लेने लगा था। उन दिनों मेरे द्वारा प्रस्तुत -'समसामयिक परिप्रेक्ष्य में यशपाल के कथासाहित्य का अनुशीलन' शोध-विषय डॉ. विजयेन्द्र स्नातक की अध्यक्षता में हुई विद्वत परिषद की बैठक में निरस्त हो चुका था। मैं दूसरे विषय की खोज में था। इसी खोज के दोरान मैं कानपुर के प्रसिध्द विद्वान-समाजशात्री और उन दिनों 'कंचनप्रभा' पत्रिका के सम्पादक शम्भूरत्न त्रिपाठी के सम्पर्क में आया। कंचनप्रभा के कार्यालय में ही मेरी मुलाकात गीतकार विजयकिशोर मानव से हुई जो उन दिनों दैनिक जागरण का रविवारीय परिशिष्ठ देखते थे। वहीं मेरी पहली मुलाकात कानपुर के वरिष्ठ कथाकार राजेन्द्र राव से हुई थी। वह मुझे पहले से ही जानते थे जबकि एक कथाकार के रूप में तब तक मेरी कोई पहचान नहीं थी। मुझे बाद में ज्ञात हुआ कि उन दिनों कानपुर में मेरी चर्चा मेरी तब तक छुटपुट प्रकाशित रचनाओं के कारण नहीं बल्कि एक प्राइवेट छात्र के रूप में एम.ए. में प्रथम श्रेणी प्राप्त करने के कारण थी। त्रिपाठी जी मेरे मुक्त प्रशंसक थे। वह मात्र ग्रेजुएट थे लेकिन उनके द्वारा लिखी समाजशास्त्र की पुस्तकें विश्वविद्यालय में पढ़ाई जा रही थीं। यही नहीं वे हिन्दी-साहित्य मर्मज्ञ भी थे। उन्होंने मुझे कई शोध विषय सुझाए, लेकिन वे इतने शास्त्रीय थे कि मैंने उनपर कार्य करने में अपने को असमर्थ पाया। अंतत: 'प्रतापनारायण श्रीवास्तव के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रस्तुत मेरा विषय स्वीकृत हो गया था। 'विविधा' से जुड़ने के बाद मेरे लेखन में तेजी आई थी। कुछ रचनाएं इतस्तत: प्रकाशित भी होने लगी थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुरादगर छोटी-सी जगह है जहां केवल आर्डनैंस फैक्ट्री और उसका ही एस्टेट है। 'विविधा' के तीन मित्र सुभाष नीरव, सुधीर अज्ञात और सुधीर गौतम दिल्ली में नौकरी करते थे। ये लोग विभिन्न पुस्तकालयों के सदस्य थे। वहां रहते हुए इनके माध्यम से मुझे अनेक हिन्दी और विदेशी लेखकों को पढ़ने का अवसर मिला। 'सारिका', 'धर्मयुग', 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' आदि पत्रिकाएं भी इन्हीं लोगों ... विशेषरूप से नीरव के माध्यम से मुझे मिलती थीं। विविधा के दो सदस्य - सुभाष नीरव और मुझे छोड़कर शेष सभी अपनी-अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो जाने के कारण साहित्य से दूर हो गए। इस संस्था का बार-बार उल्लेख मैं इसलिए करता हूं कि मैं आज जो भी हूं उसमें इसकी महत भूमिका स्वीकार करता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शोध के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के तत्कालीन हिन्दी विभागाध्यक्ष से विश्वविद्यालय के केन्द्रीय पुस्तकालय की सदस्यता के लिए विशेष अनुमति प्राप्त कर मैं वहां का सदस्य बना। मारवाड़ी पुस्तकालय, चांदनी चौक, दिल्ली के पुस्तकालयाध्यक्ष कल्याण पारीख ने न केवल सहजता से सदस्यता प्रदान की बल्कि सुधा, माधुरी आदि पुरानी पत्रिकाओं के अंक साथ ले जाने की अनुमति भी प्रदान की थी, जिसकी अनुमति कोई पुस्तकालय नहीं देता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1979 में मेरी पहली कहानी माक्र्सवादी पत्र 'जनयुग' में प्रकाशित हुई। जून 1979 में शादी के बाद से अक्टूबर 1980 तक मैं गाजियाबाद रहा। 11 अक्टूबर,1980 को मैं शक्तिनगर, दिल्लीं शिफ्ट हुआ, जहां से 3 अगस्त, 2003 को सादतपुर के अपने मकान में आया। दिल्ली में एक ही मकान में मकान मालिक से बिना किसी विवाद के इतने लंबे समय तक रह लेना मेरे जीवन की उल्लेखनीय घटना है। उल्लेखनीय इस अर्थ में क्योंकि यदि मुझे प्रतिवर्ष मकान बदलते रहना पड़ता तो मैं जितना लिख सका उतना शायद ही लिख पाता। एक अन्य कारण से भी यह महत्वपूर्ण है। हम पति-पत्नी नौकरीपेशा थे और बच्चों की सुरक्षा की दृष्टि से इससे अधिक उपयुक्त मकान मिलना कठिन था। मुझे सदैव मकान मालिक सोमनाथ रतन का सहयोग मिलता रहा। इस मकान में रहते हुए मैंने जमकर लिखा- कहानियां, उपन्यास, बाल कहानियां, लघुकथाएं, आलेख, निपोर्ताज, यात्रा संस्मरण, संस्मरण, समीक्षाएं, साक्षात्कार आदि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि पहली पुस्तक यत्किंचित (कविता संग्रह) मैंने और नीरव ने मार्च,1979 में अपने खर्च से संयुक्त रूप से प्रकाशित करवायी थी, जिसे पढ़कर डॉ. हरिबंशराय बच्चन ने मुझे लिखा था, ''मुझमें कवि बनने की प्रतिभा नहीं....कुछ भी बन सकते हो, लेकिन कवि नहीं बन सकते।'' मैंने स्वयं अनुभव किया कि उनका कथन सच था। उसके बाद मैंने कविताएं नहीं लिखी। मैंने अपना ध्यान कथा-साहित्य पर केन्द्रित किया। उन्हीं दिनों मैं प्रसिध्द बालसाहित्यकार डॉ. राष्ट्रबंन्धु के सम्पर्क में आया और कहानियों के साथ बाल कहानियां भी लिखने लगा। अब तक मेरे दस बाल कहानी संग्रह और तीन किशोर उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। हालांकि अब बाल कहानियां लिखना स्थगित हो चुका है वैसे ही जैसे लघुकथा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1982 में मेरा पहला बाल कहानी-संग्रह 'राजा नहीं बनूंगा' प्रकाशित हुआ। किसी प्रकाशक से प्रकाशित होने वाली यह मेरी पहली कृति थी। 1983 में 'किताब घर' से 'अपराध:समस्या और समाधान' (अपराध विज्ञान) पुस्तक प्रकाशित हुई। वहीं से मेरा पहला कहानी-संग्रह -'पेरिस की दो कब्रें' 1984 में प्रकाशित हुआ। पुस्तकों के प्रकाशन का जो सिलसिला प्रारंभ हुआ वह बदस्तूर जारी है। अब तक मेरी 42 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें सात उपन्यास, बारह कहानी-संग्रह, तीन किशोर उपन्यास, यात्रा संस्मरण, आलोचना, लघुकथा-संग्रह, अनुवाद, जीवनी, आदि हैं। पांच पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य हैं, जिनमें एक कहानी-संग्रह (भीड़ में), अनुवाद, उपन्यास, संस्मरण (यादों की लकीरें - भाग एक) और साहित्यकारों के साक्षात्कारों की पुस्तक (शब्दशिल्पियों के साथ) हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रेणु ने अपने पात्रों के विषय में अपने एक कहानी संग्रह की भूमिका में लिखा कि उनके पात्र उनके जीवन से किसी न-किसी रूप में जुड़े रहे हैं। अर्थात उन्होंने उन पात्रों को ही केन्द्र में रखकर लिखा जिन्हें वे जानते थे। मुझे भी यह कहते हुए अच्छा लग रहा है कि अधिकांशतया मेरे पात्र मेरे जाने-पहचाने ही हैं। लेकिन भोगे हुए यथार्थ के साथ देखे या पढ़े यथार्थ को भी अपने अन्दर जीने के बाद मैंने सफलतापूर्वक लिखा। मेरी 'भेड़िए' 'सड़क' 'खाकी वर्दी' जैसी अनेक कहानियां इसीप्रकार की हैं। लेकिन मेरे सभी उपन्यास तथा आदमखोर, पापी, हारा हुआ आदमी, उनकी वापसी, आखिरी ख़त' आदि कहानियां जाने-पहचाने चरित्रों पर ही लिखी गयी हैं। मेरी 'क्रान्तिकारी' कहानी, जो स्व. सत्येन कुमार की पत्रिका 'कहानी मासिक चयन' में 'और क्रान्ति शुरू हो गयी' शीर्षक से प्रकाशित हुई थी, के प्रकाशित होते ही बवाल मच गया था। मेरी रिश्तेदार स्व. शीला सिध्दान्तकर ने आरोप लगाया कि यह कहानी उनके पति को लेकर लिखी गयी थी। उन्होंने मुझे मरवाने की धमकी दी। मैंने जानना चाहा था कि कहानी के मुख्य पात्र शान्तनु को वास्तव में क्या उन्होंने पहचान लिया था जिसकी शातिर कारगुजारियों को मैं आज तक पकड़ नहीं पाया। मैंने जब-जब उसे पकड़ने का प्रयास किया और उसे केन्द्र में रख कोई रचना लिखी वह आगे इतना कुछ कर जाता रहा कि लगा कि वह फिर मेरे हाथ से फिसल गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राघ्यापन की दुनिया में अनेक ऐसे लोग हैं जो दिन में माक्र्सवाद का लबादा ओढ़े रहते हैं और रात के अंधियारे में सत्ता के गलियारे में घूमते दिखाई देते हैं। ये सुविधाभोगी छद्म माक्र्सवादी लोग हैं और माक्र्सवाद इनके लिए सुविधा-सम्पन्नता प्राप्त करने का साधन होता है। शीला सिध्दान्तकर भी अपने को माक्र्सवादी कहती थीं। लेकिन 'ये' लोगों का इसप्रकार इस्तेमाल करने में माहिर थे कि शोषण की पराकाष्ठा तक जिसका इस्तेमाल करते वह उफ तक न कर पाता। मैंने इस्तेमाल होने से इंकार किया और इन लोगों ने मेरे विरुध्द षडयंत्र प्रारंभ कर दिए जो मुझे तबाह करने के लिए पर्याप्त थे। मैं बचा यह मेरा भाग्य ही था (इस पर फिर कभी विस्तार से)। आज मुझे लगता है कि शीला जी तो अपने पति का मोहरा मात्र थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बात अगस्त 1981 की है। उस समय मैंने इन लोगो की तुच्छ महत्वांक्षाओं के विषय में लोगों (अपने रिश्तेदारों) को आगाह किया था लेकिन हुआ उल्टा..... मेरे ससुराल पक्ष के सभी लोगों ने मुझे ही कटघरे में खड़ा कर दिया था। कहा गया कि यह सब मैं उनसेर् ईष्यावश कह रहा था। मैं अलग-थलग पड़ गया। लेकिन मार्च, 2001 में मेरा कहा जब सच साबित हुआ तब उन सबके के पास हाथ मसलने के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं बचा था। पति के साथ षडयंत्र कर शीला जी ने अपने पिता के कानपुर के लाटूश रोड स्थित चार सौ वर्ग गज में बने मकान (जिसकी कीमत आज दो करोड़ से अधिक होगी) की वसीयत छद्म रूप से पिता से अपने नाम करवा ली थी और आठ भाई-बहन देखते रह गए थे। हालांकि वह उस मकान का कुछ कर पातीं उससे पहले ही कैंसर से उनकी मृत्यु हो गयी थी। लेकिन वह वसीयत आज भी उनके पति ने सहेज रखी है। संभव है कभी भविष्य में उसका उपयोग हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे रिश्तेदारों ने जितना माानसिक कष्ट मुझे पहुंचाया, मेरे कुछ मित्रों ने उससे अधिक पहुंचाने का प्रयत्न किया। मेरे एक साहित्यिक मित्र मेरे उपन्यास 'रमला बहू' (1994 किताबघर) के प्रकाशन से इतना विचलित हुए कि उन्होंने मेरे प्रकाशकों को मेरे विरुध्द भड़काना प्रारंभ कर दिया। इन मित्र की किस रूप में मैंने सहायता की थी यह बताना भारतीय संस्कृति के विरुध्द है। मेरे दो प्रकाशकों को भड़काने में वह सफल भी रहे, लेकिन इसका मुझे लाभ ही हुआ। यह मेरे लिए एक बड़ी चुनौती थी। मैं निरंतर लिख रहा था यही उनके लिए कष्ट का कारण था। अपनी पुस्तकों के लिए मैंने नए प्रकाशक खोजे और आश्चर्यजनक रूप से उसके पश्चात मैं अनेक प्रकाशकों के संपर्क में आया। अब तक मेरी पुस्तकें चौदह प्रकाशकों से प्रकाशित हो चुकी हैं। यह सिलसिला जारी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक उदाहरण और। मेरा उपन्यास 'पाथर टीला' अक्टूबर,1998 में प्रकाशित हुआ। प्रकाशक उस पर विचार-गोष्ठी करवाना चाहते थे। मेरे एक अन्य साहित्यिक मित्र ने सामयिक प्रकाशन, जहां से उपन्यास प्रकाशित हुआ था, के महेश भारद्वाज को तीन बार फोन करके उपन्यास पर विचार-गोष्ठी न करवाने के लिए कहा, लेकिन महेश के अनुसार -''जितना ही वह फोन कर विचार-गोष्ठी न करवाने के लिए कहते उतना ही मैं उसे करवाने के लिए दृढ़-संकल्प होता।'' साहित्य में मेरे विरुध्द चलने वाली दुरभिसंधियों ने मुझे कमजोर नहीं बल्कि मजबूत किया। मैं निरंतर कार्यरत हूं और जीवन के अंतिम क्षण तक कार्य करना चाहता हूं। चाहता हूं कि एक ऐसा उपन्यास लिख सकूं जो मेरे नाम का पर्याय बन सके। कुछ मित्रों का मानना है कि यह काम 'पाथर टीला' ने पूरा कर दिया है। लेकिन मुझे संतोष नहीं है। 'खुदीराम बोस' के प्रकाशित होते ही यूनीवार्ता ने उस पर विशेष फीचर प्रकाशित करवाया जो एक साथ एक ही दिन देश के कई सौ समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ। कहा गया कि 'खुदीराम बोस' पर हिन्दी में वह पहला उपन्यास था। मेरा अनुमान है कि आज भी वह पहला ही है। 'पाथर टीला' के विषय में भी हंस में यह लिखा गया कि हिन्दी का यह पहला उपन्यास है जिसमें खलनायक नायक के रूप में चित्रित हुआ है। मेरे उपन्यास 'नटसार' का नायक भी खलनायक ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सफलताओं से मुझे प्रसन्नता होती है लेकिन असफलताओं से मैं निराश नहीं होता। नेपोलियन के बारे में विक्टर ह्यूगो ने अपने उपन्यास 'ले मेजराबल' में लिखा , '' वह आस्थावादी व्यक्ति था, जो सुख में प्रसन्न रहता ओैर दुख में शांत और मानता था कि समय बदलेगा अवश्य ... जो है वही नहीं रहेगा।'' उसकी यह बात मुझे बल देती है।&lt;br /&gt;****&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2880097249222214869-5941548516277498714?l=wwwrachanayatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/feeds/5941548516277498714/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2880097249222214869&amp;postID=5941548516277498714' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/5941548516277498714'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/5941548516277498714'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='यादों की लकीरें'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-aBiXJMpk2qo/TcasSZO3-zI/AAAAAAAAASo/brJTqzonsbQ/s72-c/cflowers0152.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2880097249222214869.post-5578472117541905295</id><published>2011-03-04T17:47:00.000-08:00</published><updated>2011-03-04T17:51:46.619-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्मरण'/><title type='text'>यादों की लकीरें (भाग दो)</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-YVqtTnBwQoc/TXGWj_OYw7I/AAAAAAAAASA/zrCClevRYQI/s1600/Lodhi+Garden-6.jpg"&gt;&lt;img 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चित्ताकर्षक गुरुद्वारा है। हालांकि आज न तब जैसी चमकदार सड़क रही न दुकानें....... बढ़ती आबादी और राजनैतिक भ्रष्टाचार ने जब कानपुर शहर के अन्य क्षेत्रों को नर्क में तब्दील होते देने में कोई कमी नहीं छोड़ी तब गुमटी नंबर पांच की बाजार अपने को सुरक्षित कैसे रख सकती थी। लेकिन 1969-70 में ऐसा नहीं था। उन दिनों मैं आई.टी.आई. का छात्र था और मेरे प्रशिक्षण का समय था दोपहर दो बजे से शाम छः तक। इंस्टीट्यूट जे.के. मंदिर के पश्चिम ओर गुमटी  नंबर पांच (जिसे कानपुर के लोग केवल गुमटी कहते हैं) पूर्व ओर अवस्थित है। प्रायः इंस्टीट्यूट से निकल मैं अकेले या किसी प्रशिक्षु के साथ जे.के. मंदिर की दीवार पर जा बैठता और साफ-शफ़्फ़ाक़ परिधानों में लिपटे स्त्री-पुरुषों और बच्चों को आते-जाते देखता रहता। अकेले होता तब भविष्य के सपने बुनता हुआ घण्टों बिता देता, जो मुझे अंधकारमय प्रतीत होता था। उन दिनों मैं युवावस्था की दहलीज पर कदम रख रहा था। भविष्य के ढेरों सपने थे और चारों ओर फैले तिमिर में उन्हें पकड़ कैसे मुट्ठी में कैद किया जाए यही मेरे सोच की उड़ान होती थी।&lt;br /&gt;लेकिन जब साथ में कोई साथी होता तब बातों के विषय क्या होते अब याद नहीं, लेकिन स्पष्टतया कोई गंभीर मुद्दे नहीं ही होते थे। अध्ययन बहुत सीमित था और पत्र-पत्रिकाओं से न के बराबर परिचय हुआ था। विज्ञान से ग्यारहवीं करके एक वर्ष जानवरों के सान्निध्य में खेत-जंगल भटकने के बाद तय पाया गया था कि ग्रेजुएशन-पोस्ट ग्रेजुएशन के बजाय कोई प्रोफेशनल कोर्स किया जाए जिससे बड़े परिवार की गाड़ी सहजता से खींचने में बड़े भाई के साथ मैं भी अपना कंधा दे सकूं। स्थितियों को कम उम्र से ही समझने लगा था और मन में यह संकल्प भी था कि जीवन में कुछ करने के लिए स्वावलंबी होना ही पड़ेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; मैंने जुलाई 1969 में इंस्टीट्यूट में प्रवेश लिया। वह प्रवेश भी उतना आसान न रहा होता यदि भाई साहब के एक सहयोगी ने सहायता न की होती। भाई साहब हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड में प्रशासन विभाग में थे और शायद नियुक्तियां देखते थे। जिन सहयोगी की बात की, उनकी नियुक्ति भी भाई साहब के माध्यम से हुई थी। उससे पहले वह इंस्टीट्यूट से किसी रूप में संबद्ध रहे थे। उनकी संबद्धता मेरे काम आयी थी। काम इसलिए कि मेरी शैक्षणिक योग्यता तब हाईस्कूल थी जबकि वहां इतनी कम योग्यता का कोई अभ्यर्थी नहीं था। सभी ग्रेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट थे। लेकिन मुझे इस बात का लाभ मिला था कि जिस प्रशिक्षण के लिए मैंने आवेदन किया था उसके लिए निम्नतम अर्हता हाईस्कूल ही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चालीस छात्रों की क्लास में मैं एक मात्र हाईस्कूल, जिसकी अंग्रजी माशा-अल्लाह। जब कुछ छात्र अंग्रेजी में बातें करते तब मैं उनके चेहरे देखता और मन ही मन यह संकल्प करता रहता कि मुझे उस कोर्स में उत्तीर्ण होना ही है। कोर्स की पढ़ाई का माध्यम अंग्रजी.......इंस्ट्रक्टर आता, लेक्चर देता और चला जाता। आधा पल्ले पड़ता और आधा नहीं। मैंने कठोर श्रम किया और परीक्षा में चालीस में से जो सात छात्र उत्तीर्ण हुए उनमें से एक मैं भी था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंस्टीट्यूट में प्रवेश मिलने के बाद समस्या आई रहने की। भाई साहब वहां से 15-16 किलोमीटर दूर रहते थे। वहां से प्रतिदिन आने-जाने की समस्या का समाधान उन्होंने खोज निकाला। शस्त्रीनगर की लेबर कॉलोनी में इंस्टीट्यूट का होस्टल था। उन्होंने पुनः अपने सहयोगी की सेवाएं लीं और मुझे होस्टल में एकमोडेशन मिल गया। दो मंजिला कॉलोनी है वह। इंस्टीट्यूट ने होस्टल के लिए पूरा एक ब्लॉक ले रखा था.... शायद सोलह फ्लैट्स का। मुझे भूतल का फ्लैट मिला। दो बड़े कमरें-बड़ा आंगन। दो तख्त और एक मेज। एक सप्ताह ही बीता था कि एक दिन सुबह किसी ने दरवाजा खटखटाया। दरवाजा खोला तो पांच फुट चार इंच लंबा, चमकती आंखों, सुतवां नाक, चपटे गाल, और गहरा कृष्णवर्णी एक युवक सामने खड़ा था जिसने मोती जैसे चमकते दांतों में मुस्कराते हुए कहा, ‘‘मैं मथाई सी.जे......मुझे यह फ्लैट एलाट हुआ है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘हां, हां ....अंदर आ जाओ।’’ मैं उसका सामान उठाने के लिए आगे बढ़ा, जिसके लिए उसने मुझे रोक दिया। मैं जानता था कि एक न एक दिन मेरे साथ रहने के लिए कोई आएगा ही। दूसरे फ्लैट्स में दो-तीन छात्र रह रहे थे.... और आधे से अधिक छात्र पुराने थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मथाई अपना सामान अंदर ले आया तो मैंने दरवाजा बंद कर दिया। मैंने खिड़की के साथ के तख्त पर आसन जमा रखा था। सामने के तख्त की ओर इशारा कर बोला, ‘‘उस पर बिस्तर लगा लो।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘वह शाम को करूंगा। अभी इंस्टीट्यूट जाना है।’’ मथाई ने कुछ सामान तख्त के नीचे फेका, कुछ कमरे में बने टॉल पर और पूछा, ‘‘आप कब तक लौटते हैं ?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘साढ़े छः बजे तक।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘ताले की डुप्लीकेट ’की’ है?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘है।’’ मैंने दूसरी चाबी उसे दे दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने नोट किया कि वह जब मुस्कराता, जीभ दांतो से लगा लेता। यद्यपि उसका हिन्दी बोलने का लहजा केरलाइट था, लेकिन हिन्दी वह अच्छी बोल-समझ लेता। उसने मुझे बताया कि उसने बाकायदा स्कूल में हिन्दी पढ़ी और परीक्षा उत्तीर्ण की थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मथाई के प्रशिक्षण का समय सुबह नौ बजे से शाम छः बजे था। वह इलेक्ट्रिकल में डिप्लोमा कर रहा था। हम दोनों अलग भोजन पकाते। वह स्टोव में प्रायः मसूर की लाल दाल और सेला चावल पकाता जिसका माड़ निकाल देता। दाल वह दोनों वक्त के लिए सुबह ही पका लेता। वह साढ़े आठ बजे पका-खाकर चला जाता। उसके जाने के बाद मैं अपनी बुरादे की अंगीठी सुलगाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन किसी रविवार मथाई ने साग्रह लंच के समय मुझे अपनी दाल सेवन के लिए दी। दाल खाकर मैं हतप्रभ था। इतना स्वादिष्ट...। दाल में वह मसालों का भरपूर प्रयोग करता। उसकी दाल का स्वाद आज भी मैं अनुभव करता हूं। वह छौंकर सीधे भगौने में पकाता था। उस जैसी मसूर की दाल पकाने की मैंने कितनी ही बार कोशिश की, लेकिन वह स्वाद नहीं मिला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात पढ़ने के लिए मेज का उपयोग मथाई करता। मेरा तख्त खिड़की के साथ था, इसलिए पढ़ते समय मेरा चेहरा सामने दीवार की ओर और पीठ खिड़की की ओर होते। खिड़की के बाहर सड़क थी जो हर समय चलती रहती थी। सड़क के उस पार एक और ब्लॉक था। उस ब्लॉक में मेरे फ्लैट के सामने प्रथम तल के फ्लैट की खिड़की पूरे समय खुली रहती। मेज पर जब मथाई का कब्जा होता, उसका चेहरा खिड़की की ओर होता और पढ़ते हुए भी उसकी नजरें सड़क पार सामने ब्लॉक के उस खुली खिड़की पर टिकी होतीं। बीच-बीच में मथाई कभी किसी हिन्दी फिल्म तो कभी किसी मलयाली फिल्म का गाना गुनगुनाता रहता। जब वह गाना गुनगुनाता, मेरी नजर सामने वाले फ्लैट की खिड़की की ओर उठ जाती। उस कमरे में उनतीस-तीस वर्षीया एक सुन्दर लंबी युवती इधर-उधर आती-जाती दिखाई देती। युवती इतनी तेजी से उस कमरे में आती-जाती कि मथाई ने उसे फिरकी नाम दे दिया। कभी ही वह खिड़की के सामने खड़ी होती, लेकिन जब भी खड़ी होती मथाई के गाने की आवाज कुछ ऊंची हो जाती, लेकिन इतनी भी नहीं कि वह सड़क पार दूर उस फ्लैट की खिड़की तक जा पहुंचती। कभी-कभी वह युवती चार-पांच वर्ष की अपनी बेटी को दुलारती दिखाई देती। उस क्षण मथाई गाता नहीं था.....एकटक उधर देखता रहता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘ये है कौन?’’ एक दिन उसने मुझसे पूछा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘जाकर पता कर लो।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘उंह....।’’ वह खिलखिला उठा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन उसे यह जानने के लिए अधिक दिन प्रतीक्षा नहीं करना पड़ा। एक दिन उस कमरे में उस युवती की ही उम्र का सरदार युवक दिखा तो उसने मेरा ध्यान खींचते हुए कहा, ‘‘रूपसिंह, वह सरदारिनी है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने देखा युवक सरदार भी सुन्दर था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मथाई सी.जे. मुझसे दो वर्ष बड़ा था और उस आयु की उस स्वाभाविक चंचलता के अतिरिक्त उसमें कोई ऐब नहीं था। हॉस्टल में वह किसी अन्य से संबन्ध नहीं रखता था। उसकी सीमित दुनिया थी जो कानपुर के कुछ केरलवासियों तक ही सीमित थी। लेकिन वे लोग होस्टल नहीं आते थे। मथाई ही उनके यहां जाता। उसकी बड़ी बहन कानपुर के अकबरपुर तहसील में फेमिली प्लानिगं से संबद्ध थी और शायद नर्स थी। कभी-कभी वह अपने उस छोटे भाई से मिलने अपने फील्ड आफीसर के साथ, जो एक केरलाइट ब्राम्हण था, मोटरसाइकिल पर आती थी। फील्ड आफीसर लंबा-हट्टा कट्टा, गोरा और खूबसूरत व्यक्ति था..... जिसकी आयु तीस से पैंतीस के मध्य थी। सी.जे. की बहन दुबली-पतली भाई की भांति गहरी श्यामवर्णी सत्ताइस-अट्ठाइस के आस-पास थी।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मथाई सी.जे. के साथ तीन महीने ही बीते थे कि एक दिन शाम एक और युवक रिक्शे पर टीन का बॉक्स, एक कनस्तर और होल्डाल लादे आया और बोला, उसे भी वह फ्लैट एलाट किया गया है। वह कानपुर के पास औरय्या का रहनेवाला था। हम दोनों ने उसका स्वागत किया। युवक बहुत बातूनी था। उसकी वाचालता से हम विचलित थे, क्योंकि हमारे अपने लक्ष्य थे, जबकि वह लक्ष्यहीन लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘ये हमारी पढ़ाई चौपट कर देगा।’’ मैंने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘कुछ इलाज करना होगा।’’ मथाई बोला ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन युवक ने कनस्तर से देशी घी और मेवा पड़े आटा के लड्डू हम लोगों को खाने को दिए। बहुत स्वादिष्ट थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘किसने बनाए?’’ मैंने पूछा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘मां ने।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘तुम्हारी मां तुम्हे बहुत प्यार करती हैं।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युवक भावुक हो उठा, ‘‘बहुत प्यार करती हैं। मैं आना नहीं चाहता था, लेकिन पिता ने जबर्दस्ती इधर ला पटका।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘मां का प्रेम होता ही ऐसा है...।’’ मथाई बोला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युवक की आंखें घुचघुचा आईं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बतचीत में हम दोनों ने उस युवक को मां के प्रेम के प्रति इतना उकसाया कि तीन या चार दिन बाद ही, ‘‘मैं घर जा रहा हूं.... एक सप्ताह बाद आउंगा।’’ कहकर वह घर चला गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके जाने पर हमने राहत की सांस ली। एक सप्ताह बाद दो-तीन दिन और बीत गए । वह नहीं लौटा तब हमारी नजरें उसके कनस्तर पर जा टिकीं। लड्डुओं (जिसे वहां पीड़ा कहा जाता है) का स्वाद मुंह में बरकरार था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक रात मैं बोला, ‘‘मथाई इसने कनस्तर में ताला डाला हुआ है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘उसके लड्डू खाना चाहते हो?’’ मुस्कराते हुए मथाई बोला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘चाहता हूं।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘तो ताला भी खुल जाएगा।’’ कहता हुआ मथाई आंगन में गया और एक तार लेकर लौटा। उसने उस तार से कनस्तर के छोटे-से ताले को खोल दिया। ताला चिटखनीवाला था, जिसे दबाकर बंद किया जा सकता था। उस दिन के बाद वह तार हमने तब तक संभालकर रखा जब तक उस कनस्तर में पांच-छः लड्डू छोड़ शेष सभी हमारे उदर में नहीं पहुंच गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीन सप्ताह बाद वह युवक लौटा, लेकिन रहने के लिए नहीं....सामान उठा ले जाने के लिए। उसने कनस्तर खोलकर भी नहीं देखा। जिस रिक्शे पर आया था, उसी पर सामान लाद वह चला गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन मैं शाम साढ़े छः बजे जे.के. मंदिर की दीवार पर बैठा आने-जाने वालों का नजारा ले रहा था। मंदिर के चारों ओर बहुत लंबी-चौड़ी जगह है और पाण्डुनगर और गुमटी की ओर अर्थात मंदिर के पश्चिम-पूर्व गेट हैं। पश्चिमी गेट यानी पाण्डुनगर की ओर का गेट छोटा है, केवल लोगों के आने-जाने के लिए, जबकि उसका मेन गेट गुमटी की ओर है। यह मंदिर सफेद संगमरमर पर निर्मित दिल्ली के बिरला मंदिर की अनुकृति है और उससे कई गुना अधिक भव्य।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने नीचे देखा, मथाई हाथ में डायरी थामे जा रहा था। वह जब भी इंस्टीट्यूट जाता डायरी  अवश्य उसके हाथ में होती थी। एक बार पूछने पर उसने बताया था कि इंस्ट्रक्टर की बातें वह उसमें दर्ज करता था और कुछ अन्य आवश्यक बातें भी। मैंने ऊपर से आवाज दी। मुझे मंडेर पर बैठा देख उसके चेहरे पर मुस्कान खिल उठी और दूधिया दांत यमक उठे। उसने हाथ के इशारे से मुझे नीचे आने का संकेत किया। मैंने भी इशारे से ही पूछा -‘‘किसलिए?’’ उसने साथ चलने का इशारा किया। मैं उसके साथ हो लिया। पूछने पर उसने बताया कि वह गुमटी जा रहा था रेस्टॉरेण्ट में इडली खाने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘तुम्हें इडली पसंद है?’’ उसने पूछा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘नापसंद नहीं है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह चुप हो गया। प्रायः ही वह चुप रहता। किसी प्रश्न का उत्तर संक्षेप में देता और जब मैं अघिक बातें करने लगता तब बचने के लिए कोई मलयाली फिल्मी गाना गुनगुनाने लगता। वह मेरा रूममेट था, इसलिए मुझसे बातें करना उसकी विवशता थी, लेकिन न भी होता तब भी मेरा यकीन था कि वह मुझे नापसंद नहीं करता। उसके स्थान पर यदि कोई अन्य युवक मेरे साथ होता तो शायद मैं उतनी पढ़ाई नहीं कर पाता और उस कोर्स में उत्तीर्ण हो पाता कहना कठिन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल वहां हम दोनों और दो-तीन अन्य युवकों को छोड़ शेष सभी उद्दण्ड और बदमाश किस्म के लड़के थे। मेरे पड़ोसी फ्लैट के ऊपरी मंजिल में दो मुसलमान लड़के रहते थे और सुना कि वे कई वर्षों से उसमें रह रहे थे। दो वर्षों के कोर्स में वे चार वर्ष बिता चुके थे। उनकी गतिविधियों से लगता और दूसरें लड़कों में चर्चा भी थी कि दरअसल इंस्टीट्यूट में वे केवल होस्टल के लिए रह रहे थे, जबकि उनके धंधे कुछ और थे । क्या, यह जानने की न मुझे फुर्सत थी न चाहत, लेकिन पड़ोसी बी.एन. कनौजिया, जो मेरे ही क्लास में था और जिसकी ऊपरी मंजिल में वे रहते थे, प्रायः सुबह देर से उठकर  आंाखें मलता हुआ बताया करता ‘‘सालों ने रात भर सोने नहीं दिया।’’&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;‘‘क्यों?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘रात एक बजे मैं पढ़ रहा था कि मेरी खिड़की के सामने जीप आकर रुकी। दो लड़कियां और एक लड़का उतरे और ऊपर चले गए। फिर नींद कैसे आती..... रात भर साले धमाचौकड़ी करते रहे और मैं जागता रहा।’’ बड़ी बंटे जैसी आंखें मलता हुआ कनौजिया मुंह बनाकर कहता और अपने सांवले, फूले, चौड़े मुंह में ठठाकर हंस देता। कनौजिया बहुत टिप-टॉप रहता था। अपने को सजाने-संवारने में विशेष ध्यान देता। कानपुर में मैं जब तक रहा, उससे मेरा संपर्क बना रहा था। इंस्टीट्यूट से निकलने के कुछ दिनों बाद ही उसका विवाह हो गया था और उसकी पत्नी को देख मैंने उससे कहा था कि भाभी की शक्ल दीप्तिनवल जैसी है। कनौजिया बहुत प्रसन्न हुआ था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शादी के कुछ दिनों बाद डी.एम.एस.आर.डी. (डी.आर.डी.ओ. की एक लैब) कानपुर में उसकी नौकरी लग गई थी। स्वैच्छिक सेवावकाश ग्रहण करने से पहले और बाद में कई बार मैं इस लैब के गेस्ट हाउस में ठहरा और ऑफिस के काम से लैब भी गया, लेकिन वहां कनौजिया नहीं मिला। पूछने पर ज्ञात हुआ कि प्रमोशन पाकर वह देहरादून चला गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;******&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन शाम सी.जे. मुझे लेकर गुमटी के एक दक्षिण भारतीय रेस्टॉरेण्ट में गया। इडली का आर्डर देकर हम मेज पर बैठ गए। मेरी बगल की मेज पर एक सरदार परिवार बैठा हुआ था। मैं उसे नहीं पहचान पाया, लेकिन सी.जे. ने पहचन लिया। उसने मुझे इशारा किया, लेकिन मैंने उसके इशारे पर ध्यान नहीं दिया। वह कुछ कहना चाहता था, लेकिन कह नहीं पा रहा था। जब मैं कुछ नहीं समझा, उसने मेरा हाथ पकड़ा और बाहर चलने के लिए कहा। मैं समझ नहीं पा रहा था कि बेयरा इडली लेकर आने वाला था और मथाई बाहर जाने के लिए कह रहा था। वह मुझे लेकर आया था और अब .......मैं उसके साथ बाहर आ गया। वह मुझे सड़क पार खींच ले गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘मामला क्या है सी.जे.?’’ मैं चीख उठा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘बाप रे....तुमने देखा नहीं....?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘क्या?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘बगल की मेज पर ....।’’ उसकी सांस उखड़ी हुई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘बगल की मेज पर ....हां क्या था बगल की मेज पर।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘अरे यार....।’’ केरलाइट लहजे में वह बोला, ‘‘फिरकी अपनी बच्ची और हजबैंण्ड के साथ बैठी थी।’’ अब वह प्रकृतिस्थ था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘धत्तेरे की....।’’ मैंने उसे धौल जमाते हुए कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘किसी दूसरे रेस्टॉरेण्ट में चलते हैं।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘होस्टल चलते है। ....बहुत दिनों से तुम्हारे द्वारा पकायी मसूर की दाल नहीं खायी। आज तुम मेरे लिए दाल और चावल पकाओगे।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘ओ.के.।’’ वह हंस पड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अप्रैल का महीना था। पसीना पोछते हम दोनों तीन-चार किलोमीटर का रास्ता पैदल तय करने का निर्णय कर होस्टल लौट पडे़ थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****                                 &lt;br /&gt;जून, 1970 में इंस्टीट्यूट से मेरा वास्ता समाप्त हो चुका था, जबकि सी.जे. को एक वर्ष और वहां रहना था। यद्यपि  मैं अक्टूबर 1973 तक कानपुर में रहा, लेकिन इंस्टीट्यूट छोड़ने के बाद सी.जे. से मेरी मुलाकात नहीं हुई। किसी से ज्ञात हुआ था कि इंस्टीट्यूट से निकलने के बाद वह फर्टिलाइजर कार्पोरेशन ऑफ इंडिया में पहले एप्रैण्टिश के रूप में फिर वहीं स्थायी नौकरी पा गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2880097249222214869-5578472117541905295?l=wwwrachanayatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/feeds/5578472117541905295/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2880097249222214869&amp;postID=5578472117541905295' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/5578472117541905295'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/5578472117541905295'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='यादों की लकीरें (भाग दो)'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-YVqtTnBwQoc/TXGWj_OYw7I/AAAAAAAAASA/zrCClevRYQI/s72-c/Lodhi%2BGarden-6.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2880097249222214869.post-7094058365176247587</id><published>2010-12-20T01:34:00.000-08:00</published><updated>2010-12-20T02:19:02.186-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यादों की लकीरें'/><title type='text'>यादों की लकीरें</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TQ8ldqtXdPI/AAAAAAAAARs/C6RKUz3jJP0/s1600/roop%2Bchandel-bala-2.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TQ8kxKy3nJI/AAAAAAAAARc/jZ67yVA8e2A/s1600/Balram-4.jpg"&gt;&lt;img style="WIDTH: 135px; HEIGHT: 110px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5552697292701015186" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TQ8kxKy3nJI/AAAAAAAAARc/jZ67yVA8e2A/s200/Balram-4.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; छाया चित्र - बलराम अग्रवाल&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;संस्मरण&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;पहला मित्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;रूपसिंह चन्देल&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उससे मेरी पहली मुलाकात 1956 के मार्च या अप्रैल में हुई थी । उस वर्ष की होली कलकत्ता में मनाकर माँ के साथ मैं और छोटी बहन गांव लौटे थे । वहां मुझे पढ़ाने के पिता जी और बड़े भाई के सारे उपक्रम व्यर्थ रहे थे और शायद यह भी सोचा गया होगा कि दो वर्ष बाद पिता जी के रिटायर होने पर अंतत: मुझे गांव के स्कूल में ही पढ़ना होगा । गांव से जाने के समय मैं चार वर्ष के आस-पास रहा हूंगा । उस समय उससे मेरे संपर्क की याद मुझे नहीं है । शायद तब वह गांव में था भी नहीं । उसके पिता फौज में थे और परिवार साथ रखते थे । निश्चित ही तब वह पिता के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान घूमता रहा था, लेकिन कलकत्ता से मेरे लौटने पर वह गांव में था गुल्ली-डंडा और कंचे खेलता हुआ । पता चला उसके पिता फौज से अवकाश ग्रहण कर चुके थे ।&lt;br /&gt;उसका एक घर मेरे घर के सामने था (आज भी है) पक्का लिंटलवाला । मेरा मिट्टी की कच्ची इंटों का बना हुआ । उसके घर से सटा हुआ पक्का चबूतरा है , जिसमें एक शिवलिगं है और एक कोने में त्रिशूल गड़ा हुआ है। चबूतरे के पूर्वी छोटे-से हिस्से की फर्श टूट गयी थी जिसमें रेत डाल दी गई थी । मेरे और उसके घर के बीच दस फीट चौड़ी गली है। गली में उसे गांव के किसी न किसी लड़के के साथ कंचे खेलता प्रतिदिन सुबह मैं अपने चबूतरे पर और शाम उसके पक्के चबूतरे पर बैठकर देखता रहता ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसका नाम था बाला ... बाला प्रसाद त्रिवेदी । बड़ी ऑंखें, गोल चेहरा, तांबई रंग और हृष्ट-पुष्ट शरीर । जैसा वह बचपन में था वैसा ही अपनी अंतिम मुलाकात में मैंने उसे देखा था। वह मुझे खेलने के लिए बुलाता, लेकिन मैं खेलता नही । खेलने में मेरी रुचि नहीं थी। निठल्ला मैं उसे खेलते देखता और यहीं से हमारी मित्रता प्रारंभ हुई थी। मेरे घर के सामने उसका जो घर था, वह दो हिस्सों में बटा हुआ था। उसका आधा भाग उसके मंझले ताऊ के पास था और आधे में उसके पिता रहते थे। मेरे घर के सामने की गली से मुड़ती एक और संकरी गली है, उसमें पचास कदम पर उसका एक और मकान था, जिसमें वह अपनी माँ, विधवा बुआ और भाई-बहनों के साथ रहता था। बाद में उसकी माँ ने उसे भी पक्का बनवा लिया था ।&lt;br /&gt;वह मुझसे एक वर्ष बड़ा था लेकिन माँ ने एक मील दूर पुरवामीर के 'जुग्गीलाल कमलापति प्राइमरी पाठशाला' में जब मेरा नाम लिखाया तब पता चला कि वह मेरी कक्षा में पहले से ही था। मेरी शिक्षा तो लेट-लपाट शुरू ही हुई थी, लेकिन शायद पिता के साथ रहने के कारण उसकी मुझसे भी देर से प्रारंभ हुई थी। विद्यालय में एक साथ होने के कारण मेरा अधिकांश समय उसके साथ बीतता। सुबह अपना बस्ता संभाल मैं जब उसके घर पहुंचता, वह चाय के साथ पराठे का राश्ता कर रहा होता। हम पगडंडी के रास्ते पड़ोसी गांव पुरवामीर की ओर लपकते जहां हमारी पाठशाला थी। लौटते समय भी हम साथ होते। गांव के तीन औेर लड़के हमारी कक्षा में थे। प्राय: वे हम दोनों से अलग चलते। कारण यह कि वे बाला को पसंद नहीं करते थ । पसंद न करने का कारण था उसकी शरारतें। बात-बात में वह लड़ जाता। शरीर में सबसे जबर था, इसलिए सामने वाले पर भारी पड़ता। आए दिन उसके घर शिकायत पहुंचती। लेकिन वह मुझसे प्रेम करता.... मेरी हर बात मानता। मेरे दूसरे सहपाठियों का ही नहीं, गांव वालों और अध्यापकों का यह मानना था कि हमारी मित्रता अनमेल थी। कई बार हम दोनों के सामने लोग कहते, ''रूप तुम्हें ब्राम्हण और इसे क्षत्रिय घर में जन्म लेना चाहिए था।'' बाला ब्राम्हण था। वह जितना हृष्ट-पुष्ट था मैं उतना ही दुर्बल। गांव में सींकिया पहलवान कहा जाता मुझे। दूसरों से लड़-भिड़ने वाला बाला मेरी डांट सुन लेता और खींसे निपोर देता, लेकिन ऐसा तभी होता जब गलती उसकी होती और मैं उस क्षण उपस्थित &lt;span&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TQ8lUJeTYoI/AAAAAAAAARk/BE45BJjJIQI/s1600/roop%2Bchandel%2B-%2Bbala-1.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 150px; FLOAT: left; HEIGHT: 200px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5552697893641740930" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TQ8lUJeTYoI/AAAAAAAAARk/BE45BJjJIQI/s200/roop%2Bchandel%2B-%2Bbala-1.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;होता।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;(बाएं से इकबाल बहादुर सिंह,बाला प्र.त्रिवेदी और  लेखक -चित्र (नव.१९६६)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;हम हाई स्कूल तक &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; साथ रहे। आठवीं के बाद मैंने साइंस ली और उसने कामर्स। उत्तर प्रदेश में हाई स्कूल से स्ट्रीम तय कर लेना होता है। प्राइमरी उत्तीर्ण करने के बाद जूनियर हाईस्कूल के लिए हमने गांव से तीन मील दूर महोली के विद्यालय में प्रवेश लिया था। तब तक मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हो चुकी थी। उन तीन वर्षों की पढ़ाई के दौरान हम दोनों के मध्य एक बार किसी बात पर सिकठिया-पुरवा की बाजार के पास तालाब किनारे (उन दिनों वह तालाब सिघांड़ों की बेल से पटा पड़ा था) मल्लयुध्द हुआ था। हम पगडंडी के रास्ते गांव लौट रहे थे। गांव के हमारे तीनों सहपाठी भी उस दिन साथ थे। किसी बात पर बाला और मुझमें बहस छिड़ी हुई थी और उस बहस ने इतना भयंकर रूप लिया कि ताल ठोक हम आमने-सामने थे। एक-दूसरे के बस्ते साथियों ने संभाले और हम भिड़ गए थे खुले मैदान। दुबला-पतला होने के बावजूद मुझमें ताकत कम न थी। उठा-पटक ऐसी कि कभी वह मेरे ऊपर होता तो कभी मैं। एक बार उसकी पीठ पर बैठ मैंने उसका दाहिना हाथ उमेठना शुरू किया। वह सीत्कार कर रहा था। शुक्र था कि मेरे गांव के सीताराम अवस्थी (जो हम दोनों के पड़सी थे) अचानक प्रकट हो गए थे और उनकी दहाड़ सुन मैंने उसका हाथ छोड़ दिया था। सीताराम अवस्थी ने न केवल हमें बुरी तरह डांटा था, बल्कि घर और स्कूल मे शिकायत की धमकी भी दी थी। मैं लड़ाई को बाहर तक ही रखना चाहता था। नहीं चाहता था कि मेरे पिता-माँ तक या स्कूल तक बात पहुंचे। स्कूल में अध्यापकों से लेकर हेडमास्टर तक का मैं प्रिय छात्र था ... सीधा-सादा।उनकी दृष्टि में मैं अपनी वही छवि बनाए रखना चाहता था। मैंने कपड़े पहने, बस्ता साथी से लिया और तेजी से गांव के लिए भाग खड़ा हुआ था।&lt;br /&gt;उसके बाद कई महीनों तक न हम साथ आए-गए और न बोल-चाल रही। बाद में उसने गलती स्वीकार कर माफी मांगी और हमारी मित्रता पुन: उसी ढर्रे पर चल पड़ी थी।&lt;br /&gt;*******&lt;br /&gt;बाला खेल का शौकीन था ..... वालीबाल और कबड्डी। दूसरे खेलों की गांव में गुंजाइश नहीं थी। वालीबाल के लिए वह कभी-कभी रेलवे स्टेशन जाता, जहां शायं कुछ युवक खेलते थे। अक्टूबर-नवंबर में जब किसान अपने खेतों को रवी की फसल बोने के लिए जोतकर पाटा देते तब खेत चौरस हो जाते। बाला एण्ड कंपनी ऐसे खेतों में रात की छिटकी चांदनी में कबड्डी खेलते। सुबह वह मुझे उत्साहित करता ,''आज तुम भी चलना ... गजब का आनंद आता है ।''&lt;br /&gt;उसे खेलने में ही आनंद नहीं आता था, बागों से फल लूटने में भी वह आनंद लेता। गांव के बाहर दक्षिण दिशा में एक मुसलमान का अमरूदों का बड़ा बाग था। ऐसे कई बाग आज भी गांव में हैं और उनके अमरूद इलाहाबादी अमरूदों जैसे गुदाज और मीठे होते हैं। एक दिन वह बोला, ''आज शाम चलना मेरे साथ....।''&lt;br /&gt;''कहां ?''&lt;br /&gt;''घूमने......स्कूल से आकर घर में घुस लेते हो। कभी घूम भी लिया करो।''&lt;br /&gt;यह सातवीं कक्षा के दिनों की बात है।&lt;br /&gt;शाम लगभग साढ़े पांच बजे वह मुझे लेने आ गया।&lt;br /&gt;''कहां जा रहे हो ?'' तेजी से बढ़ते धुंधलके और ठंड को भांप माँ ने पूछा।&lt;br /&gt;''बाला के साथ जा रहा हूं....अभी आता हूं।''&lt;br /&gt;''दूर मत जाना....शाम होते ही साउज गांव के नजदीक आ जाते हैं।''&lt;br /&gt;गांव के आस-पास जंगल के नाम पर बाग थे और बहुतायत में थे (अब उतने नहीं रहे)। एक मील की दूरी पर गांव के पूरब और दक्षिण में दो नाले थे, जो बरसात के दिनों में किसी नदी का रूप ले लेते थे। इन नालों के दोनों ओर झाड़-झंखाड़ थे, जिनमें कोई खतरनाक जानवर नहीं, सियार, लोमड़ी और खरगोश छुपे होते या कभी-कभी कोई स्याही दिख जाती। गांव के निकट जो बाग घने थे उनमें भी झाड़ियां थीं और कोई जानवर वहां भी छुपा होता। दिन में वे झाड़ियों में होते जबकि रात शुरू होते ही वे गांव के निकट आ जाते। रातभर हमें सियारों की हुहुआहट सुनाई देती। जब लगातार कई दिनों तक सियार गांव के और अधिक निकट आकर हुहुआते तब माँ-नानी कहतीं कि गांव में कुछ विपदा आने वाली है। यह उनका अनुभूत सत्य था ।&lt;br /&gt;''अमुक की तबीयत ज्यादा खराब है .... भगवान उसकी रक्षा करना।''&lt;br /&gt;जब कभी कई दिनों तक हुहुआने के बाद सियारों का हुहुआना कम हो जाता, वे कहतीं, ''भगवान उस पर मेहरबान है .... विपदा टल गयी।''&lt;br /&gt;रास्ते में बाला बोला, ''हाफी जी के बाग में अमरूदों की बहार है .... आज उधर ही चलते हैं ।''&lt;br /&gt;मैं डर रहा था, लेकिन स्वादिष्ट अमरूदों की कल्पना से मेरे मुंह में भी पानी आ गया था। हम हाफी जी के बाग के पीछे पहुंचे। बाग चारों ओर से ऊंची दीवार से घिरा हुआ था और था भी ऊंचाई पर। मेरा साहस उसके अंदर जाने का नहीं हो रहा था, लेकिन बाला उस्ताद था। उसने एक ऐसी जगह पहचान रखी थी जहां से बिना आहट बाग के अंदर प्रवेश किया और निकला जा सकता था। वह एक ही छलांग में बिना आहट बाग में पहुंच गया। उसने मुझे इशारा किया। अंधेरे में केवल उसका हाथ नजर आया। अमरूदों की महक मुझे ललचा रही थी। मैं भी साहस जुटा ऊपर पहुंच गया। हम अंधेरे में टटोलकर अमरूद तोड़ने लगे और कुर्ते की जेबों में ठूंसने लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाग की फसल किसी कुंजड़े ने खरीद रखी थी। बाग के बीच उसने फूस की झोपड़ी डाल रखी थी, जहां वह सपरिवार दिन-रात रहता था। दिन में वह गांव-गांव - और बाजार में अमरूद बेचता और उसकी पत्नी-बच्चे रखवाली करते। अमरूद पक्षियों.... खासकर सुग्गों का प्रिय आहार होता है। उसके लिए बाग के चारों ओर पेड़ों से बांस के डंडे बांधकर रस्सी से उनको मड़ैया से वे संचालित करते। रस्सी खींचने से डंडे पेड़ से टकराते .... आवाज होती और पक्षी उड़ जाते। दिनभर उसके बच्चे यह करते रहते, जबकि पत्नी घूम-घूमकर पके अमरूद तोड़ती ओैर जानवरों पर नजर रखती।&lt;br /&gt;यद्यपि हम बहुत संभलकर अपना काम कर रहे थे, लेकिन आहट कुंजड़े तक पहुंच चुकी थी। उसने भक से टार्च की रोशनी उधर फेकी। पहचान नहीं पाया, लेकिन इतना समझ गया कि बाग में कोई जानवर नहीं मानुस घुसे थे। वह गाली देता डंडा लेकर हमारी ओर दौड़ा, लेकिन उसकी टार्च की रोशनी पड़ते ही हम प्रवेश की जगह से नीचे कूद गये और सिर पर पैर रख भाग खड़े हुए थे।&lt;br /&gt;इस प्रसंग को केन्द्र में रखकर मैंने 'अमरूदों की चोरी' शीर्षक से एक बाल कहानी लिखी थी।&lt;br /&gt;*******&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी हाई स्कूल की बोर्ड परीक्षा निकट थी और हम दोनों ने ही उस वर्ष पढ़ाई नहीं की थी। उत्तर प्रदेश में आठवीं की परीक्षा जिला बोर्ड द्वारा ली जाती थी और गांव में मैं पहला लड़का था जिसने प्रथम श्रेणी पायी थी। हाई स्कूल में फेल हो जाने का खतरा या कम अंक लेकर पास होने से मैं प्रकम्पित था। सोचता, फिर भी पढ़ाई नहीं कर रहा था। कह सकता हूं कि पूरे वर्ष मैंने पड़ोसी गांव के एक दूधिया के बेटे, जो मुझसे सीनियर था और लगातार इण्टरमीडिएट में फेल होता रहा था, के चक्कर में केवल गप्प-गोष्ठी में समय नष्ट किया था। वह मेरे गांव दूध लेने आता और दूध लेकर सात बजे के लगभग मेरे चबूतरे से साइकिल टिकाकर मुझे आवाज देता। मुझे उसके आने का इंतजार रहता। उसकी एक आवाज में मैं डयोढ़ी पार होता और सामने के पक्के चबूतरें पर रात नौ बजे तक हमारी गोष्ठी होती रहती। इस गोष्ठी में बाला कभी शामिल नहीं हुआ। उसके न पढ़ने के अपने कारण रहे होगें। तभी 31 जनवरी,1967 को मुझे बड़े भाई से मिलने कानपुर जाना पड़ा। रविवार का दिन था। कानपुर मेरे गांव से तीस किलोमीटर दूर है। और उन दिनों मेरे पास नई हीरो साइकिल थी, जिसे मैं हर समय चमकाकर रखता था। मुझे उसी से जाना था। मेरे गांव से जी.टी.रोड एक किलोमीटर उत्तर है और वह कानपुर के मध्य से गुजरती है। भाई साहब उन दिनों लाल बंगला में रहते थे, जो जी.टी.रोड के किनारे बसा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाई साहब हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड में नौकरी करते थे ...घर का एकमात्र आर्थिक स्रोत। माहांत में या तो वह स्वयं आकर घर खर्च दे जाते या मैं जाकर ले आता। उस दिन मुझे उनसे पैसे लेने जाना था और उसी दिन उनके साले बाबूसिंह को भी कानपुर जाना था। एक मुलाकात में उनसे समय-दिन और स्थान निश्चित हो गया था। तय हुआ था कि महाराजपुर थाना के आगे, जहां नरवल से आने वाला रास्ता जी.टी.रोड से मिलता है वहीं मंदिर के पास हम दस बजे मिलेंगे।&lt;br /&gt;मैं निश्चित समय पर साइकिल मंदिर की दीवार से टिका मंदिर की दीवार पर नरवल की ओर से आने वाली सड़क पर टकटकी लगाकर बैठ गया था। दीवार अधिक ऊंची न थी । मंदिर लगभग एक एकड़ क्षेत्र में था। बाबू सिंह की प्रतीक्षा में जब दो घण्टे से ऊपर समय बीत गया तब मंदिर के पुजारी ने मेरे पास आकर पूछा ,''किसी की प्रतीक्षा में हो बेटा ?''&lt;br /&gt;''जी ।'' मैंने पूरी बात बतायी ।&lt;br /&gt;''अंदर आ जाओ।''&lt;br /&gt;वह मुझे गेट से अंदर प्रागंण में ले गए जहां बिछी चारपाई पर मुझे बैठाते हुए उन्होंने मेरे बारे में जानकारी ली। कुछ देर तक कुछ सोचने के बाद वह कागज-पेंसिल ले आए और बोले, ''किसी फूल का नाम सोचो।''&lt;br /&gt;मेरे सोचते समय उन्होंने उस फूल का नाम लिख लिया था। मेरे बताते ही उन्होंने अपना लिखा कागज मेरी ओर बढ़ा दिया। उन्होंने फूल का वही नाम लिखा था। फिर उन्होंने कहा, ''किसी फल का नाम सोचो।''&lt;br /&gt;मेरे सोचने तक वह उस फल का नाम भी लिख चुके थे।&lt;br /&gt;एक-दो और बातों ने मुझे उनके प्रति आकर्षित किया।&lt;br /&gt;'यह तो बहुत विद्वान व्यंक्ति हैं।' मैंने सोचा। मैं यह सोच रहा था और वह मेरे चेहरे को पढ़ रहे थे। देर की चुप्पी के बाद वह बोले, ''बेटा तुमने पूरे वर्ष पढ़ाई नहीं की.... और हाई स्कूल की परीक्षा देने जा रहे हो!''&lt;br /&gt;मैंने स्वीकार किया ।&lt;br /&gt;''परीक्षा कब से है ?''&lt;br /&gt;''29 फरवरी से।''&lt;br /&gt;''एक महीना है।'' वह फिर कुछ देर चुप रहे, फिर बोले, ''एक महीना है। मैं पढ़ पा रहा हूं कि यदि तुम अभी भी जमकर परिश्रम करोगे तो अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो जाओगे ।''&lt;br /&gt;पुजारी की बात ने मुझे आंदोलित किया। एक बज चुका था और बाबूसिंह का अता-पता नहीं था। मैंने पुजारी से इजाजात ली और भाई साहब से मिलने चला गया। रास्ते भर मैं पुजारी की बात सोचता रहा। घर लौटा तब एक संकल्प था मन में कि कल से रात दिन एक कर देना है पढ़ाई में। रात ही मैंने बाला को यह बताया। वह भी पूरे वर्ष न पढ़ने से परेशान था। हमने तय किया कि गोरखनाथ निगम के बाग में सुबह ही हम पढ़ने चले जाएगें और शाम पांच बजे तक वहीं रहेंगे। दिन भर पढ़ेंगे ....केवल आध घण्टे का विश्राम लेंगे।&lt;br /&gt;यह बाग हमारे घर से दो सौ मीटर की दूरी पर था बिल्कुल गांव से सटा हुआ ...उत्तर दिशा में। उस बाग से सटा हुआ था मुसलमानों का बेरों का बाग।&lt;br /&gt;अगले दिन से हम वहां जाने लगे। प्रेपरेशन लीव चल रही थीं। दृढ़ संकल्प के साथ हमने टाइम-टेबल बनाकर पढ़ाई की। बीच-बीच में बाला अवश्य इधर-उधर घूम आता और मौका पाकर बेर भी तोड़ लाता। शाम पांच बजे अपने बस्ते संभाल हम घर लौटते। मेरे पास घड़ी नहीं थी। उसके पास थी। उसने अपनी घड़ी मुझे दे दी और वह परीक्षा तक मेरे पास ही रही, जिसने समय संयोजित करने में मेरी बहुत सहायता की थी।&lt;br /&gt;मैं सात बजे सो जाता माँ से यह कहकर कि वह साढ़े बारह बजे मुझे जगा देंगी। बाला अपने पिता के कमरे में सोता यह कहकर कि मैं जब उठूंगा उसे भी जगा दूंगा। मुझे आश्यर्य होता जब माँ बिना घड़ी-एलार्म मुझे ठीक साढ़े बारह बजे उठा देतीं। दो बजे कहा तो दो बजे....ऐसा वह कैसे संभव कर लेती थीं..... आज भी मेरे लिए रहस्य है। मैं सुबह तक पढ़ता और अगले दिन की फिर वही दिनचर्या होती। इतना घनघोर परिश्रम मैंने कभी नहीं किया था। परिणामत: मेरी आंखों में पीलापन छा गया। धुंधला दिखने लगा। परीक्षा के बाद इसका देसी इलाज किया और स्वस्थ हुआ।&lt;br /&gt;आज भी सोचता हूं कि यदि मंदिर के पुजारी से मुलाकात न हुई होती तो पता नहीं मेरा भविष्य क्या रहा होता। मैं और बाला दोनों ही पास हो गए थे। कुछ अंकों से मेरी प्रथम श्रेणी रह गयी थी। बाला भी द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हो गया था।&lt;br /&gt;*******&lt;br /&gt;हाई स्कूल का परीक्षा परिणाम आने से पहले ही उसका विवाह हो गया। वह बहुत प्रसन्न था। पत्नी सुन्दर और सुशील थी। हाई स्कूल के बाद उसने पढ़ाई नहीं की। वह नौकरी की तलाश में लग गया था। रेगुलर इंटरमीडिएट मैं भी नहीं कर सका। बीच मे्रं 1969-70 मे आई.टी.आई. किया और उसी की भांति नौकरी के लिए भटकने लगा। (इकरामुर्रहमान हाशमी पर लिखे अपने संस्मरण में मैंने इस विषय पर विस्तार से लिखा है।)&lt;br /&gt;जून 1970 में आई.टी.आई से निकलने के बाद मैं भाई साहब के साथ रहने के लिए बेगमपुरवा कॉलोनी में शिफ्ट कर गया था। उन्हीं दिनों भाई साहब ने कॉलोनी में दूसरी मंजिल पर एक और फ्लैट खरीदा था। उन्होंने पड़ोसी बमशंकर बाजपेई से कहकर बाला को उनके प्रिण्टिगं प्रेस में प्रशिक्षु के रूप में लगवा दिया। वेतन न के बराबर था, लेकिन वह अपना गुजर कर लेता। स्वयं ही स्टोव में खाना पकाता और प्रेस तक पांच-छ: किलोमीटर पैदल जाता, लेकिन लौटते समय बाजपेई के साथ उनकी साइकिल से आता। तब तक उसके परिवार की आर्थिक स्थिति डांवाडोल हो चुकी थी और शायद वह एक बेटे का पिता भी बन चुका था। पर्याप्त तनाव में रहता। तनाव में रहते हुए भी वह उसे प्रकट नहीं करता था। दूसरी मंजिल के फ्लैट में मैं उसके साथ रहता था। कभी-कभी वह लंबी आह भरकर कहता, ''रूप, तम्हारे लिए जगरूप कोशिश करने वाले हैं, लेकिन मेरे लिए मेरे घर का कोई कुछ करने को तैयार नहीं। पिता जी ने परिवार से नाता तोड़ लिया है।''&lt;br /&gt;उसके पिता को फौज से पेंशन मिलती थी और वह घर के लिए धेला नहीं देते थे। उसकी माँ गाय -भैंस पालकर उनका दूध बेच परिवार पाल रही थीं। उसकी चिन्ता स्वाभाविक थी।&lt;br /&gt;एक बार सप्ताह भर गांव रहकर वह लौटा। बहुत उत्साहित था। मैंने कारण पूछा।&lt;br /&gt;''रूप, तुम समझो कि जल्दी ही मेरी नौकरी लग जाएगी।''&lt;br /&gt;''कहीं जुगाड़ बन गया है ?''&lt;br /&gt;''मुझे पहले मालूम होता तो इतने दिनों तक बाजपेई जी के प्रेस में अक्षर (कंपोजिगं) न बिठाता रहता।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''कुछ मुझे भी बताओ।'' मैं स्वयं उन दिनों साइकिल के पैडल घिस रहा था और मेरा अनुमान है कि शहर की शायद ही कोई मिल रही होगी जहां मैं नहीं गया था। कितने ही छोटे दफ्तर .....और सभी जगह खेदजनक आश्वासन। भाई साहब के लिए अपनी क्लर्की से घर संभालना कठिन हो रहा था।&lt;br /&gt;''इस बार बाबू जी ने तरस खाकर मुझे बताया कि उनके फुफेरे भाई इन दिनों कानपुर के मेयर हैं ।'' वह कह रहा था ।&lt;br /&gt;''हां ऽऽऽ'' मुझे आश्चर्य हुआ। इतना निकट का रिश्ता।&lt;br /&gt;''तिवारी जी मेरे बाबा की बहन के बेटा हैं। उन दिनों कोई तिवारी कानपुर के मेयर थे.... शहर के सभ्रांत व्यक्ति।''&lt;br /&gt;''उन्होंने अब तक क्यों नहीं बताया था ?'' मैंने पूछा।&lt;br /&gt;''बाबू जी उनसे कहना नहीं चाहते थे..... हमारी उनकी हैसियत में बहुत अंतर है शायद इसलिए....''&lt;br /&gt;''तो क्या ...?''&lt;br /&gt;''बस बाबू जी को उनके पास जाना गवारा नहीं .....और इसीलिए उन्होंने आज तक नहीं बताया ।''&lt;br /&gt;''तुम मिलो तिवारी जी से..... अपने बाबा का परिचय देकर।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''कल ही जाउगां....तुम भी अपनी सर्टीफिकेट लेकर चलना ....मेरा काम बनेगा जब तब तुम्हारे लिए भी कहूंगा ।''&lt;br /&gt;''चलूंगा।''&lt;br /&gt;''बताऊं,'' बाला ने क्षणभर की चुप्पी के बाद कहा, ''तिवारी महाराज फर्टीलाइजर कार्पोरेशन ऑफ इंडिया' के चेयरमैंन हैं.... और आजकल वहां सभी प्रकार की भर्ती चल रही हैं। नया खुला है न कार्पोरेशन कानपुर में।''&lt;br /&gt;''समय नष्ट नहीं करना चाहिए बाला। कल ही चलते हैं।''&lt;br /&gt;और दूसरे ही दिन हम दोनों तिवारी जी के यहां थे सुबह दस बजे के लगभग। आलीशान कोठी। मिलने वालों की भीड़। कोठी के गेट पर दरबान ने रोका, लेकिन वह समय जनता से मिलने का था। मामूली तहकीकात के बाद हम अंदर थे। मुलाकातियों की पंक्ति में लंबे समय तक अपने नंबर की प्रतीक्षा करते हुए हम हॉल में एक ओर बैठ गए थे। हॉल से लगा तिवारी जी का मुलाकाती कमरा था .... कमरा नहीं विशाल हॉल ....खिड़कियों-दरवाजों पर झूलते मंहगे लंबे परदे, फर्शे पर बिछी कार्पेट, जिसपर पैर रखने में उसके गंदा हो जाने का संकोच हमारे चेहरों पर स्पष्ट था। नंबर आने पर हम दोनों साथ ही मिलने गए। आलीशान सोफे पर क्रीम कलर के सिल्क के कुर्ता और भक पायजामा में साठ के आस-पास की आयु के लंबे, गोरे-चिट्टे चमकते चेहरे वाले तिवारी जी आसीन थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाला ने अपना परिचय दिया, ''मैं नौगवां गौतम के कृष्णकुमार त्रिवेदी का बेटा हूं।''&lt;br /&gt;अपने ममेरे भाई का नाम सुनकर भी तिवारी जी के चेहरे पर पहचान का कोई चिन्ह प्रकट नहीं हुआ। ना ही उन्होंने ममेरे भाई के बारे में कुछ पूछा।&lt;br /&gt;''क्या काम हैं ?'' दूसरों की भांति एक रूटीन प्रश्न।&lt;br /&gt;बाला ने आने का आभिप्रय बताया।&lt;br /&gt;''एप्लीकेशन और प्रमाण-पत्र लाए हो ?''&lt;br /&gt;'जी।'' हम दोनों एप्लीकेशन प्रमाणपत्रों के साथ ले गए थे। बाला ने वे उन्हें पकड़ा दिए। लेकिन मेरा मन नहीं हुआ अपनी एप्लीकेशन देने का। बाला ने इशारा भी किया, लेकिन मैं चुप बैठा रहा था।&lt;br /&gt;कुछ देर की चुप्पी के बाद तिवारी जी बोले, '' ठीक है । कुछ होगा तब तुम्हें बुला लेगें।''&lt;br /&gt;हम दोनों ने तिवारी जो के उठ जाने के संकेत को समझा और तुरंत उठकर बाहर आ गए। लेकिन इस बार बाला ने वह गलती नहीं की जो अंदर जाने पर की थी। तब वह तिवारी जी के चरण-स्पर्श करना भूल गया था। लौटते समय उसने वह भूल सुधार ली थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''तुम्हारा काम बन जाएगा।'' रास्ते में मैंने उससे कहा।&lt;br /&gt;''मुझे उम्मीद नहीं है ...(.तिवारी महाराज वह ऐसे ही बोल रहा था) उसने पहचाना ही नहीं। बाबू जी का नाम सुनकर भी उन्होंने कुछ भी नहीं पूछा ।&lt;br /&gt;बाला का अनुमान सही सिद्ध हुआ था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग एक वर्ष तक बाला ने प्रेस में हाथ-पैर मारे लेकिन कंपोजिंग में वह अच्छी गति नहीं बना पाया। बाजपेई उसे कुछ नहीं कहते लेकिन भाई साहब को बताते ,''ठाकुर साहब, बाला काम सीखने में रुचि नहीं ले रहा।'' और वास्तव में ही उसका मन नहीं लग रहा था। एक दिन खीजकर उसने कहा, ''इस काम से मेरी गुजर न होगी। मैं नहीं सीख पाउंगा।'' और एक दिन उसने घोषणा की कि वह गांव वापस जा रहा है। मैं अपने संघर्षों में डूबा हुआ था। बाद में पता चला कि वह अपने बड़े ताऊ के बड़े लड़के बद्रीप्रसाद त्रिवेदी के पास चला गया था, जो महाराष्ट्र के किसी शहर में रेलवे में छोटे पद पर कार्यरत थे। बद्री ने किसी प्रकार उसे रेलवे पुलिस में भर्ती करवा दिया था। नौकरी लगने के बाद मैं मुरादनगर, फिर दिल्ली आ गया। गांव जाना कम हो गया। लेकिन मुझे बाला के समाचार मिलते रहते।&lt;br /&gt;1973 के बाद लंबे समय तक हम नहीं मिले और जब मिले तब पता चला कि वह गांव लौट आया था। यह मुलाकात गांव में हुई थी। वह रेलवे की नौकरी छोड़ आया था.... छोड़ नहीं बल्कि उसे निकाल दिया गया था। वह झगड़ा करने की आदत से विवश था। अपने किसी सहयोगी से उसका झगड़ा हुआ और उसने उस पर घातक प्रहार किया था। परिणामस्वरूप नौकरी से हाथ धोना पड़ा। मैं गांव गया तब वह मुझसे मिलने आया और लगभग एक घण्टा मेरे पास बैठा। लेकिन उसकी नौकरी के विषय में कुछ भी पूछने का साहस मुझमें नहीं था और न ही उसने बताया। यह बात 1988 की है। उसने मेरा दिल्ली का पता लिया। मैंनें उसे अपना वर्तमान पता दिया, क्योंकि मैंने इस मकान का आधा भाग इस उद्देश्य से बनवाया था कि यहां शिफ्ट करूंगा। बाला को पता देने के समय मैं शक्तिनगर में किराए के मकान में रह रहा था और कुछ दिनों के अंदर ही अपने मकान में आने का विचार था, लेकिन बच्चों की शिक्षा को ध्यान में रखकर बाद में इस विचार को त्यागना पड़ा था। उसने बताया था कि उसकी छोटी बहन का विवाह दिल्ली में हुआ था और वह जल्दी ही दिल्ली आएगा ।&lt;br /&gt;वह दिल्ली आया और मेरे मकान में भी आया, लेकिन यहां ताला बंद था। शक्तिनगर का पता उसके पास नहीं था। डेढ़-दो वर्ष बाद मैं फिर गांव गया। इस बार वह गांव में नहीं था। उस दिन मेरा मन अपने खेतों की ओर जाने का हुआ। अपने खेतों की ओर जाऊं और पास के रेलवे स्टेशन (करबिगवां) तक न जाऊं यह संभव नहीं था। इस रेलवे स्टेशन से मेरी अनेक यादें जुड़ी हुई हैं। गांव में रहते हुए मैं प्राय: शाम के समय उधर निकल जाता और स्टेशन के बाहर एक चबूतरे पर बैठकर आगरा-इलाहाबाद पैसेंजर से आने वाले यात्रियों को देखता। उस दिन मेरा मन स्टेशन को एक बार पुन: देखने का हुआ। वहां मुझे बदलू मोची मिले, जो उसी प्रकार स्टेशन के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे बैठे हुए थे, जिस प्रकार वह मेरी किशोरावस्था में मुझे बैठे दिखाई देते थ। घर के जूते-चप्पलें गठवांने के लिए मुझे एक मील चलकर स्टेशन तक जाना पड़ता, जबकि बदलू मेरे गांव के ही थे। ऐसा इसलिए क्योंकि वह अपना सामान स्टेशन में ही कहीं रख आते थे। बदलू बहुत बूढ़े हो चुके थे। मैंने जिस बदलू को किशोरावस्था में देखा था उनमें और उस दिन के बदलू में बहुत अंतर था। चेहरा झुर्रियों भरा......हाथ-पैर सूखे हुए.....लेकिन वह तब भी जूते गांठ रहे थे ।&lt;br /&gt;स्टेशन में बहुत कुछ बदल गया था, नहीं बदला था तो पुन्नी पाण्डे के भतीजे का व्यवसाय। वर्षों बाद भी मैंने उसे उसी प्रकार यात्रियों को पानी पिलाते देखा। उम्र अपनी छाप उसके चेहरे पर छोड़ चुकी थी। गोरे चेहरे पर कालिमा उतर आयी थी, जो उसके कठिनतर जीवन की गवाही दे रही थी ।&lt;br /&gt;वहां से लौटते हुए रेलवे फाटक के पास अचानक बाला से मेरी मुलाकात हो गयी। वह किसी बारात में जा रहा था। बारात बैलगाडियों में थी। मुझे देखते ही वह बैलगाड़ी से उछलकर कूदा और आंखे निकालकर लगा धमकाने, ''तुम्हारा खून पीने का मन कर रहा है .....मुझे तुमने सादतपुर का पता दिया....मैं गया....वहां ताला बंद था। तुमने शक्तिनगर का पता क्यों नहीं दिया था ! नहीं मिलना था तब दिया ही क्यों था ?''&lt;br /&gt;शर्मिन्दा मैंने बहुत सफाई दी, लेकिन उसने एक नहीं सुनी। बोलता रहा। ट्रेन निकल गई थी और फाटक खुलने वाला था। वह बोला, ''अपना शक्तिनगर का पता दो ।''&lt;br /&gt;मैंने उसके आदेश का पालन किया।&lt;br /&gt;''ठीक है....जल्दी ही वहां आऊंगा।'' कहकर वह उछलकर बैलगाड़ी पर सवार हो गया था।&lt;br /&gt;लेकिन वह शक्तिनगर कभी नहीं आया।&lt;br /&gt;बाला के साथ वह मेरी अंतिम भेंट थी। उसके बाद उसके विषय में मुझे जो सूचना मिलती वह अत्यंत कष्टकारी होती। उसके पास कोई रोजगार नहीं था .... शायद वह कुछ करना भी नहीं चाहता था। कोढ़ में खाज यह कि वह पीने लगा था। ऐसा-वैसा नहीं.....पूरी बोतल एक साथ पी जाता और पीने के लिए उसे हर दिन शराब चाहिए थी। बड़ा बेटा कहीं कुछ करने लगा था, लेकिन हालात बेहतर नहीं थे ।&lt;br /&gt;शराब के साथ ही उसने मदक की लत डाल ली थी। गांव में मदक की पहली लत उसके बड़े ताऊ यानी बद्रीप्रसाद त्रिवेदी के पिता ने डाली थी। वह पूरे दिन उसी में धुत रहते थे और उनसे ही वह लत गांव के कितने ही लोगों को लग गयी थी। कई लोग तबाह हुए थे और कई युवावस्था में ही परलोकवासी हो चुके थे। अब वही लत बाला ने अपना ली थी। अपने उपन्यास 'पाथरटीला' में मैंने मदक का विस्तृत चित्रण किया है।&lt;br /&gt;मदक और शराब ने बाला के हट्टे-कट्टे शरीर को निचोड़ दिया। ऐसा नहीं कि वह इसके दुष्परिणाम नहीं जानता रहा होगा। शायद वह अपने जीवन से अत्यंत असंतुष्ट और निराश था और उसने अपने को समाप्त कर लेने का निर्णय कर लिया था। उसने जो चाहा होगा, वही हुआ। हाल की कानपुर यात्रा के दौरान मुझे सूचना मिली कि सात-आठ माह पूर्व वह इस संसार को अलविदा कह गया था।&lt;br /&gt;अपने पहले मित्र के ऐसे अंत से मैं आहत था। उसका अंतिम स्वप्न भी मैंने लगभग इतने ही दिनों पहले देखा था। शायद वह मुझे स्वप्न में अलविदा कहने आया था और संभव है, वह वही दिन रहा हो जिस दिन वह इस संसार से विदा हुआ था।&lt;br /&gt;****** &lt;br /&gt;दिल्ली-110 094&lt;br /&gt;फोन : 09810830957&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2880097249222214869-7094058365176247587?l=wwwrachanayatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/feeds/7094058365176247587/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2880097249222214869&amp;postID=7094058365176247587' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/7094058365176247587'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/7094058365176247587'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='यादों की लकीरें'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TQ8kxKy3nJI/AAAAAAAAARc/jZ67yVA8e2A/s72-c/Balram-4.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2880097249222214869.post-1044585249302316019</id><published>2010-10-05T20:24:00.001-07:00</published><updated>2010-10-05T20:31:24.541-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्मरण'/><title type='text'>यादों की लकीरें</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TKvsHcUZM2I/AAAAAAAAARM/90_2IyK9EB4/s1600/cflowers0342.jpg"&gt;&lt;img style="WIDTH: 105px; HEIGHT: 91px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5524768980505015138" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TKvsHcUZM2I/AAAAAAAAARM/90_2IyK9EB4/s200/cflowers0342.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;संस्मरण-३&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;प्रखर प्रतिभा के धनी थे नन्दन जी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;रूपसिंह चन्देल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आठवें दशक के मध्य की बात है । धर्मयुग के किसी अंक में हृदयखेड़ा के एक सज्जन पर केन्द्रित रेखाचित्र प्रकाशित हुआ । हृदयखेड़ा मेरे गांव से तीन मील की दूरी पर दक्षिण की ओर पाण्डुनदी किनारे बसा गांव है, जहां मेरी छोटी बहन का विवाह 1967 में हुआ था । वर्ष में दो-तीन बार वहां जाना होता । रेखाचित्र जिसके विषय में था उन्हें मैं नहीं जानता था, लेकिन उसके लेखक के नाम से परिचित था । वह धर्मयुग के सहायक सम्पादक कन्हैंयालाल नन्दन थे । तब नन्दन जी के नाम से ही परिचित था, लेकिन उस रेखाचित्र ने मुझे इतना प्रभावित किया कि उसने नन्दन जी के प्रति मेरी उत्सुकता बढ़ा दी । मैंने बहनोई से पूछा । उन्होंने इतना ही बताया कि नन्दन जी उनके पड़ोसी गांव परसदेपुर के रहने वाले &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TKvsULL_17I/AAAAAAAAARU/4aVH7sSDzPw/s1600/kanhaiya+Lal+nandan.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 121px; FLOAT: left; HEIGHT: 142px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5524769199244695474" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TKvsULL_17I/AAAAAAAAARU/4aVH7sSDzPw/s200/kanhaiya+Lal+nandan.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;हैं । परसदेपुर का हृदयखेड़ा से फासला मात्र एक फर्लागं है । कितनी ही बार मैं उस गांव के बीच से होकर गुजर चुका था । मेरे गांव से उसकी दूरी भी तीन मील है.......बीच में करबिगवां रेलवे स्टेशन ...... यानी रेलवे लाइन के उत्तर मेरा गांव और दक्षिण परसदेपुर ।&lt;br /&gt;इस जानकारी ने कि नन्दन जी मेरे पड़ोसी गांव के हैं उनके बारे में अधिक जानने की इच्छा उत्पन्न कर दी । उन दिनों मैं मुरादनगर में था और साहित्य से मेरा रिश्ता धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बनी और सारिका आदि कुछ पत्र-पत्रिकाएं पढ़ने तक ही सीमित था । मैंने नन्दन जी के बारे में अपने भाई साहब से पूछा ।&lt;br /&gt;‘‘तुम नहीं जानते ?’’ उनके प्रश्न से मैं अचकचा गया था । चुप रहा ।&lt;br /&gt;‘‘रामावतार चेतन के बहनोई हैं । मुम्बई में रहते हैं .... परसदेपुर में सोनेलाल शुक्ल के पड़ोसी हैं ।’’ और वह करबिगवां स्टेशन में कभी हुई नन्दन जी से अपनी मुलाकात का जिक्र करने लगे ।&lt;br /&gt;मैं अपनी अनभिज्ञता पर चुप ही रहा । सोनेलाल शुक्ल से कई बार मिला था, क्योंकि वह मेरे गांव आते रहते थे । मेरे पड़ोसी कृष्णकुमार त्रिवेदी उनके मामा थे और चेतन जी की कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ता रहा था ।&lt;br /&gt;हिन्दी साहित्य की दो हस्तियां मेरे पड़ोसी गांव की थीं, इससे मैं गर्वित हुआ था ।&lt;br /&gt;नन्दन जी से यह पहला परिचिय इतना आकर्षक था कि मैं उनसे मिलने के विषय में सोचने लगा, लेकिन यह संभव न था । कई वर्ष बीत गए । एक दिन ज्ञात हुआ कि नन्दन जी ‘सारिका’ के सम्पादक होकर दिल्ली आ गए हैं, लेकिन मित्रों ने उनकी व्यस्तता और महत्व का जो खाका खींचा उसने मुझे हतोत्साहित किया । मैं उनसे मिलने जाने की सोचता तो रहा, लेकिन कुछ तय नहीं कर पाया । तभी एक दिन एक मित्र ने बताया कि नन्दन जी मुरादगर आए थे.....कुछ दिन पहले ।&lt;br /&gt;‘‘किसलिए ?’’&lt;br /&gt;‘‘हमने काव्य गोष्ठी की थी उसकी अध्यक्षता के लिए ।’’&lt;br /&gt;‘‘और मुझे सूचित नहीं किया !’’&lt;br /&gt;मित्र चुप रहे । शायद मुझे सूचित न करने का उन्हें खेद हो रहा था ।&lt;br /&gt;‘‘मैं मिलना चाहता था ।’’ मैंने शिथिल स्वर में कहा ।&lt;br /&gt;‘‘इसमें मुश्किल क्या है ! कभी भी उनके घर-दफ्तर में जाकर मिल लो । बहुत ही आत्मीय व्यक्ति हैं । मैं दो बार उनसे उनके घर मिला हूं .....।’’&lt;br /&gt;मित्र से नन्दन जी के घर का फोन नम्बर और पता लेने के बाद भी महीनों बीत गए । मैं नन्दन जी से मिलने जाने के विषय में सोचता ही रहा ।&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;अंततः अप्रैल 1979 के प्रथम सप्ताह मैंने एक दिन आर्डनैंस फैक्ट्री के टेलीफोन एक्सचैंज से नन्दन जी को फोन किया । अपना परिचय दिया और मिलने की इच्छा प्रकट की ।&lt;br /&gt;‘‘किसी भी रविवार आ जाओ ।’’ धीर-गंभीर आवाज कानों से टकराई ।&lt;br /&gt;‘‘इसी रविवार दस बजे तक मैं आपके यहां पहुंच जाऊंगा ।’’ मैंने कहा ।&lt;br /&gt;‘‘ठीक है ....आइए ।’’&lt;br /&gt;नन्दन जी उन दिनों जंगपुरा (शायद एच ब्लाक) में रहते थे । मैं ठीक समय पर उनके यहां पहुंचा । पायजामा पर सिल्क के क्रीम कलर कुर्ते पर उनका व्यक्तित्व भव्य और आकर्षक था । सब कुछ बहुत ही साफ-सुथरा ....आभिजात्य । नन्दन जी सोफे पर मेरे बगल में बैठे और भाभी जी हमारे सामने । हम चार धण्टों तक अबाध बातें करते रहे । तब तक किसी बड़े साहित्यकार-पत्रकार से मेरी पहली ही मुलाकात इतने लंबे समय तक नहीं हुई थी । गांव से लेकर शिक्षा , प्राध्यापकी, पत्रकारिता, साहित्य आदि पर नन्दन जी अपने विषय में बताते रहे । शायद ही कोई विषय ऐसा था जिस पर हमने चर्चा न की थी । जब उन्होंने बताया कि उन्होंने ‘भास्करानंद इण्टर कालेज नरवल’ से हाईस्कूल किया था तब मेरी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा था । मैंने उन्हें बताया कि मैंने भी उसी कालेज से हाईस्कूल किया था ।&lt;br /&gt;बीच-बीच में नन्दन जी फोन सुनने के लिए उठ जाते, लेकिन उसके बाद फिर उसी स्थान पर आ बैठते । बीच में एक बार लगभग आध घण्टा के लिए वह चले गए तब भाभी जी से मैं बातें करता रहा, जिन्हें दिल्ली रास नहीं आ रहा था । वह मुम्बई की प्रशंसा कर रही थीं, जहां लड़कियां दिल्ली की अपेक्षा अधिक सुरक्षित अनुभव करती थीं ।&lt;br /&gt;उस दिन की उस लंबी मुलाकात की स्मृतियां आज भी अक्ष्क्षुण हैं ।&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;यह वह दौर था जब मैं कविता में असफल होने के बाद कहानी पर ध्यान केन्द्रित कर रहा था । मेरी पहली कहानी मार्क्सवादी अखबार ‘जनयुग’ ने प्रकाशित की, और लिखने और प्रकाशित होने का सिलसिला शुरू हो गया था । एक कहानी ‘सारिका’ को भेजी और कई महीनों की प्रतीक्षा के बाद सारिका कार्यालय जाने का निर्णय किया । तब तक मैं दिल्ली शिफ्ट हो चुका था ।&lt;br /&gt;मिलने के लिए चपरासी से नन्दन जी के पास चिट भेजवाई । तब सारिका के सम्पादकीय विभाग के किसी व्यक्ति से मेरा परिचय नहीं था , इसलिए चपरासी के बगल की कुर्सी पर बैठकर प्रतीक्षा करने लगा । दस मिनट की प्रतीक्षा के बाद नन्दन जी ने मुझे बुलाया । कंधे पर लटकते थैले को गोद पर रख मैं उनके सामने किसी मगही देहाती की भांति बैठ गया ।&lt;br /&gt;‘‘कहें ?’’ फाइलों पर कुछ पढ़ते हुए नन्दन जी ने पूछा ।&lt;br /&gt;‘‘यूं ही दर्शन करने आ गया । ’’ मेरी हर बात पर देहातीपन प्रकट हो रहा था , जिसे नन्दन जी ने कब का अलविदा कह दिया था .... शायद गांव से निकलते ही ।&lt;br /&gt;‘‘हुंह ।’’ उस दिन मेरे सामने बैठे नन्दन जी घर वाले नन्दन जी न थे । हर बात का बहुत ही संक्षिप्त उत्तर ....और कभी-कभी वह भी नहीं । लगभग पूरे समय फाइल में चेहरा गड़ाए वह कुछ पढ़ते-लिखते रहे । मेरे लिए चाय मंगवा दी और ,‘‘ मैंने अभी-अभी पी है ’’ मुस्कराते हुए उन्होंने कहा, ‘‘आप पियें ...तब तक मैं कुछ काम कर लूं ।’’ वह फाइल में खो गए थे ।&lt;br /&gt;इसी दौरान अवधनारायण मुद्गल वहां आए । नन्दन जी से उन्होंने कुछ डिस्कस किया और उल्टे पांव लौट गए । नन्दन जी के संबोधन से ही मैंने जाना था कि वह मुद्गल जी थे ।&lt;br /&gt;मैंने उठने से पहले अपनी कहानी की चर्चा की ।&lt;br /&gt;‘‘देखूंगा....।’’ फिर चुप्पी ।&lt;br /&gt;‘अब मुझे उठ जाना चाहिए ।’ मैंने सोचा और ‘‘अच्छा भाई साहब ।’’ खड़े हो मैंने हाथ जोड़ दिए ।&lt;br /&gt;नन्दन जी ने चेहरा उठा चश्मे के पीछे से एक नजर मुझ पर डाली, मुस्कराए, ‘‘ओ.के. डियर ।’’&lt;br /&gt;सारिका को भेजी कहानी पन्द्रह दिनों बाद लौट आयी और उसके बाद मैंने वहां कहानी न भेजने का निर्णय किया । इसका एक ही कारण था कि मैं दोबारा कभी किसी कहानी के विषय में नन्दन जी से पूछने से बचना चाहता था और वहां हालात यह थे कि परिचितों की रचनाएं देते ही प्रकाशित हो जाती थीं, जबकि कितने ही लेखकों को उनकी रचनाओं पर वर्षों बाद निर्णय प्राप्त होते थे । एक बार रचनाओं के ढेर में वे दबतीं तो किसे होश कि उसे खंगाले । नन्दन जी तक रचना पहुंचती भी न थी ।&lt;br /&gt;और नन्दन जी के कार्यकाल में मैंने कोई कहानी सारिका में नहीं भेजी । सारिका में जो एक मात्र मेरी कहानी प्रकाशित हुई वह ‘पापी’ थी, जिसे मुद्गल जी ने उपन्यासिका के रूप में मई,1990 में प्रकाशित किया और इस कहानी की भी एक रोचक कहानी है, जो कभी बाद में लिखी जाएगी ।&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;फरवरी 1983 या 1984 की बात है । कानपुर की संस्था ‘बाल कल्याण संस्थान’ ने उस वर्ष बालसाहित्य पुरस्कार का निर्णायक नन्दन पत्रिका के सम्पादक जयप्रकाश भारती को बनाया था। 1982 से उन्होंने मुझे संस्थान का संयोजक बना रखा था । प्रधानमंत्री इंदिरा जी के निवास में 19.11.1982 को अपने संयोजन में मैं संस्थान का एक सफल आयोजन कर चुका था और केवल उसी कार्यक्रम का संयोजक था , लेकिन संस्थान दिल्ली से जुड़े मामलों का कार्यभार ‘‘मैं संस्था का संयोजक हूं...इसे संभालूं’’ कहकर मुझे सौंप देता ।&lt;br /&gt;उस अवसर पर भी दिल्ली के साहित्यकारों से संपर्क करना, एकाध के लिए रेल टिकट खरीदना आदि कार्य मुझे करने पड़े । जयप्रकाश भारती ने पुरस्कार के लिए जिन लोगों को चुना वे उनके निकटतम व्यक्ति थे, लेकिन सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह कि संस्थान के बड़े पुरस्कार के लिए उन्होंने हिन्दुस्तान टाइम्स समूह में कार्यरत अपनी परिचिता महिला पत्रकार का चयन किया । यह पुरस्कार बहुत विवादित रहा था । उस महिला और भारती जी को लेकर अनेक प्रकार की कुचर्चां थी (आज दोंनो ही जीवित नहीं इसलिए उसपर बस इतनी ही ), लेकिन जिस बात के लिए मैंने इस प्रसंग की चर्चा की वह नन्दन जी से जुड़ी हुई है ।&lt;br /&gt;कार्यक्रम कानपुर के चैम्बर आफ कामर्स में था । नन्दन जी कालका मेल से ठीक समय पर वहां पहुंचे । अध्यक्षता की और जब वह अध्यक्षीय भाषण दे रहे थे तब उन्होंने कहा ,‘‘ मैं जयप्रकाष भारती जी को संस्थान द्वारा उनकी पत्नी को पुरस्कृत किए जाने के लिए बधाई देता हूं ।’’&lt;br /&gt;भारती जी और उनके द्वारा चयनित पत्रकार-बालसाहित्यकार मंच पर ही थे । मैं भी मंच पर नन्दन जी के बगल में बैठा था । नन्दन जी के यह कहते ही भारती जी का चेहरा फक पड़ गया और उस पत्रकार , जो अपनी संगमरमरी शरीर और सौन्दर्य के लिए आकर्षण का केन्द्र थीं, ने नन्दन जी की ओर फुसफुसाते हुए कहा , ‘‘आपने यह क्या कहा ?’’&lt;br /&gt;भारती जी भी कुछ बुदबुदाए थे, जो किसी ने नहीं सुना था, क्योंकि दर्शक-श्रोता तो नहीं, लेकिन उपस्थित साहित्यकारों के ठहाकों में उनकी आवाज दब गई थी ।&lt;br /&gt;नन्दन जी प्रत्युत्पन्नमति व्यक्ति थे । तुरंत बोले, ‘‘मेरा आभिप्राय भारती जी की पत्नी स्नेहलता अग्रवाल जी से है ... जिन्हें कुछ दिन पहले एक संस्थान ने ...’’ कुछ रुककर बोले, ‘‘ एन.सी.आर.टी. ने बालसाहित्य के लिए पुरस्कृत किया है ।’’ (नन्दन जी उस पुरस्कार के निर्णायक मंडल में रहे थे ) ।&lt;br /&gt;बात आई गई हो गई । लेकिन इसने सिद्ध कर दिया कि नन्दन जी की नजर हर ओर हरेक की गतिविधि पर रहती थी .... सही मायने में वह पत्रकार थे और एक प्रखर पत्रकार थे । इसी भरोसे टापम्स समूह ने उन्हें सारिका के बाद पराग और फिर दिनमान का कार्यभार सौंपा था । अपने समय के वह एक मात्र ऐसे पत्रकार थे जो एक साथ तीन महत्वपूर्ण पत्रिकाएं देख रहे थे ।&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;उसके बाद साहित्यिक कार्यक्रमों में प्रायः नन्दन जी से मुलाकात होने लगी थी ।&lt;br /&gt;‘‘कैसे हो रूपसिंह ? ’’ मेरे कंधे पर हाथ रख वह पूछते और , ‘‘ठीक हूं भाई साहब ।’’ मैं कहता ।&lt;br /&gt;मेरा मानना है कि पत्रकारिता की दुनिया विचित्र और बेरहम होती है । कब कौन शीर्ष पर होगा और कौन जमीन पर कहना कठिन है । नन्दन जी के साथ भी ऐसा ही हुआ । एक साथ तीन महत्वपूर्ण पत्रिकाओं के सम्पादक और बड़े हालनुमा भव्य कमरे में बैठने वाले नन्दन जी को एक दिन नवभारत टाइम्स के ‘रविवासरीय’ का प्रभारी बनाकर (जो एक सहायक सम्पादक का कार्य होता है ) 10, दरियगंज से टाइम्स बिल्डिगं में एक केबिन में बैठा दिया गया । निश्चित ही उनके लिए यह विषपान जैसी स्थिति रही होगी , लेकिन उन्होंने उस विष को अपने चेहरे पर शाश्वत मुस्कान बरकरार रखते हुए पी लिया । कई महीने वह उस पद पर रहे । सारिका से बलराम और रमेश बतरा भी उनके साथ गए थे । तब तक इन दोनों से मेरी अच्छी मित्रता हो चुकी थी ।&lt;br /&gt;1988 की बात है । सचिन प्रकाशन के लिए मैंने ‘बाल कहानी कोश’ सम्पादित किया , जिसके लिए दो सौ कहानियां मैंने एकत्र की थीं । नन्दन जी से कहानी मांगने के लिए मैं टाइम्स कार्यालय गया । बलराम ने नन्दन जी से कहा , ‘‘रूपसिंह मिलना चाहते हैं ।’’&lt;br /&gt;‘‘पिछले वर्ष मैंने तुम्हारे एक दोस्त के लिए सिफारिश की थी...अब ये भी....।’’ नन्दन जी को भ्रम हुआ था ।&lt;br /&gt;बलराम ने कहा , ‘‘नहीं, चन्देल किसी और काम से आए हैं ।’’&lt;br /&gt;बहर आकर बलराम ने मुझे यह बात बताई और हंसने लगे । दरअसल नन्दन जी उन दिनों हिन्दी अकादमी दिल्ली के सदस्य थे और शायद पुरस्कार चयन समिति में थे । बलराम के जिस मित्र की सिफारिश की बात उन्होंने की थी, वह मेरे भी मित्र थे । खैर, मैं नन्दन जी से मिला । एक बार पुनः आत्मीय मुलाकात । उन्होंने ड्राअर से निकालकर अपनी बाल कहानी ‘आगरा में अकबर’ मेरी ओर बढ़ा दी ।&lt;br /&gt;दुर्भाग्य कि वह ‘बाल कहानी कोश’ आज तक प्रकाशित नहीं हुआ , क्योंकि दिवालिया हो जाने के कारण सचिन प्रकाशन बन्द हो गया था और पाण्डुलिपि की कोई प्रति मैंने अपने पास नहीं रखी थी ।&lt;br /&gt;इस घटना के कुछ समय बाद ही नन्दन जी सण्डे मेल के सम्पादक होकर चले गए । उन्होंने उसे स्थापित किया । उनके साथ टाइम्स समूह के अनेक पत्रकार भी गए थे । 1991 में मेरे द्वारा सम्पादित लघुकथा संकलन ‘प्रकारान्तर’ किताबघर से प्रकाशित हुआ । हिन्दी में तब तक जितने भी लघुकथा संग्रह या संकलन प्रकाशित हुए थे, सामग्री और साज-सज्जा की दृष्टि से वह अत्यंत आकर्षक था । यह संकलन मैंने तीन लोंगो - कन्हैयालाल नन्दन, हिमांशु जोशी, और विजय किशोर मानव को समर्पित किया था।&lt;br /&gt;नन्दन जी की प्रति देने मैं सण्डे मेल कार्यालय गया । नन्दन जी प्रसन्न, लेकिन उस दिन भी वह मुझे उतना ही व्यस्त दिखे, जितना सारिका में मेरी मुलाकात के समय दिखे थे । यह सच है कि वह समय के साथ चलने वाले व्यक्ति थे .... अतीत को लात मार भविष्य की सोचते और वर्तमान को जीते ....और भरपूर जीते।&lt;br /&gt;सण्डेमेल की उस मुलाकात के बाद गाहे-बगाहे ही उनसे मिलना हुआ । मुलाकात भले ही कम होने लगी थी , लेकिन कभी-कभार फोन पर बात हो जाती । बात उन दिनों की है जब वह गगनांचल पत्रिका देख रहे थे । मेरे एक मित्र उनके लिए कुछ काम कर रहे थे । उन दिनों मैंने (शायद सन् 2000 में) कमलेश्वर जी का चालीस पृष्ठों का लंबा साक्षात्कार किया था । उसका लंबा अंश मेरे मित्र ने गगनाचंल के लिए ले लिया । ले तो लिया, लेकिन अंश का बड़ा होना उनके लिए समस्या था । ‘‘मैं नन्दन जी से बात कर लेता हूं ’’ मैंने मित्र को सुझाव दिया । फोन पर मेरी बात सुनते ही नन्दन जी बोले , ‘‘रूपसिंह , पूरा अंश छपेगा ...... उसे दे दो । मैं कमलेश्वर के लिए कुछ भी कर सकता हूं ।’’&lt;br /&gt;6 जनवरी 2001 को कनाट प्लेस के मोहन सिंह प्लेस के इण्डियन काफी हाउस’ में विष्णु प्रभाकर की अध्यक्षता में कमलेश्वर जी का जन्म दिन मनाया गया । हिमांशु जोशी जी ने मुझे फोन किया । वहां बीस साहित्यकार -पत्रकार थे । नन्दन जी भी थे और बलराम भी । कार्यक्रम समाप्त होने के बाद नन्दन जी ने मेरे कंधे पर हाथ रख पूछा , ‘‘रूपसिंह, क्या हाल हैं ?’’&lt;br /&gt;‘‘ठीक हूं भाई साहब ।’’&lt;br /&gt;‘‘तुम्हे जब भी मेरी आवश्यकता हो याद करना ।’’ लंबी मुस्कान बिखेरते हुए वह बोले, ‘‘यह घोड़ा बूढ़ा बेशक हो गया है , लेकिन बेकार नहीं हुआ ...।’’ उन्होंने बलराम की ओर इशारा करते हुए आगे कहा , ‘‘उससे पूछो ।’’&lt;br /&gt;मैं बेहद संकुचित हो उठा था । कुछ कह नहीं पाया, केवल हाथ जोड़ दिए थे । नन्दन जी मेरे प्रति बेहद आत्मीय हो उठे थे और उनकी यह आत्मीयता निरंतर बढ़ती गई थी । शायद उन्हें इस बात का अहसास हो गया था कि कानपुर के नाम पर उनसे बहुत कुछ पा जाने वाले या पाने की आकांक्षा रखने वाले लोगों जैसा यह शख्श नहीं है । उनके प्रति इस शख्श का आदर निःस्वार्थ है । बीस-बाइस वर्षों के परिचय में इसने उनकी सक्षमता से कुछ पाने की चाहत नहीं की । और यह सब कहते हुए भी वह जानते थे कि यह व्यक्ति शायद ही कभी किसी बात के लिए उनसे कुछ कहेगा । वह सही थे । और यही कारण था कि उनका प्रेम मेरे प्रति बढ़ता गया था ।&lt;br /&gt;न्यूयार्क में होने वाले विश्व हिन्दी सम्मेलन की स्मारिका के सम्पादन का कार्य उन्हें करना था । एक पत्र मिला , जिसमें डा. ”शिवप्रसाद सिंह के उपन्यास ‘अलग-अलग वैतरिणी’ पर निश्चित तिथि तक आलेख मुझे लिख भेजने के लिए उन्होंने लिखा था । उन दिनों मैं लियो तोल्स्तोय के उपन्यास ‘हाजी मुराद’ के अनुवाद को अंतिम रूप दे रहा था । मेरे पास शिवप्रसाद जी के उपन्यास ‘नीला चांद’ पर अच्छा आलेख था । मैंने नन्दन जी को लिखा कि ‘अलग -अलग वैतरिणी’ के बजाय मैं ‘नीला चांद’ पर लिख भेजता हूं । उनका तुरंत पत्र आया ,‘‘ एक सप्ताह का अतिरित समय ले लो, लेकिन लिखो ‘अलग-अलग वैतरिणी’ पर ही ।’’ मुझे उनकी आज्ञा का पालन करना ही पड़ा था । बाद में एक दिन शाम सवा पांच बजे उनका फोन आया ।&lt;br /&gt;‘‘रूपसिंह कैसे हो ?’’&lt;br /&gt;‘‘आपका आशीर्वाद है भाई साहब ।’’&lt;br /&gt;कुछ इधर-उधर की बातें और अंत में ,‘‘आज तुम पर प्रेम उमड़ आया ...... तुम्हें प्रेम करने का मन हुआ ....।’’ और एक जबर्दस्त ठहाका ।&lt;br /&gt;मैं भी ठहाका लगा हंस पड़ा था ।&lt;br /&gt;‘‘अच्छा प्रसन्न रहो ।’’ आशीर्वचन ।&lt;br /&gt;और उनके पचहत्तरहवें जन्म दिन का निमंत्रण । इण्डिया इण्टरनेशनल सेण्टर में आयोजन था । लगा पूरी दिल्ली के साहित्यकार-पत्रकार उमड़ आए थे । नन्दन जी के कुछ मित्र बाहर से भी आए थे । उस दिन नन्दन जी बहुत ही बूढ़े दिखे थे । बीमारी ने उन्हें खोखला कर दिया था । डायलिसस पर रहना पड़ रहा था । 1933 में परसदेपुर (जिला - फतेहपुर (उत्तर प्रदेश ) में जन्मे इस प्रखर पत्रकार -साहित्यकार ने 25 सितम्बर , 2010 को नई दिल्ली के राकलैण्ड अस्पताल में तड़के तीन बजकर दस मिनट पर 77 वर्ष की आयु में इस संसार को अलविदा कह दिया ।&lt;br /&gt;अत्यंत सामान्य परिवार में जन्में नन्दन जी का जीवन बेहद उथल-पुथलपूर्ण रहा । प्रेमचंद से प्रेरित हो उन्होंने अंतर्जातीय विवाह किया , जिसके बारे में उन्होंने अपने एक आलेख में लिखा था । उनके जाने से पत्रकारिता और लेखन जगत को अपूरणीय क्षति हुई है ।&lt;br /&gt;****&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2880097249222214869-1044585249302316019?l=wwwrachanayatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/feeds/1044585249302316019/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2880097249222214869&amp;postID=1044585249302316019' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/1044585249302316019'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/1044585249302316019'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/2010/10/blog-post_05.html' title='यादों की लकीरें'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TKvsHcUZM2I/AAAAAAAAARM/90_2IyK9EB4/s72-c/cflowers0342.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2880097249222214869.post-5935406818332175830</id><published>2010-10-03T01:52:00.000-07:00</published><updated>2010-10-03T02:02:17.440-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्मरण'/><title type='text'>यादों की लकीरें</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TKhE9FMp7yI/AAAAAAAAARE/PxVZ_0v_lNc/s1600/butterfly6.jpg"&gt;&lt;img style="WIDTH: 111px; HEIGHT: 117px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5523740759127879458" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TKhE9FMp7yI/AAAAAAAAARE/PxVZ_0v_lNc/s200/butterfly6.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000099;"&gt;संस्मरण&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;चंदनिया बुइया उर्फ चांदनी देवी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;रूपसिंह चन्देल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;16 अगस्त ,1981 (रविवार) को उनसे मेरी अंतिम मुलाकात हुई थी । सुबह छः बजे का वक्त था । आसमान में हल्के बादल थे और रह-रहकर फुहारें पड़ रही थीं । उनसे मिलने के लिए मैं पांच मिनट पहले घर से निकल आया । वह दरवाजे के बाहर खड़ी थीं । मैंने आगे बढ़कर उनके चरणस्पर्श किए ।&lt;br /&gt;‘‘जा रहे हौ ? एकौ दिन न रुकेव ।’’&lt;br /&gt;‘‘कल दफ्तर है ।’’&lt;br /&gt;‘‘बिटेऊ जा रही हैं ?’’&lt;br /&gt;‘‘बहुत मुश्किल से दो महीने के लिए तैयार हुई हैं ।’’&lt;br /&gt;‘का बताई बबुआ .... बहुत समझावा पर सुनै का तैयार नहीं । ई उमिर मा आदमी का अपन बच्चन के पास रहा चाही .... कब तलक अकेली पड़ी रहिहैं, लेकिन ई कान ते सुनति हैं अउर दुसरे ते निकारि देति हैं ।’’&lt;br /&gt;मैं उनके घर के सामने गली के साथ खड़े नीम के पेड़ की ओर खिसकने लगा । वह भी मेरे साथ खिसकने लगीं । मैंने गौर से उन्हें देखा । बहुत बूढ़ी हो गयी थीं । चेहरे पर झुर्रियां छायी हुई थीं ।&lt;br /&gt;तभी मेरे घर के दरवाजे पर ताला बंद होने की आवाज आयी । उनके स्वर में हड़बड़ाहट थी । मैं तुरंत भांप गया कि वह मेरी मां का सामना करने से बचना चाहती थीं ....... मेरी मां यानी उनकी बेटी । वह मेरी नानी थीं ......अस्सी पार ।&lt;br /&gt;‘‘हम चली बबुआ ..... देखिहैं तो कहिहैं कि हम तुमका कुछ पट्टी पढ़ावत रही ।’’&lt;br /&gt;मैंने पुनः उनके चरणस्पर्श किए । आशीसती नानी घर की ओर लपक लीं थीं।&lt;br /&gt;घर में ताला बंद कर मां सामने के त्रिवेदी परिवार के किसी सदस्य से कह रही थीं , ‘‘का बताई , जबरदस्ती जांय का पडि़ रहा है ।’’&lt;br /&gt;उधर से सांत्वना में क्या कहा गया , सुन नहीं पाया । मैं नीम के पेड़ के पास खड़ा मां के आने के प्रतीक्षा कर रहा था और सोच रहा था , नानी और उनके स्वभाव के विषय में । नानी जितनी सीधी-सहज, सरल थीं, मां उतनी ही अक्खड़ । अड़ जाएं तो दुनिया की कोई ताकत उन्हें डिगा नहीं सकती थी । पूरी रात मैं उन्हें कुछ दिन अपने साथ चलकर दिल्ली रहने के लिए मनाता रहा था । नानी से भी कहा था कि वह भी समझाएं, लेकिन ‘‘हमरे कहैं ते वह जाती हुई भी न जइहैं बबुआ ।’’ नानी ने असमर्थता व्यक्त की थी , ‘‘तुम्हरे आवैं ते पहले कहा रही.......पर उनने कहा कि मैं तो चाहती ही हूं कि वह गांव मा न रहैं ।’’&lt;br /&gt;और इसीलिए नानी मां का सामना टालना चाहती थीं ।&lt;br /&gt;त्रिवेदी परिवार से मिलकर और ऐसा आभास देकर कि जिन्दा बचीं तो वह जल्दी ही दिल्ली को अलविदा कह आएगीं, मां भारी कदमों से आगे बढ़ रही थीं ।&lt;br /&gt;पुरवामीर बस अड्डे तक पूरे रास्ते वह बुड़बुड़ाती रहीं और इस गति से चलती रहीं मानो कसाईघर जाने वाली कोई गाय । मुझे कानपुर से आसाम मेल पकड़ने की जल्दी थी और जब भी इस विषय में उन्हें कहता वह चीख उठतीं , ‘‘ मैं तेज नहीं चल सकती । जल्दी है तो चले जाव ।’’&lt;br /&gt;उस दिन नानी मेरे दिमाग में यो अटकीं कि आसाम मेल में पूरे समय वह मेरे साथ रहीं और उसके बाद भी कितने ही ऐसे अवसर आए जब उनकी स्मृतियों ने मुझे अपने में समेटा और घण्टों उनकी याद में बीत गए ।&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;जब भी हम बच्चे नानी का नाम पूछते वह सकुचा जातीं । कितनी ही बार पूछने के बाद एक बार बोलीं, ‘‘चंदनिया बुइया ।’’ और हो होकर हंस पड़ी थीं । नाम ठीक समझ में नहीं आया । दोबारा पूछा । फिर वही..... तीसरी बार सही नाम सुना गया । ‘लेकिन यह कोई नाम न हुआ ।’ मै मन ही मन सोचता रहा । सोचता रहा ....... वर्षों .... उम्र गुजर गई और नानी भी गुजर गईं, लेकिन उनके नाम का सही उच्चारण मैं खोजता रहा । यह बात तभी ज्ञात हो गयी थी कि यमुना पार अर्थात् बांदा-हमीरपुर में बुइया का अर्थ देवी या बाई से था , जो वहां सभी लड़कियों के नाम के साथ जोड़ दिया जाता था ।&lt;br /&gt;अनुमान लगाया कि वह चांदनी देवी थीं । चांदनी देवी अर्थात मेरी नानी की मृत्यु 1982 में जब हुई तब वह लगभग नव्वे वर्ष की थीं । इस प्रकार उनका जन्म 1890-91 के आसपास कभी बांदा जिला (उत्तर प्रदेश) के एक गांव में हुआ था । तीन भाइयों की इकलौती बहन । सभी भाई लंबे छः फुटा , लेकिन बहन की कद-काठी सामान्य थी । गेहुआं रंग, गोल चेहरा, बड़ी आंखें ,हृष्ट-पुष्ट शरीर ..... होश संभालने के बाद मैंने उन्हें वैसा ही देखा था । जब मैंने होश संभाला , जाहिर है वह सत्तर के आस-पास थीं , लेकिन ऐसा नहीं लगता था कि वह बूढ़ी हो गयी थीं । उनके बूढ़े होने की प्रक्रिया बेटे (मेरे मामा) के दूसरे विवाह के बाद प्रारंभ हुई थी ।&lt;br /&gt;’’’’’&lt;br /&gt;चांदनी देवी की उम्र जब खेतों से ज्वार और बाजरे के भुट्टे चुन लाने की थी, तभी उनका विवाह मेरे नाना के साथ कर दिया गया । नाना, जिन्हें मैंने कभी नहीं देखा । मेरी मां या मेरे मामा (इन्द्रजीत सिंह गौतम) ने भी अपने पिता को नहीं जाना । मामा साढ़े तीन और मां जब ढाई वर्ष के थे किसी अनजान ज्वर से नाना की मृत्यु हो गयी थी । नानी तब पचीस -छब्बीस वर्ष की थीं ..... जवानी में वैधव्य । घर में तीन देवर और अकाल वर्ष । अकाल भी ऐसा कि बड़े-बड़े किसानों ने घुटने टेक दिए । घरों में चूहे दण्ड लगाते और खेतों में किसान जेठ की तपती दोपहर में जौ-चना के दाने खोजते । अकाल इतना भीषण था कि सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच गई । लोग भूखों मरने लगे । उस पर अंग्रेज सरकार और उसके जमींदारों का आतंक जीने से अधिक उन्हें मृत्यु वरण के लिए प्रेरित कर रहा था ।&lt;br /&gt;तीन वर्ष अकाल की भेंट चढ़े । नानी ने उन दिनों का एकाधिक बार वर्णन किया था । घर में दो मटके चना बचे हुए थे । रात घर के हर सदस्य के हिसाब से एक मुट्ठी चना भिगो दिए जाते । सुबह अंगौछे में भीगे चना बांध नाना के भाई खेतों में पत्थर हुई मिट्टी से जूझते । बड़े-बड़े ढेलों को तोड़ते और मन को आश्वस्त करते कि आसाढ़ में यदि वर्षा हुई तब वे अच्छी फसल उगा सकेगें । वर्षा तो नहीं हुई, लेकिन उनका सबसे छोटा भाई लू की चपेट में आकर प्राण गंवा बैठा । अब शेष बचे दो भाई , जिनमें मझले कंचन सिंह सन् 1967 तक जीवित रहे थे ।&lt;br /&gt;अकाल के दिनों एक दिन जमींदार का कारिन्दा सिपाहियों सहित नानी के घर आ धमका लगान वसूली के लिए । छूछे घर से क्या वसूली करता ? उसने बेइज्जत करने के लिए सिपाहियों को हुक्म दिया कि वे घर की ड्योंढ़ी उखाड़ लें । गांवों में आज भी ड्योढ़ी किसी भी घर की प्रतिष्ठा से जुड़ी होती है । सिपाही आगे बढ़े ही थे कि नानी दरवाजे की ओट हो आ खड़ी हुईं और दबंग आवाज में बोलीं , ‘‘ खबरदार, ड्योंढ़ी को हाथ मत लगाना ।’’&lt;br /&gt;सिपाही ठहर गए । कारिन्दा का चेहरा देखने लगे ।&lt;br /&gt;‘‘डर गए स्सालो .... आगे बढ़ो ....।’’&lt;br /&gt;‘‘बढ़ो आगे .... गर्दन पर गड़ासा पड़ेगा ।’’ नानी दुर्गा बनी दरवाजे की ओट खड़ी थीं ।&lt;br /&gt;कारिन्दा भी सहमा , ‘‘ठकुरानी, अकड़ से काम नहीं चलेगा । रोकड़ा गिन दो लगान का ....।’’&lt;br /&gt;‘‘बताव।’’&lt;br /&gt;कारिन्दा ने हिसाब बताया । नानी ने टेंट से चांदी के सिक्के निकाले और कारिन्दा की ओर फेककर कहा , ‘‘अब शकल न दिखाएव ।’’&lt;br /&gt;‘‘वाह ठकुरानी ।’’ बेसाख्ता कारिन्दा के मुंह से निकला था।&lt;br /&gt;नना के दोनों भाई नानी का चेहरा देखते रहे थे , लेकिन वे नानी का इतना सम्मान करते थे कि उनसे उलट यह नहीं पूछा कि ‘‘भौजाई, घर में फांके के हालात है और तुम चांदी के सिक्के छुपाए बैठी थी ।’’&lt;br /&gt;वे नहीं पूछ पाए लेकिन मैंने यह बात पूछी थी । नानी ने बताया कि ‘‘कारिन्दा दो साल से लगान वसूली के लिए नहीं आया था । उसे किसान के परेशान हाल होने का ही इंतजार होता था। मैंने कुछ रकम केवल इसीलिए बचा रखी थी । कम खाकर गुजर हो ही रहा था । लेकिन लगान न देने पर अगर वह खेतों से बेदखल कर देता तब क्या होता ..... भूखे रहकर भी खेत बचाना जरूरी था ।’’&lt;br /&gt;इस घटना के कुछ वर्षों में घर में पुनः सम्पन्नता आ बिराजी थी । लेकिन उस सम्पन्नता का उपभोग कंचन नाना के दूसरे भाई नहीं कर सके । कंचन नाना को अकला छोड़ वह भी एक दिन मृत्यु का शिकार हो गए थे ।&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;भरे-पूरे घर में अब बची थीं नानी, मामा और मां और शायद नानी की एक विधवा ननद। उन सबका बोझ कंचन नाना के कंधों पर था । कंचन नाना का रंग बिल्कुल कंचन जैसा .... साफ-सुथरा, चमकदार चेहरा । सूर्य की रोशनी में उनका चेहरा बिल्कुल सोने की भांति दहकता । कुल मिलाकर वह भव्य व्यक्तित्व के धनी थे ।&lt;br /&gt;कंचन नाना ने अपनी जिम्मदारी का निर्वहन सफलतापूर्वक किया । कुछ दिनों बाद अकाल पीडि़त नानी के तीनों भाई भी उनके यहां आ जमे थे । नाना के पास अच्छी खेती थी ...गांव में सबसे अधिक मातबर खेत । कई बाग और पड़ती पड़ी जमीन । वह पड़ती जमीन ही कंचन नाना ने बाद में मेरे पिता को दी थी ।&lt;br /&gt;नानी के सबसे बड़े भाई दुलार सिंह और छोटे गजराज सिंह को ही मैं जानता था । तीसरे और शायद मंझले भाई कुछ दिन रहकर अपने गांव वापस लौट गए थे और अपनी किसी खता के कारण कभी नाना के घर नहीं आए । जबकि दुलार सिंह और गजराज सिंह ने नाना के खेत संभाल लिए थे और अपने भांजा-भांजी की परवरिश में रुचि लेने लगे थे । दोनों ही अविवाहित थे और सारी जिन्दगी अविवाहित रहे थे । कंचन नाना भी अविवाहित रहे थे ।&lt;br /&gt;नानी के भाइयों के आने के बाद कंचन नाना ने खेती से अपने को मुक्त कर लिया था और गांव से पांच या छः मील दूर पाण्डुनदी के किनारे सिउली नामक गांव में जी.टी.रोड के किनारे शराब का ठेका ले लिया था । वर्षों वह उसे चलाते रहे । अच्छा धन कमाया और चार गांवों में सम्पन्न व्यक्तियों में शामिल हो गए । लेकिन तभी एक सुबह सोकर उठने पर उन्होंने पाया कि दुनिया देखने की उनकी क्षमता नष्ट हो चुकी थी । वह अंधे हो गए थे । लेकिन मेरी मां और मामा के विवाह तक वह बिल्कुल ठीक थे । यह घटना उसके कुछ दिनों बाद की थी ।&lt;br /&gt;कंचन नाना ने जिस समर्पण के साथ घर संभाला था और भौजाई और उनके बच्चों की देखभाल की थी , नाना के अंधे होने के बाद नानी ने कभी उन्हें कोई कष्ट नहीं होने दिया । वह उनके हर सुख -दुख का खयाल रखती थीं । अंधा होने के बाद नाना घर छोड़कर गांव के बाहर सड़क किनारे के बाग में आकर रहने लगे थे , जहां पहले से ही जानवर बंधते थे और दो कोठरियां बनी हुई थीं ।&lt;br /&gt;शादी के बाद मेरी मां कलकत्ता चली गईं और मामा की पहली पत्नी दो लड़कियों को जन्म देने के बाद जीवित नहीं रहीं । लंबे समय तक विधुर जीवन जीने के बाद मामा का पुनर्विवाह बांदा के ही किसी गांव में हुआ । मेरा अनुमान है कि मामा और इस दूसरी मामी में आयु का पन्द्रह से अघिक वर्षों का अंतर था । कुछ दिनों में ही मामा उस नवोढा की मुट्ठी में थे और नानी अधिकार-वंचिता ।&lt;br /&gt;और वहीं से प्रारंभ हुआ था नानी के दुर्दिनों का सिलसिला और हम उनके लिए कुछ भी कर सकने में अपने को असमर्थ पा रहे थे । दो कारण थे ..... पहला यह कि मामी गजब की लड़ाकू थी । उसे अपने डील-डौल पर घमण्ड था । दूसरा कारण था हमारे घर की विद्रूप आर्थिक स्थिति । पिता अवकाश पाकर घर आ गए थे और कुछ ही वर्षों में उनकी जमा-पूंजी खत्म हो चुकी थी । किस आधार पर एक और पेट हम पालते , जबकि मामा गांव के समृद्धतम व्यक्तियों में गिने जाते थे ।&lt;br /&gt;गहरे सांवले रंग की मामी , मोटी नाक, बड़ी आंखें और चेचकारू चेहरे वाली हृष्ट-पुष्ट शरीरा थी । नाक में जब मोटी छदाम जितनी लौंग पहनती और मटककर चलती तब धरती हिलती प्रतीत होती । कुछ वर्षों में ही उसने एक के बाद कई बच्चे पैदा किए ......शायद आठ-नौ । एक डेढ-दो साल का होता कि पता चलता दूसरा आने वाला है । पैदा करती हुई पालने के लिए वह उन्हें नानी के हवाले कर देती । बच्चा जनने से तीन महीना पहले से लेकर चार-पांच महीने बाद तक वह घर के काम छूती भी न थी । नारियल और मिश्री उसका प्रिय खाद्य था । आभूषणों की वह शौकीन थी और उसकी बाक्स का आकार उनके कारण बड़ा होता जा रहा था । घर का सम्पूर्ण स्वामित्व अपने अधीन रखने के बावजूद वह चोरी छुपे छत के रास्ते घर से सटे मुसलमानों के घरों की औरतों को आनाज बेचती और वह बेच अपने लिए दबाकर रखती । जब पचहत्तर की आयु में पूरे घर के बर्तन मांजते मैं नानी को देखता तब कलेजा मुंह को हो आता , और जब भी इस विषय में नानी से कहता कि हम उससे या मामा से बात करके किसी को बर्तन मांजने के लिए लगा लेने के लिए कह देते हैं तब नानी का चेहरा पीला पड़ जाता । लटपटी जुबान से वह कहतीं , ‘‘न बबुआ.... न कहौ । किस्मत मा जो लिखा है होंय देव ।’’&lt;br /&gt;किशोरावस्था से ही मैं अन्याय के विरोध में आवाज उठाने लगा था । मैं अपने को रोक नहीं पाया । एक दिन मामी के पास गया और बोला, ‘‘ मांई (मामी) शर्म करो , इतना बड़ा शरीर पलंग पर पसरा रखा है और इतनी बूढ़ी सास से खांची भर बर्तन मंजवा रही हो ।’’&lt;br /&gt;वह तमककर पलंग पर उठ बैठी और तमतमाती हुई नानी की ओर लपकी ,‘‘ये बूढ़ा.....तुम गांव भर मा हमारी बुराई करती घूमती हो ........ छोडि़ देव बर्तन ।’’ और उसने नानी को धकियाकर एक ओर करने का प्रयास किया और बर्तनों को पैर से दूर खिसका दिया । उसके धकियाने से नानी पीढ़े पर अपना संतुलन नहीं संभाल पायीं । एक ओर लुढ़क गयीं । आगे बढ़कर मैंने उन्हें संभाला ।&lt;br /&gt;नानी बुक्का फाड़कर रोने लगीं, ‘‘हाय बबुआ रूप, ई दिन द्याखैं का बदा रहै ।’’&lt;br /&gt;‘‘ज्यादा बुलकी न बहाव बूढ़ा, आज से ई बबुआ रूप ही तुम्हें खिलैहैं । यहां खाना-रहना है तो ई बर्तन धोवैं का ही पड़ी ।’’ पैर पटकती वह चली गई थी ।&lt;br /&gt;मैं किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रहा था - असहाय ! नानी के आंखों की ओर देखने का साहस मुझमें नहीं रहा था ।&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;(प्रकाश्य संस्मरण पुस्तक - ‘रोशनी की लकीरें’ (भाग दो ) में प्रकाश्य एक संस्मरण ।)&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2880097249222214869-5935406818332175830?l=wwwrachanayatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/feeds/5935406818332175830/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2880097249222214869&amp;postID=5935406818332175830' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/5935406818332175830'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/5935406818332175830'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='यादों की लकीरें'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TKhE9FMp7yI/AAAAAAAAARE/PxVZ_0v_lNc/s72-c/butterfly6.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2880097249222214869.post-5772431763411292083</id><published>2010-07-21T08:47:00.000-07:00</published><updated>2010-07-21T08:59:43.405-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यादों की लकीरें'/><title type='text'>यादों की लकीरें</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TEcW27598hI/AAAAAAAAAQ0/s29yjrhbIp4/s1600/cflowers5052.jpg"&gt;&lt;img style="WIDTH: 100px; HEIGHT: 91px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5496387003278553618" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TEcW27598hI/AAAAAAAAAQ0/s29yjrhbIp4/s200/cflowers5052.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रचना यात्रा में अब तक &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;’यादों की लकीरें’&lt;/span&gt; श्रंखला के अंतर्गत प्रकाशित अट्ठारह संस्मरण पुस्तकाकार रूप में इसी शीर्षक से भाग एक के रूप में &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;’भावना प्रकाशन’ , १०९ A , पटपड़गंज, दिल्ली-९२&lt;/span&gt; से शीघ्र ही प्रकाश्य हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#6600cc;"&gt;प्रस्तुत है इसी श्रंखला के दूसरे भाग का एक संस्मरण :&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;तांगेवाला&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;रूपसिंह चन्देल&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;2 जुलाई, 1984 - सोमवार का दिन । स्कूल खुल गए थे । उस दिन मैंने अवकाश लिया और सुबह बेटी को स्कूल छोड़ आया । आधा दिन यह सोचते हुए बीता कि उसके लिए टैक्सी , आटो की व्यवस्था करूं या बस की । टैक्सी-आटो की व्यवस्था अनुकूल थी, क्योंकि अनुरोध करने पर शायद वे उसे क्रेच के गेट पर छोड़ देते, लेकिन बस मुआफिक इसलिए न थी क्योंकि उसका निश्चित स्टैण्ड था और बच्चों को स्टैण्ड पर उतारकर बस आगे चली जाती हैं । यदि क्रेच की आया या मालकिन स्टैण्ड पर उपस्थित न रही तब तीन वर्ष की बेटी क्रेच तक कैसे जाएगी, यह सोचकर बस की व्यवस्था करने का विचार हमने त्याग दिया था । दरअसल इस उलझन से हम मई में स्कूल बंद होने के साथ ही जूझने लगे थे । अप्रैल से 15 मई तक का समय हमने किसी तरह काट लिया था, लेकिन अब समस्या मुंह बाये खड़ी थी । डेढ़ महीने तक जूझने के बाद भी हम किसी निर्ष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाए थे । बेटी जब पांच माह की थी, तभी से क्रेच जा रही थी । प्रारंभ में शक्तिनगर में रवीन्द्र मल्होत्रा द्वारा खोले गए क्रेच में , और एक साल बाद उसके बंद होने पर बैंग्लोरोड (जवाहरनगर) में चोपड़ा परिवार के यहां । चोपड़ा गोरे, मध्यम कद के हंसमुख स्वभाव व्यक्ति थे । आर.के. पुरम के एक कार्यालय में कार्य करते थे और आते-जाते प्रायः वह मेरे साथ होते, लेकिन वर्षों तक मुझे यह जानकारी नहीं हुई कि जिस क्रेच में मेरी बेटी जाती थी, उसे उनकी पत्नी और उनका अविवाहित छोटा भाई (जिसने कभी विवाह न करने की शपथ ले रखी थी) चलाते थे । यह तब ज्ञात हुआ जब बच्चों का क्रेच जाना बंद हो गया था ।&lt;br /&gt;उस दिन पत्नी आधे दिन के बाद घर आ गई । दिल्ली विश्वविद्यालय शक्तिनगर से मात्र तीन किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है । स्कूल की छुट्टी ढाई बजे होनी थी । स्कूल घर से बहुत ही निकट था - - - पैदल पन्द्रह मिनट के रास्ते पर - - रेलवे लाइन के उस पार । बहुत सोच-समझकर हमने उस स्कूल का चयन किया था । यह आर.आर.वी.एम. सीनियर सेकेण्डरी स्कूल के प्रबन्धन का एल.वी.एम. नामका उसी परिसर में दूसरा स्कूल था । आर.आर.वी.एम. दिल्ली के महत्वपूर्ण विद्यालयों में रहा था , लेकिन तब तक वह अपनी प्रतिष्ठा खो चुका था, जबकि एल.वी.एम. सीनियर सेकेण्डरी स्कूल अपनी प्रिन्सिपल की सुव्यवस्था और अनुशासनप्रियता के कारण उस क्षेत्र के महत्वपूर्ण विद्यालयों की पंक्ति में खड़ा था । मेरे मित्रों ने सेण्ट जेवियर्स या डी.पी.एस. के लिए प्रयत्न न करने के लिए मुझे झिड़का था, और मेरा विश्वास था कि उनमें भी बेटी को प्रवेश मिल जाता, लेकिन हमारी विवशता थी । विवशता थी हम दोनों का नौकरीपेशा होना और घर में किसी का भी न होना जो बेटी को बस स्टैण्ड से ले सकता ।&lt;br /&gt;हमें एक ऐसे विद्यालय की खोज थी जहां से सुविधाजनक प्रकार से बेटी क्रेच पहुंच जाती और आवश्यकता होने पर पत्नी, जो उन दिनों तक विश्वविद्यालय पुस्तकालय में तदर्थ मुलाजिम थी , स्कूल, क्रेच या घर पहुंच सकती जो अधिक से अधिक आध धण्टा के रास्ते पर थे ।&lt;br /&gt;उस दिन हम दोनों पौने दो बजे स्कूल पहुंच गए । बेटी को स्कूल छोड़ते समय मैंने यह ध्यान नहीं दिया था कि कुछ बच्चे तांगों पर भी आ रहे थे । जब हम पहुंचे कम से कम पांच तांगे घोड़े जुते खड़े हुए थे । हमने आपस में चर्चा की कि क्यों न माशा (बेटी का घर का नाम) के लिए किसी तांगे वाले से बात की जाए । यह अधिक सुरक्षित साधन था । इससे पहले दो टैक्सी वालों से हम बात कर चुके थे । वे उस रूट पर नहीं जाते थे ।&lt;br /&gt;हम एक युवा तांगावाले के पास पहुंचे । उसे अपनी समस्या बतायी । उसने सिर हिला दिया , ‘‘मैं उधर नहीं जाता ।’’&lt;br /&gt;हम निराशा में ऊभ-चूभ हो ही रहे थे कि हमने उसे अपनी ओर आते देखा । रूखे उलझे, कुछ भूरे बाल, पका सांवला रंग, छोटी आंखें , मोटी नाक, चेहरे पर स्पष्ट दिखते चेचक के दाग, गंदी कमीज और पायजामा में वह हमारे सामने था ।&lt;br /&gt;‘‘क्या बात है बाबू जी ?’’ पीले दांतों में मकुस्कराते हुए उसने पूछा ।&lt;br /&gt;हमने उसे अपनी समस्या बताई ।&lt;br /&gt;‘‘किस क्लास में पढ़ती है बिटिया ?’’&lt;br /&gt;‘‘एल.के.जी. में......... सवा तीन साल की है ।’’&lt;br /&gt;‘‘मैं छोड़ दिया करूंगा ।’’&lt;br /&gt;उसके उत्तर से हमारे मुर्झाए चेहरों पर चमक आ गई । सब तय हो गया । स्कूल छूटने पर पत्नी बेटी के साथ तांगे पर घर गयी ..... उसे घर दिखाने के लिए ।&lt;br /&gt;उसका नाम कमल था । अगले दिन सुबह निश्चित समय पर कमल घर आ गया । उस किराए के मकान की दूसरी मंजिल मेरे पास थी । कमल के घोड़े के सामने सड़क पर घर की ओर मुड़ते ही मैंने माशा को गोद उठाया , उसका बैग संभाला, अपना थैला कंधे से लटकाया और सीढि़यां उतर गया । उसे तांगे वाले को पकड़ा मैं बस पकड़ने के लिए दौड़ गया था । उस दिन दोपहर पत्नी पुनः स्कूल पहुंची थी और कमल को क्रेच दिखाने ले गयी थी। उस दिन के बाद कमल प्रतिदिन क्रेच के सामने तांगा खड़ाकर बेटी को गोद में उठा, कंधे से उसका बैग लटका पहली मंजिल पर क्रेच की आया या मालकिन को उसे देकर आने लगा था ।&lt;br /&gt;लेकिन हमारी समस्याओं का अंत वहीं नहीं हुआ । कुछ दिनों बाद पुस्तकालय प्रशासन ने पत्नी की ड्यूटी शिफ्ट में लगा दी । एक महीना सुबह और दूसरे महीना शाम . सुबह उसे आठ बजे पहुंचकर पुस्तकालय खुलवाना होता । तब वह चार बजे वहां से निकलती । कमल बेटी को क्रेच छोड़ता जहां से शाम साढ़े पांच बजे के लगभग क्रेच की आया रिक्शा से उसे घर छोड़ने आती । चोपड़ा के भाई ने क्रेच के बच्चों को लाने-छोड़ने के लिए स्कूलों की भांति एक रिक्शा रखा हुआ था । पत्नी की दूसरी शिफ्ट दोपहर बारह बजे से रात आठ बजे तक होती । उन दिनों वह डिपार्टमेण्ट आफ एजूकेशन की लाइब्रेरी में थी । उस कठिन घड़ी में क्रेच का रिक्शा शाम बेटी को लाइब्रेरी छोड़ता था । मैं दो बसें बदलकर लटकता-पटकता छः-साढ़े बजे तक पुस्तकालय पहुंचता और बेटी को लेकर घर आता । लेकिन अप्रैल 1985 में पत्नी के रेगुलर होने के बाद स्थितियों में कुछ परिवर्तन हुआ । उसे शिफ्ट की ड्यूटी से मुक्ति मिली । अब वह जनरल शिफ्ट में थी, जो दस बजे से साढ़े पांच बजे तक होती । तब तक बेटा भी क्रेच जाने लगा था , जिसे क्रेच का रिक्शा ले जाता और शाम दोनों बच्चों को छोड़ जाता । बेटा इतना छोटा था कि कभी-कभी आया को पत्नी के पहुंचने की प्रतीक्षा करनी होती । यह सिलसिला मार्च 1987 तक चला । मार्च ’87 में मेरी मां बहुत मनुहार के बाद मेरे पास आकर रहने को तैयार हो गयी थीं । लेकिन तीन महीने बाद ही उन्होंने गांव जाने का ऐसा तुमुल नाद छेड़ा कि हमें उन्हें भेजना पड़ा । एक बार पुनः बच्चे क्रेच के हवाले हुए थे।&lt;br /&gt;हम जब भी कमल को अपनी समस्या बताते वह मुस्कराकर कहता, ‘‘कोई नहीं बाबू जी ......बूढ़े लोगों का मन एक जगह नहीं रमता ......अम्मा को आप गांव जाने दो...... आप जहां कहेंगे..... मैं वहां बच्चों को छोड़ दिया करूंगा ।’’&lt;br /&gt;और सच ही कमल ने अपना कौल निभाया था । माता जी दो महीना बाद फिर चेहरे पर तनाव लिए आयीं । बच्चों के चेहरे खिल उठे । हमने भी राहत की सांस ली । मैं जानता था कि उनका वह आना दो-तीन माह से अधिक के लिए नहीं था । लेकिन हमने यह भी निर्णय कर लिया था कि बच्चों को भविष्य में क्रेच नहीं भेजेंगे । बेटा भी स्कूल जाने लगा था और उसे भी उसी स्कूल में प्रवेश मिल गया था । अब स्थितियां ये थीं कि जिन दिनों माता जी नहीं होतीं कमल बच्चों को एजूकेशन डिपार्टमेण्ट के गेट पर छोड़ता । उन्हें वहां पहुंचते हुए साढ़े तीन-चार बज जाते । वहां की कैण्टीन में वे कुछ खाते, लॉन में खेलते और शाम पांच बजे मां के साथ कभी बस से तो कभी रिक्शा से घर आते ।&lt;br /&gt;1990 के अंत में मेरी मां ने दिल्ली के आवागमन को पूर्ण विराम दे दिया । उनकी भी अपनी समस्या थी, उसे मैं समझता था । हम सभी के चले जाने के बाद घर में वह अकेली होतीं, जबकि गांव में एक वृहद समाज का वह अंग थीं । गांव के अपने अकेलेपन को वह अपने ढंग से एन्जॉय करतीं...... वहां कोई बंधन नहीं, जहां चाहा गयीं.......खेतों या बगीचे की ओर निकल गयीं या किसी के घर जा बैठीं । मेरा ननिहाल ही मेरा गांव है, इसलिए पूरा गांव ही उनका था ....... हर घर में उनकी पैठ-पूछ । ऐसी स्थिति में गांव के लिए उनकी तड़प समझ आती थी , जबकि दिल्ली में घर की दीवारें थीं या खुली छत से दिखते मकानों की मुंडेरें..... सड़क पर गुजरते लोग । न आस-न पास -पड़ोस । अपरान्ह बच्चों के आने तक शून्य में ताकती उनकी आंखें दुख जातीं होंगी ।&lt;br /&gt;दो-तीन महीना वे बमुश्किल काट पातीं और गांव जाने की जिद पकड़ लेतीं । वे कानपुर में बड़े भाई के पास भी न रुकतीं जिनका बड़ा घर और भरा-पूरा परिवार है ......मेरे यहां जैसा एकाकीपन वहां नहीं था । लेकिन उन्हें गांव ही पसंद था ।&lt;br /&gt;माता जी के स्थायी रूप से चले जाने के बाद हमने एक दिन कमल को घर बुलाया । वह एक रविवार का दिन था । वह दौड़ा आया ।&lt;br /&gt;‘‘कमल अब हम बच्चों को इधर-उधर नहीं दौड़ाना चाहते ..... क्या आप हमारी एक मदद कर सकते हैं ?’’&lt;br /&gt;‘‘हुकुम करें बाबू जी ।’’&lt;br /&gt;‘‘यदि हम अपने मुख्य दरवाजे के ताले की एक चाबी आपको दे दें तो आप उसे खोलकर बच्चों को अंदर छोड़ दिया करें और बाहर से फिर ताला बंद कर दिया करें ।’’&lt;br /&gt;‘‘कोई समस्या नहीं ।’’&lt;br /&gt;‘‘मैं मकान मालिक को भी बता दूंगा ।’’&lt;br /&gt;‘‘जैसी आपकी मर्जी ।’’&lt;br /&gt;और उसके बाद कमल वैसा ही करने लगा । बिटिया इतनी बड़ी हो गयी थी कि वह व्यवस्था संभाल सकती थी । कमल बेटे का बैग उठा दोनों को ऊपर छोड़ बाहर से ताला बंद कर देता ....और बेटी अंदर से कुण्डी लगा लेती । वह दरवाजा सीढि़यां समाप्त होने के बाद था, जिसके बंद हो जाने पर बच्चे घर में सुरक्षित थे । सीढि़यों पर आने वाले किसी भी व्यक्ति को पीछे सीमण्ट की जाली से देखा जा सकता था । यह सिलसिला लगभग चार वर्षों तक चला था ।&lt;br /&gt;1993 मार्च में जब बच्चों के अवकाश पर हम अशोक आन्द्रें और बीना आन्द्रे के साथ बंगलौर, मैसूर, ऊटी आदि स्थानों की यात्रा पर निकले तब उससे पहले मकान मालिक की अनुमति से घर की सुरक्षा को दृष्टिगत रखते हुए हमने सीढि़यों पर एक लोहे का ग्रिल का दरवाजा लगवाया था । अब हमारे हिस्से की सुरक्षा के लिए दो दरवाजे थे । कमल को उसके बाद कुछ सीढि़यां कम चढ़नी पड़ती थीं । वह लोहे के ग्रिल वाले दरवाजे का ताला खोलकर बच्चों को ऊपर छोड़ देता, जबकि पुराने दरवाजे की चाबी बेटी के पास होती । शायद सुरक्षा के उस कांसेप्ट के कारण ही मेरे अपने मकान में मेन गेट के बाद भी लोहे के दो दरवाजे हैं । वरिष्ठ कवि -कथाकार विष्णुचन्द्र शर्मा ने एक दिन कहा था कि मैंने अपने घर को किसी किले की भांति सुरक्षित कर रखा है ।&lt;br /&gt;1984 से 1994 तक कमल की सेवाएं मुझे मिलीं । इस दौरान उसने दो घोड़े बदले थे । हर घोड़े के बदलने के समय वह हमसे कछ अग्रिम राशि लेता, जिसे किश्तों में कटवा देता । कमल ने 1994 में फिर घोड़ा बदला और इस बार उसने घोड़ी खरीदी जो बेहद मरियल थी और इतना मंद गति चलती कि बच्चे दुखी हो जाते । एक-दो बार घोड़ी ने अपनी पूंछ से बेटी के चेहरे को झाड़ दिया था। एक बार वह आगे न बढ़ने की कसम खाकर बीच सड़क पर अड़कर खड़ी हो गयी थी । बच्चे अपने बैग लादकर पैदल घर आए थे और उसी शाम बेटे ने घोषणा कर दी थी कि वह कमल के तांगे में नहीं जाएगा .....पैदल जाएगा । पन्द्रह मिनट का रास्ता और तांगे में एक धण्टा ......नहीं....। बेटे के मना करने पर बेटी ने भी जाने से इंकार कर दिया था . दोनों अलग-अलग पैदल जाने लगे थे । कमल की दो सवारियां कम हो गयीं थीं जिससे मुझे दुख हुआ था।&lt;br /&gt;‘‘बाबू जी, बच्चे अब बड़े हो गए हैं .....।’’ मुस्कराकर कमल ने कहा था और जो कुछ नहीं कहा था उसने मुझे अंदर तक छील दिया था । उसकी बिगड़ती आर्थिक स्थिति के विषय में मैं प्रायः सोचता । कमल ने मेरे साथ जो सहयोग किया था उसे मैं कभी भुला नहीं पाया और न ही भुला पाउंगा।&lt;br /&gt;गाहे-बगाहे स्कूल की ओर से निकलते हुए मैं कमल को तांगे में अधलेटा सोते या दूसरे तांगावालों से गपशप हांकते देखता । नजरें मिलतीं और दुआ-सलाम हो जाती । दो-तीन वर्षों तक उसकी मरियल घोड़ी मुझे दिखती रही थी, लेकिन 1997 के बाद कमल मुझे वहां नहीं दिखा । एक दिन उसके एक साथी से पूछा तो वह बोला , ‘‘उसकी घोड़ी मर गयी थी बाबू जी....दूसरी नहीं खरीद सका । गांव चला गया ।’’&lt;br /&gt;गांव....उत्तर प्रदेश के सहारनपुर का कोई गांव........जिस मिट्टी में वह जन्मा था वहीं चला गया था । इस बेदिल दिल्ली में उसके लिए कुछ भी नहीं बचा था । एक दिन उसने बड़े गर्व से बताया था, ‘‘बाबू जी मेरे तांगे में स्कूल आने वाले कई बच्चे आज डाक्टर - इंजीनियर बन गए हैं और कुछ विदेश भी चले गए हैं ।’’&lt;br /&gt;सोचता हूं कि आज मेरे बच्चों को देखकर वह अवश्य कहता, ‘‘अरे, ये वही बच्चे हैं जो मेरी गोद में चढ़कर स्कूल-क्रेच जाते थे ........ अब ये बड़ी कंपनियों में नौकरी करने लगे हैं । इत्ते बड़े थे ...... अब कित्ते बड़े हो गए......।’’ और शायद उसकी आंखे उसी प्रकार खुशी से चमक उठतीं जैसा उन बच्चों के बारे में बताते हुए चमक उठी थीं ।&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2880097249222214869-5772431763411292083?l=wwwrachanayatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/feeds/5772431763411292083/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2880097249222214869&amp;postID=5772431763411292083' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/5772431763411292083'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/5772431763411292083'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='यादों की लकीरें'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TEcW27598hI/AAAAAAAAAQ0/s29yjrhbIp4/s72-c/cflowers5052.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2880097249222214869.post-6198236315137609241</id><published>2010-06-13T21:13:00.001-07:00</published><updated>2010-06-13T21:23:26.819-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्मरण'/><title type='text'>यादों की लकीरें</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TBWs62hqXOI/AAAAAAAAAQs/RqhuZa2mbFM/s1600/days+in+pics+5.bmp"&gt;&lt;img style="WIDTH: 113px; HEIGHT: 116px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5482478248462540002" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TBWs62hqXOI/AAAAAAAAAQs/RqhuZa2mbFM/s200/days+in+pics+5.bmp" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;संस्मरण&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;अपने साहित्यकार को देर से पहचाना डॉ0 रत्नलाल शर्मा ने&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#330099;"&gt;रूपसिंह चन्देल&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फरवरी की वह सुबह अधिक ठंडी न थी । हांलाकि दिल्ली में फरवरी के अंत तक ठंड अपनी जवानी में रहती है । वह सुबह पूरी तरह शांत और सुखद थी । यह 22 फरवरी, 1997 का दिन था । तय हुआ था कि हम दोनों में जो भी पहले जग जाएगा फोन करेगा । और यह बाजी मैंने जीती थी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''हलो'' कुछ देर तक फोन की घंटी बजने के बाद खनखनाती आवाज सुनाई दी, ''मैं तो साढ़े तीन बजे ही जग गया था। आपको फोन करने ही वाला था।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''कितने बजे निकल रहे हैं ?''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''आप साढ़े पांच तैयार मिले। डॉक्टर कालरा को लेकर मैं निश्चित समय पर पहुंच जाउंगा।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''आज्ञा का पालन करूंगा।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेज ठहाका, फिर सकुचाहट, ''मुझे इतनी जोर से नहीं हंसना चाहिए। पोता जग गया तो सौ प्रश्न करेगा।'' फुसफुसाहट, ''ठीक है डॉक्टर.... तो हम मिलते हैं।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और डॉक्टर रत्नलाल शर्मा सवा पांच बजे मेरे यहां पहुंच गए। मुझे डॉ0 कालरा के पति ने पांच बजे फोन कर दिया था कि वे लोग पीतमपुरा छोड़ चुके हैं। उतनी सुबह दिल्ली की सड़कें प्राय: खाली रहती हैं। वाहन की गति स्वत: दोगुनी हो जाती है। डॉ0 कालरा के पति का फोन मिलते ही मैंने विष्णु प्रभाकर जी को फोन कर दिया था कि हम लोग पौने छ: बजे तक उनके यहां पहुंच जाएगें। यह एक सुखद संयोग था कि उस दिन हम चारों ... विष्णु प्रभाकर, डॉ0 रत्नलाल शर्मा, डॉ0 शकुतंला कालरा और मैं .... लखनऊ-नई दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस से कानपुर जा रहे थे। अवसर था ''बाल कल्याण संस्थान'' द्वारा आयोजित वार्षिक समारोह जिसके लिए हमें डॉ0 राष्ट्रबंधु ने बहुत ही आदरपूर्वक आमंत्रित किया था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ0 कालरा को संस्थान उस वर्ष अन्य बाल-साहित्यकारों के साथ सम्मानित कर रहा था, जबकि हम तीनों को अलग-अलग सत्रों के अध्यक्ष-विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। मेरे लिए यह सम्माननीय बात थी, क्योंकि जिस आयोजन के एक सत्र की अध्यक्षता विष्णुप्रभाकर जैसे वरिष्ठतम साहित्यकार कर रहे थे और दूसरे की मेरे अग्रजतुल्य मित्र डॉ0 रत्नलाल शर्मा, वहां 'विचार सत्र' के विशिष्ट अतिथि के रूप में मुझे बुलाकर डॉ0 राष्ट्रबंधु ने अपने बड़प्पन का परिचय देते हए मुझे जो सम्मान दिया मैं शायद उसके सर्वथा योग्य नहीं था, क्योंकि हिन्दी में अनेक ऐसे विद्वान साहित्यकार हैं जिनके सामने मेरी बाल-साहित्य की रचनात्मकता पासंग है। खैर, डॉ0 राष्ट्रबंधु ने विष्णु जी को ले आने के लिए मुझे तो कहा ही था डॉ0 शर्मा को भी कह दिया था। डॉ0 शर्मा अति-उत्साही व्यक्ति थे और नौकरी से अवकाश ग्रहण करने के पश्चात वह बाल-साहित्य को लेकर कुछ अतिरिक्त ही उत्साह में रहने लगे थे। उनका यह उत्साह श्रीमती रतन शर्मा,उनकी पत्नी, की मृत्यु के पश्चात कई गुना बढ़ गया था और उसी का परिणाम था कि उन्होंने बाल-साहित्य के लिए कुछ करने के ध्येय से पत्नी के नाम एक ट्रस्ट बनाया और प्रति वर्ष एक पुरस्कार देने लगे। उनके मस्तिष्क में बाल-साहित्य के महत्व और विकास को लेकर अनेक योजनाएं रहतीं और वह कुछ न कुछ करते भी रहते। हालांकि उन्होंने जो ट्रस्ट बनाया था उसमें ऐसे लोगों को रखा जो बाल-साहित्य का 'क' 'ख' 'ग' भी नहीं जानते थे और इस विषय में मेरी अनेक बार उनसे चर्चा भी हुई, लेकिन उन गैर बाल-साहित्यकारों को लेकर उनके पास तर्क थे और उन तर्कों में दम भी था। एक दमदार तर्क तो यही था कि यदि एक भी बाल-साहित्यकार उन्होंने ट्रस्ट में रखा तो 'न्यास' साहित्यिक राजनीति से अछूता न रहेगा। किसी हद तक उनकी बात सही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'श्रीमती रतन शर्मा स्मृति न्यास' की स्थापना के पश्चात वह बाल-साहित्य के देशव्यापी आयोजनों में शिरकत करने लगे थे और जब भी मिलते उन आयोजनों के संस्मरण मुग्धभाव से सुनाते। आयोजानों में सम्मिलित होते रहने से डॉ0 शर्मा और डॉ0 राष्ट्रबंधु प्राय: एक दूसरे से मिलते रहते और उसी आधार पर डॉ0 शर्मा ने उन्हें आश्वस्त कर दिया कि वह सभी को लेकर कानपुर पहुंचेगें। आनन-फानन में उन्होंने विष्णु जी और डॉ0 कालरा के आरक्षण करवा डाले। मेरा जाना किन्हीं कारणों से टल रहा था, लेकिन एक दिन दिल्ली विश्वविद्यालय पुस्तकालय की छत पर चाय की चुस्कियों के साथ आदेशात्मक स्वर में वह बोले, ''डॉक्टर, कोई बहाना नहीं मानूंगा। शनिवार - रविवार को कार्यक्रम है .... आपको चलना है।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और मुझे आरक्षण करवाना पड़ा था। इसी कारण हम अलग-अलग कोचों में थे। फिर भी बीच-बीच में मैं तीनों के पास आ खड़ा होता। डॉ0 कालरा विष्णु जी के साथ की सीट में थीं और उस अवसर का लाभ उठाने के विचार से वह लगातार विष्णु जी से साक्षात्कारात्मक बातचीत में संलग्न थीं। ऐसे समय मैं और डॉ0 शर्मा बाथरूम के पास खड़े होकर बाल-साहित्य पर चर्चा करते रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिगरेट फूंकते बात करना डॉ0 शर्मा की आदत थी। जब भी कभी गंभीर चर्चा छिड़ती वह सिगरेट सुलगा लेते। लेकिन अनुशासन-प्रियता इतनी अधिक थी उनमें कि किसी भी सार्वजनिक स्थान में सिगरेट नहीं पीते थे। उनसे जब मेरा परिचय हुआ तब वह जीवन-विहार में 'समाज कल्याण विभाग' में कार्यरत थे और वहीं से उप-निदेशक के रूप में अवकाश ग्रहण किया था। अक्टूबर 1980 में मैं गाजियाबाद से शक्तिनगर में आ बसा था। उन दिनों केन्द्रीय सचिवालय के लिए शक्तिनगर से 240 नं0 रूट की बसें प्रत्येक दस मिनट में चलती थीं। मेरा कार्यालय उन दिनों रामकृष्णपुरम में था। मैं 240 से केन्द्रीय सचिवालय पहुंचकर वहां से रामकृष्णपुरम की बस लेता। डॉ0 शर्मा शक्तिनगर के पश्चिमी छोर में और मैं पूर्वी छोर में रहता था। वह भी उसी बस से जाते और पटेल चौक उतरते। कई वर्षों हमारा यह सिलसिला चला था। बाद में वह दूसरी बस से जाने लगे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन दिनों शनिवार को कॉफी हाउस (कनॉट प्लेस) में साहित्यकारों का जमघट होता था। नियम से जाने वालों में विष्णु प्रभाकर, रमाकांत, डॉ0 रत्नलाल शर्मा, डॉ0 हरदयाल, डॉ0 राजकुमार सैनी आदि थे। मैं भी कभी-कभार पहुंच जाता। तब कॉफी हाउस का माहौल खराब नहीं था। परनिन्दा तब भी होती, लेकिन साहित्य पर चर्चा भी होती और उसी माध्यम से एक दूसरे की खिंचाई भी होती। विष्णु जी निन्दा-प्रशंसा से विमुख मंद-मंद मुस्कराते हर स्थिति का आनंद लेते रहते। यदि वे बहस में शामिल भी होते तो बोलते धीमे ही थे, लेकिन शर्मा बहस को प्राय: उत्तेजक बना देते और जब उनके मित्र उन पर हावी होने लगते, वह अनियंन्त्रित हो जाते। लेकिन इसका आभिप्राय यह नहीं कि नौबत हाथापाई तक पहुंचती थी । डॉ0 शर्मा की यह खूबी थी कि उत्तेजित वह कितना ही क्यों न होते हों लेकिन किसी के विरुध्द अपशब्द का प्रयोग करते मैंने उन्हें कभी नहीं सुना। जब कि उनके अति अंतरंग मित्रों को कई बार उनके खिलाफ अपशब्द प्रयोग करते (पीठ पीछे) मैंने सुना था । डॉ0 शर्मा आपा तो खोते, क्योंकि वह अपनी बात पर अडिग रहते और प्राय: सही वही होते । लेकिन वह यह समझ नहीं पाते कि उनके मित्र उन्हें उत्तेजित करने के लिए ही ऐसा विनोद कर रहे थे। बाद में माहौल शांत होता और सभी फिर मीठी बातों में खो जात।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत बाद में (वर्ष याद नहीं...संभवत: 1990 के आसपास) किसी शनिवार को शायद किसी मित्र ने उनके विरुध्द कोई ऐसी टिप्पणी कर दी, जिससे उन्हें गहरा आघात लगा था। उन्होंने कभी-भी कॉफी हाउस न जाने का संकल्प किया और मृत्यु पर्यन्त उसका निर्वाह किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अवकाश ग्रहण कने के बाद वह प्रतिदिन दिल्ली विश्वविद्यालय के केन्द्रीय पुस्तकालय के 'रिसर्च फ्लोर' के एक कमरे में बैठने लगे थे। निश्चित कमरा और निश्चित सीट थी उनकी। वहां वह पहले भी (जब नौकरी में थे ) शनिवार - रविवार को जाते थे, लेकिन अवकाश ग्रहण के बाद वह वहां तभी अनुपस्थित रहे जब या तो अस्वस्थ रहे या शहर से बाहर या किसी अन्य आवश्यक कार्य में व्यस्त।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'रिसर्च फ्लोर' उनके कारण आबाद रहने लगा था। वहां के प्रत्येक शोधार्थी के वह आदरणीय -प्रिय थे और उम्र की सीमाओं को ताक पर रखकर कॉलेज से निकले युवा से लेकर हम उम्र लोगों से वह स्वयं 'हैलो' करके 'विश' करते और चाय के लिए आमंत्रित करते। मुझ जैसे व्यक्ति, जो स्वयं व्यवहार में उदारता का समर्थक है, को भी वह सब अटपटा लगता कि उम्रदराज डॉ0 शर्मा अपने से चालीस-बयालीस वर्ष छोटे बालक-बालिका से न केवल स्वयं विश कर रहे हैं बल्कि साग्रह चाय के लिए बुला रहे हैं। हालांकि मैं स्वयं इसी आदत का शिकार हूं और गवंई -गांव का होने के कारण आयु की सीमारेखा खींचकर चलना आता नहीं। एक - दो बार मैंने डॉ0 शर्मा को इस विषय में उनकी उम्र का वास्ता देते हुए टोका भी। उनका छोटा-सा उत्तर होता, ''आप नहीं समझेंगे डॉक्टर।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वास्तव में मैं नहीं समझ सका। वह भी अपने स्वभाव को बदल नहीं सके। एक विशेषता और भी देखी उनमें। वह हर जरूरतमंद की मदद के लिए तत्पर रहते थे। बेहतर सलाह देने का प्रयत्न करते। अनेक उदाहरण हैं जब वह किसी न किसी शोधार्थी के काम से दौड़ रहे होते थे। कई शोधार्थियों को उनसे अपने शोध से संबन्धित चर्चा करते या अपना शोध कार्य दिखाते मैंने देखा। वास्तविकता यह होती कि छात्र-छात्रा उनके किसी मित्र प्राध्यापक के अधीन शोधरत होता और डॉ0 शर्मा मित्रता का निर्वाह करते उसका कार्य देखते/गाइड करते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राय: विश्वविद्यालय पुस्तकालय में बाहरी व्यक्ति को एक निश्चित अवधि तक ही बैठने की अनुमति होती है, लेकिन हिन्दी विभाग से लेकर पुस्तकालय तक डॉ0 शर्मा के अनेक मित्र (कुछ उनके सहपाठी थे) थे। डॉ0 शर्मा ने भी कभी स्वप्न देखा था कि वह प्राध्यापक बनेंगे। पी-एच.डी. भी इसी कारण उन्होंने की थी, लेकिन जैसा कि होता है प्राध्यापक बनने के लिए जो गुण व्यक्ति में होने चाहिए वे डॉ0 शर्मा में नहीं थे। डॉ0 शर्मा प्राध्यापक नहीं बन पाए, लेकिन वह उस टीस को शायद कभी भूल भी नहीं पाए। अंदर छुपा वह स्वप्न ही रहा होगा कि कभी उनके अधीन भी शोधार्थी हुआ करेंगे। शायद शोधार्थियों की सहायता कर वह उस स्वप्न को ही पूरा कर रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक अच्छे इंसान होते हुए भी डॉ0 शर्मा में दो कमजारियां भी थीं। जब तब उनका लेखकीय स्वाभिमान जागृत हो जाता और वह सभा-गोष्ठियों का बहिष्कार कर दिया करते। डॉ0 विनय, डॉ0 महीप सिंह, डॉ0 रामदरस मिश्र, डॉ0 नरेन्द्र मोहन और डॉ0 हरदयाल उनके गहरे मित्रों में से थे। डॉ0 शर्मा प्राय: डॉ0 विनय के घर जाते। एक बार डॉ0 विनय ने अपने घर स्व0 डॉ0 सुखबीर के कविता संग्रह पर अपनी संस्था 'दीर्घा' (दीर्घा नाम की पत्रिका भी वह निकालते थे) की ओर से विचार गोष्ठी का आयोजन किया। अध्यक्ष थे डॉ0 रामदरस मिश्र। डॉ0 शर्मा ने आलेख लिखा था। आलेख पढ़ते समय डॉ0 शर्मा को टोका-टाकी बर्दाश्त न थी । उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ। उन्होंने सभी को घूरकर देखा और अपना शाश्वत तकियाकलाम, '' इट्स एनफ'' कह वह उठ गए। सभी भौंचक। आलेख तो शुरू ही हुआ था। डॉ0 विनय ने टोका, ''क्या हुआ पंडित ?''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''मैं जा रहा हूं ।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गर्मी के दिन थे। गोष्ठी छत पर हो रही थी। डॉ0 विनय ने रोका ... मिन्नते कीं। डॉ0 रामदरस मिश्र ने समझाने का प्रयास किया, लेकिन पंडित जी का मूड उखड़ा तो फिर जमा नहीं। वह जूते पहन सीढ़ियां उतर गए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डनके व्यक्तित्व का दूसरा कमजोर पक्ष था उनकी कार्य-शैली। एक अच्छे समीक्षक -आलोचक की प्रतिभा थी उनमें, लेकिन वह उसका सही उपयोग नहीं कर सके। स्नेहिल होते हुए भी स्वभाव की अक्खड़ता ने उन्हें रचनाकारों से दूर रखा तो कर्यशैली भी बाधक बनी। कुछ भी व्यवस्थित नहीं कर पाते थे। समय का खयाल नहीं रखते थे। आवश्यक और महत्वपूर्ण को छोड़ अनावश्यक कामों-बातों और लोगों में उलझे रहे। एक बार उन्होंने बताया था कि उन्होंने लगभग एक हजार पुस्तकों की समीक्षाएं लिखी थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी कार्यशैली से संबन्धित स्वानुभूत एक उदाहरण देना चाहता हूं। किताबघर, नई दिल्ली से मेरे द्वारा सम्पादित लघुकथा संकलन प्रकाश्य था। यह कार्य मैंने 1985 में पूरा कर लिया था, लेकिन उस वर्ष उसका प्रकाशन नहीं हो पाया। उन्हीं दिनों डॉ0 शर्मा से इस विषय में चर्चा हुई । उन्होंने पूछा, '' उसकी भूमिका आपने लिखी है ?'' ''जी ।'' ''अरे डॉक्टर, आपने पहले क्यों नहीं बताया.... आजकल मैं लघुकथाओं पर विशेष कार्य कर रहा हूं। उसकी बहुत अच्छी भूमिका लिखता।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'' अभी क्या बिगड़ गया है । आप लिख दें । आपकी भी प्रकाशित हो जाएगी ।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''आप सत्यव्रत शर्मा (प्रकाशक) को कह दीजिए .... मेरी भूमिका मिलने के बाद ही वह पुस्तक को प्रेस में देंगे।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने श्री सत्यव्रत शर्मा को यह कह दिया । फिर प्रारंभ हुआ उनकी भूमिका का इंतजार। पाण्डुलिपि की एक प्रति प्रकाशक के पास और दूसरी डॉ0 रत्नलाल शर्मा के पास और शर्मा जी के वायदे दर वायदे होने लगे। ....बस इसी सप्ताह .....पन्द्रह दिन बाद....। इसी बीच उन्होंने शक्तिनगर से प्रशांत विहार शिफ्ट कर लिया। प्रकाशक को भी शर्मा जी की भूमिका न मिलने का बहाना मिल गया। 'प्रकारांतर' (लघुकथा संकलन) का प्रकाशन स्थगित होता रहा। अंतत: बहुत जोर देने पर डॉ0 शर्मा बोले, ''शिफ्ट करते समय पांडुलिपि बांधकर कहीं रख दी गई। मिल नहीं रही । रविवार को घर आ जाओ.....मिलकर खोजते हैं। मैं गया। बराम्दे में बने दोछत्ती में बोरियों में बंद पुस्तकों के साथ पांडुलिपि को हमलोगों ने खोज लिया। उसके पन्द्रह दिनों के अंदर उन्होंने छोटी-सी भूमिका लिख दी थी। उसे लिखने में उन्होंने तीन वर्षों का समय लिया था। पुस्तक 1990 में प्रकाशित हुई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रत्नलाल शर्मा के साथ एक और कमजारी थी ... वह एक विधा से दूसरी की ओर दौड़ते रहे थे। कहानी, ललित निबंध, व्यंग्य, रेखाचित्र, समीक्षा, बाल-साहित्य..... आभिप्राय यह कि यदि वह अपने को एक-दो विधाओं में साध लेते तो शायद स्थिति खराब न होती। लेखक को स्वयं अपने को पहचानना होता है .... वह क्या लिख सकता है। जीवन भर इधर-उधर भागने के बाद अवकाश ग्रहण करने के पश्चात शायद उन्हें वास्तविकता का ज्ञान हुआ और उन्होंने अपने को 'बाल साहित्य' में केन्द्रित करना प्रारंभ किया। यदि वह कुछ वर्ष और जीवित रह जाते तो तन-मन-धन से बाल साहितय के लिए समर्पित हो जाने वाले व्यक्ति के रूप में अपनी अलग पहचान बना लेते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;24 फरवरी, 1997 को जब हम लोग कानपुर से शताब्दी एक्सप्रेस से लौट रहे थे तब मुझे डॉ0 शर्मा के बालमन का परिचय भी मिला । और लगा कि उन्होंने व्यर्थ ही विभिन्न विधाओं में अपना श्रम जाया किया, उन्हें बाल साहित्यकार ही होना चाहिए था। मन को संतोष हुआ कि विलंब से ही सही उन्होंने आखिर अपने साहित्यकार को पहचान लिया है ..... बाल-साहित्य के लिए यह शुभ होगा । लेकिन प्रकृति को यह स्वीकार न था। उनकी असमय मृत्यु ने एक स्नेहिल व्यक्ति हमसे छीन लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं प्राय: हफ्ते-दो हफ्ते में डॉ0 शर्मा से मिलने विश्वविद्यालय पुस्तकालय जाता था, लेकिन उनकी मृत्यु के पश्चात लंबे समय तक नहीं गया । बहुत बाद में अपने मित्र प्रखर दलित आलोचक और 'अपेक्षा' त्रैमासिक पत्रिका के सम्पादक डॉ0 तेज सिंह से मिलने वहां जाने लगा , जो विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग में रीडर हैं। डॉ0 तेज सिंह से डॉ0 शर्मा ने ही परिचय करवाया था। वहां की सीढ़ियां चढ़ते हुए डॉ0 शर्मा की याद आती। मन करता कि उस कमरे में झांकर देखूं जहां वह बैठते थे। शायद वह बैठे काम कर रहे हों और मुझे देखते ही बोलें, '' हैलो डॉक्टर'' ,लेकिन यह सच नहीं था । सच डॉ0 शर्मा के साथ जा चुका था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2880097249222214869-6198236315137609241?l=wwwrachanayatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/feeds/6198236315137609241/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2880097249222214869&amp;postID=6198236315137609241' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/6198236315137609241'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/6198236315137609241'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/2010/06/blog-post_13.html' title='यादों की लकीरें'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TBWs62hqXOI/AAAAAAAAAQs/RqhuZa2mbFM/s72-c/days+in+pics+5.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2880097249222214869.post-7375562528084456049</id><published>2010-06-06T23:29:00.000-07:00</published><updated>2010-06-06T23:41:02.074-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्मरण'/><title type='text'>यादों की लकीरें</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TAySRrf4AII/AAAAAAAAAQU/ovNccRoRhFE/s1600/b%27ful+pic+3.jpg"&gt;&lt;img style="WIDTH: 114px; HEIGHT: 116px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5479915679034900610" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TAySRrf4AII/AAAAAAAAAQU/ovNccRoRhFE/s200/b%27ful+pic+3.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc6600;"&gt;संस्मरण&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;सपनों में पिता&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#330099;"&gt;रूपसिंह चन्देल&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों पिता एक बार फिर आए । इस बार वह वर्षों बाद ......शायद छ:-सात वर्ष बाद । हर बार की भांति वह मेरे साथ बैठे , बातें की, कुछ समझाया , साथ लेकर कहीं गए .... एक अपरिचित स्थान , जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था । एक समय था जब वह महीना-दो महीना में आते , कुछ देर ही ठहरते , कुछ कहते.... जो मुझे कभी याद नहीं रहता था । वह जब भी आते उनकी वेश-भूषा निपट गंवई होती....अर्थात् मोटे सूत की कानपुर के किसी मिल की बनी लुंगी और बण्डी । कलकत्ता से रेलवे की नौकरी से सेवानिवृत्त होने के पश्चात् उन्होंने बेहद साधारण कपड़े अपना लिए थे.......किसानों वाले । लुंगी, पुरुषों की धोती का आधा, सफेद-बदरंग होती । लेकिन इस बार वह गांव की अपनी प्रिय वेशभूषा में नहीं , कलकत्ता की प्रिय वेशभूषा....मंहगी सफेद बुर्राक धोती और सफेद लक-दक कुर्ता में थे । हाथ में भद्र बंगालियों की पहचान वाला छाता , पैरों में अच्छी चप्पलें और चेहरे पर खिली मुस्कान ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले वह जब आते जाने से पहले भोजन की मांग करते ... अपनी पसंद लौकी या तोराई की सब्जी और चपाती । मैं जब भोजन की व्यवस्था में व्यस्त होता , वह कब खिसक जाते पता नहीं चलता । उनकी यही बात मुझे बाद में याद रहती .... शेष सब भूल जाता । घर वाले दुखी होते कि पिता उनके सपनों में क्यों नहीं आते !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता जी की मृत्यु (20 सितम्बर,1970) के इक्कीस वर्ष पांच दिन (25 सितम्बर,1991) बाद मां की मृत्यु हुई और उन्हें अफसोस था कि इस पूरी अवधि में वह दो बार ही उनके सपनों में आए थे । और किसी के सपने में वह शायद ही कभी आए । मेरे सपनों में आने के लिए सभी के पास अपने तर्क थे । कुछ के अनुसार उनकी बीमारी में सबसे अधिक सेवा मैंने की थी , और उनकी मृत्यु के समय मैं उनके निकट नहीं था । शायद अंतिम क्षण उनकी आंखें मुझे खोजती रही होगीं ....इसलिए और भोजन मांगने के लिए उन लोगों के तर्क रहे कि जब मैं उनकी मृत्यु से एक दिन पहले इण्टरमीडिएट का प्राइवेट फार्म भरने कानपुर जा रहा था तब उन्होंने अपने लिए लौकी मंगा देने की मांग की थी, जिसे अनुसुना कर मैं चला गया था ..... ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता जी के उन स्वप्नों से मुक्ति के लिए लोग सुझाव देते कि मैं सुबह किसी भिखारी को भोजन करवाऊं या किसी ब्राम्हण को अन्न दान दूं या मंदिर में कुछ दे आऊं । भिखारी को कुछ देना समझ आता, लेकिन मुझ जैसा नास्तिक शेष सलाहों पर मुस्करा देता । अपने हितैषियों के विश्लेषण से अलग मेरा विश्लेषण था और वह चार-छ: बार के अनुभव के बाद तय हुआ था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता जी जब भी सपने में आते..... कुछ दिनों के अंदर मैं किसी न किसी परेशानी का सामना कर रहा होता । वह परेशानी शारीरिक होती , आर्थिक या किसी भी प्रकार की..... और कुछ अवसरों के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहले ही पहुंच लेता कि जिस किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए मैं प्रयत्नशील था उसमें असफलता मिलने वाली थी या स्वयं अथवा परिवार का कोई व्यक्ति बीमार होने वाला था । अंतत: होता भी यही । मेरा निष्कर्ष था कि सपने में पिता का आना इस बात का पूर्वाभास देना था कि कोई न कोई संकट आसन्न है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्दगीभर संघर्षरत रहने वाले पिता शायद मृत्योपरांत भी संघर्षों में मेरे साथ थे । सपनों में आकर शायद वह मुझे आगाह करते थे । लेकिन यह भी सही है कि समस्या या संकट कितना ही गहन क्यों न रहा हो मैं हर बार उससे उबरता रहा हूं । तो क्या वह आगाह कर मेरी रक्षा करते रहे । स्वप्न विश्लेषक होता तो यह जानने का प्रयत्न करता । एक समय आया कि उनके स्वप्न में आने के बाद सुबह ही मैं यह घोषणा कर देता कि कोई संकट संभावित है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इस बार.... इतने वर्षों बाद, बिल्कुल अलग वेश-भूषा ... लकदक कपड़ों में पिता का आना मुझे अच्छा लगा । सपना मैं भूल गया ... याद रहा केवल उनका वह परिधान जिसमें कलकत्ता में या छुट्टियों में गांव आने में उन्हें देखता था । सुबह मन आशंकित हुआ कि क्या घटित होने वाला है .... उनका आना किस बात की ओर संकेत है ! सोचता रहा और सोचता रहा पिता के बीहड़ जीवन के बारे में जो उनसे , चाचा (काका) और मां से जाना था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;******&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता का प्रारंभिक और अंतिम जीवन अत्यंत संघर्षमय रहा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे पितामह कानपुर के रावतपुर (मसवानपुर) के रहनेवाले थे, जो जी0टी0 रोड पर अवस्थित है और अब शहर के मध्य में है । पितामह नवाबगंज थाने में सिपाही थे । वे लंबे और हृष्ट-पुष्ट शरीर के धनी..... शायद छ: फुट से अधिक लंबे और उनके पैर इतने बड़े कि मोची विशेष आदेश पर उनके लिए जूते तैयार करता था । इतने लंबे डील-डौल वाले पिता की संतान मेरे पिता कुल पांच फुट तीन इंच लंबे थे, लेकिन बलिष्ठ थे । शायद मेरी दादी छोटे कद की थीं । दादी की मृत्यु पिता जी के जन्म के ढाई वर्ष बाद हो गयी थी । दादा जी ने दूसरी शादी की । सौतेली दादी कद-काठी में ठीक-ठाक थीं । उनसे जन्में मेरे चाचा की लंबाई भी दादा जैसी थी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दादा ने नवाबगंज थाने के पास अपना बड़ा-सा मकान बनवा लिया था । यह उन दिनों की बात रही होगी जब कानपुर का विस्तार हो रहा था । एक समय कानपुर की बसावट नवाबगंज के आस-पास थी , जिसे आज भी पुराना कानपुर कहा जाता हैं । 1857 की क्रांति के बाद जो नया कानपुर बसा वह परेड के इर्द-गिर्द था। आज जहां आर्डनैंस इक्विपमेण्ट फैक्ट्री है , वहां 1857 में अंग्रेजों का किला था ....कच्ची-पक्की ईटों से निर्मित । इससे कुछ दूर ही है परेड..... जो उन दिनों सैनिकों का परेड ग्राउण्ड हुआ करता था । 1857 की कानपुर का निर्णायक युध्द इसी परेड ग्राउण्ड और किले मध्य हुआ था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नवाबगंज कब बसा ज्ञात नहीं , लेकिन कानपुर का इतिहास 1338 के आसपास से मिलता है । इसे इलाहाबाद के तत्कालीन चन्देल वंशीय राजा कान्हदेव ने बसवाया था । अपने लाव-लश्कर के साथ कन्नोज जाते हुए वह गंगा के किनारे जिस स्थान पर ठहरे थे वह आज के नवाबगंज के पास था । तब वहां निपट जंगल था , लेकिन कान्हदेव को वहां की रमणीकता भा गयी थी । उन्होंने संचेडी (आज कानपुर के पास एक कस्बा) के तत्कालीन राजा को उस स्थान पर एक गांव बसाने के लिए कहा था । जो गांव बसा वह कान्हदेव के नाम पर कान्हपुर कहलाया , जिसका स्वामित्व एक ब्राम्हण को प्राप्त था । उस गांव के स्वामित्व के लिए उसी ब्राम्हण परिवार का मुकदमा मोतीलाल नेहरू और कैलाशनाथ काटजू द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट में लड़ा गया था ('कानपुर का इतिहास' - ले0. नारायण प्रसाद अरोड़ा )। कालान्तर में वही कान्हपुर आज का कानपुर बना ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नवाबगंज में मकान बनाने के बाद दादा का कितना रिश्ता अपने गांव रावतपुर से रहा था यह जानकारी नहीं । नवाबगंज से रावतपुर की दूरी कुछ ही किलोमीटर है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता जब तेरह वर्ष के थे दादा की मृत्यु हो गयी थी । सौतेली दादी मेरे चाचा को लेकर अपने मायके चली गयीं और पिता अपनी एक मात्र बहन के यहां चले गये , जो उनसे कई वर्ष बड़ी और पनकी के पास एक छोटे-से गांव देसामऊ में ब्याही थीं । पिता पढ़-लिख नहीं पाए लेकिन उनकी अपनी स्वतंत्र सोच थी । कुछ दिन बहनोई के साथ उनके खेतों में काम कया, लेकिन बात नहीं बनी । उन दिनों इंच-इंच जमीन की मारा-मारी नहीं थी । गांव के इर्द-गिर्द जंगल फैला हुआ था । बहन से पैसे लेकर पिता जी ने एक जोड़ी भेैसे खरीदे और लगभग दस बीघा जमीन खेती योग्य तैयार की । दो वर्ष खेती की, लेकिन काम-काज में बहनोई का दखल बर्दाश्त नहीं हुआ । हल , भैसे बहन के दरवाजे छोड़ आगरा भाग गए । उन दिनों प्रथम विश्वयुध्द चल रहा था । सेना में भर्ती हो रही थी । तब पिता जी की आयु मात्र सोलह वर्ष थी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता भर्ती के लिए गए और उनका चयन नहीं हुआ । कारण थी उनकी आयु । अठारह वर्ष से कम के युवक को भर्ती नहीं किया जा रहा था । चयन बोर्ड में अंग्र्रेज अफसरों के अलावा एक कुशवाहा साहब भी थे । पिता जी निराश भर्ती कार्यालय के बाहर घूम रहे थे । बाहर निकलने पर कुशवाहा जी ने उन्हें देखा और उन्हें पास बुलाया । पूरी जानकारी के बाद बोले , ''मेरे साथ आओ ।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता उनके पीछे हो लिए । कुछ देर चलने के बाद वह एक लंबे-चौड़े मकान में पहुंचे । वह कुशवाहा साहब का अपना घर था । पिता जी को भोजन करवाने के बाद कुशवाहा साहब बोले , ''घर के पड़ोस में मेरा एक हाता हेै । अभी दिखा दूंगा । छ: भैंसे हैं । छ: महीने तक तुम उस हाते में रहोगे ..... केवल दिसा -मैदान के लिए बाहर जाओगे । एक भैंस तुम्हारे नाम ..... उसका दूध केवल तुम इस्तेमाल करोगे .... दण्ड-बैठक....व्यायाम ...कुश्ती .....केवल अपने शरीर पर ध्यान दोगे....दूसरा कोई काम नहीं । भेैेंसों की देखभाल के लिए आदमी है । तुम्हारे खान-पान की चिन्ता मेरी । छ: महीने बाद फिर भर्ती का प्रयास करना.....तब तुम्हें निराश नहीं होना पड़ेगा ।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुशवाहा साहब ने घी, काजू , पिश्ता , बादाम....अर्थात् सभी प्रकार की पौष्टिक चीजें पिता जी के लिए उपलब्ध करवाई थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे सुनकर आश्चर्य हुआ था कि क्या ऐसे लोग भी थे जो एक अपरिचित युवक के लिए इतना करते थे । सौ वर्षों में हम कहां से कहां पहुंच गए !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता जी ने कुशवाहा साहब की आज्ञा का पालन किया । छ: महीने में ही उनका शरीर खिल उठा था । दूसरी बार भी चयन बोर्ड में कुशवाहा साहब थे । उन्होंने पहले ही बता दिया था कि पिता जी अपनी उम्र उन्नीस वर्ष बताएगें । कुछ अन्य बातें भी उन्होंने बतायी थीं। इस बार पिता जी सेलेक्ट हुए और कुछ दिनों के प्रशिक्षण के बाद इटली भेज दिए गए ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहां से विश्वयुध्द समाप्ति के बाद वह लौटे थे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत लौटते ही सेना की नौकरी छोड़ पुन: खेती की ओर रुख किया था । फिर भैसे खरीदे और (उन्हें इस बात की आशंका थी कि बैलों की खेती उनके लिए फलीभूत नहीं होगी) खेती में लग गए । लेकिन कुछ दिनों बाद ही बहनोई की दखलंदाजी से परेशान होकर मुम्बई भाग गए । वहां किसी मारवाड़ी के यहां काम किया । स्पष्ट है कि कोई छोटा काम ही रहा होगा..... घरेलू नौकर जैसा । एक दिन उस मारवाड़ी के घर के आंगन में नाली के पास उन्होंने लगभग एक सेर सोना पड़ा देखा । उन्होंने उसे उठाकर मारवाड़ी को दे दिया । उनकी ईमानदारी से मारवाड़ी ने उन्हें बख्शीश देना चाहा, लेकिन उन्होंने उसे लेने से इंकार कर दिया और नौकरी छोड़ दी। उन्हें मारवाड़ी के पेशे पर संदेह हो गया था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुन: एक बार कानपुर वापसी । फिर गांव.....फिर चख-चख और पुन: प्रस्थान ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;******&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार पिता जी जा पहुंचे कलकत्ता । आज जिस प्रकार बिहार-उत्तर प्रदेश के लोग दिल्ली दौड़ रहे हैं ... उन दिनों कलकत्ता उनका शरणस्थल था । कई दिनों तक इधर-उधर भटकने के बाद जीने का जुगाड़ सोचा । भद्र बंगाली समाज सुबह नीम की दातून आज भी पसंद करता है .... उन दिनों पसंद करने वालों की संख्या बहुत अधिक थी । उन दिनों जीविका का यह एक अच्छा साधन था और आज की भांति नीम के पेड़ों का संरक्षण भी न था । पिता ने लंबे समय तक सड़क किनारे सुबह-सुबह दातून बेचकर जीविका चलायी । कुछ समय बाद किसी परिचित के माध्यम से पश्चिम बंगाल पुलिस में भर्ती हो गए । दो वर्ष नौकरी की । एक बार वह और उनका साथी सिपाही एक चोर को ट्रेन से आसनसोल ले जा रहे थे । चोर को हथकड़ी लगी हुई थी और एक ने उसकी जंजीर पकड़ रखी थी । रात गहराई तो दोनों साथी खिड़की के रास्ते आ रही शीतल बयार में झपकी लेने लगे । एक जगह ट्रेन धीमी हुई और चोर ने आहिस्ते से जंजीर छुड़ाई और अंधेरे में कूद गया । साथ के यात्री ने इन्हें जगाया । जंजीर खींचकर ट्रेन रोकी । दोनों टार्च की रोशनी में जंगल छानते रहे , अपनी झपकी को कोसते रहे और स्वयं जेल के सीखचों के पीछे जाने की कल्पना करते रहे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह दोनों एक गांव के बीच से निकले । भाग्य ने साथ दिया । एक लोहार की दुकान पर नजर पड़ी और दोनों चौंके । चोर लोहार से अपनी हथकड़ी कटवा रहा था । बाज की तेजी से झपठकर दोनों ने चोर को जा पकड़ा था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आसनसोल से कलकत्ता लौट पिता ने पुलिस की नौकरी भी छोड़ दी थी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार फिर गांव । फिर वही स्थितियां और पुन: कलकत्ता वापसी । पुराने साथियों के सहयोग से वह रेलवे में खलासी नियुक्त हो गए । इस बार मन जमाने का प्रयत्न किया और वर्षों तक देसामऊ नहीं गए । बहनोई की मृत्यु का समाचार मिलने पर कुछ दिनों के लिए गए और अपने खेत जवान भांजे को सौंप वापस लोट गए ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता जी अथक परिश्रमी , बेहद सीधे, सरल, कोमल हृदय और ईमानदार व्यक्ति थे । सुबह चार बजे उठ जाते । कई मील चलकर कालीबाड़ी जाते .... काली दर्शन के लिए, लौटते, चाय पीते और साढ़े छ: बजे लोको वर्कशॉप (हावड़ा) के लिए निकल जाते । शाम छ: बजे के लगभग लौटते । मेरे बचपन के कितने दिन हावड़ा में बीते, यह याद नहीं लेकिन बावनगाछी की याद है मुझे । बहुत खूबसूरत फ्लैट्स थे वे ....तीन मंजिला । मेरा परिवार पहली मंजिल में रहता था । आमने -सामने फ्लैट्स के बीच लगभग सौ फुट चौड़ी जगह थी । रेलवे के वे फ्लैट्स चारदीवारी से घिरे हुए थे । केवल एक ओर... पूर्व का रास्ता खुला हुआ था, जिधर सड़क गुजरती थी और जिसे पारकर मैं पिता जी को प्रतिदिन शाम वर्कशॉप से लौटते देखता था। दक्षिण दिशा की दीवार का कुछ भाग तोड़कर लोगों ने रास्ता बना लिया था जो एक मैदान में निकलता था , जहां से होकर लोग सीधे बाजार जाते थे । कभी -कभी हम बच्चे उस मैदान में खेलने निकल जाते थे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने श्रम और लगन के बल पर पिता जी खलासी से सीढ़ियां चढ़ते हुए फिटर तक पहुंच चुके थे। मेरे जन्म से पहले ही वह फिटर बन चुके थे । कॉलोनी में उनका अच्छा रुतबा और सम्मान था । उस कॉलोनी के कुछ फ्लैट्स अफसरों को अलॉट थे और मैं देखता कि सहयोगियों के बीच ही नहीं बंगाली अफसरों के बीच भी पिता जी 'बाबू जी' के रूप में जाने जाते थे । मां-पिता दोनों ही निरक्षर थे लेकिन वे अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा देखना चाहते थे । उनकी इस लालसा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब भाई साहब पाचवीं में थे पिता जी ने उन्हें नेहरू जी की जीवनी खरीदकर भेंट की थी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े भाई ने जैसे ही गांव से पाचवीं उत्तीर्ण किया पिता जी उन्हें कलकत्ता ले गए और अंग्रेजी ज्ञान न होने के कारण बड़े भाई को पांचवीं में ही प्रवेश दिलाया । पिता जी ने जब 1959 में अवकाश ग्रहण किया , तब भाई साहब ने हाई स्कूल किया था । वह उन्हें रेलवे में बाबू बनवाना चाहते थे । भाई साहब को नियुक्ति मिल रही थी , लेकिन बंगाली चयन अधिकारी ने पिता जी से चार सौ रुपए रिश्वत मांगी, जिसे देने से उन्होंने इंकार कर दिया और बड़े भाई को पिता जी के साथ ही कलकत्ता से प्रस्थान करना पड़ा था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता जी ने मुझे दो बार पढ़ने के लिए स्कूल भेजा । उन दिनों मैं पांच वर्ष के लगभग था । पहला स्कूल घर से बहुत दूर नहीं था । सामान्य-सा विद्यालय था वह । आया मुझे और मेरे पड़ोसी मनभरन , जिन्हें हम काका कहते थे , के छोटे बेटे प्रेमचन्द को लेने आती । मां सजा-धजाकर बड़े चाव से मुझे स्कूल भेजतीं । लेकिन मुझे वहां घबड़ाहट होती । मैंने न पढ़ने का मन बना लिया । लेकिन मन बना लेने से बात बनने वाली नहीं थी । कुछ बहाना चाहिए था और मेरे बाल मन ने बहाना खोज लिया था । मैंने जिद पकड़ ली कि स्कूल नहीं जाऊंगा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''क्यों ?'' पिता , भाई ने पूछा । भाई ने धमकाया भी, लेकिन पिता जी ने प्यार से समझाया था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''क्योंकि वहां जमीन पर बैठाते हैं ......फट्टे पर ।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''सभी बच्चे बेैठते हैं ....तुम्हारे लिए कुर्सी मेज थोड़े लगाई जाएगी .....कोई अनोखे हो!''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े भाई की इस बात पर मैं रोने लगा था । मुझे यह सब आज भी ज्यों का त्यों याद है। पिता जी ने भाई को डांटा , मुझे पुचकारा , मां ने सहलाया और समझाया , लेकिन बाल जिद .... नहीं का मतलब था नहीं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्कूल का प्रिन्सिपल , जो एक बिहारी बाबू थे , मिस्टर सिन्हा , आया से मेरे स्कूल न आने का कारण जान समझाने - रिझाने घर दौड़े आए । तरह-तरह के लालच दिए , पर मैं जिद पर अटल रहा। लेकिन बड़े भाई छोड़ने वाले नहीं थे । वह जिस हायर सेकेण्डरी स्कूल से हाई स्कूल कर रहे थे , उसके पास एक अच्छा-सा स्कूल था ... मेज कुर्सी .... अच्छे स्मार्ट अध्यापकों और अच्छी ड्रेस वाला । बड़े भाई ने कैसे जुगाड़ बनाया, पता नहीं, लेकिन उन्होंने मुझे वहां प्रवेश दिला दिया । अब बचने का कोई रास्ता नहीं था । बड़े भाई के साथ बस से जाने-आने लगा । वहां मेरा मन भी लगने लगा । इसका एक कारण और था । बड़े भाई हर दिन लंच में मेरे पास आते और कभी लड्डू तो कभी कोई अन्य मिठाई मुझे दे जाते । घर में वह मुझे अंग्रेजी पढ़ाते और पढ़ाई से बिदकने वाला मैं पढ़ने लगा था । लेकिन सत्र समाप्ति से पूर्व ही अकस्मात मां को गांव जाना पड़ा और मुझे और मेरी छोटी बहन को भी उनके साथ लौटना पड़ा। उसके बाद की मेरी पढ़ाई गांव में ही हुई ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन दो बातों के उल्लेख के बिना बात अधूरी ही रहेगी । यद्यपि पिता जी का सम्पूर्ण जीवन ही किसी उपन्यास की मांग करता है, लेकिन संक्षेप में दो घटनाओं का उल्लेख करना चाहता हूं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहली घटना मां ने बतायी थी । उन दिनों बड़े भाई छोटे थे और पिता जी के पास रेलवे का छोटा मकान था । उन दिनों उनकी डयूटी शिफ्ट में रहती थी । वह रात शिफ्ट में थे और वेतन का दिन था वह । उस दिन वह रेलवे लाईन के साथ शाम वर्कशॉप जा रहे थे। रास्ते में उन्हें उनका एक सहयोगी मिला, जो दिन की शिफ्ट करके लौट रहा था । दोनों ने पांच मिनट बातचीत की । सहयोगी घर और पिता जी वर्कशॉप की ओर बढ़ गए । कुछ दूर जाने पर पिता जी को नोटों भरा पर्स मिला । खोलकर देखा .... सोचा और अनुमान लगाया कि वह पर्स कुछ देर पहले मिले सहयोगी का था जिसमें उसका वेतन था । उन्होंने पर्स आफिस में जमा कर दिया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर्स उसी सहयोगी का था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी घटना आंखों देखी है । जाड़े के दिन थे । प्रेमचंद के अतिरिक्त कॉलोनी में मेरा कोई साथी नहीं था । बड़े भाई के साथियों की संख्या पर्याप्त थी । शाम बीच के मैदान में वह अपने मित्रों के साथ वॉलीवाल खेलते...नियमत: । मैं सजधज कर -- कोट-पैण्ट पहन फ्लैट के नीचे सीढ़ियों के साथ बने छोटे चबूतरे पर बैठ उन्हें खेलता देखता । उस दिन मेरी दृष्टि सड़क की ओर से आ रहे काफ़िले पर जा टिकी । चार लोगों ने चारपाई थाम रखी थी और साथ कम से कम दस-पन्द्रह लोग थे । काफ़िला निकट आया । भाई और उनके साथियों का खेल थम गया । पता चला चारपाई पर घायल पिता थे । क्रेन से वह किसी डिब्बे को उठा रहे थे कि क्रेन का पहिया टूटकर उनकी छाती पर आ गिरा था । खून से लथपथ पिता सामने ....भाई किंकर्तव्यविमूढ़ । पूरी कॉलोनी इकट्ठा थी ....सिर ही सिर ...शोर और चीत्कार करती मां । उसके बाद क्या हुआ मैं जान नहीं पाया । बाद में कितने ही दिन मैं भाई के साथ रात रेलवे अस्पताल जाता रहा था । पिता जी स्वस्थ हो गये थे, लेकिन भारी-भरकम पहिए ने उन्हें जो आंतरिक चोट पहुंचाई थी , कालांतर में वही उनकी मृत्यु का कारण बनी थी । उस घटना के कुछ दिनों बाद उनका प्रमोशन हुआ ....... ड्राइवर के रूप में । वह मालगाड़ी चलाने लगे और उसी पद से उन्होंने अवकाश ग्रहण किया था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;******&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अवकाश ग्रहण के बाद पिता जी ने गांव में बसने का निर्णय किया , जबकि उनके साथियों ने उन्हें कलकत्ता में रुकने का आग्रह किया था । तीन हजार का एक अच्छा-सा मकान भी उन्हें मिल रहा था । पैसा भी था, लेकिन मां गांव रहना चाहती थीं । मां को उनके चाचा (कंचन सिंह गौतम) ने तेरह बीघे खेत दे दिए थे और मकान बनाने की जगह । नाना के पास यह जमीन अतिरिक्त थी । गांव में सर्वाधिक उपजाऊ खेत उन्हीं के पास थे , लेकिन जो जमीन उन्होंने मां को दी थी वह ऊंची -नीची और चरीदा थी, जिसे कभी उपजाऊ नहीं बनाया जा सका । पिता जी ने अपने गांव देसामऊ में जो खेत भांजे को जोतने-बोने और उनके लौटने पर उन्हें लौटा देने के लिए दिए थे उस भांजे ने कोर्ट में उन्हें मृत घोषित कर (शपथ पत्र देकर) वे खेत अपने नाम लिखा लिए थे । लोगों ने पिता जी को जब भांजे पर मुकदमा करने की सलाह दी तब उन्होंने उत्तर दिया ,'' भांजा बेटा समान होता है ...... उससे कैसा मुकदमा !''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कानपुर शहर से सटे उन दस बीघे खेतों की कीमत आज लगभग ढाई-तीन करोड़ रुपए है । उसी प्रकार मेरे पितामह का जो मकान नवाबगंज में था पिताजी की उदासीनता के कारण नगर महापालिका ने उसे अपने अधिकार में ले लिया था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;******&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांव आकर कलकत्ता के बाबू जी पूरे किसान हो गए थे और गांव में 'चंद्याल' के नाम से जाने जाने लगे । नौकरी करने के दौरान जब भी वह गांव आते (मेरा ननिहाल ही मेरा गांव है ) हर दिन किसी न किसी के घर आमंत्रित रहते । एक युवा नाई, जिसका नाम मैं भूल गया हूं , सप्ताह में दो बार उनकी तेल-मालिश करने आता और बाबू जी मुक्त हस्त पैसे खर्च करते । मां के ठाठ सदैव शाही रहे । बनारसी साड़ी से नीचे कुछ नहीं पहना और यह सब 1962 तक चला । पिता जी ने भले ही खेती में झोंक अपने को माटी कर लिया था , लेकिन मां और हम सब तब तक अच्छा जीवन जीते रहे जब तक अवकाश प्राप्त होने के समय एक मुश्त मिला पैसा समाप्ति की कगार पर नहीं पहुंचा । लेकिन पिता जी ने शायद पहले ही यह स्थिति भांप ली थी । उन्होंने दुधारू गाएं , भैसें पाल ली थीं .... खेती करने के भैसों के साथ । उन दिनों तेरह जानवर थे मेरे यहां । कुछ खेत तिहाई में दिए जाते और कुछ वह स्वयं करते । लेकिन नाले के किनारे होने के कारण भयानक जाड़े में खेतों को पाला मार जाता और फसल के नाम पर जो मिलता उससे लागत बमुश्किल निकल पाती ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलकत्ता की अपनी आदत के अनुसार पिता सुबह चार बजे जागते । अब गाय-भैसों की सेवा उनके लिए काली दर्शन था । कुट्टी काटते, सानी तेैयार करते और साढ़े पांच बजे तक हसिया फावड़ा ले खेतों की ओर निकल जाते । जानवर घर से कुछ दूर पसियाने के बीच बने बड़े से घेर में रहते थे और पिता भी वहीं सोते थे । उनके खेतों की ओर जाने से पहले ही गाय-भैंसों का दूध निकालने या दूधिया से निकलवाने के लिए मां बालटी लटका घेर पहुंच जाती थीं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता जी के रिटायरमेण्ट की राशि खत्म होने के बाद और बड़े भाई की नौकरी लगने तक घर का खर्च गाय-भैंसों के कटता दूध से ही चला था । मुक्त भाव से लोगों को चीजें देने वाले ....ठाठ-बाट से रहने वाले पिता जवान बेटे की उतारन पहनने के लिए विवश थे ,लेकिन उन्हें कभी खीझते-झींकते ...दुखी होते या शिकायत करते नहीं देखा । 'दुखे-सुखे समेकृत्वा' वाला भाव रहता उनके चेहरे पर । जानवरों के लिए सानी आदि तैयार करते हुए ऊंची आवाज में भजन गाते रहते तरन्नाम में ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1967 में पहली बार उनके फेफड़ों में फोड़ा हुए । खांसी के साथ बलगम नहीं मवाद निकलता । शहर में दिखाया गया । इंजेक्शन ....लगभग एक सौ इंजेक्शन लगे । चार महीने लगे ठीक होने में । ठीक होते ही पुन: काम । डाक्टरों ने शायद उनके मर्ज को टी.बी. समझाा था । जबकि छाती पर वर्षों पहले गिरे क्रेन के पहिए के जख्म से उन्हें फेफड़ों का कैंसर हो गया था । इंजेक्शन ने कुछ समय के लिए कष्ट मुक्त कर दिया था । लेकिन तीन वर्ष बाद पुन: वह उभरा और इस बार जानलेवा साबित हुआ । बलगम के स्थान पर जो पस वह उगलते उसमें इतनी बदबू होती कि घर का कोई भी व्यक्ति उनके निकट ठहरने से कतराता । मां भी घबड़ाती, लेकिन मैं रात-दिन उनकी सेवा में रहा । मिट्टी के बड़े बर्तन में राख डाल दी गई थी । जब भी उन्हें खांसी आती मैं उनके सिर के नीचे हाथ लगा उन्हें आधा उठाता और राख भरा मिट्टी का बर्तन उनके मुंह के पास कर देता । उनके थूकने के बाद साफ कपड़े से उनका मुंह साफ करता । लगभग डेढ़ महीना यह सिलसिला चला था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;19 सितम्बर, 1970 को सुबह इंटरमीडिएट का फार्म भरकर (20 सितम्बर अंतिम तिथि थी) 21 को वापस लौट आने की बात उनसे कहकर मैं कानपुर गया । लेकिन बीस सितम्बर की रात मेरे छोटे बहनोई ने कानपुर पहुंच मुझे उनके दिवगंत होने की सूचना दी थी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मृत्यु के समय मैं उनके अंतिम दर्शन से वंचित रहा था । क्या इसीलिए वे मेरे सपनों आते रहे । लेकिन उनके आने का जो विश्लेषण मैंने किया था इस बार भी वह सही सिध्द हुआ । मध्य मई में मेरा एक अत्यावश्यक कार्य सम्पन्न होना था , जो नहीं हुआ । पिता शायद उसका पूर्वाभास देने आए थे ।&lt;br /&gt;******&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2880097249222214869-7375562528084456049?l=wwwrachanayatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/feeds/7375562528084456049/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2880097249222214869&amp;postID=7375562528084456049' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/7375562528084456049'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2880097249222214869/posts/default/7375562528084456049'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wwwrachanayatra.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='यादों की लकीरें'/><author><name>Roop Singh Chandel</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07746336325719389687</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S_czFPWGNYI/AAAAAAAAAP0/Wh2MGHz2tIY/S220/Chandel-2.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/TAySRrf4AII/AAAAAAAAAQU/ovNccRoRhFE/s72-c/b%27ful+pic+3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2880097249222214869.post-7889829398091100873</id><published>2010-04-25T17:46:00.000-07:00</published><updated>2010-04-25T18:03:03.705-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्मरण'/><title type='text'>यादों की लकीरें</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S9Ti02YwsMI/AAAAAAAAAPM/4vXvt8DUYt0/s1600/10.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5464241645487698114" style="WIDTH: 129px; CURSOR: hand; HEIGHT: 125px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_HbKD6q6mQoU/S9Ti02YwsMI/AAAAAAAAAPM/4vXvt8DUYt0/s200/10.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;संस्मरण &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;एक किस्सागो से मुलाकात &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;रूपसिंह चन्देल&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संस्मरणों की इस श्रृंखला में मैंने कुछ साहित्यकारों पर लिखा तो उन लोगों पर भी जिनका साहित्य से दूर का भी रिश्ता नहीं था । जिन साहित्यकारों पर लिखा उन्होंने किसी न किसी रूप में मुझे प्रभावित किया और दूसरे लोगों की मेरे जीवन में कुछ स्मरणीय भूमिका रही । सभी पर लिखने के अपने कारण रहे लेकिन मुख्य कारण उन पर लिखकर उन सबकी स्मृतियों को जीने का सुख प्राप्त करना रहा ।  मैं आज जो हूं उसके निर्माण में जिन लोगों की सकारात्मक भूमिका रही उन्हें याद करना उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के अतिरिक्त कुछ नहीं है । उनमें से एक नाम डॉ0 शिवतोष दास का  है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ0 दास दुबले , पांच फीट छ: या सात इंच लंबे , चमकदार आंखों और चपटे ---कुछ लंबोतरे चेहरे वाले व्यक्ति थे । उनकी भौंहों पर घने बाल थे । मुंह में बनारसी पान , दाहिने हाथ में छाता (जैसा कि प्राय: बंगाली भद्र लोगों में देखने को मिलता है ) , और बायें में रेड वाइन कलर का चमड़े का बैग .....पैर में चप्पलें और ढीले पैण्ट पर बाहर निकली शर्ट...... वह प्रतिदिन सुबह आठ बजे मुझे शकितनगर बस स्टैण्ड पर दो सौ चालीस नंबर बस की प्रतीक्षा में पंक्ति में खड़े दिखते । यदि मुझे आते हुए नांगिया पार्क के मोड़ पर देख लेते तब चीखते .......''आसून.....आसून.....।'' और मैं दौड़ लेता । लेकिन यदि उस बस में मेरे लिए सीट मिलने की  संभावना न होती तब वह भी बस छोड़ देते और हम दूसरी बस में होते जो दस मिनट बाद जाने वाली होती । उन दिनों शक्तिनगर से सेण्ट्रल सेक्रेटरिएट के लिए प्रत्येक दस मिनट में दौ सौ चालीस नंबर बस शक्तिनगर से चलती थी और यात्री अनुशासन में पंक्तिबध्द बस में चढ़ते थे । आज की भांति अनुशासन-हीनता नहीं थी । आज बसों के लिए दिल्ली में कहीं कोई पंक्ति नहीं दिखती और यदि होती भी है तो बस के आते ही वह बिखर जाती है । सभ्यता के मुखौटे में दिल्ली इन तीस वर्षों में इतनी असभ्य .....इतनी संवेदनशून्य और खुदगर्ज हो गयी है कि सभी एक दूसरे के कंधे पर चढ़कर निकल जाना चाहते हैं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहित्य भी अपवाद कैसे रह सकता था । हालंकि जड़ें काटने वाले लोग तब भी थे , लेकिन आज जैसी गलाकाट स्थिति न थी । तब एक -दूसरे की सहायता के लिए अधिक हाथ आगे बढ़ते थे और नि:स्वार्थभाव से .... आज ऐसे हाथ हैं लेकिन संख्या कम हो गयी है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिवतोष दास से मेरा परिचय डॉ0 रत्नलाल शर्मा ने करवाया था । दास साहब कमला नगर में ई-135 में रहते थे , जबकि डॉ0 शर्मा शक्तिनगर में आनाज गोदाम के पास गंदा नाले की ओर रहते थे ....... मेरे घर से दस मिनट के रास्ते पर । परिचय के मामले में मैं सदैव संकोची रहा हूं । स्वयं आगे बढ़कर परिचय करने से आज भी बचता हूं । संभव है इसे लोग मेरा अहंकार मानते हों या कुछ और लेकिन मैं आज भी अपनी इस आदत का शिकार हूं । एक बार परिचय होने के बाद अपनी ओर से उसके निर्वाह की भरपूर कोशिश करता हूं ......। रिश्तों में कांइयापन मुझे स्वीकार नहीं.....इसका अहसास होते ही कोई कितना ही बड़ा लेखक-व्यक्ति क्यों न हो उससे दूर छिटक लेने में मैं समय नष्ट नहीं करता ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन दिनों मेरे पास पढ़ने के लिए बहुत कुछ होता था ....खासकर कथा-साहित्य । दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी , मारवाड़ी पुस्तकालय (चांदनी चौक) ,और केन्द्रीय सचिवालय पुस्तकालय का मैं स्थायी सदस्य था और दिल्ली विश्वविद्यालय और साहित्य अकादमी पुस्तकालयों का अस्थायी । शक्तिनगर से आर।के। पुरम तक की मेरी एक ओर की यात्रा में दो बसें बदलकर डेढ़ -पौने दो घण्टे लगते थे । आते -जाते मुझे तीन-साढ़े तीन घण्टे मिलते , जिसमें मैं किसी भी कृति के सत्तर-अस्सी पृष्ठ पढ़ लेता । डॉ0 रत्नलाल शर्मा समाज कल्याण विभाग में डिप्टी डायरेक्टर थे , जो उन दिनों संसद मार्ग में था । वह प्रतिदिन मुझे पढ़ते देखते ..... और महीनों देखते रहे । बस में उनके परिचितों की संख्या बहुत थी और प्राय: वह आगे बैठते , जबकि मैं जानबूझकर बीच में या पीछे बैठता । कई महीनों बाद डॉ0  शर्मा ने मेरे बारे में पूछ लिया । वह आलोचक थे ...... उन्होंने अपना परिचय उसी रूप में दिया था , लेकिन उन्हें उनके मित्र आलोचक मानने को तैयार नहीं थे । उनके मित्रों में डॉ0 विनय , डॉ0 कमलकिशोर गोयनका , डॉ0 रामदरस मिश्र , डॉ0 हरदयाल , डॉ0 नरेन्द्र मोहन , डॉ0 प्रताप सहगल , डॉ0 अश्वनी पाराशर , डॉ0 सुखबीर ..... थे और  उनके माध्यम से इन सबसे मेरा परिचय हुआ। डॉ0 विनय दास साहब के ब्लॉक में रहते थे और प्राय: इन सबका उनके यहां बैठना होता । इनमें से कोई प्राय: डॉ0 शर्मा को छेड़ देता और वह उत्तेजित हो बैठक छोड़कर विनय के घर की सीढ़ियां उतर जाते । लेकिन ऐसा वह अपने समकालीनों के साथ ही करते । मुझ जैसे युवा और अपने से बहुत जूनियर के प्रति उनका व्यवहार बहुत ही आत्मीय होता था । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ0 रत्नलाल शर्मा ने दास साहब से मेरा परिचय करवाया , ''आर. के. पुरम में केन्दीय हिन्दी निदेशालय में हैं दास साहब ....बड़े लेखक हैं । ''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहली बार केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय नामक संस्था के बारे में जाना और आगे जितना ही जाना यही निष्कर्ष निकाला कि यह संस्था एक सफेद हाथी है ..... हिन्दी के नाम पर जनता के धन का दुरुपयोग करने वाली मृतप्राय: संस्था । डॉ0 दास वहां सहायक शिक्षा अधिकारी थे । उनसे परिचय के बाद सुबह बस में मेरा पढ़ना बंद हो गया । उनके पास संस्मरणों का भंडार था , जिसे वह किसी किस्सागो की भांति सुनाते और सफ़र का पता ही नहीं चलता । मैं सोचता , यह व्यक्ति यदि कथाकार होता तो कितने ही मील के पत्थर गाड़ चुका होता ।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;वह बनारस के रहने वाले थे और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र रहे थे । वहां से उन्होंने मिलटरी साइंस में एम0एस0सी किया था । उनके मुताबिक उन्होंने ओटावा विश्वविद्यालय से पी-एच।डी. की थी और दिल्ली से ओटावा की यात्रा का एक बार नहीं अनेक बार उन्होंने आकर्षक वर्णन किया था ..... फिर विश्वविद्यालय जीवन का भी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''इतनी योग्यता के बाद भी आप केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय जैसे अर्थहीन संस्था में.....और वह भी ग्रुप-बी गज़टेड अफसर के रूप में क्यों सड़ रहे हैं ?'' एक दिन मैंने पूछ लिया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''सब किश्मत का खेल है चंदेल जी ।'' मुंह में पान चभुलाते हुए उन्होंने कहा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके बैग में कई बीड़े पान रहते , जो वह घर से लगवा लाते थे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके साथ रिसर्च असिस्टैण्ट बनकर नौकरी प्रारंभ करने वाले लोग इधर-उधर घूमकर वहां निदेशक बने.... डॉ0 रणवीर रांग्रा वहां एक मेसेंजर के पद पर नियुक्त हुए और कहीं न जाकर वहीं निदेशक के पद तक पहुंचे । 'कोई रहस्य है.........दास साहब कुछ छुपा रहे हैं' मैं सोचता लेकिन उस विषय में मैंने कभी कोई चर्चा नहीं की । मैं उनके किस्से सुनकर ही प्रसन्न था । लेकिन जाड़े के एक दिन डॉ0 रत्नलाल शर्मा ने दिल्ली विश्वविद्यालय के रिसर्च फ्लोर की छत पर धूप में बैठकर चाय पीते हुए कहा , ''डॉ0 दास ने पी-एच0डी0 नहीं की ..... होम्योपैथ का सार्टीफिकेट है उनके पास ।''  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छठवें -सातवें दशक में लखनऊ से होम्योपैथ और आयुर्वेद के प्रमाणपत्र सहजता से मिल जाया करते थे । संभव है डॉ0 शर्मा सच कह रहे हों लेकिन इस विषय में मेरी रुचि नहीं थी । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल गाहे-बगाहे दास साहब मेरे घर आने लगे थे । उनकी पत्नी मीना दास आर्टिस्ट थीं और दिल्ली दूरदर्शन द्वारा निर्मित घारावाहिकों में उनकी कोई न कोई भूमिका होती थी । प्राय: वह कृषि-दर्शन में किसी से बातचीत करती दिखतीं । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1982 , फरवरी में कानपुर की बाल-कल्याण संस्था ने बाल साहित्य में दास साहब के योगदान के लिए उन्हें सम्मानित किया । वह मुझे भी अपने साथ ले गये ....''आपका शहर है .... अपका साथ अच्छा लगेगा । ''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुरस्कार पाकर वह बहुत प्रसन्न थे और शायद वह उनके जीवन का प्रथम और अंतिम पुरस्कार था । उन दिनों उन्होंने अपनी पुस्तकों की जो साइक्लोस्टाइल्ड प्रति मुझे दी थी उसमें तब तक उनकी बाल साहित्य की प्रकाशित पुस्तकों की संख्या चौसठ थी । उनकी पुस्तकें किताबघर , आर्य बुक डिपो, , प्रकाशन विभाग (भारत सरकार ) , पेनमेन पब्लिशर्स  आदि से प्रकाशित हुईं थीं , जिनमें आदिवासियों और जन-जातियों पर अनेक बड़ी पुस्तकें भी थीं । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1982 में एक दिन बस में उन्होंने मुझे एक प्रस्ताव दिया , '' आप हमारी संस्था के लिए कोई पुस्तक क्यों नहीं लिखते ?''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''मैं.......।'' मैं चौका था , क्योंकि तब तक मैं साहित्य में अपने पैर जमाने की कोशिश कर रहा था और 'विशाल साहित्य सदन ' , नवीन शाहदरा से मेरा बालकहानी संग्रह - ''राजा नहीं बनूंगा'' ही प्रकाशित हुआ था । 'यत्किंचित' के कवि के रूप में मैं फ्लाप घोषित किया जा चुका था और कवि होने के मुगालते से बाहर आ चुका था । अब कथा साहित्य ही मेरी दुनिया थी । तब तक कोई प्रकाशक मुझे पहचानता नहीं था .... बल्कि उनकी दृष्टि में मैं लेखक था ही नहीं । 'प्रभात प्रकाशन' के श्यामसुन्दर जी ने उन्हीं दिनों बहुत ही शालीनता से कहा था , '' न ....न .... अभी आप अपने को लेखक न कहें .....अभी तो आपने लिखना शुरू ही किया है .....।'' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात गलत नहीं थी । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस वास्तविकता से वाकिफ़ मेरे लिए दास साहब का प्रस्ताव आश्चर्यचकित करने वाला था । बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा ''निदेशालय की एक योजना है प्रकाशकों के सहयोग से पुस्तक प्रकाशन की । पाण्डुलिपि आप निदेशालय में किसी प्रकाशक के माध्यम से प्रस्तुत करेंगे । निदेशालय तीन विद्वानों से उस पर राय लेगा । स्वीकृत होने पर  प्रकाशक को तीन हजार प्रतियां प्रकाशित करनी होगीं । निदेशालय उसमें से एक हजार प्रतियां खरीद लेगा । प्रकाशक लेखक को उन एक हजार की तुरंत रायल्टी देने के लिए बाध्य होता है ।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझ जैसे नये लेखक के लिए योजना आकर्षक थी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''फिर कहानियों का संग्रह प्रस्तुत कर देता हूं ।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''नहीं , कथा-साहित्य नहीं....कुछ और विषय सोचिए .....।''उस  दिन बात यहीं समाप्त हो गयी । लगभग एक सप्ताह बाद उन्होंने पूछा ,''विषय सोचा ?''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''नहीं ।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''आप अपराध विज्ञान पर पुस्तक लिखें ।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'' मैं और अपराध विज्ञान ..........यह तो मज़ाक हो गया ।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''नहीं.....मेरे पास इस विषय पर पर्याप्त सामग्री है ।'' चेहरे पर गंभीरता ओढ़ वह बोले , ''भाभी जी (मेरी पत्नी) दिल्ली विश्वविद्यालय पुस्तकालय में हैं ..... उनकी सहायता लें । आप स्वयं अनेक पुस्तकालयों के सदस्य हैं ...... बहुत अच्छा रहेगा । एक बार लगकर काम कर जायें .....पुलिस विभाग , क्राइम ब्रांच ....सर्वत्र आपकी पूछ बढ़ जाएगी । '' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''भाड़ में जाये  पूछ .....मुझे कहानियां ही लिखने दीजिए ।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन वह पीछे पड़ गये और एक दिन ढेर-सी सामग्री मेरे घर छोड़ गये । विषय भी सुझा दिया -- ''अपराध : समस्या और समाधान ।'' मैंने उनकी दी सामग्री का अध्ययन किया । पत्नी की सहायता ली । अन्य पुस्तकालयों से अपराध संबन्धी डॉटा इकट्ठा किया । मनोवैज्ञानिकों के अपराध संबन्धी वियारों का अध्ययन किया और कार्य प्रारंभ किर दिया । छ: महीनों तक मैंने कोई अन्य साहित्यिक कार्य नहीं किया । पाण्डुलिपि टाइप करवाकर दास साहब को सौंप दी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''मुझे नहीं ..... मेरे मित्र प्रकाशक हैं सुखपाल जी .... आर्य बुक डिपो , करोल बाग ....उन्हें दे आइये । पेमेण्ट के मामले में वह ईमानदार हैं । आजकल इस प्रोजेक्ट को मैं ही देख रहा हूं । मैं उन्हें कह दूंगा । ''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पण्डुलिपि मैं सुखपाल जी को दे आया । मैं प्रसन्न था कि दिल्ली में एक ढंग के प्रकाशक से परिचय हुआ । यह तो बाद में जाना कि वह साहित्य के नहीं स्कूलों की पुस्तकें प्रकाशित करते थे । &lt;br /&gt;पण्डुलिपि केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय से स्वीकृत हो गयी । पत्र मुझे और आर्यबुक डिपो के पास आया । दास साहब से पूछा , ''अब ?''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''जाकर अनुबंध करो । '' कुछ देर चुप रहकर बोले , ''सुखपाल जी से कहना कि वह आपको अनुबंध के साथ तीन हजार रुपये अग्रिम दें ।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दास साहब की सलाह मान मैं सुखपाल जी से मिला । मेरा प्रस्ताव सुनते ही वह उत्तेजित स्वर में बोले , ''अग्रिम मैं किसी को नहीं देता .....आपको तो बिल्कुल ही नहीं , क्योंकि आपसे मेरा अधिक परिचय नहीं है । फिर तीन हजार ......।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लौटकर मैं सीधे दास साहब के घर गया । पता चला वह घर में नहीं थे । हालांकि कभी-कभी वह होकर भी मना करवा देते थे । एक बार का ऐसा ही प्रसंग उन्होंने सुनाया था । उनके पास ढाई कमरे थे किराये पर । छोटे कमरे को उन्होंने स्टडी बना रखा था । उसका निकास ड्राइंगरूम से था । वह स्टडी में कुछ लिख रहे थे । कोई मित्र मिलने आ गया । मीना जी ने कहा , ''वह बाहर गए हैं ।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''कोई बात नहीं भाभी जी ....मैं उनके आने का इंतजार करूंगा ।'' और मित्र महोदय बैठ गये । जाड़े के दिन.....दास साहब लिखने के फेर में पेशाब टालते रहे थे ....'' अब .....'' वह सोचने लगे । दो घण्टे तक उन पर क्या बीती होगी , कल्पना की जा सकती है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह बस में पूरा विवरण सुनकर वह बोले ,'' आप फोन करके सुखपाल जी को कह दें कि यदि वह अग्रिम राशि देंगे तभी पाण्डुलिपि उनके यहां से प्रकाशित होगी ..... अन्यथा आप किसी अन्य प्रकाशक को दे देंगे । यदि वह नहीं छापते तो लिखकर दे दें ।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने दास साहब के निर्देश का पालन किया । सुखपाल भले प्रकाशक थे । लिखकर देने के लिए तैयार हो गये । इधर दास साहब ने किताबघर के श्री सत्यव्रत शर्मा से उसे प्रकाशित करने की चर्चा की और वह तैयार हो गये । लेकिन मुझे अग्रिम तीन हजार नहीं डेढ़ हजार ही देने के लिए तैयार हुए । सत्यव्रत जी अनुबंध करने के लिए दास साहब के साथ मेरे घर आये । डेढ़ हजार का चेक पाकर मैं इतना प्रसन्न था कि उस पुस्तक का कॉपी राइट मैंने मीना दास के नाम लिख दिया ... जो आज भी उन्हीं नाम है । हालंकि उसका दूसरा संस्करण आज तक नहीं हुआ  और न ही मेरी उस पुस्तक में कोई रुचि रही । लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि दास साहब मुझे छोटे भाई की भांति मानने लगे । 'अपराध :समस्या और समाधान' के बाद उनके कारण सत्यव्रत जी ने एक साथ मेरी तीन पाण्डुलिपियां प्रकाशनार्थ लीं । एक कहानी संग्रह (पेरिस की दो कब्रें) ,  बाल कहानी संग्रह (अपना घर) और लघुकथा संग्रह (चीख) । लेकिन उन्होंने केवल कहानी संग्रह ही 1984 में प्रकाशित किया । 'अपना घर' बहुत बाद में अभिरुचि प्रकाशन से और 'चीख' संशोधित रूप में 'कुर्सी संवाद' शीर्षक से 1997 में पेनमेन पब्लिशर्स से प्रकाशित हुए ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दास साहब के माध्यम से ही मेरा परिचय जैनेन्द्रे जी के पुत्र प्रदीप जैन से हुआ और प्रदीप ने पूर्वोदय प्रकाशन के लिए मेरा किशोर उपन्यास 'ऐसे थे शिवाजी' लिया । तीन सौ रुपये अग्रिम राशि भी दी । यह 1985 की बात है । लेकिन उन्होंने उसे प्रकाशित नहीं किया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*******&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन दफ्तर में दास साहब का फोन आया , ''चन्देल जी.... तुरंत आइए .....।'' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''क्यों ?''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''इलाहाबाद से सहगल साहब आए हैं .....चांद कार्यालय वाले ।''''चांद कार्यालय .....?''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''अरे भाई, चांद पत्रिका .....आप तो इतिहास में रुचि रखने वाले व्यक्ति हैं ।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं दौड़ गया । सड़क के इस पार-उस पार का फासला । दास सहब मेरे बारे में सहगल साहब से पहले ही हवा बांध चुके थे । यह वह दौर था जब मैं पत्र-पत्रिकाओं में धुंआधार लिख रहा था । दैनिक हिन्दुस्तान के प्रत्येक दूसरे रविवासरीय संस्करण में मेरी एक रचना होती थी । सहगल साहब मेरे नाम-काम से परिचित थे । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''आप चन्देल जी की बाल साहित्य की पुस्तकें प्रकाशित करें ..... ।'' दास साहब बोल रहे थे और ''दीजिए साहब ....मुझे आपको प्रकाशित कर अच्छा लगेगा । '' सहगल साहब ने कहा । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका नाम अशोक कुमार सहगल था । चांद पत्रिका उनके पिता जी निकालते थे , जिसका फांसी अंक सरकार ने जब्त कर लिया था । सहगल साहब ने मेरी चार पुस्तकें प्रकाशित कीं , जिनमें तीन बाल कहानी संग्रह  और 'ऐसे थे शिवाजी' किशोर उपन्यास थे । 1985-86 में चारों की अग्रिम भुगतान के रूप में उन्होंने चार हजार रुपये दिये थे । बाल साहित्य की पुस्तकों की दृष्टि से उन दिनों यह अच्छी राशि थी क्योंकि बड़े-बड़े प्रकाशक बाल साहित्य की पाण्डुलिपियां  मिट्टी भाव खरीदते थे... ढाई -तीन सौ से लेकर पांच सौ में ----सदा के लिए । कर्तार सिंह सराभा' पर मेरे  किशोर उपन्यास 'अमर बलिदान' (1992 ) के साथ राजपाल एण्ड संस ने ऐसा ही किया था और मैं आज तक उसे पुनर्मुद्रित नहीं करवा सका ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि तीन प्रकाशकों से ही डॉ0 शिवतोष दास ने मेरा परिचय करवाया , लेकिन यह उन्होंने तब किया जब इस क्षेत्र में मेरी कोई पहचान नहीं थी । उसके बाद मैं एक के बाद अनेक (अब तक चौदह) प्रकाशकों के संपर्क में आया और दास साहब ने जो जमीन मेरे लिए तैयार की थी .... मैंने मित्रों के लिए करने की कोशिश की । मेरे माध्यम से जब मेरे किसी मित्र की कोई पुस्तक प्रकाशित होती है तब अपनी पुस्तक प्रकाशित होने जैसा सुख मैं अनुभव करता हूं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे और दास साहब के बीच कुछ मुद्दों पर मतभेद भी रहे , लेकिन संबन्धों में कोई फ़र्क नहीं आया । 1987-88 के आस-पास हमारा साथ आना-जाना छूट गया था । कभी-कभार हम मिलते , लेकिन उनमें वही उत्साह.......ल
